फ़ुरसतिया

अनूप शुक्ला: पैदाइश तथा शुरुआती पढ़ाई-लिखाई, कभी भारत का मैनचेस्टर कहलाने वाले शहर कानपुर में। यह ताज्जुब की बात लगती है कि मैनचेस्टर कुली, कबाड़ियों,धूल-धक्कड़ के शहर में कैसे बदल गया। अभियांत्रिकी(मेकेनिकल) इलाहाबाद से करने के बाद उच्च शिक्षा बनारस से। इलाहाबाद में पढ़ते हुये सन १९८३में ‘जिज्ञासु यायावर ‘ के रूप में साइकिल से भारत भ्रमण। संप्रति भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय के अंतर्गत लघु शस्त्र निर्माणी ,कानपुर में अधिकारी। लिखने का कारण यह भ्रम कि लोगों के पास हमारा लिखा पढ़ने की फुरसत है। जिंदगी में ‘झाड़े रहो कलट्टरगंज’ का कनपुरिया मोटो लेखन में ‘हम तो जबरिया लिखबे यार हमार कोई का करिहै‘ कैसे धंस गया, हर पोस्ट में इसकी जांच चल रही है।

26 responses to “…अथ कोलकता मिलन कथा”

  1. सतीश पंचम

    बहुत ही धांसू फांसू और हांसू पोस्ट है। हिंदी और अंग्रेजी पर समान अधिकार…….. चौकीदार द्वारा पांच इडियट पकड कर रखना…… गजब का ह्यूमर है जी ।

  2. Prashant(PD)

    1. एक बातें नोट कर ली हमने.. अबकी बार कलकत्ता जाओ तो शिव भैया से रसगुल्ले की उम्मीद करो.. पिछली बार तो बस भौजी के हाथ का खाना खाकर ही सलटा लिये थे.. :D

    2. कंचन दीदी का गला तो हमेशा ही खराब रहता है.. वैसे भी वो मुझे नया नाम दे चुकी हैं, और उसी के मुताबिक मुझे कोस रही होंगी कि, “ये नौस्टैल्जिया को एक काम दिये थे वो भी भूल गया..” कौन सा काम? यह जानने के लिये उन्ही से संपर्क करें.. :)

    3. कलकत्ता में कुछ खास बात है क्या? कोट-वोट पहिन कर गये थे? चेन्नई में तो ऐसे नहीं आये थे? लगता है आंटी जी(आपकी मिसेज) से बात करना जरूरी हो गया है.. :P

  3. Manoj Kumar

    इस विस्तार से की गई चर्चा के लिये आभार। ऐसा लगा मानों फिर से वह शाम सजीव हो उठी।
    पर शिव कुमार जी द्वारा पानी पिला-पिला कर किये गये स्वागत को आप कैसे भूल सकते हैं?

  4. अर्कजेश

    क्‍या खूब लिखे हैं । मजा आ गया पढकर । स्‍टाइल है ….

  5. समीर लाल

    बढ़िया रहा कलकत्ता मिलन बाँचना.

  6. Vivek Rastogi

    एक दम धांसू लिखे हैं, इस ब्लॉगर मिलने की बातें

  7. Dr.Manoj Mishra

    बढ़िया शैली में लिखी है यह पोस्ट ,प्रशंसनीय..

  8. Shiv Kumar Mishra

    बहुत गजब लेखन.

    सही कह रहे हैं. अभी तक महाकाव्य नहीं तो खंड-काव्य तो निकाल ही लेना चाहिए था. पीड़ा और दुख शायद यह सोचते हुए टिके हुए हैं कि “कुछ न कुछ तो लिखेगा ही.” पीड़ा की आशंका में दो-चार पोस्ट निकल आती हैं, सच की पीड़ा में तो न जाने क्या-क्या निकाला जा सकता है….:-) वैसे पढ़कर लगा जैसे हमें आपने केवल १०१ रूपये के निजी मुचलके पर छोड़ दिया…..:-)

  9. Sanjeet Tripathi

    blog jagat par kuchh hi logo ki lekhan shailee aisi hai jise padhkar irshya hoti hai, aapne unme se ek hain ;)

  10. संजय बेंगाणी

    इस पोस्ट एक संक्षिप्त वर्जन भी लिखना चाहिए.

