ब्लॉगिंग से होनेवाले कुछ नायाब फायदे

ब्लौगिंग से फायदे तो होते ही हैं. इससे कुछ मिलता नहीं तो हम सब यहाँ अपना टाइम काहे खोटी करते? यहाँ नयी बातें पता चलती हैं, लिखने-पढ़ने की इच्छा पूरी होती है, टिप्पणियों के ज़रिये सराहना मिलती है, अच्छे पाठक और दोस्त मिलते हैं. बहुत कुछ लिखने और पढ़ने के दौरान हमें अपनी कमियों और खूबियों का पता भी चल जाता है. बहुत से ब्लौगर दीगर के फालतू कामों को करने से बचे रहते हैं, यह भी अच्छी बात है. कुछ के लिए ये थैरेपी की तरह है. रोज़मर्रा के तनाव और दुश्वारियों से लड़ते हुए वे उन्हें अपनी पोस्ट में उड़ेल देते हैं. एक बड़ी बिरादरी इसे मौजूदा व्यवस्था का विश्लेषण और इसका विरोध करने का बेहतरीन औज़ार बना चुकी है. ऐसी ही बातों के घालमेल से मैंने ब्लौगिंग से होनेवाले सबसे महत्वपूर्ण फायदों की ये लिस्ट तैयार की है. आप इसे पढ़कर बताएं कि आप इससे कितना इत्तेफाक रखते हैं. कुछ इजाफा कर सकें तो सोने पे सुहागा:

1. दिमागी खुराक पाने का बेहतरीन नुस्खा – मन में कुछ अटका रहे और बोझ में तब्दील हो जाये तो उसे उगल देना चाहिए. ये हमारी भड़ासी भाइयों का आजमाया हुआ नुस्खा है. दिमाग में कुछ चलता रहे और कोई राह नहीं सूझे तो मन बेचैन हो जाता है. फिर यह कभी-कभी हार मानकर हताशा में खुद को डुबो देता है. ऐसे में यदि आप ब्लौगिंग करने लगते हैं तो आप अपने मन के उन विचारों को दूसरों से साझा करने लगते हैं. आपको जब मौका मिलता है आप अपनी भावी पोस्ट की योजना में उस तत्व को शामिल कर लेते हैं और उसे अपनी नोटबुक में या डायरी में या पोस्ट के ड्राफ्ट के रूप में ही सेव कर लेते हैं. अपने जीवन पर आपकी निगाह कुछ पैनी हो जाती है. आपका ध्यान उन बातों की ओर जाने लगता है जिनको आप अपने लेखन में शामिल कर सकें. आप खुद में ही बने रहते तो आपके विचार भीतर ही भीतर गुम हो सकते थे. ब्लौगिंग के ज़रिये वे अब बाहर निकल चुके हैं, अब उन्हें दूसरों को झेलने दीजिये और आप अपनी अगली पोस्ट के लिए निगाह दौड़ाने लगें.

2.  दुनिया को देखने का नजरिया बदल जाता है – जैसा कि मैंने ऊपर बताया, एक सक्रिय ब्लौगर अपनी आँखें खुली रखने लगता है और अपने आसपास चल रही बातों पर पहले से ज्यादा ध्यान देने लगता है. चीज़ों की बारीकियां पकड़ में आती हैं और वर्तमान पर पकड़ मजबूत होती है. दो पोस्ट पहले मैंने खुद में आई जिस तब्दीली की बात की थी वह बहुतों को महसूस हुआ होगा. इंटरनेट पर यूंही कुछ करने की गरज से मैंने कहानियों के अनुवाद का जो काम हाथ में लिया था उसका मेरे ऊपर बहुत सकारात्मक प्रभाव पड़ा. साथ ही मैंने पहली बार जीवन में अलग-अलग विषयों पर बहुत कुछ पढ़ा. हमारे नज़रिए में आनेवाला छोटा सा बदलाव भी जीवन में बड़े परिवर्तन ला सकता है ऐसी मेरी मान्यता है. सकारात्मक परिवर्तन जीवन की गुणवता को बढाते हैं.

