मुट्ठी में इंद्रधनुष

 जीतू की  होली

आज जीतेंदर का फोटो देखा। पूरे कादर खान लग रहे हैं । कादर खान, जिनके मुंह से दादा कोंडके का कोई डायलाग बस निकलना ही चाहता है। ये फोटो जीतू की होली के अवसर की है(कोई मानेगा भला!)।

चूंकि बात होली की तथा जीतू की हो रही है लिहाजा मुझे याद आया कि मेरे पिछले लेख जो कि जीतू के आइडिये पर मैंने लिखा था मानोशीजी ने टिप्पणी की थी-जीतु जी बिचारे…कभी तो छोड दिया करें उन्हें।

हम बहुत देर सोचते रहे कि हम जीतू को क्या पकड़े हुये हैं जो उन्हें छोड़ दें! या जीतेन्दर  कोई चर्चा समूह हैं जिसे हम मतभेद होने पर किसी कम्प्यूटर

विशेषज्ञ ब्लागर की तरह मुंह फुला के छोड़ दें? या कि जीतू कोई अपहरणकर्ता/ आतंकवादी हैं जिन्हें हम भारत सरकार की तरह किसी वीआईपी बंधक को मुक्त कराने के लिये छोड़ दें।या फिर हम कोई मनचले शेख हैं और जीतू हमारी चार बीबियों में से एक हैं जिनको हम जब छोड़ेंगे तभी शेख साहब अपनी नयी माशूका से निकाह पढ़वा सकेंगे।

लब्बोलुआब यह कि मानवाधिकार आयोग के प्रवक्ता के अंदाज में हमें यह अहसास कराया मानसीजी ने कि हम मानव अधिकारों का उल्लंघन कर रहे हैं।हम  मानोशी जी  की बात मान के अपराधबोध के पाले में जाने ही वाले थे कि जीतेन्दर की टिप्पणी दिखी-
फुरसतिया जी तो उस महबूब की तरह हैं कि जिसकी गालियां भी फूलों की तरह लगती है।

हमने कहा वाह पट्ठे! छिड़ने वाला होय तो जीतेंदर जैसा चाहे फिर एक

ही होय।

अब देखो अगला हमें महबूब मान रहा है। हमारी गाली को फूल बता रहा है। लेकिन मोहल्ले वाले कह रहे हैं कि छोड़ दो। महबूब छोड़ने के लिये होते हैं? न भइया न! महबूब तो दिल से लगाने के लिये होते है। होली में मौज मनाने के लिये होते हैं। छोड़ने के लिये कत्तई नहीं होते हैं। तीज-त्योहार में तो वैसे भी लोग-बाग घर-परिवार-शहर वालों से जुड़ने के लिये हुड़कता है। सूखी होली खेलता है तब भी मन गीला होता रहता है बचपन की यादों से। ऐसे गीलेपन में कइसे छोड़ दें एक कनपुरिये को जो बेचारा ऐसी होली खेलने को अभिशप्त हो जिसमें उसका कुर्ता तक नील-टीनोपाल का विज्ञापन कर रहा हो।
 

तो भइया हम तो न छोड़ेंगे। खेलेंगे हम होली टाइप जिसमें मौज-मजा तो होगा ही नहीं तो जीतू बुरा मान जायेंगे।

एक बात और ध्यान देने की है कि छेड़ हम रहे हैं,मजा जीतू को भी आ रहा है लेकिन तकलीफ मानोशीजी को हो रही है। धन्य हैं देवी ।

संजय बेंगानी बोले कि हमारा टाइटिल गायब है। अब भइया टाइटिल क्या दें। आपका मामला तो रागदरबारी के डायलाग की तरह है- जीप से अफसर नुमा चपरासी तथा चपरासीनुमा अफसर उतरे। नाम है आपका संजय जो कि अहिंसक माने जाते थे लेकिन आप धारण करते हैं तरकश। तरकश में तीर हैं  जोगलिखे। इतने विरोधाभासी महापुरुष को कइसे टाइटिलियाया जाय!हम पहले ही कह चुके हैं-

जिनके (टाइटिल) छूट गये वे समझें कि वे वर्णनातीत हैं।

जिन साथियों ने होली के टाइटिल वाली पोस्टों पर कमेंट किये उनका शुक्रिया साथ ही यह भी साबित हुआ कि जैसा बोओगे वैसा काटोगे।करनी का फल सब यहीं मिल जाता है।हमने लोगों को एक-एक ही टाइटिल दिये लेकिन हमें कई मिले। जो काहू को गढ्ढा खोदै वाके लिये कुंआ तैयार!

