खुशदीप सहगल
बंदा 16 साल से कलम-कंप्यूटर तोड़ रहा है

16 अगस्त...मेरे ब्लॉगिंग के दो साल...खुशदीप

  • Monday, August 15, 2011
  • by
  • Khushdeep Sehgal
  • आज 16 अगस्त है...देश-विदेश की नज़रें अन्ना हज़ारे पर हैं...

    64 साल की आज़ादी...मेरा भारत महान...मदमस्त सरकार...लुंजपुंज विपक्ष...विपक्ष के रोल में सिविल सोसायटी...आंदोलन का प्लेटफॉर्म...अन्ना का मुखौटा...दूसरी आज़ादी का ख्वाब...बापू का ध्यान...राजघाट पर मजमा...15 अगस्त को अंधेरा...16 अगस्त का सवेरा...पुलिस क्या करेगी...सरकार क्या करेगी...अन्ना क्या करेंगे...लोग क्या करेंगे...मीडिया क्या करेगा...अरे छोड़िए न...मनोज कुमार का गाना याद कीजिए... इक तारा बोले...क्या कहे वो तुमसे...तुन तुन...तुन तुन...

    चलो ये तो हो गई अन्ना के आंदोलन की बात...

    लेकिन मेरे लिए 16 अगस्त के एक दूसरे मायने भी हैं...आज से ठीक दो साल
    पहले मेरी ब्लॉगिंग की शुरुआत हुई...16 अगस्त 2009 को देशनामा पर पहली पोस्ट लिखी थी...कलाम से सीखो शाहरुख...हुए सिर्फ दो साल हैं...लेकिन लगता है कि आप सब से न जाने कब का नाता है...इतने दोस्त, बुज़ुर्गों का आशीर्वाद, छोटों का प्यार...क्या नहीं मिला यहां...कौन कहता है ये आभासी दुनिया है...



    दो साल की ब्लॉगिंग में मैंने पाया कि ये दुनिया हक़ीक़त की दुनिया से कहीं ज़्यादा ज़िंदादिल है...जैसे परिवार में, दोस्तों में झगड़े होते हैं, वैसी तल्खी यहां भी कभी-कभी देखने को मिलती है...उखाड़-पछाड़ यहां भी हैं...लेकिन जीवन के नौ रसों की तरह इन सबका होना भी ज़रूरी है...तड़के बगैर दाल हो तो स्वाद कहां आता है...हां अगर सिर्फ तड़का ही तड़का रह जाए और दाल गायब हो जाए तो पेट का खराब होना भी निश्चित है...जैसे हिंदुस्तान को अलग अलग फूलों से सजा गुलदस्ता कहा जाता है, ऐसे ही ब्लॉगिंग भी है...दूसरों की खुशबू को भी सराहना सीखिए...कांटा चुभे तो बुरा मत मानिए...

    किसी ब्लॉग को पढ़ने के बाद जो आपका अंतर्मन कहता हो, उसी से दूसरे को अवगत कराइए...ये विचारों का अंतर्द्वंद्व ही ब्लॉगिंग की असली ताकत है...इसी से ब्लॉगिंग और व्यक्तिगत स्तर पर विकास हो सकता है...आज नाम किसी का नहीं ले रहा लेकिन जिन्होंने मुझे दो साल में प्रोत्साहित किया, उन्हें शुक्रिया जान कर नहीं कह रहा...मेरी समझ से शुक्रिया परायों का किया जाता है...यहां तो सब अपने हैं...हां, जाने-अनजाने मेरे किसी बोल या कृत्य से किसी का दिल दुखा हो तो ज़रूर नासमझ समझ कर माफ़ कर दीजिएगा...वैसे गाना तो यहां मेरा सबसे मनपसंद ही फिट होता है..एहसान मेरे दिल पे तुम्हारा है दोस्तों..लेकिन आज आपको दूसरा गाना सुनाता हूं...

