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वसीयत पर न्यायालय के पू्र्व निर्णय के आधार पर मकान का बँटवारा और राजस्व रिकार्ड को ठीक कराएँ।

lawसमस्या-
बाराबंकी, उत्तर प्रदेश से श्याम ने पूछा है-

मेरी समस्या ये है कि मेरे पिताजी के चचेरे बाबा ने मेरे पिता जी को मरते वक्त एक वसीयत लिख दी थी कि मेरी चल-अचल सम्पति मेरे पिताजी को मिले। उसके बाद वसीयतकर्ता के एक उत्तराधिकारी ने उस सम्पति और वसीयत के खिलाफ एक वाद किया। जिस पर अदालत ने वादी की बात नहीं मानी और वसीयत को सही मानते हुए मेरे पिताजी को समस्त सम्पति का वारिस बना दिया।  लेकिन मेरे पिताजी ने ये वसीयतनामा और अदालत का फैसला कही भी प्रदर्शित नहीं किया जिस से मेरे बाबा कि सम्पति और वसीयत में मिली सम्पति भी मेरे दोनों चाचाओं के नाम तीन हिस्से में दर्ज हो गयी। क्योंकि अभी तक परिवार सयुंक्त रूप से था लेकिन दोनों चाचाओं का देहावसान होने के बाद उनके पुत्र विवाद कर रहे हैं कि मैं कुछ नहीं जानता सारी सम्पती को तीन हिस्से में बाँटो।  जबकि उनको पैतृक बाबा की सम्पति में तीसरा हिस्सा मिलना है और वसीयत में मिली सम्पति में उनका अधिकार नहीं है। वसीयत करीब साल १९५७ की है। मेरा सवाल ये है कि समस्त कृषि भूमि मेरे पिताजी और दोनों चाचाओं के नाम दर्ज हो कर उन के पुत्रों के नाम दर्ज है। क्या अब मेरे पिताजी को मिली वसीयत वाली सम्पति मेरे पिताजी के नाम दर्ज हो सकती है? और वापस दर्ज कराने के लिए क्या करना पड़ेगा? कृषि भूमि की एक बार चकबंदी हो चुकी है। लेकिन घर के मामले में तो चकबंदी वाला कोई मामला नहीं है क्यों कि अभी लोग संयुक्त रूप से रह रहे थे। उस का बँटवारा कैसे होगा?

समाधान-

कृषि भूमि के संबंध में अलग अलग राज्यों में अलग अलग कानून हैं। हमारे पास उत्तर प्रदेश के कृषि भूमि संबंधी कानून का कोई विशेषज्ञ फिलहाल उपलब्ध नहीं है इस कारण से आप को किसी स्थानीय वकील से जो राजस्व भूमि संबंधी मामलों को देखता हो राय करनी चाहिए। आप चाहें तो इस संबंध में बाराबंकी में श्री रणधीर सिंह सुमन एडवोकेट से उन के फोन नं. 9450195427 पर बात कर के उन से व्यक्तिगत रूप से मिल सकते हैं। वे आप को इस संबध में स्वयं सलाह दे सकते हैं या फिर आप को कोई उचित वकील सुझा सकते हैं।

फिर भी हमारी राय यह है कि यदि पूर्व में वसीयत के मामले में न्यायालय का निर्णय आप के पास है तो आप उस के आधार पर राजस्व विभाग में भूमि के संबंध में जो रिकार्ड है उसे भी ठीक करवा सकते हैं और मकान का भी उसी के आधार पर बँटवारा करवा सकते हैं। मकान के बँटवारे का वाद प्रस्तुत करना चाहिए। इस वाद में वसीयत पर दिए गए पूर्व निर्णय के आधार पर आप के हिस्सों का बँटवारा हो सकता है। इस संबंध में भी श्री रणधीर सिंह सुमन आप को उचित सलाह दे सकते हैं।

मुस्लिम स्त्री की मृत्यु के बाद उस की आधी संपत्ति पर पति तथा शेष आधी संपत्ति पर मायके वालों का हक …

