इलाहाबाद से बनारस

इलाहाबाद से हम सबेरे चले थे। कुछ ही देर में हम शहर के बाहर आ गये। बनारस की तरफ जाने वाले संगम पुल पर कुछ देर खड़े-खड़े गंगा-यमुना संगम को देखते रहे। दोनों के पानी का रंग अलग दिखाई दे रहा था।

हम तीनों ‘टीनएजर्स‘ शेरशाह सूरी मार्ग पर चलते हुये बनारस की तरफ बढ़ चले। करीब ३० किमी चलकर हम हंडिया तहसील पहुंचकर एक ढाबे की चारपाइयों पर लेट गये। मैं तथा अवस्थी अपनी रिन की चमकार वाली सफेद ड्रेस के कारण लोगों के कौतूहल का विषय बने थे। ढाबे में चाय -नाश्ता किया। हमारी आंखे अनजाने ही डी.पी.पांडे को खोज रहीं थीं।

डी.पी. उर्फ दुर्गाप्रसाद पांडे हमारे कालेज के सीनियर थे। हमसे एक साल सीनियर थे। जब हम कालेज पहुंचे थे तो वे एक पढ़ाकू मेधावी सीनियर के रूप में नमूदार हुये थे। धीरे-धीरे वे तमाम दूसरे कालेजियट सद्गगुण भी सीखते गये। लिहाजा जब कालेज से निकले तो आत्मरक्षा भर की गुंडई में भी पर्याप्त अनुभव हासिल कर चुके थे।फिलहाल पांडे जी ओबरा में उ.प्र. विद्युत निगम में कार्यरत हैं।

नवीन शर्मा,डीपी पांडे,पीएस मिश्र
नवीन शर्मा,डीपी पांडे,पीएस मिश्र

दो दिन पहले इलाहाबाद में कालेज अलुमिनी एशोसियेशन की मीटिंग में जिन तमाम लोगों से मुलाकात उनमें पांड़ेजी, मिसिरजी , नवीन शर्मा तथा लव शर्मा भी थे। नवीन शर्मा, लव शर्मा हमारे साथ थे तथा मिसिर जी हम सभी के सीनियर थे। खिंचाई में कोई किसी से कम नहीं है। जब मैं इलाहाबाद से कानपुर लौट आया तो मिसिरजी ने हमें फोन पर बताया:-

शुकुल जब तुम चले गये तो यहां एक हादसा हो गया।

हमने पूछा -क्या हो गया?

डीपी की रात में कोई पैंट (उतार ) ले गया।

हम चुप हो गये यह जानकर कि अब पूरी घटना खुदै बतायी जायेगी। हुआ भी यही। बताया गया:-

डीपी सबेरे से चरस बोये पड़े हैं। इनकी कोई सोते में पैंट उतार ले गया। हमने लाख समझाया-चढ्ढी पहना करो लेकिन ये मानते ही नहीं । कहते हैं अब हम बड़े हो गये । चढ्ढी पहनने की उमर थोड़ी रही । लोग चिढ़ायेंगे कि इतना बड़ा होकर चढ्ढी पहनता है। अब सबेरे से परेशान हैं। हमें भी परेशान कर रहे हैं। अजीब लफड़ा हो गया ससुर।

बहरहाल पांडे जी तो नहीं मिले लेकिन हम हंडिया दर्शन के बाद आगे बढ़े। अगला पढ़ाव गोपीगंज कस्बा था। पानी बरसने लगा था। हमने वहीं कहीं खाना खाया। पानी बरसने के कारण कीचड़ हो गया था। दुकानों में खुले में रखी मिठाईंयां बकौल श्रीलाल शुक्ल-मक्खी-मच्छरों,आंधी-पानी का बखूबी मुकाबला कर रहीं थीं।

रुकते-चलते हम शाम तक बनारस पहुंच गये। बनारस में हमें बीएचयू में रुकना था। दीपक गुप्ता के घर।

दीपक हमारे जूनियर तथा गोलानी के ‘बैचमेट’ हैं। दीपक जितना खूबसूरत है उससे ज्यादा खूबसूरत उसका व्यवहार है। यह संस्कारी बालक अपने परिवेश में सदैव लोगों का चहेता रहा। यह संयोग ही रहा कि दीपक को अपने पारिवारिक जीवन में काफी कष्ट उठाना पड़ा। दीपक की पत्नी का स्वास्थ्य सालों खराब रहा। उसको अपने दो बच्चों की परवरिश काफी दिन मां-बाप दोनों की तरह करनी पड़ी। लेकिन दीपक ने बिना किसी शिकायत के सारी जिम्मेदारियां निभाई।