    ना मैं भगवान हूं, ना मैं शैतान हूं,दुनिया जो चाहे समझे मैं तो इनसान हूं,
    मुझ में भलाई भी मुझ में बुराई भी,
    लाखों हैं मैल दिल में, थोड़ी सफाई भी,
    थोड़ा सा नेक हूं थोड़ा बेइमान भी,
    दुनिया जो चाहे समझे मैं तो इनसान हूं,
    दुनिया जो चाहे समझे मैं तो इनसान हूं
    ना कोई राज है ना सर पे ताज है,
    फिर भी हमारे दम से धरती की लाज है,
    तन का गरीब हूं मन का धनवान हूं,
    दुनिया जो चाहे समझे मैं तो इनसान हूं,
    जीवन का गीत है सुर में ना ताल में,
    उलझी है सारी दुनिया रोटी के जाल में,
    कैसा अंधेर है, मैं भी हैरान हूं,
    दुनिया जो चाहे समझे मैं तो इनसान हूं.,
    ना मैं भगवान हूं, ना मैं शैतान हूं,
    दुनिया जो चाहे समझे मैं तो इनसान हूं...

    (फिल्म- मदर इंडिया (1957), गीतकार- शकील बदायूंनी, संगीत- नौशाद, गायक- मुहम्मद रफ़ी)



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    जय हिंद, जय हिंद की सेना...खुशदीप

  • Sunday, August 14, 2011
  • by
  • Khushdeep Sehgal
  • हम सब भारत के नागरिक हैं...64 साल के आज़ाद देश भारत के नागरिक...हमारी हज़ार ख्वाहिशें हैं...लेकिन फौजी की एक ही ख्वाहिश होती है...जानते हैं क्या...दुश्मन को छठी का दूध याद दिला कर घर सही सलामत लौटना...हम आज़ाद हवा में सांस ले रहे हैं...हमारी आज़ादी बरकरार है...किसकी बदौलत...सिर्फ देश के इन रणबांकुरों के दम पर...15 अगस्त देश के साथ हम सबके लिए बहुत अहम है...इस तारीख से अपना फायदा ढ़ूंढने की कोशिश किसी को नहीं करनी चाहिेए...न किसी राजनीतिक दल को और न ही किसी मूवमेंट को...इस दिन बत्तियां बुझाने का संदेश देना, मेरे विचार से सही नहीं है...किसी का कद कितना भी बड़ा क्यों न हो, लेकिन देश के फौजियों से ऊंचा नहीं हो सकता...



    भ्रष्टाचार पर बेशक हम सरकार से हर दिन लड़ें लेकिन 15 अगस्त जैसे पवित्र राष्ट्रीय पर्व को राजनीति से दूर ही रहने दें...बर्फ से लदी चोटी पर खड़े अपने निगहेबान किसी फौजी को याद कीजिए...याद कीजिए देश के शहीदों को, कवि प्रदीप के इन अमर बोलों के साथ...



    ऐ मेरे वतन के लोगो!
    तुम खूब लगा लो नारा !
    ये शुभदिन है हम सबका!
    लहरा लो तिरंगा प्यारा
    पर मत भूलो सीमा पर!
    वीरों ने है प्राण गँवाए!


    कुछ याद उन्हें भी कर लो
    जो लौट के घर न आए,
    ऐ मेरे वतन के लोगो!
    ज़रा आँख में भरलो पानी!
    जो शहीद हुए हैं उनकी!
    ज़रा याद करो क़ुरबानी...


    जब घायल हुआ हिमालय!
    खतरे में पड़ी आज़ादी!
    जब तक थी साँस लड़े वो!
    फिर अपनी लाश बिछा दी
    संगीन पे धर कर माथा!
    सो गये अमर बलिदानी!
    जो शहीद हुए हैं उनकी!
    ज़रा याद करो क़ुरबानी...


    जब देश में थी दीवाली!
    वो खेल रहे थे होली!
    जब हम बैठे थे घरों में!
    वो झेल रहे थे गोली
    थे धन्य जवान वो अपने!
    थी धन्य वो उनकी जवानी!
    जो शहीद हुए हैं उनकी!
    ज़रा याद करो क़ुरबानी...


    कोई सिख कोई जाट मराठा
    कोई गुरखा कोई मदरासी
    सरहद पे मरनेवाला!
    हर वीर था भारतवासी
    जो ख़ून गिरा पर्वत पर!
    वो ख़ून था हिंदुस्तानी!
    जो शहीद हुए हैं उनकी!
    ज़रा याद करो क़ुरबानी...


