फ़ुरसतिया

शनिवार, सितंबर ०४, २००४

नहीं जीतते- क्या कर लोगे?

कल लखनऊ में कानून और व्यवस्था का भरत मिलाप हो गया.
काफी खून बह गया.पुलिस खुश कि गोली नहीं चली.बेचारा जो
दरोगा समझाने की कोशिश में था वो पहले पिटा फिरनिलम्बित.
काम का तुरन्त ईनाम.आपसी मेलजोल बनाये रखने के लिये इस
तरह के सम्बंध कितने जरूरी हो गये है यह इस बात से भी
पता चलता है कि पहले आप-पहले आप वाला शहर भावुकता
त्यागकर पहले हम(पीटेंगे)-पहले हम(पीटेंगे) की क्रान्तिकारी
मुद्रा अपना लेता है.

कल इधर वकील-पुलिस पिटा-पिटौव्वल खेल रहे थे वहीं उधर
भारतीय क्रिकेट टीम अकेले पिट रही थी----ये दिल मांगे मोर
(पिटाई) कहते हुये.

अगर कोई पूंछता तो शायद वो कहते ---नहीं जीतते क्या कर
लोगे?वास्तव में भारतीय "वसुधैव कुटुम्बकम् "की भावना से
इतना भीगे रहते है कि दूसरे की जीत भी अपनी लगती है.ऐसी
उदात्त भावना के सामने जीत जैसी भौतिक चीज इतनी तुच्छ लगती
कि उसके बारे में सोचने में ही अपराधबोध लगता है.

ईश्वर हमें इतना ही महान बनाये रखे.

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