3. हम अकेले नहीं हैं भाई! – जब आप बेहतर महसूस नहीं करते तो आप खुद को अकेलेपन के हवाले कर देते हैं. जब आदमी अकेला होता है तो वह अवसाद की गिरफ्त में आ जाता है. किसी-किसी को यह भी लगने लगता है कि बाहर की दुनिया में हर कोई उससे बेहतर ज़िंदगी जी रहा है. ऐसी फ़िज़ूल की बातों और कल्पनाओं के फेर में पड़कर बहुतों को यह लगने लगता है कि ‘ये जीना भी कोई जीना है लल्लू!’

लेकिन एक बार जब आप अपने मन की बातें, अपने दुःख, सोच, चिंताएं, और अनुभूतियाँ दूसरों से बांटने लगते हैं तो आयेदिन आपका साबका ऐसे लोगों से होने लगता है जिनके पास आपसे भी ज्यादा संजीदा बातें शेयर करने के लिए हैं. दुनिया में बहुतेरे लोग आपसे भी ज्यादा बड़ी और विकराल मुसीबतों का सामना कर चुके हैं. यह बात आपको हर कभी पता चलने लगती है या आपकी परवाह करनेवाले आपके मित्र आपमें आशा का संचार करने के लिए आपसे सतत संपर्क में रहते हैं. ब्लौगरों के समूह बनते हैं, मित्रता फलती-फूलती है, आपको यह लगता है कि आपकी बात सुनी जाते है और लोग आपकी कद्र करते हैं. इसपर भी यदि आपको अच्छा नहीं लगता तो भैया आप तो कट लो यहाँ से! आपका केस क्लिनिकल है.:)

4.  अच्छे पाठक जिम्मेदारियों का अहसास दिलाते हैं – यदि आपने (गलती से भी) अपने पाठकों से कोई वादा या कोई दावा कर दिया तो अब आपको कोई नहीं बचा सकता! खुद को बचाने के लिए यदि आप पोस्ट को डिलीट भी कर देंगे तो आपके ‘सुधी’ पाठक उसे गूगल काश में से निकाल लेंगे. वैसे आजकल ‘जागरूक’ पाठक पोस्ट छपते ही उसका स्क्रीनशॉट भी ले लेते हैं ताकि आपको भविष्य में आपकी जिम्मेदारियों का अहसास दिलाया जा सके. इसीलिए कहता हूँ कि वही कहें या करें जिसके पर्याप्त आधार हों वरना अपने कहे से मुकरने या फिरने के लिए आपके पास कोई बहाना नहीं बचेगा.

आपके पाठक आपके चीयरलीडर्स और सपोर्टर हैं. हर बेहतर लिखनेवाले को अपने पाठकों की ख्वाहिशों को पूरा करना होता है. अपनी कही बातों से मुकरके या पोस्टें/टिप्पणियां डिलीट करके आप कहाँ जायेंगे? उनसे किये गए वादे निभाइए और शान से लिखिए-पढ़िए. ब्लॉगलेखन कोई अगंभीर बात नहीं है कि आप जो मन में आये वह कह दें. इस माध्यम की सुविधाएँ हैं तो कुछ जिम्मेदारियां भी हैं. कुछ हद तक, ब्लॉग लेखन अमर है और अच्छे-बुरे किसी भी विचार को यहाँ कॉपी-पेस्ट के जरिये फैलने में वक़्त नहीं लगता. मजाकिया हास्य-व्यंग्य भी अनुशासनपूर्ण लेखन की मांग करता है.