हां ,तो बात हो रही थी जीतेंदर की। हमने पूछा भइये क्या था तुम्हारा आइडिया जो हम चुरा लिये?

जीतू बोले -हमने प्रत्यक्षाजी के साथ मिलकर टाइटिल देने का प्लान बनाया था। कुछ नाम भी तय किये थे। हम बोले धत्तेरे की।खाली नाम तय किये -बोले आइडिया था ये।गठबंधन तो कायदे से किया होता। प्रत्यक्षाजी को जो तुम योजना दिये होगे उसका प्रिंट आउट लेकर वो उसके पिछवाड़े कुछ कवितायें घसीट दी होंगी । देखना कुछ दिन मेंजहां समय मिला वे कवितायें आ जायेंगी सामने फिर बिना समझे तारीफ करने के अलावा कोई चारा नहीं रहेगा तुम्हारे पास।

जीतू अपने चुनाव को लेकर कुछ ज्यादा ही आश्वस्त थे लिहाजा वोफिर बोले -नहीं यार मेरी बात हो गयी थी। तैयारी थी लेकिन…। हम बोले-भइया की बातें। तुम चूंकि कविता समझते नहीं लिहाजा प्रत्यक्षाजी का स्वभाव भी नहीं समझते।

जीतू आंखे मिचमिचाते खड़े रहे। हम बोले हम कोई कविता थोड़ी सुना रहे हैं जो तुम ‘नासमझ मोड’ में चले गये। अरे भाई, जो शख्स प्रेमी के आने की बात से इतना नींद में गाफिल /बेखबर रहे कि सबेरे फूलों की खूशबू से सूंघकर कहे -

 रात भर ये मोगरे की
खुशबू कैसी थी
अच्छा ! तो तुम आये थे
नींदों में मेरे ?

 उसको तुम्हारा मेहनत का काम याद रहेगा यह सोचते हो तुम बहुत भोले हो(बेवकूफ हम नहीं लिखेंगे काहे से कि फिर कहा जायेगा कभी तो छोड़ दिया करो)

हमने फिर प्रत्यक्षाजी से पूछा कि काहे को जीतू से वायदाखिलाफी की आपने? तब पता लगा कि मामला ही दूसरा था। बताया गया कि जीतू ने कुछ नाम नोट कराये थे कि इन लोगों के टाइटिल दिये जायें। फिर मिलने का वायदा था लेकिन

बाद में नेट पर मुलाकात नहीं हो पायी।

तब हमारे सामने सारी बात साफ हो गयी। दरअसल जीतू प्रत्यक्षाजी को बाकी ब्लागरों की तरह समझे होंगे। बहुत दिन से जीतू की अदा रही है कि कोई योजना बनाना,साथी को शामिल करना, फिर अचानक व्यस्त हो जाना। फिर होता यह कि अगला मारे शरम के सारा काम पूरा करता। लेकिन इस बार ऐसा हो नहीं पाया। सेर को सवा सेर मिला और आइडिया ,आइडिया ही रह गया।

जैसे इनके दिन बहुरे,वैसे ही सबके बहुरें।

अब बात इन्द्रधनुष की। कुछ दिन पहले  मानसीजी ने ई-कविता पर एक कविता लिखी थी। उस कविता में कुछ ऐसा सा होता है कि जैसे आदमी का पर्स,