    थी खून से लथपथ काया!
    फिर भी बन्दूक उठाके!
    दस-दस को एक ने मारा!
    फिर गिर गये होश गँवा के
    जब अन्त समय आया तो!
    कह गये के अब मरते हैं!
    ख़ुश रहना देश के प्यारो
    अब हम तो सफ़र करते हैं
    क्या लोग थे वो दीवाने!
    क्या लोग थे वो अभिमानी!
    जो शहीद हुए हैं उनकी!
    ज़रा याद करो क़ुरबानी...


    तुम भूल न जाओ उनको!
    इसलिये कही ये कहानी!
    जो शहीद हुए हैं उनकी!
    ज़रा याद करो क़ुरबानी...


    जय हिन्द। जय हिन्द की सेना,
    जय हिन्द, जय हिन्द, जय हिन्द...

    सी रामचंद्र के संगीतबद्ध इस गीत को पहली बार लता मंगेशकर ने 26 जनवरी 1963 को दिल्ली के रामलीला मैदान पर गाया था तो तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू समेत सभी की आंखों से गंगा-जमुना की तरह आंसुओं की धारा बह उठी थी...इस गाने से जुड़े किसी भी व्यक्ति ने एक पैसा भी फीस नहीं ली थी...कवि प्रदीप ने गाने की रायल्टी से मिलने वाली सारी रकम वार विडोज़ फंड को देने का ऐलान किया था...

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    Legendary actor Shammi Kapoor passes away


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    शम्मी कपूर जी को श्रद्धांजलि...खुशदीप

  • by
  • Khushdeep Sehgal

  • 1931-2011

    शम्मी कपूर जी का आज सुबह मुंबई में अस्सी साल की उम्र में निधन हो गया...पूरे ब्लॉगवुड की तरफ से याहू स्टार को श्रद्धांजलि...




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    मैं कहीं 'कवि' न बन जाऊं...खुशदीप

  • Saturday, August 13, 2011
  • by
  • Khushdeep Sehgal
  • आजकल फेसबुक पर सुबह गुरुदेव समीर लाल जी अपनी एक फोटो के साथ दो लाइन लिखकर सबको इल्ले से लगा देते हैं...भारत की सुबह का मतलब कनाडा की रात है...गुरुदेव सोने चले जाते हैं और फिर पूरा दिन (कनाडा की पूरी रात) एक से बढ़कर एक कमेंट आते हैं...मैं भी पिछले तीन चार दिन से अपने कमेंट के साथ वहां पर चोंच लड़ा रहा हूं...सच में इंस्टेंट जवाब मिलने में बड़ा मज़ा आता है...प्रेसेंस ऑफ माइंड का सारा खेल है...ऐसे ही फ्रैंडशिप डे वाले दिन फेसबुक पर गुरुदेव की पोस्ट के नीचे ही शरद कोकास भाई जी के शुभकामना संदेश वाली पोस्ट पढ़ने को मिली...इसमें शरद भाई ने लिखा था...सभी कवि मित्रों को मित्रता दिवस की शुभकामनाएं...मैंने सवाल किया...आपके जो मित्र कवि नहीं हैं, वो क्या करें...इस पर शरद भाई का जवाब आया...जो मित्र कवि नहीं हैं, उन्हें भी शुभकामनाएं इस कामना के साथ कि वो भी शीघ्र कवि बन जाएं...इसका जवाब मैंने दिया...मैं कहीं कवि न बन जाऊं, आपकी मित्रता में ए शरद जी...अब कह तो दिया लेकिन कवि बनना इतना आसान तो है नहीं कि खाला जी के घर जाओ और सीख आओ...लेकिन अब मैंने भी ठान ली कि शरद भाई का कवि-मित्र बन कर दिखाऊंगा...इसलिए लैपटॉप पर वर्डपैड खोल कर बैठ गया...कविता के नाम पर जो नतीज़ा निकला, वो आपके सामने है...बस बर्दाश्त कर लीजिएगा....



    मैं हूं कौन...