5. दूसरों की मदद करने से खुद के मसले भी सुलझते हैं – बहुत अच्छे लेखक (ब्लौगर) देखते ही देखते जनप्रिय, सर्वजन हितैषी बन जाते हैं. अनेक लोग उन्हें रोल मॉडल के रूप में देखने लगते हैं. निजी जीवन में वे कैसे भी हो पर ब्लौगर के रूप में वे कई नवोदित लेखकों के आदर्श बन जाते हैं. ऐसे ब्लौगर और उसके मित्रों के बीच प्रगाढ़ संबंध बन जाते हैं. कुछ अपवादों को छोड़कर जनप्रिय ब्लौगर अपने पाठकों की भरसक सहायता करते हैं और इस प्रक्रिया में वे बहुत कुछ सीखते हैं. यह तो तयशुदा बात है ही कि दूसरों की समस्याएँ और चुनौतियों का सामना करने से हमारा ध्यान अपनी परेशानियों से हटता है. दूसरों की मदद करने की आदत से मन में नए विचार आते हैं, सकारात्मकता जागती है. अपने हर कामकाज में आशावादिता का ओज झलकने लगता है.

अभी हिंदी के अत्यल्प ब्लौगरों ने ब्लौगिंग को अपने जीवनयापन का माध्यम बनाया है. यदि आप ऐसा नहीं भी करना चाहते हों या आप निजी जीवन में दुश्वारियों का सामना कर रहे हों, तनावग्रस्त रहते हों तो ब्लौगिंग ऐसी कम खर्चीली विधा है जो अनेक प्रकार से आपकी गाड़ी को पटरी में लाने में मददगार हो सकती है.

देखा, ब्लौगिंग के कितने सारे परोक्ष लाभ हैं! आप भी अच्छा लिखें और इनका लुत्फ़ लें. सबसे पहले ऐसे लोगों को ब्लॉग शुरू करने के लिए प्रेरित करिए जो अपने खाली समय का सदुपयोग करना चाहते हों. तकनीकी जानकारी के अभाव में अभी बहुत से लोग ब्लॉग बनाने से कतराते हैं. लोगों की मदद करें ताकि वे बेहतर अभिव्यक्ति की वाहक बन सकें.

यदि आप पाठक हैं तो आपके पास अपना ब्लॉग बनाने के पर्याप्त आधार हैं.

और यदि आप ब्लौगर हैं तो इन बातों से कितना सहमत हैं, कृपया बताएं.

(इस पोस्ट की प्रेरणा अंगरेजी की इस पोस्ट से ली गयी है)

‘नये साल में यह नया करें’ – प्रीतीश नंदी

समय बड़ी जल्दी बीत जाता है. कुछ ही दिनों पहले नए साल की धूमधाम हो रही थी और देखते-देखते जनवरी ख़त्म होने को आ गया. यदि आपने नए साल में कुछ बेहतर करने या बेहतर बनने का सोचा हो तो आपको श्री प्रीतिश नंदी जी के लेख से प्रेरणा मिलेगी जिसे मैंने रविवार वेब पत्रिका से साभार लिया है. पढ़ें और मनन करें:

आमतौर पर वर्षगांठ या सालगिरह के मौके पर कोई न कोई प्रण लिया जाता है या कोई कसम खाई जाती है. अक्सर तो कोई लत या बुरी आदत छोडऩे का ही प्रण लिया जाता है. मैंने अपने कई दोस्तों को यह कसम खाते हुए देखा है कि आज के बाद वे सिगरेट छोड़ देंगे, शराब से तौबा कर लेंगे, चॉकलेट को हाथ न लगाएंगे, गाड़ी तेज न चलाएंगे, वक्त पर दफ्तर पहुंचेंगे वगैरह-वगैरह. यह फेहरिस्त बहुत लंबी हो सकती है, लेकिन अमूमन ये कसमें लंबे समय तक निभाई नहीं जातीं. शायद ये कसमें लंबे समय तक निभाए जाने के लिए होती भी नहीं हैं.

पिछले शनिवार को मेरा जन्मदिन था. मैंने हर बार की ही तरह अपना जन्मदिन मनाया. मैंने अपने रोजमर्रा के कामकाज से छुट्टी ली और उन बातों पर विचार किया, जो मेरे लिए महत्वपूर्ण हो सकती हैं. इनमें से कोई भी बात ऐसी न थी, जिससे किसी को बहुत फर्क पड़ता या जिससे दुनिया इधर-उधर हो जाती. मैं अपना जन्मदिन मनाने के लिए एक ऐसी जगह पर चला गया, जिसे मैं अपनी ‘शरणस्थली’ कहता हूं. मैं कभी-कभी वहां कुछ दिनों के लिए चला जाता हूं. यह एक दिन है, जिसे मैं अपने लिए बचाकर रखता हूं. अपने जन्मदिन पर मैं किन्हीं नकारात्मक बातों पर विचार नहीं करता, इसलिए कोई प्रण भी नहीं लेता. इसके उलट मैं तो कुछ नई आदतें डाल लेने की कोशिश करता हूं. मैं अपने जीवन को अधिक समृद्ध और संपूर्ण बनाना चाहता हूं. मैं कुछ नया सीखना चाहता हूं.