तलाकसमस्या-

बलिया, उत्तर प्रदेश से नदीम अख्तर ने पूछा है -

मैं मुस्लिम हूँ और जाति का पठान हूँ। मैं ने नवम्बर 2011 में अपनी छोटी बहन की शादी इसी जिले के ‘सिकन्दरपुर कस्बे’ में रहने वाले एक सजातीय परिवार में किया था। किन्तु हमारा दुर्भाग्य यह कि जून 2013 में उसकी अकाल मृत्यु हो गई। मृत्यु का कारण हार्ट अटैक था। मृत्यु हॉस्पीटल में इलाज के दौरान हुई। इलाज हम ही करा रहे थे। जिस रात उसकी मृत्यु हुई, वह उसी दिन सुबह हमारे यहाँ आई थी। उसे सर दर्द, कमजोरी और घबराहट हो रही थी। उसे पहले कभी हार्ट की कोई तकलीफ नहीं थी। खुशमिजाज, जहीन और चरफर रहने वाली लड़की थी। जो भी उसके सम्पर्क में आता, उसके काम और व्यवहार की तारीफ किये बिना न रहता था। उम्र महज 26 वर्ष थी। हॉस्पीटल की लापरवाही भी नही कह सकता, सब हमारे सामने ही हुआ था। डॉक्टर ने पूरी कोशिश की, लेकिन हालत बिगड़ी ही चली गई। पोस्टमार्टम नहीं हुआ, धार्मिक हवाले से कोई इसके लिए तैयार भी नहीं हुआ। उसके ससुराल में कोई कमी नहीं थी, लेकिन ससुरालियों का व्यवहार ठीक नहीं था। पति दुबई में काम करता है, और उसकी डेढ़ साल की शादी शुदा जिन्दगी में महज दो महीने ही साथ रहा। कोई बच्चा नहीं था। मृत्यु के समय वह दुबई ही था। ससुराली हर समय उसके पीछे पड़े थे।  दिन भर कामों में वह झुँकी रहती थी। आखरी दो हफ्तों में स्थिति अधिक बुरी हो गई थी। परिवार के दामाद अपने पूरे परिवार के साथ आ गये थे। उसे प्रातः 4 बजे से देर रात तक गर्मी में उन लोगों की सेवा में खटना पड़ा। कई दिनों से वह सही से सोई नहीं थी। बिजली न रहने पर उसे पंखा चला कर सोने की मनाही थी और वे इनवर्टर के पंखे में चैन से सोते रहे। मृत्यु से तीन-चार दिन पहले से उसे तकलीफ थी, लेकिन इलाज के लिए ध्यान नहीं दिया गया। उस नेकबख्त ने हमसे भी नहीं बताया। सम्बन्धियों के वापस चले जाने के बाद उसने मुझे फोन कर के ले चलने के लिए कहा। मैं उसे उसी दिन लाया। एडमिट कराया, लेकिन वो नहीं बची। मैं उसे नहीं बचा सका। वह हमारे हाथ से फिसल गई। फोन करने पर वह कुछ बताती भी नही थी, सब ठीक है कह जाती थी। ससुराल में उसे कुछ परेशानी है, इसका हमें एहसास था। हमने बहनोई से बात भी किया था। उसने कुछ महीनों बाद वहीं ले जाने की बात कही थी। हमने उम्मीद किया कि सब ठीक हो जाएगा, लेकिन उसकी नौबत ही नही आई।  उसकी अकाल मौत से हमारे परिवार को गहरा सदमा लगा है और हम इसे नियति के हवाले खुद को दिलासा दे रहे हैं। लेकिन उधर बहन के मरने के बाद से ही दूसरी शादी की तैयारियाँ हो रही हैं। वे खुश हैं कि शादी का सारा दहेज जस का तस उनके पास ही है। फिर शादी करेंगे, फिर दहेज बटोरेंगे। बहन की मौत से तो जैसे उनकी लॉटरी लग गई है।

मेरी बहन तो बेहतर जिन्दगी की आस लिए तड़पती हुई चली गई और ये गिद्ध उसके सामान को नोचने की फिराक में हैं। साथ ही मर चुकी मेरी बहन और हमें जलील कर रहे हैं  कि उसे हार्ट की बीमारी थी और हमने इसे छिपाते हुए उनके गले मढ़ा था। यह सब सुन कर खून खौलता है। लेकिन शिक्षित इन्सान हूँ, कानून हाथ में नहीं ले सकता।

शादी में हमने अपनी हैसियत से ज्यादा कर्ज-बाकि करके दहेज दिया था। करीब छः लाख खर्च हुए थे, जिसमें से पचास हजार से कुछ अधिक ही नकद दिया था। हमारे पास दहेज की सूची तो है, परन्तु बिना किसी हस्ताक्षर के है। हालाँकि तमाम लोग इसके साक्षी हैं। हमारे सभी रिश्तेदारों ने हमसे दहेज वापस माँगने के लिए कहा।