    मेरा 'मैं' मिला मुझसे,
    वो 'मैं' जो अब मैं नहीं,
    मैंने हाथ बढ़ाया,
    वो बस मुस्कुराया,
    मैं सकपकाया,
    हाथ वापस लौट आया,
    मैंने कहा, मिलोगे नहीं,
    उसने कहा, किससे ?
    मुझसे और किससे ?
    तुम अब वो हो कहां,
    वो जो गैरों को भी
    गले मिलता तपाक से,
    अब तुम औरों से क्या,
    अपने से भी नहीं मिलते,
    अपने जो बीता कल हैं,
    तुम्हारे सपने ही अब सब कुछ हैं,
    सपने जो आने वाला कल है,
    इनमें मैं कहां फिट हूंगा,
    मैं जो तुम्हारा अतीत हूं,
    वो अतीत जो इनसान था,
    किसी के भी दर्द में पिघलता था,
    अब तुम पत्थर हो,
    आलीशान इमारत के पत्थर,
    खूबसूरत लेकिन बेजान,
    गरूर ऐसा जैसे,
    मुर्दे अकड़ते हैं,
    मुर्दों से 'मैं' हाथ नहीं मिलाता,
    बस हाथ जोड़ता हूं,
    फिर मेरा सपना टूट गया,
    वो हमेशा के लिए चला गया,
    अब मैं सोच रहा हूं,


    मैं हूं कौन...

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    लुट रहा है लंदन, कहां हैं स्कॉटलैंड यार्ड...खुशदीप

  • Friday, August 12, 2011
  • by
  • Khushdeep Sehgal


  • कहते हैं कि हर आपदा से कुछ सीखना चाहिए...ब्रिटेन में हो रहे दंगे भी ऐसी ही आपदा है...ब्रिटेन-अमेरिका जैसे पश्चिमी देश भारत की पुलिस का इसलिए मज़ाक उड़ाते रहे हैं कि वो 26/11 जैसे हमले में भी ट्रेंड और अत्याधुनिक हथियारों से लैस आतंकवादियों का लाठी और पुरानी जंग लगी राइफलों से मुकाबला कर रही थी...अब लंदन समेत ब्रिटेन के तमाम शहरों में दंगाइयों ने आतंक मचाया हुआ है तो कहां हैं दुनिया की सबसे बेहतरीन मानी जाने वाली लंदन की स्कॉटलैंड यार्ड पुलिस...ब्रिटेन के प्रधानमंत्री डेविड कैमरन ने गुरुवार को संसद में कबूल किया कि उनकी पुलिस दंगों की शुरुआत में स्थिति की गंभीरता को समझने में नाकाम रही...दंगाइयों से जिस सख्ती से निपटा जाना चाहिए था, वैसे नहीं निपटा गया....पुलिस ने जो भी तरीके अपनाए वो कारगर नहीं रहे...कैमरन के मुताबिक पुलिस यही समझती रही कि ये एक व्यक्ति (मार्क डग्गन) की मौत पर भीड़ का गुस्सा है... एक हफ्ते पहले लंदन के टोटेनहाम इलाके में डग्गन की कथित तौर पर पुलिस की गोली से मौत हुई थी...लेकिन डग्गन की मौत पर वो भीड़ का गुस्सा नहीं था वो आपराधिक प्रवत्ति का दंगा था...एक वक्त में कई जगह कई सारे लोग एक ही काम में लगे हुए थे...वो था संपत्ति को नुकसान पहुंचा कर लूट-खसोट कर अपना फायदा करना...दुकानों से कीमती सामान लूटना...ऐसे लोगों से वैसे ही निपटा जाना चाहिए था जैसे अपराधियों से निपटा जाता है...

    पांच दिन तक ब्रिटेन के जलने के बाद ब्रिटेन सरकार ने पुलिस को और अधिकार देने का ऐलान किया...दंगाई युवकों की तलाश में घर-घर छापे मारना शुरू किया गया...लंदन या दूसरे शहरों में नकाब पहनकर अब किसी को घर से निकलने की इजाज़त नहीं होगी...1500 लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है...आने वाले दिनों में और भी कई गिरफ्तारियां हो सकती हैं...पड़ोसी मुल्क स्काटलैंड से 250 तेज़तर्रार पुलिस अफसरों को मदद के लिए ब्रिटेन में बुलाया गया है...