हमें ‘हां’ को अपने जन्मदिन का प्रण बनाना चाहिए, ‘ना’ को नहीं. मैं स्वीकारता हूं कि दुनिया बदल गई है, लेकिन इसका यह अर्थ नहीं कि लोगों ने जो कुछ किया, वह सब गलत था. फिर चाहे वे ऑड्रे हापबर्न हों, जिन्होंने ब्रेकफास्ट एट टिफनी में सिगरेट पीकर स्मोकिंग को एक चलन बना दिया था या फिर चाहे डिलन टॉमस हों, जो दिन-रात शराबनोशी करते थे, लेकिन उन्होंने अपने समय की सबसे अच्छी कविता लिखी. यदि आपको मेरी बात पर यकीन नहीं होता तो रिचर्ड बर्टन, जो सर्वकालिक महान अभिनेताओं में से एक हैं, को डिलन टॉमस की कविताओं का पाठ करते सुनिए. इसे ही मैं सही मायनों में एक बदलाव कहता हूं.

हमें न्यायाधीश बनने की कोशिश नहीं करनी चाहिए. हम ड्रग्स लेने वाले जिम मॉरिसन के लिए कोई फैसला क्यों लें क्या हम जिम मॉरिसन के गीतों और उनके संगीत को सुनकर उसके बारे में विचार नहीं कर सकते? अल्डुअस हक्सले ने कहा था कि मेस्कलिन के बिना दिमाग की खिड़कियां और विचारों के दरवाजे कभी नहीं खुल सकते. उन्होंने नोबेल पुरस्कार जीता. एलेन गिंसबर्ग ने अपनी श्रेष्ठ कविताएं गंगा नदी के किनारे श्मशान पर सिगरेट फूंकते हुए लिखीं. कैनेडी ने इतनी अच्छी तरह से अपने प्रशासनिक दायित्वों का निर्वाह किया था. तब क्या हमें उनके निजी जीवन के अविवेकपूर्ण कार्यों के आधार पर उनके बारे में कोई निर्णय लेना चाहिए?

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उम्मीद पे दुनिया क़ायम है!

प्राचीन यूनान के मिथकों में सृष्टि की रचना से सम्बंधित एक कथा में वर्णित है कि प्रोमेथियस नामक एक मनुष्य द्वारा स्वर्ग से अग्नि चुरा लेने और उसका रहस्य मानवजाति को बता देने के कारण देवता उससे नाराज़ हो गए. उन्होंने एक योजना के तहत उसका विवाह पेंडोरा नामक एक देवी से करा दिया. पेंडोरा को अपने विवाह पर एक संदूक दिया गया जिसके अंदर कई उपहार थे. समस्या यह थी कि संदूक को खोलकर देखना निषिद्ध था. अब जहाँ निषेध है वहां कौतूहल जागना तो स्वाभाविक ही है. जिस प्रकार ईसाई जेनेसिस में हव्वा के मन में ज्ञान प्राप्ति के फल को चखने की लालसा पैदा हो गयी थी उसी तरह पेंडोरा से भी रहा नहीं गया और उसने संदूक को खोल दिया. संदूक को खोलते ही उसमें कैद भांति-भांति की विपत्तियाँ निकल उडीं और उन्होंने मनुष्यों को सदा के लिए त्रस्त कर दिया. संदूक के भीतर इन्हीं विपत्तियों के साथ ही ‘उम्मीद’ भी बंद थी. केवल उम्मीद ही उस संदूक से नहीं छूट पाई और अब हर प्रकार की विपत्तियों और समस्याओं का सामना करने में मनुष्य को इसका ही सहारा है.

