Saturday, May 7, 2011

"मेरे बग़ैर मत जाना" !!







रात ख़ामोश है
मैं दरवाज़े से बाहर आता हूँ
और तुम्हारे पास होने के लिए
इस पहाड़ी पर चढ़ने लगता हूँ .........


पहाड़ी पर ...
तुम नहीं हो...
सिर्फ़ एक काग़ज़ का टुकड़ा ......


"मेरे बग़ैर मत जाना" !!


मैं फूलों को सहलाता हूँ ...
तेज़ साँसों से
उस गर्म रात को जीता हूँ ....


खुश्क लबों को महसूसता हूँ

कुछ बूँदें डाल ... उन्हें
सर्द करता हूँ ...

और "साथ होने का महागासर" पीता हूँ ....


फिर ..
पहाड़ी की उस ढलान पर
मैं तुम्हारे लिए
प्यार के गीत गाता हूँ ........


अजनबी-सी एक रात .... मुझे
एक ख़ाली-से बिस्तर पर
ख़ामोश ... तन्हा ....
छोड़ जाती है !!



Saturday, April 9, 2011

दीवाना है दीवाना .......













दोस्त गर है तो मेरा साथ दे, अकेला हूँ मैं
वैसे जीने को तो तन्हा भी जिया करता हूँ
और दुश्मन है तो दो चार ज़ख्म ही दे दे
तू जो कोई नहीं क्यों याद तुझे करता हूँ


कोई ज़रूर तो नहीं कि जब कभी भी मुझे
ख्वाब आयें तो उन में तेरा गुज़र भी हो ही
गोया तू मेरे ही इन ख़्वाबों की अमानत है
यूं है नहीं, मैं यूं ही सोच लिया करता हूँ


तुझ को ये इल्म भला हो भी अगर, क्योंकर हो
कि मैं ने ख़्वाबों के कितने ही महल तोड़े हैं
पर तुझे क्या, कि ये हक़ीक़तें तो मेरी हैं
ख्वाब को भी मैं हक़ीक़त शुमार करता हूँ


मुझ से तू आशना है, और बात है ये मगर
आशनाई ये काश मेरे दिल से भी होती
किसी दिन तुझ को कभी इल्म ये भी हो जाता
बग़ैर तेरे मैं न जीता हूँ न मरता हूँ




Friday, March 25, 2011

मीत सब झूठे पड़ गए ...... : The Absurd











आज भी हर सुबह
खिड़की से आती रौशनी से
तुम्हारा ही चेहरा बनता है - मेरे कमरे की दीवार पे !


आज भी मेरी आँखों में चमकता है वही,
या शायद ....
मेरी आँखें चमकती हैं - उसी नूर से


एक पतंगा -
उस लौ के गिर्द
जो है ही नहीं ...


फिर भी -
तुम कोई तो हो !


कोई - जिस के बिना जीना
ज़िन्दगी जैसा तो नहीं है !!


मीत सब झूठे पड़ गए ..........



Sunday, March 20, 2011

मोहे मारे नजरिया सांवरिया रे ........


दोस्तो ...... होली की हार्दिक शुभकामनाएं !!



ख़ूब खेलें होली ...... रंगों और भंग में डूब जाएँ .... और ख़ूब मिठाइयां खाएं ......



बीच बीच में ये गाने सुनें ....... या background में इन्हें चलने दें ........



बहरहाल, मेरे हिस्से की मिठाइयां बचा के रखियेगा .....


फ़िलहाल सुनिए ये गाने और डूब जाइए होली के रंगों में ..... ओह ! माफ़ कीजिये .... डूब जाइए भंग के रंग में !!!!!


मोहे मारे नजरिया सांवरिया रे ....




होली आई रे कन्हाई ....



होली खेलत नंदलाल .....



अरे जा रे हट नटखट ......



जब फागुन रंग झमकते हों ...

Sunday, March 13, 2011

ग़ालिब - एक ग़ज़ल, दो फ़नकार





कह्र हो या बला हो, जो कुछ हो
काश कि तुम मेरे लिए होते




ग़ालिब को जितना पढता हूँ उतना ही और ज़्यादा पढने को जी चाहता है .....


छुट्टी का दिन हो और ग़ालिब की ग़ज़लों से दिन की शुरुआत हो ..... तो फिर सारा दिन समझ लीजिये बर्बाद है .... अब कोई कुछ और क्यों करे, क्योंकर करे ...... सारा दिन इसी में न डूबा रहे ?


आज सुनिए ग़ालिब की एक बेहद मकबूल ग़ज़ल, दो आवाजों में ......


पहले सुरैया ......





और फिर मुहम्मद रफ़ी






नुक्तः चीं है ग़म-ए-दिल उस को सुनाये न बने
क्या बने बात जहाँ बात बनाए न बने

मैं बुलाता तो हूँ उस को, मगर ऐ जज़्बा-ए-दिल
उस पे बन जाए कुछ ऎसी कि बिन आये न बने

खेल समझा है, कहीं छोड़ न दे, भूल न जाए
काश यों भी हो, कि बिन मेरे सताए न बने

ग़ैर फिरता है लिए यों तेरे ख़त को कि अगर
कोई पूछे कि ये क्या है, तो छुपाये न बने

इस नज़ाकत का बुरा हो, वो भले हैं, तो क्या
हाथ आयें, तो उन्हें हाथ लगाए न बने

कह सके कौन, कि ये जल्वःगरी किस की है
पर्दः छोड़ा है वो उस ने, कि उठाये न बने

मौत की राह न देखूँ, कि बिन आये न रहे
तुम को चाहूँ कि न आओ, तो बुलाये न बने

बोझ वो सर से गिरा है, कि उठाये न बने
काम वो आन पड़ा है, कि बनाए न बने

इश्क़ पर ज़ोर नहीं, है ये वो आतिश "ग़ालिब"
कि लगाए न लगे, और बुझाए न बने





नुक्तः चीं = हर बात में दोष निकालने वाला, माशूक़
जज़्बा-ए-दिल = मनोभाव, मन का आवेश