    माना यही जा रहा है कि दंगे भड़काने में एफ्रो-कैरेबियाई समुदाय के भटके हुए युवकों का हाथ रहा है...इसी समुदाय में बेरोज़गारों और स्कूल ड्राप आउटस का हिस्सा सबसे ज़्यादा है...नस्ली आक्रोश की संभावना से भी इनकार नहीं किया जा रहा...भारतीयों समेत एशियाई मूल के लोगों को अपनी संपत्ति की हिफाज़त के लिए खुद ही पहरेदारी करनी पड़ रही है...दंगों की विभीषिका के पीछे सोशल मीडिया को भी ज़िम्मेदार माना जा रहा है...कैमरन ने शांति और कानून-व्यवस्था की बहाली के उपायों के तहत सोशल मीडिया पर अंकुश लगाने पर गंभीरता से विचार करने की बात कही है...ब्रितानी प्रधानमंत्री का सवाल है कि जब हम जानते हैं कि वो हिंसा, अव्यवस्था और अपराध को बढ़ावा देने में लगे हैं, ऐसे में उन्हें सोशल मीडिया के ज़रिए एक-दूसरे से संवाद बनाने से रोकना क्या सही कदम नहीं होगा...यानि सोशल मीडिया पर कई तरह की बंदिशें लग जाएं तो कोई बड़ी बात नहीं...

    ब्रिटेन में साक्षरता की दर भारत से कहीं ऊंची हैं...मेरा सवाल है कि भारत के भ्रष्टाचार, गरीबी, अशिक्षा, अपराध, गंदगी, दंगों को लेकर नाक-भौं चढ़ाने वाले पश्चिमी देश ब्रिटेन को लेकर चुप क्यों है...भारत में आंतकवाद या और कोई घटना होती है तो अमेरिका-ब्रिटेन जैसे ही देश अपने देश के लोगों को एडवायज़री जारी करने में सबसे आगे रहते हैं...इतना भारत की घटनाओं से असर नहीं होता जितना कि इनकी एडवायज़री से होता है कि भारत जाना खतरे से खाली नहीं है...इससे देश के टूरिज्म और होटल सेक्टर को तो चोट लगती ही है भारत के बारे में भी दुनिया भर में गलत तस्वीर बनती है...

    सुनील गावस्कर ने सही कहा है कि अगर ब्रिटेन जैसे दंगे भारत में हो रहे होते और इंग्लैंड टीम भारत के दौरे पर होती तो कब की अपने देश वापसी के लिए भाग खड़ी होती...लेकिन हमारी टीम बर्मिंघम में होटल के पास लूट-पाट होने के बाद भी दौरे की प्रतिबद्धता से पीछे नहीं हटी...लेकिन यहां मेरा मकसद एक दूसरे की कमीज़ को ज़्यादा सफेद बताना नहीं है...हमें दूसरों की खूबियों और खामियों से सबक लेना चाहिए...भीड़तंत्र के मनोविज्ञान से निपटने में ब्रिटेन के इस प्रकरण से नसीहत लेनी चाहिए...कैमरन ने एक बात अच्छी कही है कि दंगे में जिन दुकानों और घरों को नुकसान पहुंचा है वो 12 दिन के भीतर अपने नुकसान की भरपाई के लिए ब्रिटेन सरकार से आवेदन कर सकते हैं...उनके आवेदनों को जल्दी से जल्दी निपटाया जाएगा...क्या हमारे देश में इतनी जल्दी ऐसी राहत मिलती है...

    कैमरन के संसद में दिए बयान और दंगों को रोकने के लिए किए गए उपायों को आप विस्तार से इस लिंक में देख सकते हैं... Britain ! You also got wrong...
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    पृथ्वी पर पहला जीवन स्पेस से आया...खुशदीप

  • Wednesday, August 10, 2011
  • by
  • Khushdeep Sehgal


  • पृथ्वी पर सबसे पहले जीवन कैसे आया, ये हम सबके लिए हमेशा से दिलचस्पी का सबब रहा है...इस सवाल का जवाब आज भी वैज्ञानिकों के लिए चुनौती बना हुआ है...दो सौ साल से डॉर्विन की विकास की थ्योरी सबसे मान्य थ्योरी रही है...इस थ्योरी के मुताबिक 3.9 अरब साल पहले समुद्र में सबसे पहला जीवन आया...अमोनिया, मिथेन, कार्बन डाई आक्साइड और पानी और अन्य यौगिकों के मिलने से ये मुमकिन हुआ...RNA (Ribo-Nucleic Acid) का निर्माण इस दिशा में पहली कड़ी था...