मोबाइल, पेन खो जाता है न फिर जिसका  खोता है वो  अनाउन्समेंट  करवाता है कि जिस सज्जन को मिला हो वापस कर दें ।लौटाने वाले को  उचित   इनाम  दिया  जायेगा। वैसे ही मानोशीजी की इस कविता में इंद्रधनुष का एक रंग खो जाता हैं फिर वो प्रिय से  तकादा करती हैं :-

 प्रिय तुम वो रंग आज ला दो
जिसे तोडा था उस दिन तुमने
और मुझे दिखाये थे छल से
बादलों के झुरमुट के पीछे
छ: रंग झलकते इन्द्रधनुष के

लेकिन नहीं यहां खोने की बात नहीं तोड़े जाने की बात कही है। मतलब इंद्रधनुष का रंग किसी बाग में खिला कोई फूल या बगीचे का फल है जिसे प्रिय तोड़ ले गया। अब वो लौटा दे इंद्र धनुष मुकम्मल हो जाये। ये ‘जोड़-तोड़ घराने’ की कवितायें बहुत मजेदार लगती हैं। टूट-फूट बचाने का सराहनीय प्रयास!

इन्द्रधनुष आमतौर पर बारिश में दिखता है। बरसात में जब सूरज की रोशनी होती है तो प्रकाश के कारण इंद्रधनुष दिखता है।लेकिन कल हमें लगा कि ये इन्द्रधनुष तो हम जब मन आये तब देख सकते हैं।

हुआ दरअसल यह कि प्रत्यक्षाजी की टिप्पणी को ख्याल में रखते हुये हम कल मय कैमरे के पार्क में गये। यह पार्क कुछ दिन पहले तक एकदम जंगल था। क्षेत्रफल इतना कि चार फुटबाल मैदान बन जायें। हम आजकल अपने स्टेट का रखरखाव का  काम देखते हैं। जनवरी में पता नहीं कैसे ख्याल आया कि इस जंगल को पार्क में तब्दील किया जाय। सो जुट गये पूरे अमले के साथ। सरकारी नौकरी के साथ यह खाशियत मैंने देखी है कि यदि आप कुछ नहीं करते तो कुछ नहीं बिगड़ता लेकिन यह भी सच है कि आप कुछ करना चाहते हैं तो कोई रोकता भी नहीं।लिहाजा दो महीने से भी कम समय में जहां जंगल था वहां अब पार्क बन रहा है। तीन चौथाई बन गया। जहां कोई नहीं आता है वहां अब सैकड़ों लोग आते हैं। पार्क सुबह पांच बजे से रात ग्यारह बजे तक गुलजार रहता है।

पार्क में ढेर सारे झूले लगाये गये हैं जिनमें बच्चे,महिलायें झूलते रहते हैं। पार्क के ही बीचोबीच में एक फव्वारा भी बना है। इसकी भी कहानी मजेदार है। जब हम सोचे कि फव्वारा बनाया जाय तो दाम पता गया। कोई कहे चालीस-हजार लगेंगे कोई कहे पचास हजार। हम सोच रहे थे कि क्या किया जाय। इतना पैसा हम खर्चा करने के मूड में थे।

 इन्द्रधनुष

अचानक हमें याद आया कि हम तो इंजीनियर हैं वो भी मेकेनिकल। फिर तो हमने सोचा खुदै काहे न बनाया जाय! फिर हम एक चार इंच व्यास का एक ठो छ: इंच लंबा पाइप लिये। उसके दोनों तरफ आधा सेमी मोटी सीट वेल्ड करा दिये। फिर उसमें दस ठो छेद करा दिये। उनमें धांस दिये पचहत्तर रुपये वाली दस ठो नोजल । पीछे से जोड़ दिये ८००० रुपये की दो हार्स पावर की मोटर।सारा खर्चा दस हजार रुपये से भी कम हुआ। ये सब भानुमती का पिटारा जोड़ कर जहां हम बटन दबाये पानी सर्रररर से निकला तथा हवा के इशारे पर हमें भिगोने लगा।

पार्क की रौनक देखकरमन खुश हो जाता है। जनता खुश। जनता को देखकर हम खुश!