विभाग में भी दीपक बहुत काबिल आफीसर के रूप में जाने जाते हैं। तीन साल पहले दीपक को भारत सरकार की तरफ से एक साल के अध्ययन के रायल मिलिटिरी कालेज,लंदन जाना था। इधर दीपक की पत्नी गंभीर रूप से बीमार थीं। विदेश जायें या न जायें के उहापोह में पत्नी की बीमारी बढ़ती गई। जाना कुछ कारणों से टल गया। कुछ दिन बाद ही पत्नी की मृत्यु भी बीमारी के कारण हो गई।

दीपक मानते हैं कि दौरा टल जाना अच्छा ही रहा नहीं तो अगर कहीं वो विदेश चला जाता तो अंतिम समय पत्नी के पास न रहने का अफसोस जिंदगी भर रहता।

पत्नी की मृत्यु के समय दीपक की उम्र बमुश्किल ३५ साल की रही होगी। तमाम लोगों ने समझाया तो दीपक बच्चों की बात सोचकर दुबारा शादी के लिये राजी हुये।एक सजातीय रिश्ते के बारे में पता चला। लड़की के पति तथा बच्चे की एक सड़क दुर्धटना में ६ साल पहले मौत हो गई थी। लड़की के भी काफी चोट थी आई थी । पैर अभी भी सीधा नहीं नहीं होता था। चेहरे पर भी चोट के निशान थे। पैर तथा चेहरे की बात सुनकर दीपक ने शादी की बात से (अपने पिताजी को) इंकार कर दिया।

इंकार के बाद दीपक को अफसोस हुआ कि इस दुर्घटना में लड़की का क्या दोष? यह सोचकर फिर तुरंत दीपक अपने दोनों बच्चों के साथ लड़की के पास आगरा पहुंचे। बच्चे तुरंत हिलमिल गये । कुछ दिन बाद दीपक की शादी हो गई । आज पूरा परिवार खुशहाल है। दीपक को बहुत दिन इंतजार करना पड़ा खुश होने के लिये।

हम जब बनारस पहुंचे तो सीधे बीएचयू में दीपक के घर गये। वहीं रुके। दीपक के पिताजी, प्रोफेसर बृज किशोर मेकेनिकल इंजीनियरिंग विभाग के जाने माने प्रोफेसर थे।संघी विचारधारा के प्रोफेसर किशोर का ज्योतिष में भी काफी दखल था।

थके होने के कारण हम खाना खाकर जल्द ही सो गये।अगले दिन बनारस घूमना था।

फ़ुरसतिया

अनूप शुक्ला: पैदाइश तथा शुरुआती पढ़ाई-लिखाई, कभी भारत का मैनचेस्टर कहलाने वाले शहर कानपुर में। यह ताज्जुब की बात लगती है कि मैनचेस्टर कुली, कबाड़ियों,धूल-धक्कड़ के शहर में कैसे बदल गया। अभियांत्रिकी(मेकेनिकल) इलाहाबाद से करने के बाद उच्च शिक्षा बनारस से। इलाहाबाद में पढ़ते हुये सन १९८३में ‘जिज्ञासु यायावर ‘ के रूप में साइकिल से भारत भ्रमण। संप्रति भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय के अंतर्गत लघु शस्त्र निर्माणी ,कानपुर में अधिकारी। लिखने का कारण यह भ्रम कि लोगों के पास हमारा लिखा पढ़ने की फुरसत है। जिंदगी में ‘झाड़े रहो कलट्टरगंज’ का कनपुरिया मोटो लेखन में ‘हम तो जबरिया लिखबे यार हमार कोई का करिहै‘ कैसे धंस गया, हर पोस्ट में इसकी जांच चल रही है।

3 responses to “इलाहाबाद से बनारस”

  1. Raag

    महोदय,

    क्षमा किजिएगा, बहुत ढुँढ्ने पर भि आपका “प्रोफाईल” नही ढुँढ् पाया, इसिलीये आपको आपके नाम से सम्बोधित नहिँ कर पा रहा हूँ. मेरी हिन्दि उतनी अछ्छी नहिँ है पर प्रयत्न करुँगा. पहली बार आपके “ब्लाग” पर आया था – बहुत अछ्छा लगा. “मजा ही कुछ और है” का क्या कहना! निस्चय, “फुरसतिया” अब “इँटरनेट” पर मेरे पसन्दिदा “डेस्टीनेशनस्” मे से एक हो गया है.

    आपके कलम [या फिर "कि-बोर्ड" को कहिये :-) ] को और शक्ति मिले.

    शुक्रिया,
    राग

  2. देबाशीष

    अनूप भाई,

    आपके फैन बढ़ते जा रहे हैं अब वाकई आपको एक परिचय पृष्ठ बना लेना चाहिये।

  3. फ़ुरसतिया-पुराने लेख

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