    इससे भी थोड़ा पहले की बात की जाए तो 4.6 अरब साल पहले सूर्य के चारों ओर घूम रही Accretion Disc से पृथ्वी बनी...Accretion Disc को ऐसे वलय से समझा जा सकता है जो घटता-बढ़ता रहता है...फिर पृथ्वी और थेइया (Theia) ग्रहों के आपस में टकराने से कई मूनलेट्स निकलीं जिनके जुड़ने से चंद्रमा बना...चंद्रमा के Gravitational Pull (गुरुत्वाकर्षण बल) की वजह से ही पृथ्वी के चक्कर काटने की धुरी (Axis) स्थिर हुई...इसी प्रक्रिया के बाद ऐसे हालात का निर्माण हुआ जिसमें आगे चलकर जीवन का पृथ्वी पर आना संभव हो सका...

    करीब 4.1 अरब साल पहले पृथ्वी का Crust ठंडा होकर ठोस हुआ...साथ ही वायुमंडल और समुद्र बने...समुद्र में बहुत गहराई में आयरन सल्फाइड बनना, प्लेटलेट्स की दीवार , RNA जैसे कार्बनिक यौगिक का निर्माण, RNA का खुद को रिपीट करना...यही पहले जीवन का संकेत था...रिपीटिशन या Replication के लिए ऊर्जा, जगह, बिल्डिंग ब्लॉक्स की बड़े पैमाने पर ज़रूरत पड़ी...इससे कंपीटिशन या प्रतिस्पर्धा को मौका मिला...Survival Of Fittest के प्राकृतिक चयन ने उन्हीं मॉलीक्यूल्स को चुन लिया जो खुद को परिस्थितियों के अनुरूप ढालने और Replication में सबसे असरदार थे...फिर DNA (Deoxyribo Nucleic Acid) ने मुख्य रिप्लीकेटर का स्थान लिया...इसी DNA को आज भी जीवन की सबसे छोटी इकाई या Building Blocks of Life माना जाता है...हर जीव का DNA से बना genome अलग होता है...इन्हीं Genomes ने अपने चारों तरफ खोल या Membrane विकसित की और Replication में उन्हें और आसानी हुई... इसके बाद उल्काओं की लगातार बरसात से ये मुमकिन था कि उस वक्त तक जो भी जीवन था सब खत्म हो गया हो...या कुछ Microbes (सूक्ष्म जीव) ऐसे थे जिन्होंने पृथ्वी की सतह पर हाइड्रोथर्मल खोलों में खुद को छुपा लिया हो...और वहीं धीरे-धीरे विकास के रास्ते सभी जीवों को जन्म देने का आधार बने...यहां तक तो थी डार्विन की प्रचलित थ्योरी...

    लेकिन यहां से अब एक अलग थ्योरी निकलती है...इसके मुताबिक पृ्थ्वी पर जीवन दूसरे ग्रह से धूमकेतु (Comet) या उल्का (Meteroide) के ज़रिए आया...कार्डिफ यूनिवर्सिटी में एस्ट्रोबायोलॉजी के निदेशक प्रोफेसर एन चंद्रा विक्रमसिंघे के मुताबिक पहली बार इसका सबूत तब मिला जब 1986 में हैली कॉमेट पृथ्वी के बिल्कुल पास से गुज़रा..अंतरिक्ष यान गिओटो के उपकरणों की मदद से वैज्ञानिकों ने देखा कि धूमकेतु जटिल जैविक पदार्थों से ही बने होते हैं...इसी आधार पर प्रोफेसर विक्रमसिंघे ने दावा किया कि जीवन को धरती पर लाने के लिए धूमकेतु ही ज़िम्मेदार थे, न कि समुद्र में जीवन की उत्पत्ति हुई...उनका ये भी कहना है कि जब पांच अरब साल पहले Solar-System (सौर-मंडल) में सिर्फ गैस मौजूद थी तब भी आकाशगंगा में जीवन मौजूद था...धूमकेतुओं ने ही धरती पर बैक्टीरिया के रूप में जीवन का बीज बोया...

    धूमकेतुओं या उल्कापिंडो के ज़रिए पृथ्वी पर जीवन आने की थ्योरी को अब नासा के अनुदान पर की गई एक स्टडी से भी बल मिला है...इस में उल्कापिंडो में वही अवयव या components पाए गए हैं जो हमारे जीवन की इकाई DNA में पाए जाते हैं...क्या है ये क्रांतिकारी स्टडी, जो मुमकिन है आगे चलकर डार्विन की समुद्र में जीवन की उत्पत्ति के सिद्धांत को ही गलत ठहरा दे...इस स्टडी को जानने के लिए लिंक है- Is the popular theory of origin of life wrong ...Khushdeep

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    इस मुल्क की तो ले ली भईया...खुशदीप

  • Monday, August 8, 2011
  • by
  • Khushdeep Sehgal
  • जिसे देखो आता जाए, खाता जाए, पीता जाए,

    क्या कहूं अपना हाल, ए दिल-ए-बेकरार,

    सोचा है के तुमने क्या कभी,

    सोचा है कभी क्या है सही,


    सोचा नहीं तो अब सोचो ज़रा...