इसी फव्वारे का जिक्र हमने प्रत्यक्षाजी से किया था तभी उनकी टिप्पणी थी-

हम तो सोच रहे थे कि फव्वारे के रंगीन पानी के नीचे, होली खेलते हुये तस्वीरें होंगी. एक पंथ दो काज !

तो कल जब हम फोटो खींचने गये तो धूप खिली थी।फव्वारा आन किया तो धूप तथा फव्वारे के पानी के गठबंधन से इंद्रधनुष दिखा। पहले तो हमें लगा कि नजर का धोखा है लेकिन हर बार जब तक धूप रही किसी न किसी तरफ से इंद्रधनुष दिखता रहा। आज भी देखा तथा उसकी फोटो लेने की कोशिश की। फोटो में बहुत साफ नहीं दिखता लेकिन पता चलता है- फव्वारे की धार के बीच में बायीं तरफ।मुझे लगा कि अब तो इंद्रधनुष हमारी मुट्ठी में है। जब देखने का मन किया पार्क गये। फव्वारा चलाया इंद्रधनुष देख लिया। किसी मौसम का  मोहताज भी नहीं होना पड़ेगा। न किसी से याचना करनी पड़ेगी कि  रंग लौटा दो ताकि हमारा इंद्रधनुष पूरा हो जाये।

वैसे भी महापुरुष लोग कहते रहे हैं कि मेहनत,लगन तथा लक्ष्य के प्रति समर्पण वह चाभी है जिससे दुनिया का कोई भी इंद्रधनुष मुट्ठी में किया जा सकता है।

मुट्ठी में इन्द्रधनुष मतलब आत्मनिर्भरता की तरफ बढ़ते कदम बकौल 

नंदनजी-
ओ माये काबा से जाके कह दो
कि अपनी किरणों को चुनके रखलें,
मैं अपने पहलू के ज़र्रे-जर्रे को
खुद चमकना सिखा रहा हूं।

 

मेरी पसंद

एक सलोना झोंका
भीनी-सी खुशबू का,
रोज़ मेरी नींदों को दस्तक दे जाता है।एक स्वप्न-इंद्रधनुष
धरती से उठता है,
आसमान को समेट बाहों में लाता है
फिर पूरा आसमान बन जाता है चादर
इंद्रधनुष धरती का वक्ष सहलाता है
रंगों की खेती से झोली भर जाता है
इंद्रधनुष 
रोज रात
सांसों के सरगम पर 
तान छेड़
गाता है।
इंद्रधनुष रोज़ मेरे सपनों में आता है। पारे जैसे मन का 
कैसा प्रलोभन है
आतुर है इन्द्रधनुष बाहों में भरने को।
आक्षितिज दोनों हाथ बढ़ाता है,
एक टुकड़ा इन्द्रधनुष बाहों में आता है
बाकी सारा कमान बाहर रह जाता है।
जीवन को मिल जाती है
एक सुहानी उलझन…
कि टुकड़े को सहलाऊँ ?
या पूरा ही पाऊँ?
सच तो यह है कि
हमें चाहिये दोनों ही
टुकड़ा भी,पूरा भी।
पूरा भी ,अधूरा भी।
एक को पाकर भी दूसरे की बेचैनी
दोनों की चाहत में 

कोई टकराव नहीं।
आज रात इंद्रधनुष से खुद ही पूछूंगा—
उसकी क्या चाहत है
वह क्योंकर आता है?
रोज मेरे सपनों में आकर 

क्यों गाता है?
आज रात 

इंद्रधनुष से 

खुद ही पूछूंगा।
-कन्हैयालाल नंदन
  

  