मैने उनसे महज डेढ़ साल की शादी होने, कोई बच्चा न होने सामान जस का तस पड़ा होने और दूसरी शादी होने पर नई वधु के द्वारा अपना दहेज अपने साथ लाने के हवाले उनसे दहेज वापसी की माँग किया तो उन सभी का एक सुर (बहनोई भी) जवाब था—

—ऐसा कहाँ होता है? कोई तलाक थोड़े ही हुआ है।

—एक बार दे देने के बाद आपको वापस पाने का कोई हक नही है।

—आप का खर्च हुआ तो हमारा भी खर्च हुआ है।

—आप ने बीमार लड़की हमें ब्याही।

मैं समझता हूँ कि मेरी बहन के प्रति उनके किए सुलूक के लिए मै उन्हें कोई सजा नहीं दिला सकता। लेकिन दहेज वापसी के लिए मैं न्यायालय की मदद लेना चाहता हूँ। इसलिए भी कि, मुझे स्वीकार्य नहीं है कि हमारी मेहनत के पैसों से जो चीजें मैं ने अपनी बहन को दी थी, जिन का इस्तेमाल तो दूर, कई चीजों को तो उसने खोल कर देखा भी नहीं था।  उस का इस्तेमाल वो लोग करें जो अप्रत्यक्षतः उसकी हत्या के दोषी हैं। मैने लोगों की पंचायत का भी विचार किया, तो मैं देखता हूँ कि वहाँ के स्थानीय लोग भले ही अन्दर से उनकी आलोचना कर रहे हैं, लेकिन सब के सामने उन्हीं का पक्ष लेंगे और हमारे लोग भले हमसे हमदर्दी जता रहें है, लेकिन समय पर अपनी व्यस्तता जता कर हट जाएंगे।

मैं आप से जाननाचाहता हूँ कि-

—क्या वाकई मुझे दहेज वापस माँगने का हक नहीं है?

—क्या कहीं किसी कोर्ट में ऐसा केस हुआ है और वादकार के हक में कोर्ट ने आर्डर किया है। क्या ऐसा कोई प्रावधान या सन्दर्भ है?

—मुझे क्या, कैसे करना चाहिए? किस हवाले कैसे अपनी बात कोर्ट में रखनी चाहिए?

—क्या कोर्ट जाने से हमें कुछ हासिल होगा?

कृपया सलाह अवश्य दें! हो सकता है आपकी सलाह पर अमल करके मेरे परिवार और मेरी मृत बहन की आत्मा को सुकून मिले।

समाधान-

मुस्लिम विधि में स्त्री के माता-पिता या रिश्तेदारों द्वारा दहेज दिए जाने का कोई उल्लेख नहीं है. अपितु स्त्री अपने पति से मेहर मुकर्रर करती है जिसे उसे प्राप्त करने का अधिकार होता है। इस तरह मुस्लिम स्त्री को विवाह के पूर्व या बाद में मिले हुए तमाम उपहार चाहे वे दहेज के रूप में क्यों न हों, उस की अपनी संपत्ति हैं।

किसी भी मुस्लिम की मृत्यु के उपरान्त उस की जो भी संपत्ति है वह शरिया के कानून के अनुसार उस के उत्तराधिकारियों को प्राप्त होती है। एक मुस्लिम स्त्री की मृत्यु के उपरान्त उस की संपत्ति भी शरिया के कानून के अनुसार उस के उत्तराधिकारियों को प्राप्त होगी।

रिया के अनुसार आप की बहिन की जो भी संपत्ति है उस का आधा (1/2) हिस्सा उस के पति को प्राप्त होगा। यदि बहिन की माता-पिता जीवित हैं तो एक तिहाई (1/3) हिस्सा माता को प्राप्त होगा तथा छठवाँ (1/6 हिस्सा) पिता को प्राप्त होगा। लेकिन यदि माता-पिता जीवित नहीं हैं तो फिर पति को प्राप्त होने वाले आधे हिस्से के अलावा शेष आधा (1/2) हिस्सा स्त्री की बहन को भाई के साथ प्राप्त होगा।

स से स्पष्ट है कि स्त्री के देहान्त के उपरान्त उस की संपत्ति पर उस के ससुराल में सिर्फ उस के पति को आधे हिस्से पर अधिकार है। शेष आधे हिस्से पर उस के मायके के संबंधियों का अधिकार है।