    अरविंद गौड़ के निर्देशन में अस्मिता थिएटर ग्रुप दिल्ली और एनसीआर में जगह-जगह भ्रष्टाचार पर नुक्कड़ नाटक कर रहा है...मेरा मानना है कि देश के हर जागरूक नागरिक को ये नुक्कड़ नाटक ज़रूर देखना चाहिए...इसमें युवाओं के जोश को देखकर आपको भरोसा जगेगा कि अब भी देश में सब कुछ खत्म नहीं हुआ है...देश को लूट कर खाने वाले नेताओं को बस सबक सिखाने की ज़रूरत है...शिल्पी मारवाह समेत नुक्कड़ नाटक के एक-एक पात्र के जीवंत अभिनय ने इसे बेमिसाल बना दिया है...दिल्ली से बाहर रहने वालों की सुविधा के लिए लिंक दे रहा हूं, इस आग्रह के साथ, इसे ध्यान से और पूरा ज़रूर देंखें...अगर नेट की स्पीड तंग करे तो एक बार इसे पूरा डाउनलोड होने के बाद देखें...INDIA FOR CORRUPTION...KHUSHDEEP
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    इस बार 16 अगस्त का भी इंतज़ार...खुशदीप

  • Sunday, August 7, 2011
  • by
  • Khushdeep Sehgal


  • पंद्रह अगस्त को नौ दिन रह गए हैं...लेकिन इस बार देश को सोलह अगस्त का भी इंतज़ार है...अन्ना हज़ारे की दूसरी आज़ादी की लड़ाई के आह्वान पर यूपीए सरकार क्या रवैया दिखाती है, इस पर दुनिया के हर भारतीय की नज़र है...


    लेकिन आज इस पोस्ट में बात ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल की...चर्चिल ने 64 साल पहले भारत के राजनीतिक भविष्य पर कहा था-

    सत्ता ठग, चोर, उच्चकों के हाथ में चली जाएगी...सारे भारतीय नेता निम्न कोटि के होंगे...वो मीठी जुबान और मूर्ख दिल वाले होंगे...वो सत्ता के लिए आपस में लड़ेंगे...राजनीतिक द्वेष और झगड़ों में भारत की अच्छाइयां छुप जाएंगी...एक दिन ऐसा आएगा जब देश में हवा-पानी पर भी टैक्स होगा...

    वाकई हमारे नेताओं ने साढ़े छह दशक में बड़ी मेहनत की है, विंस्टन चर्चिल को सही ठहराने के लिए...

    देखिए इस लिंक पर सबसे बड़ा शाहकार...LOOT LO INDIA
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    संतान सुख (fertility) से अब कोई नहीं रहेगा वंचित?...खुशदीप

  • Saturday, August 6, 2011
  • by
  • Khushdeep Sehgal



  • संतान के सुख से वंचित लोगों के लिए जापान में हुए प्रयोग से उम्मीद की नई किरण जगी है...जापानी साइंसदानों ने शुक्राणु बनाने में असमर्थ एक चूहे में लैब में पैदा की गई स्पर्म कोशिकाओं के ज़रिए प्रजनन की ताकत पैदा कर दी...इस शोध से आगे चलकर मानव प्रजाति को भी लाभ मिल सकता है...साइंस पत्रिका नेचर के मार्च अंक में इस शोध के नतीजों को छापा गया है...

