Thursday, June 16, 2011

कुछ शेर

ग़म को कैसे करें जुदा खुद से
आंसुओं ने मुझे बनाया है

गैर किसको कहें, किसे अपना
दोस्तों ने हमें सताया है

सर पे जब चढ़ गया बहुत सूरज
लापता तब से अपना साया है

-ज़श्न

2 comments:

अनूप शुक्ल said...

इत्ते दिन हो गये गमजदा हुये! आगे कुछ लिखा जाये जी! :)

अंतर्मन | Inner Voice said...

शुक्ल जी, आज ही एक ताज़ा पोस्ट छापी है :-)