यहूदी परंपरा में भी एक कथा है जिसमें महाप्रलय के चालीसवें दिन महात्मा नूह अपनी विराट नौका से बाहर निकलते हैं. नई सृष्टि के अवलोकन की आस अपने मन में लेकर वे नौका से उतरते हैं और पवित्र सुगंध जलाते हैं. अपने चारों ओर महाविनाश के चिह्न देखकर उनके ह्रदय में घोर संताप उत्पन्न होता है और वे परमपिता से पूछते हैं: – “मेरे ईश्वर, यदि आप भविष्य को जानते थे तो आपने मनुष्यों की रचना क्यों की? क्या आप हमें दंड देकर प्रसन्न होते हैं?”

कहते हैं कि पृथ्वी से तीन सुगंध उठकर स्वर्ग तक गईं: पवित्र सुगंध, नूह के आंसुओं की सुगंध, और उसके कर्मों की सुगंध.

और उत्तर आया: – “सत्य के मार्ग पर चलनेवाले मनुष्यों की प्रार्थना मैं सदैव सुनता हूँ. मैं तुम्हें बताऊँगा कि मैंने यह सब क्यों किया: तुम और तुम्हारी संतति केवल आशा के बल पर ही राख में से अपनी दुनिया बना सकोगे. इस प्रकार हम कर्म और कर्मफलों को साझा कर देते हैं: इनके प्रति हम दोनों ही उत्तरदायी रहेंगे”.

इरविंग वैलेस ने अपनी पुस्तक ‘द बुक ऑफ लिस्ट्स’ (1977) में लिखा है: – “हर व्यक्ति इन तीनों की आस लगाये रहता है: पहली – प्रियतम का साहचर्य, दूसरी – अतुल संपत्ति, और तीसरी – अमरता.

पिछली पोस्ट सकारात्मकता पर थी. उसमें अमिता नीरव जी ने बड़ा चुटीला सा एक कमेन्ट किया : “लेकिन यदि नकारात्मकता ज्यादा आकर्षक लगे तो…?”

साहित्य और संस्कृति में नकारात्मकता का भी महत्वपूर्ण वर्णन और इतिहास है. शायरों, भग्नहृदय प्रेमियों, और वीतरागियों को नकारात्मकता में भी रस लेते देखा है. मिर्ज़ा ग़ालिब ने भी फरमाया था:

कोई उम्मीद बर नहीं आती, कोई सूरत नज़र नहीं आती,
मौत का एक दिन मुअय्यन है, नींद क्यों रात भर नहीं आती?

इसपर मैं पाठकों से विचार आमंत्रित करता हूँ. क्या नकारात्मकता से भी कुछ ‘प्राप्ति’ संभव है? क्या जीवन और संसार के प्रति नकारात्मक दृष्टिकोण रखकर जीवन जिया जा सकता है? मेरी समझ से क्षणिक नकारात्मकता आदमी को डुबोती है, उसे दबाती है, ताकि वह उस यंत्रणा का सामना करने के लिए शक्ति अर्जित कर सके.

जी-जान लगाकर प्रतिवर्ष लाखों-करोड़ों विद्यार्थी अपने सपनों को सच साबित करने की दिशा में प्रयत्न करते हैं. सफल होने वालों की संख्या बहुत कम होती है और असफल होनेवाले उनसे सैंकड़ों-हज़ारों गुना अधिक. फिर भी यह दुःख की बात है कि इनमें से कुछ प्रतिभागी निराशा के गहन क्षणों में अपने जीवन को भी होम कर देते हैं जबकि उनके ही समान अन्य बहुसंख्यक अपनी असफलताओं से सबक लेकर स्वयं में नई ऊर्जा का संचार करते हैं और टूट कर बिखर नहीं जाते. एक परीक्षा में मिली असफलता या नौकरी पाने में लगनेवाली ठोकरें इतनी बड़ी कैसे हो सकतीं हैं कि वे जीवन से मुक्त हो जाने के विचार को फलीभूत कर बैठें?

