वर्धा-हिंदी का ब्लॉगर बड़ा शरीफ़ टाइप का जीव होता है

वर्धा-हिंदी का ब्लॉगर बड़ा शरीफ़ टाइप का जीव होता है

वर्धा के बारे में लिखने का सिलसिला एक बार टूट गया। बीस दिन पहले हुयी घटना अब लगता है कोई बहुत पहले की बात है।   वर्धा का ब्लॉगर सम्मेलन महात्मा गांधी विश्वविद्यालय वर्धा ने करवाया था। किसी और विश्वविद्यालय ने इस तरह की कोई पहल क्यों नहीं की अब तक क्या यह सोचने की [...]

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वर्धा –कुछ और बातें

वर्धा –कुछ और बातें

आलोक धन्वा जी के बाद बोलने का हमारा नम्बर था। हमने मंच पर पहुंचकर सबसे पहले ब्लॉग जगत से जुड़े अपने पुराने साथियों को याद किया। रविरतलामी, देबाशीष चक्रवर्ती, आलोक कुमार, जीतेन्द्र चौधरी और पंकज नरूला। इसके बाद मैंने सिद्धार्थ त्रिपाठी की जमकर तारीफ़ की। सिद्धार्थ ने ब्लॉगिंग से जुड़े तीन सम्मेलन कराये हैं। तीनो [...]

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वर्धा  – कंचन मृग जैसा वाई-फ़ाई

वर्धा – कंचन मृग जैसा वाई-फ़ाई

….हां तो बात वर्धा सम्मेलन की हो रही थी। लोगों से मिलते-बतियाते-गपियाते हम उसई बड़े अंगने में बैठे रहे। दो-तीन चाय खैंच डाली। सेल्फ़ सर्विस रही। उड़ेल के केतली से कप में चीनी मिलाकर पीते रहे। लोग आपस में मिल-मिलाकर बतियाना-चहकना शुरू कर दिये थे। अविनाश वाचस्पति को चैन कविता जी मिलने की उत्सुकता थी [...]

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…अथ वर्धा ब्लॉगर सम्मेलन कथा

…अथ वर्धा ब्लॉगर सम्मेलन कथा

…और इस तरह संपन्न हुआ वर्धा ब्लॉगर सम्मेलन! लोगों ने अपने अपने अनुभव लिखे। अच्छे। खराब! जो लोग वहां थे उन्होंने अपने अनुभव लिखे। ज्यादातर लोगों ने आत्मीय और लोगों से मिलकर खुश होने के अनुभव बयान किये। जो वहां नहीं थे वे इधर-उधर से चिंदी-चिंदी बिन-बिन कर अपने  डिजाइनर अनुभव बयान कर रहे हैं। [...]

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…लीजिये साहब गांधीजी के यहां घंटी जा रही है

…लीजिये साहब गांधीजी के यहां घंटी जा रही है

[आज कुछ नया लिखने की सोच रहे थे। फ़िर यह लेख याद आ गया। सोचा आज इसे ही फ़िर से पोस्ट किया जाये। दुबारा। आदतन शुरू में ब्लॉगिंग की बातें हर पोस्ट में लिखते थे। सो इसमें भी बाद में आ गयी हैं। अब वे गैर जरूरी लगती हैं। एक तिहाई हिस्सा गैरजरूरी हो गया। [...]

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…तुम मेरे जीवन का उजास हो

तुम मेरे जीवन का उजास हो! न जाने कब मेरे मन आयी होगी पहली बार यह बात लेकिन अब इसे मैं फ़िर फ़िर दोहराता हूं सोचता हूं फ़िर दोहराता हूं। सच तो यह है कि मुझे पता भी नहीं ठीक-ठीक मतलब उजास का लेकिन कुछ-कुछ ऐसा लगता है कि इसका मतलब होता है रोशनी जिसमें [...]

…स्वेटर के फ़ंदे से उतरती कवितायें

१.वे लिख रहे हैं कवितायें जैसे जाड़े की गुनगुनी दोपहर में गोल घेरे में बैठी औरतें बिनती जाती हैं स्वेटर आपस में गपियाती हुई तीन फ़ंदा नीचे, चार फ़ंदा ऊपर* उतार देती हैं एक पल्ला दोपहर खतम होते-होते हंसते,बतियाते,गपियाते हुये। औरतें अब घेरे में नहीं बैठती, आपस में बतियाती नहीं, हंसती,गपियाती नहीं स्वेटर बिनना तो [...]