    सभी फोटो ध्यान से देखे, दूर्योधन की डायरी कहाँ छिपा कर रखी जा सकती है, यह निरिक्षण करते रहे.

    अंग्रेजी हमसे ज्यादा किसी की कमजोर हो ही नहीं सकती, अपना नाम तक रोमन में नहीं लिख सकते.

    आप हंस लिये, हँसा दिये…बहुत पुण्य का काम किया :)

  11. वन्दना अवस्थी दुबे

    चकाचक चर्चा….यात्रा कथा. शिवकुमार जी की इतनी मौज ले ली है न आपने, कि अब अगली बार जाइये कोलकता, तब समझ में आयेगा, जब न रसगुल्ले मिलेंगे न ढोकला. चाय तो अभी ही………….

  12. मसिजीवी

    बहुत से ब्‍लॉगरों के बारे में बातें की हर जगह सर्वनाम का इस्‍तेमाल कर आगे चल दिए हैं जबकि कायदे से संज्ञा का इस्‍तेमाल होना चाहिए था कुछ और मजा आता।

    चाय की सतत अवनति की कथा बेहद मनोरंजक रही।

  13. कुश भाई 'जयपुर वाले'

    पी डी की बात गौर करने वाली है.. कोट पहन के तो जयपुर भी नहीं आये थे आप.. कलकत्ते में क्या चक्कर है.. ?

  14. dr anurag

    शुक्र है इस विजिट …..लाल स्वेटर साथ लेकर नहीं गये…..इन दिनों ब्लोगिंग बड़ी खतरनाक हो गयी है ..फेशन सरीखी …जिस शहर जायो …फोन घुमा दो…नाश्ते पानी का इंतजाम मुफ्त…. वैसे भी इतने बिलोगर सम्मलेन हो गये है के कई लोग तो सम्मलेन स्पेशलिस्ट हो गये है ….सुनते है एक भाई साहब ने तो चुटकुले सुना सुना कर बिलोगिंग की छह सौ पोस्ट एक महीने में लिख डाली ….हर आधे घंटे में एक चुटकुला छोड़ देते थे ….फ़िलहाल शाल खरीद रहे थे के भाई पुरूस्कार इसे पहनकर लूँगा …तभी तो पोस्ट लगेगी….हमने पूछा कौन दे रहा है .बोले बिरादरी के लोग कह रहे है तुमने नाम रोशन किया है हमारा …बिरादरी के पहले बिलोगर जो हो…….खैर कई मजेदार फटके है इस पोस्ट में …….

    1)जब बाहर हो तो फ़ोन करने का जी बहुत हुड़कता है। उनको भी फ़ोनिया लेते हैं जिनके नम्बर पास नहीं होते।

    2)लेकिन छत भी अनामी ब्लॉगर सरीखी बेशरम चुपचाप तमाशा देखती रही। यह लिख चुकने के बाद मन बोला- भैये, छत को अनामी मत लिख! तटस्थ लिख! अनामी उखड़ जायेगा उसको तुमने बेशरम लिख दिया!। सो पूरी बात फ़िर से–छत भी तटस्थ ब्लॉगर की तरह चुपचाप तमाशा देखती रही! उसको इस बात की कौनौ चिन्ता फ़िकिर नहीं थी कि कोई उसके अपराध लिखेगा-कभी।

    3)जिन लोगों ने कभी एक-दूसरे को देखा नहीं वे जरा-जरा से मुद्दे पर दूसरे को देख लेने की धमकी दे देते हैं। लोग धमकियां ऐसे देते हैं जैसे ब्लॉगर मीट के लिये अदालत में बुला रहे हैं।

  15. dr anurag

    ओर हाँ कंचन की बात पर गौर फरमाये ….इधर एक्टिंग स्कूल के लोग आपसे बहुतो आगे निकल रहे है ……