सकारात्मकता और नकारात्मकता दोनों का अपना महत्व है. सकारात्मक दृष्टिकोण ने हवाई जहाज को बनाया और नकारात्मक घटित होने की सम्भावना ने पैराशूट. लेकिन पैराशूट का ध्येय ही है जीवन की रक्षा करना. जब हवाई जहाज के नष्ट होने की पूरी संभावनाएं हों तो सवार को नीचे कूदना ही पड़ेगा!

पोस्ट में वर्णित कथाएं पाउलो कोएलो के ब्लॉग से ली गईं हैं.

सकारात्मकता की राह पर…

मैं बहुत ज्यादा पौज़िटिव शख्स नहीं हूँ. मौके-बेमौके मैं झुंझला जाता हूँ और मुझसे काम निकलवाने के लिए घर में और दफ्तर में, दोनों जगह सामनेवाले को अक्सर मेरे सर पर सवार रहना पड़ता है. मेरे पाठकों को यह लग सकता है कि इस बेहद प्रेरक और मोहक ब्लॉग को दो सालों से भी ज्यादा समय से चलाने के बाद भी मैं यह क्यों कह रहा हूँ – लेकिन यह सच है. इसके बावजूद जब मैं अपनी तुलना तीन साल पहले के निशांत से करता हूँ तो मुझे बहुत ख़ुशी होती है क्योंकि मैंने इस बीच स्वयं में बहुत सार्थक परिवर्तन का अनुभव किया है. मेरा बात-बात पर खीझना, कमियां निकालना और गुस्सा करना कम हुआ है, मैं अपनी चीज़ों की हिफाज़त करने लगा हूँ और उन्हें ठीक से रखता-सहेजता हूँ. सबसे अच्छी बात तो यह है कि मेरा खर्च कम हुआ है और मैं अधिक संतोषी जीव बन गया हूँ. जीवन में इसी प्रकार के पौज़िटिव परिवर्तन पहले आ जाते तो बहुत अच्छा होता लेकिन अभी भी कोई देर तो नहीं हुई है!

लेकिन अभी बहुत कुछ है जिसकी ओर ध्यान देना ज़रूरी है. ज़िंदगी, नौकरी, नाते-रिश्ते, और भागमभाग – इन सबके चलते मन में बहुत सी नकारात्मकता और कड़वाहट रह जाती है जो हमारी तरक्की और ख़ुशी के रास्ते में आड़े जाती है. ऐसे में मुझे श्री प्रवीण पाण्डेय जी की वह बात बहुत याद आती है जो उन्होंने पिछले महीने मुझे दिल्ली में कही थी. सरल और सौम्य व्यक्तित्व के स्वामी प्रवीण जी ने सच ही कहा था कि हमारे कथनों और वचनों में उपस्थित थोड़ी सी भी नकारात्मकता हमें पीछे धकेलती है. यदि मैं बेहतर लेखन नहीं कर पा रहा तो स्वयं से यह कहते रहना कि ‘मैं अच्छा नहीं लिख सकता’ स्वयं को नकारात्मक सुझाव देना है. तो फिर ऐसे में क्या कहना चाहिए? ‘मैं अच्छा लिखूंगा’ या ‘मैं अच्छा लिख सकता हूँ’ हमारे मनस को प्रेरित करता है. एक थैरेपी भी होती है जिसे ऑटोसजेस्टिव थैरेपी कहते हैं. इसमें बस इतना ही ध्यान रखना होता है कि कोई नकारात्मक विचार मन पर हावी न होने पाए. असाध्य रोगों से लड़ रहे कुछ व्यक्तियों का जीवट इतना सशक्त होता है कि वे अतिविकट परिस्थितियों में भी कई बार मौत के करीब जाकर भी पूर्णतः स्वस्थ हो जाते हैं जबकि बहुत से भीरुमना व्यक्ति मामूली चोटों और खरोंचों से ही नहीं उबर पाते.