फ़ुरसतिया

अनूप शुक्ला: पैदाइश तथा शुरुआती पढ़ाई-लिखाई, कभी भारत का मैनचेस्टर कहलाने वाले शहर कानपुर में। यह ताज्जुब की बात लगती है कि मैनचेस्टर कुली, कबाड़ियों,धूल-धक्कड़ के शहर में कैसे बदल गया। अभियांत्रिकी(मेकेनिकल) इलाहाबाद से करने के बाद उच्च शिक्षा बनारस से। इलाहाबाद में पढ़ते हुये सन १९८३में ‘जिज्ञासु यायावर ‘ के रूप में साइकिल से भारत भ्रमण। संप्रति भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय के अंतर्गत लघु शस्त्र निर्माणी ,कानपुर में अधिकारी। लिखने का कारण यह भ्रम कि लोगों के पास हमारा लिखा पढ़ने की फुरसत है। जिंदगी में ‘झाड़े रहो कलट्टरगंज’ का कनपुरिया मोटो लेखन में ‘हम तो जबरिया लिखबे यार हमार कोई का करिहै‘ कैसे धंस गया, हर पोस्ट में इसकी जांच चल रही है।

8 responses to “मुट्ठी में इंद्रधनुष”

  1. समीर लाल

    बहुत ही सुंदर और मज़ेदार….आनंद आ गया पढ कर. क्या लेखनी है, माँ शारदा कृपा बनायें रखें, इतनी हरकतों के बाद भी, यही कामना है. :)
    समीर लाल

  2. sanjay | joglikhi

    वर्णनातीत काहे रहे? अफसर कहो या चपरासी क्या फरक पङता हैं, बस वर्णन होना चाहिए. संजय को आप ‘अंधे का दूरदर्शन मान रहे हैं’ जब कि हमारा मानना हैं कि यह महादेव का एक और नाम हैं. पूजो तो भोले भंडारी वरना तांडव करते कहां देर लगती हैं. जीतूभाई पर यह आपने लगातार ‘दुसरा’ फेंका हैं. सही भी हैं क्योंकि जीतूभाई तन और मन सें इस योग्य हैं. बन्दा मनमौजी पर जिम्मेदार किशम का हैं जो व्यंग्य कि समझ रखता हैं.
    आपका यह लिख भी अच्छा रहा ( कविताएं ज्यादा नहीं हो गयी?) तस्विर देख का मैने समझा था फव्वारा होली खेलने के काम में लिया होगा. नेक काम के लिए साधुवाद.

  3. रवि

    यह बात सही है – जैसा बोओगे, वैसा पाओगे.
    आम के पेड़ पे इमली नहीं फला करती.

    कवि और कविताओं से आपको अ-प्रेम सा है, पर, आप खुद देखेंगे कि आपके टाइटल ने कितने नए कवि और, कितनी सारी कविताएँ पैदा कर दीं.

    अब झेलते रहें.

    वैसे, नए कवियों को बधाई, और, सचमुच उनका नया-नया प्रयास सराहनीय है, और उम्मीद है कि वे अपनी कविता लेखन में नियमितता लाएंगे.

  4. प्रत्यक्षा

    यहाँ (मतलब हमारे ब्लॉग पर )भी देख लें, रवि जी ने सही ही कहा है ,अब झेलिये ;-)

  5. Manoshi

    ये तो कुछ यूँ हुआ कि दूसरों पर लगी चुइंग छुडाने की कोशिश करने में खुद पर ही लग जाये। जीतु जी ही ठीक थे, उन्हें पकडे रहिये। :-) और ये मेरा इन्द्रधनुष, फ़व्वारे से मुट्ठी और मुट्ठी से फ़व्वारे के चक्कर काटते-काटते छ: रंगी से रंग हीन हो चुका है अब तक। उसे भी बख्श दिया जाये।

  6. शालिनी नारंग

    आपके लेख की भाषा बहुत ही सरल और प्रवाहमयी है। पढ़कर मज़ा आ गया।

  7. फ़ुरसतिया » छत पर कुछ चहलकदमी

    [...] फ़ुरसतिया » छत पर कुछ चहलकदमी on मैं और मेरी जम्हाई शालिनी नारंग on मुट्ठी में इंद्रधनुष Manoshi on मुट्ठी में इंद्रधनुष फ़ुरसतिया on मुट्ठी में इंद्रधनुष प्रत्यक्षा on मुट्ठी में इंद्रधनुष [...]

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