  16. shefali pande

    bahut aanand aaya ….post bahut dhaansu hai….milne a silsila banae rakhen……

  17. anitakumar

    :) पहले तो हम अपने कुछ मित्रों का समर्थन कर रहे हैं। हम भी संजीत की तरह ईर्ष्या कर रहे हैं इस शैली पर और हम भी जानना चाह्ते हैं जी ये कलकत्ता में ऐसी क्या खास बात थी कि आप अपना मनपसंद लाल स्वेटर तक तज दिये और कोट चढ़ा लिये।
    पी डी की आंटी के लिए कोई शॉपिंग वापिंग वगैरह नहीं किए, घर में घुसने कैसे दिया गया?
    शिव भाई के जल्द स्वस्थ होने की कामना करते हैं।
    साहित्य विमर्श भी बड़िया रहा। मनोज जी के बारे में जानना भी सुखद रहा। वैसे आप के दफ़्तर के कितने लोग ब्लोगरस हैं?

  18. हिमांशु

    संजय जी का कहना सही है, इसका संक्षिप्त वर्जन भी लिखना चाहिये ! शुरुआत में ही फ्लैट कर दिया आपने, जब यह समीकरण दिया – “शायद यात्रा की बोरियत जम्हुआई लेते समय खुले मुंह की समानुपाती होती हो।”

    शानदार !

  19. sushila puri

    अनूप जी तुसी ग्रेट हो !!!!!!!! कलकत्ते जाकर तो आपने कमाल कर दिया , कलकत्ता शहर धन्य हुआ आपके चरण -रज से …., आपकी इतनी सुखद यात्रा को सुनकर हम कुंए के मेढकों को भी उछलने का मन करने लगा .

  20. प्रवीण त्रिवेदी ╬ PRAVEEN TRIVEDI

    ,,,,हम भी समझ नहीं ना पा रहे स्वेटर (अरे ! वही इंटहा कलर का) छोड़ कोट-फोट में कैसे ?
    पर जो भी बड़े झकास लग रहें हैं !!

  21. amit

    बढ़िया चकाचक तरीके से बाँच दिए, पर फोटू नज़र नहीं आ रहे, जो स्लाईडशो लगाए हैं ऊ लगता है अब उधर नहीं है जहाँ पहले था!! फ्लिकर पर आपका खाता तो है ही, फोटू उधर चढ़ा के इधर चस्पा दीजिए! :)

  22. ज्ञानदत्त पाण्डेय

    किसी ब्लॉगर की अंग्रेजी कमजोर कमजोर होने की बात चली तो हमने कहा कि बात केवल अंग्रेजी की नहीं है। उनका अंग्रेजी और हिन्दी पर समान अधिकार है। इस सच को सुनते ही न जाने क्यों सब हंसने लगे।
    —————–
    अच्छा, हमारी खिल्ली उड़ाई गई! :-)

  23. Abhishek Ojha

    अनुरागजी द्वारा लिस्टेड पॉइंटस में सुमुखी की जम्हाई का समानुपाती सिद्धांत भी जोड़ लिया जाय :)

  24. मृगांक

    कहाँ कहाँ मौज लेते रहते हो बंधू ?कभी meerut का भी प्रोग्राम बनाओ

  25. kanchan

    aaj nikale hai sair par to idhar bhi aa gaye…hamari burai…???? dekh lungi.

    @PD beta ab gala bhi achchha ho gaya aur kaam bhi ho gaya….!

  26. गौतम राजरिशी

    इस पोस्ट का डा० साब से इतना तारीफ़ सुने कि पूछिये मत। पढ़ने का मौका आज मिला है। सचे में…नहीं पढ़ते तो कुछ बहुत ही “अजबे-सा” छूट जाता।

    “बहुत बढ़िया” लिखना तनिक बोरिंग-सा हो गया है आपके ब्लौग पर कि हर पोस्ट ही तो बहुते बढ़िया होता है।

    परसाई, चतुर्वेदी सबे आप हैं इस हिंदी ब्लौग-जगत के…”शुक्ल” का जिक्र नहीं कर रहे हैं कि ऊ तो खुदे ले रखे हैं अपने नाम में।

    “छत की तटस्थता” वाला जुमला…आहहा…लाजवाब है।

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