प अपनी बहिन के ससुराल वालों को कानूनी नोटिस भेज सकते हैं और बहिन की आधी संपत्ति लौटाने के कह सकते हैं। ससुराल वालों के पास आप की बहिन की आधी संपत्ति आप की अमानत है। आप इस अमानत को प्राप्त करने के लिए दीवानी वाद न्यायालय में संस्थित कर सकते हैं। यदि वे स्पष्ट रूप से उक्त अमानत को लौटाने से इन्कार करें तो यह अमानत में खयानत का अपराध होगा जिस के लिए आप उन के विरुद्ध धारा 406 में पुलिस थाने में प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज करवा सकते हैं। यदि पुलिस कार्यवाही करने से इन्कार करे तो आप न्यायालय में परिवाद दर्ज करवा सकते हैं।

पत्नी और संतानें न होने पर संपत्ति का उत्तराधिकार किसे होगा?

joint family treeसमस्या-

हनुमान गढ़, राजस्थान से जसवीर सिंह ने पूछा है –

मेरे मित्र की मृत्यु हो गयी है। वह अविवाहित था। उस के नाम का लीज डीड का प्लॉट आवंटित है। कृपया बताएँ कि उस की सम्पत्ति पर किस का हक बनता है?

समाधान-

दि आप के मित्र हिन्दू हैं तो हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 8 के अनुसार अनुसूची में वर्णित प्रकार से उस प्लाट पर उन के नजदीकी उत्तराधिकारी का उस पर हक बनेगा। अविवाहित होने के से उन की पत्नी या संतान तो है नहीं इस कारण अनुसूची की प्रथम श्रेणी में तो माता के अतिरिक्त कोई उत्तराधिकारी हो नहीं सकता। यदि उन की माता जीवित हैं तो सब से पहला अधिकार उन का होगा। लेकिन यदि माता जीवित नहीं हैं तो दूसरी श्रेणी के उत्तराधिकारियों का अधिकार होगा।

नुसूची की दूसरी श्रेणी में सर्वप्रथम अधिकार उन के पिता का है। पिता के न होने पर  उन के भाई व बहनों का उस पर संयुक्त अधिकार होगा, अर्थात जितने भाई व बहिन जीवित होंगे सब को समान रूप से उस प्लाट पर संयुक्त अधिकार प्राप्त होगा। यदि कोई भाई या बहिन भी जीवित नहीं है तो फिर मृत भाई बहनों के पुत्र पुत्रियों को समान रूप से उस प्लाट पर संयुक्त अधिकार प्राप्त होगा। इन में से भी कोई जीवित नहीं होगा तो दादा दादी को यह अधिकार प्राप्त होगा। उन के भी जीवित नहीं होने पर पिता की विधवा तथा भाई की विधवा को संयुक्त रूप से इस का अधिकार प्राप्त होगा। उन के भी जीवित नहीं होने पर चाचा और बुआओं को यह अधिकार संयुक्त रूप से प्राप्त होगा। उन के भी जीवित नहीं होने पर नाना नानी को संयुक्त रूप से यह अधिकार प्राप्त होगा। उन के भी जीवित नहीं होने पर मामाओँ और मौसियों को संयुक्त रूप से यह अधिकार प्राप्त होगा।

दि उपरोक्त में से कोई भी जीवित नहीं है तो पैतृक संबन्धियों में से नजदीकी संबंधी को और उस के भी जीवित नहीं होने पर मातृ संबंधियों में से नजदीकी संबंधी को अधिकार प्राप्त होगा।

हिन्दू पुरुष की मृत्यु के उपरान्त संतानें, पत्नी और माँ निर्वसीयती संपत्ति में बराबर की उत्तराधिकारी हैं।

हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियमसमस्या-

इन्दौर, मध्यप्रदेश से नगराज सिंह ने पूछा है -

मेरे पिताजी का निर्वसीयती देहांत हो गया है। अब उत्तराधिकारी में हम दो भाई और और हमारी माता जी हैं।  हमारी माता जी का मानना है कि पति के मृत्यु के बाद पत्नी पति की सम्पत्ति की पूर्ण रूप से उत्ताराधिकारी हो जाती है, वह चाहे तो किसी को वसीयत कर सकती है या दान दे सकती है।  मैं जानना चाहता हूँ कि मेरे पिता जी के सम्पत्ति में माता जी का 1/3 हिस्सा होगा कि वे पूरी सम्पत्ति की अधिकारी हो जाएँगी?