    क्योटो यूनिवर्सिटी में डॉ मेटिनोरी सेतोऊ के नेतृत्व में रिसर्च टीम ने ये करिश्मा कर दिखाया है...इस टीम ने भ्रूण की स्टेम कोशिकाओं से पहले जर्म कोशिकाएं प्राप्त कीं...और फिर इन जर्म कोशिकाओं को एक सात दिन के चूहे के वीर्यकोष (testes) में प्रत्यर्पित या ट्रांसप्लांट कर दिया गया...नतीजा ये निकला कि चूहे ने न सिर्फ सामान्य दिखने वाले शुक्राणु पैदा किए...बल्कि इन शुक्राणुओं ने पेट्री डिश में अंड कोशिकाओं को निषेचित भी कर दिखाया...इस तरह 214 भ्रूण पैदा कर मादा चुहिया में इंप्लांट किए गए...नतीजा 65 स्वस्थ चूहे-चुहियों ने जन्म लिया...यही नहीं इस तरह जन्मे चूहे-चुहियों ने आगे चलकर प्राकृतिक तौर पर ही बच्चों को जन्म दिया..

    डॉ सेतोऊ और उनके सहयोगी सालों से इस शोध में लगे हुए थे...उनके इस प्रयोग की पूरी दुनिया के साइंसदानों ने प्रशंसा की है और साथ ही इसे आगे चलकर मानव प्रजाति में बांझपन से निजात दिलाने के लिए क्रांतिकारी कदम बताया है...डॉ सेतोऊ ने साफ किया है कि मानव प्रजाति के लिए ये अभी दूर की कौड़ी है क्योंकि इसके लिए पहले कई और प्रयोग करने होंगे...

    इसी विषय पर टाइम पत्रिका के लाइफ साइंस के रिपोर्टर मेरेडिथ मेल्निक ने अपने लेख में शोध के हवाले से खंगाला है कि क्या लैब में पैदा किए गए शुक्राणु नामर्दों को भी मर्द बना सकते हैं...ये रहा लिंक...Could Lab-Grown Sperm Help Infertile Men?
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    यहां सब 'Jawahar Lal Nehru' ही आते हैं...खुशदीप

  • Thursday, August 4, 2011
  • by
  • Khushdeep Sehgal

  • डॉ अनवर जमाल भाई ने ई-मेल से एक लिंक भेजा...आप क्या जानते हैं हिंदी ब्लॉगिंग की मेंढक शैली के बारे में ? Frogs online...पढ़ा तो व्यंग्य में धार लगी...खास तौर पर इन पंक्तियों में...इन सब कोशिशों के बावजूद अपने कुएं से बाहर के किसी इंसान ब्लॉगर की नकेल उनके (मेंढकों) हाथ न आ सकी...तब उन्होंने टर्रा कर बहुत शोर मचाया और सोचा कि इंसान शायद इससे डर जाये लेकिन जब बात नहीं बनी तो वे समझ गए कि 'इन चेहरों को रोकना मुमकिन नहीं है...' इस बार भी उनसे सहमत वही थे जो उनके साथ कुएँ में थे...इंसान ने कुएं की मुंडेर से देख कर उनकी हालत पर अफ़सोस जताया और हिंदी ब्लॉगिंग को मेंढकों की टर्र टर्र से मुक्त कराने के लिए उसने अपना हाथ आगे बढ़ा दिया...

    डॉ जमाल की इन पंक्तियों को पढ़कर एक किस्सा भी याद आ गया...अब ये किस्सा ब्लॉगिंग से जुड़ता है या नहीं, ये तय करना आप पर ही छोड़ता हूं...




    एक बार जवाहरलाल नेहरू आगरा में मानसिक रोगी केंद्र का निरीक्षण करने पहुंचे...सुपरिटेंडेंट नेहरू जी को केंद्र का दौरा कराते हुए सारी जानकारी देते जा रहे थे...जब मानसिक रोगियों से मिलने का वक्त आया तो नेहरू जी ने सुपिरटेंडेंट को कुछ भी न बोलने का इशारा किया...मानसिक रोगियों में जिसे सबसे 'अक्लमंद' माना जाता था, उसे नेहरू जी से मिलवाने के लिए सबसे आगे खड़ा किया गया था...नेहरू जी ने उसे देखा था मुस्कुरा कर अपना हाथ मिलाने के लिए आगे बढ़ा दिया...साथ ही नेहरू जी ने प्यार से कहा...पहचाना मुझे, मैं हूं जवाहरलाल नेहरू...इस देश का प्रधानमंत्री...इस पर जो 'अक्लमंद' आगे खड़ा था, उसने कहा...चल-चल लग जा लाइन में, यहां पहली बार जो भी आता है वो 'जवाहरलाल नेहरू' ही होता है...थोड़े दिन यहां रह कर सही हो जाता है...

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