मुझे भी यह लगने लगा है कि ह्रदय और मन में सकारात्मकता का होना सफलता पाने के लिए बहुत ज़रूरी है. सफलता – क्या और क्यों? इस विषय पर तो जाने कितना लिखा जा सकता है. सफलता और सफल होने  के सबके अर्थ भिन्न हो सकते हैं. मेरे लिए सफल होने के मानी ये हैं कि मैं आत्मिक, पारिवारिक, और आर्थिक मोर्चों पर कितना परिपक्व हूँ – यदि मैं किन्ही चीज़ों को पाना चाहता हूँ तो उन्हें पाने की दिशा में मैं कितना प्रयत्न कर सकता हूँ या कितना खतरा उठा सकता हूँ. यदि कुछ सोचा हुआ आशातीत मेरे साथ घटित न हो तो उस दशा में मेरी प्रतिक्रिया क्या होगी – मेरी सफलता का प्रत्यय इन्हीं प्रश्नों से जुड़ा है.

सकारात्मकता जीवन को रूपांतरित कर सकती है. इसे केवल इस वेबसाईट की कहानियां या कोई दूसरी किताब पढ़कर ही अपने जीवन में नहीं उतारा जा सकता. इसके लिए कुछ छोड़ना, कुछ जतन करना, कुछ अपनाना भी पड़ता है. पिछले पंद्रह वर्षों से सकारात्मकता और प्रेरक विचारों की पुस्तकों की रिकौर्ड़तोड़ बिक्री हुई है पर लाखों पाठक अपने में वह बदलाव नहीं ला सके जिसकी वे अपेक्षा करते थे. ऐसा होने के पीछे कई कारण और परिस्तिथियाँ हैं पर इस पोस्ट में उनकी चर्चा नहीं की जा रही है. सकारात्मकता और प्रेरणा पर मेरे प्रिय ब्लौगर द्वारा लिखे गए सूत्र मैं यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ. मुझे इनकी उपादेयता अनुभूत होती है और आपके लिए भी ये समान रूप से उपयोगी होंगे.

* ‘मैं यह नहीं कर सकता’, खुद से यह कहने के बजाय स्वयं को समझाएं कि दुनिया में कुछ भी असंभव नहीं है.

* यह ध्यान दें कि आप खुद से क्या बातें करते रहते हैं.

* नकारात्मक विचारों को मच्छर की तरह मसल दें.

* उनकी जगह सकारात्मक विचारों को उड़ान भरता देखे.

* आपके पास जो कुछ भी है उससे प्रेम करें.

* अपने जीवन, परिजन, और स्वास्थ्य के लिए आभारी रहें.

* आपके पास जो है उसपर ध्यान दें, जो नहीं हो उसकी चिंता नहीं करें.

* दूसरों से अपनी तुलना नहीं करें.

* लेकिन उनसे प्रेरणा ज़रूर लें.

* आलोचना को खुले दिल से स्वीकार करें.

* लेकिन निंदकों को नज़रंदाज़ कर दें.

* बुरी बातों में भी अच्छाई छुपी हो सकती है.

* असफलता रास्ते का वह पत्थर है जिसपर खड़े होकर सफलता की ओर बढ़ा जा सकता है.

* उन लोगों की बीच रहें जो पौज़ितिव तरंगें बिखेरते हों.

* शिकायत कम करें, मुस्कुराएँ ज्यादा.

* यह कल्पना करें कि आप दिनों-दिन निखरते जा रहे हैं.

* और अगले चरण में वही व्यक्ति बन जाएँ.

* सबसे पहले अपनी आदतों पर ध्यान दें, फिर आपके पास दूसरी बातों पर ध्यान देने के लिए पर्याप्त समय होगा.

“आप कहीं भी जाएँ और मौसम कितना भी खराब क्यों न हो, अपना सूरज अपने साथ लेकर चलें”.

“मुझे पसंदीदा जूते नहीं मिलने का मलाल था… लेकिन फिर मैंने सड़क पर एक शख्स देखा जिसके पैर ही नहीं थे”.

“यदि आपको यह लगता है कि हर दिन बुरा दिन है तो क्या आप कभी एक दिन को खोकर देखना चाहेंगे?”

“हर दिन अच्छा नहीं होता लेकिन हर दिन कुछ-न-कुछ अच्छा ज़रूर होता है”.

“यदि आपको कुछ नापसंद हो तो उसे बदल दें. यदि आप उसे बदल नहीं सकते तो उसके बारे में सोचने का तरीका बदल दें.”

“हर बात में सिर्फ दोष ढूँढने वाले व्यक्तियों को ही ज़िंदगी में वह सब मिल पाता है जो वह ढूंढना चाहते हैं”.

“हर विचार एक बीज है. यदि आप आम खाना चाहते हों तो बबूल का बीज मत बोइये”.

“हम सभी गटर में हैं लेकिन हम लोगों में से कुछ की आँखें ऊपर आकाश में तारों को ताकती रहतीं हैं”.

“वह धन्य है जिसके मन में कोई चाह नहीं है, क्योंकि वह कभी भी निराश नहीं होगा”.

“पराजय तभी कड़वी होती है जब आप उसका स्वाद चखना चाहते हों”.

“नकारात्मक मनोदशा रखना ही एकमात्र विकलांगता है”.

“स्वर्ग की चाबी सबके पास है, दुर्भाग्यवश नरक का ताला भी उसी से खुल जाता है”.

(इस पोस्ट का कुछ अंश लियो बबौटा की इस पोस्ट से लिया गया है)

राजा की अंगूठी

gold ringकिसी ज़माने में कहीं एक राजा था जिसका राज दूर-दूर तक फैला हुआ था। अपने दरबार में उसने बहुत सारे विद्वानों को सलाहकार नियुक्त किया हुआ था। एक दिन वह कुछ सोचकर बहुत परेशान हो गया और उसने सलाह लेने के लिए विद्वानों को बुलाया।

राजा ने उनसे कहा – “मुझे नहीं मालूम कि इसका मतलब क्या है… मुझे ऐसा लगता है कि कहीं कोई ऐसी अंगूठी है जिसे मैं अगर पहन लूँ तो मेरे राज्य में हर तरफ़ खुशहाली और व्यवस्था कायम हो जायेगी। मुझे ऐसी अंगूठी चाहिए। उसके मिलने पर ही मैं खुश होऊंगा। लेकिन अंगूठी ऐसी होनी चाहिए कि जब मैं खुश होऊं और उसे देखूं तो मैं उदास हो जाऊं”।

यह बड़ी अजीब बात थी। इसे सुनकर विद्वानों का भी सर घूम गया। वे सभी एक जगह एकत्र हो गए और उन्होंने ऐसी अंगूठी के बारे में खूब विचार-विमर्श किया। बहुत मंत्रणा करने के बाद उन्हें ऐसी एक अंगूठी बनाने का विचार आ गया जो बिल्कुल राजा के बताये अनुसार थी। उनहोंने राजा के लिए एक बेहतरीन अंगूठी बनवाई। उसपर लिखा था:

यह भी एक दिन नहीं रहेगा

चित्र साभार – फ्लिकर

सत्य का स्वाद

एक राजा ने एक महात्मा से कहा – “कृपया मुझे सत्य के बारे में बताइये. इसकी प्रतीति कैसी है? इसे प्राप्त करने के बाद की अनुभूति क्या होती है?”

राजा के प्रश्न के उत्तर में महात्मा ने राजा से कहा – “ठीक है. पहले आप मुझे एक बात बताइए, आप किसी ऐसे व्यक्ति को आम का स्वाद कैसे समझायेंगे जिसने पहले कभी आम नहीं खाया हो?”

राजा सोच-विचार में डूब गया. उसने हर तरह की तरकीब सोची पर वह यह नहीं बता सका कि उस व्यक्ति को आम का स्वाद कैसे समझाया जाय जिसने कभी आम नहीं खाया हो.

हताश होकर उसने महात्मा से ही कहा – “मुझे नहीं मालूम, आप ही बता दीजिये”.

महात्मा ने पास ही रखी थाली से एक आम उठाया और उसे राजा को देते हुए कहा – “यह बहुत मीठा है. इसे खाकर देखो”.