समाधान-

प की माता जी का सोचना गलत है। आप के पिताजी की संपत्ति निर्वसीयती है इस कारण हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा-8 के अनुसार  पुरुष की सभी सन्तानें, पत्नी और उस की माता निर्वसीयती संपत्ति में बराबर के उत्तराधिकारी हैं। आप के पिताजी की संपत्ति निर्वसीयती है इस कारण आप तीनों उक्त संपत्ति के  बराबर के अधिकारी हैं और आप तीनों का बराबर हिस्सा उक्त अविभाजित संपत्ति में है।

हाँ, आप की माता जी उक्त संपत्ति में 1-3 की अधिकारी हैं और इतने ही हिस्से के आप अधिकारी हैं।  आप उन्हें सलाह दें कि वे किसी वकील से पूछ कर अपनी इस शंका का समाधान कर लें। यदि वकील से भी बात न बनती हो तो आप संयुक्त अविभाजित संपत्ति के विभाजन का वाद प्रस्तुत कर दें। न्यायालय के निर्णय से उन की यह शंका दूर हो जाएगी।

कृषि भूमि के उत्तराधिकार में विवाहित पुत्रियों का हिस्सा ।

समस्या-

दिल्ली से राकेश ने पूछा है-

मेरी दो बहनें हैं, दोनों विवाहित हैं। मेरे पिता जी ने कोई वसीयत नहीं की है। हमारे पिता जी के देहावसान के उपरान्त क्या वे पिता जी की पैतृक भूमि में से हिस्सा लेने का उन्हें कानूनी अधिकार है?

समाधान-

Hindu succession actप का प्रश्न अधूरा है। आप ने यह नहीं बताया है कि आप के पिता जी की भूमि किस किस्म अर्थात कृषि भूमि है या आबादी भूमि है? आप ने यह भी नहीं बताया है कि आप उसे पैतृक कैसे मानते हैं? यह भी नहीं बताया है कि यह भूमि किस राज्य में स्थित है? इन तथ्यों की जानकारी के बिना यह पता लगाया जाना कठिन है कि उक्त भूमि के उत्तराधिकार की स्थिति क्या होगी?

कोई भी भूमि या तो कृषि भूमि हो सकती है या फिर आबादी भूमि हो सकती है।  भारत में कृषि भूमि पर तो सदैव ही राज्य का स्वामित्व होता है किसान केवल उस का खातेदार कृषक होता है जिस की हैसियत एक किराएदार जैसी होती है। लगान के रूप में वह किराया अदा करता है। कृषि भूमि के संबंध में राज्य सरकारों को कानून निर्माण का अधिकार है तथा यह आवश्यक नहीं कि उन पर हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम प्रभावी हो। अनेक राज्यों में कृषि भूमि पर हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम प्रभावी है किन्तु उत्तर प्रदेश व उत्तराखंड जैसे राज्यों में वह जमींदारी विनाश अधिनियम के उपबंधों से प्रभावी होता है जिस में उत्तराधिकार की पृथक व्यवस्था की गई है। जहाँ कृषि भूमि के उत्तराधिकार में विवाहित पुत्रियों को पुत्र के समान अधिकार प्राप्त नहीं है। इस के लिए आप को किसी स्थानीय वकील से जो कि राजस्व मामलों को देखता हो सलाह प्राप्त करनी चाहिए।

राजस्थान, मध्य प्रदेश आदि राज्यों में जहाँ कृषि भूमि पर भी उत्तराधिकार की व्यक्तिगत विधि प्रभावी है। वहाँ आबादी भूमि और कृषि भूमि के संबंध में समान विधि प्रभावी है।  यदि आप की भूमि जिस राज्य में स्थित है वहाँ कृषि भूमि पर भी व्यक्तिगत विधि प्रभावी है तो आप के पिता जी की भूमि पर हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम प्रभावी होगा। यह अधिनियम 15 जून 1956 से प्रभावी हुआ है। इस अधिनियम के प्रभावी होने के पूर्व तक जो भी संपत्ति किसी पुरुष को अपने चार पीढ़ी पूर्व तक के किसी पुरुष उत्तराधिकारी अर्थात पिता, दादा या परदादा से उत्तराधिकार में प्राप्त होती थी उस में उस के चार पीढ़ी बाद तक के पुरुष उत्तराधिकारियों अर्थात पुत्र, पौत्र व प्रपौत्र को जन्म से ही अधिकार प्राप्त होता था। जिस के कारण वह पैतृक संपत्ति कहलाती थी। यदि आप के पिता को उक्त भूमि उक्त तिथि के उपरान्त प्राप्त हुई है तो उसे पारंपरिक अर्थ में पैतृक तो कहा जा सकता है लेकिन उस में उन के पुरुष उत्तराधिकारियों को कोई अधिकार प्राप्त नहीं है। उस भूमि पर आप के पिता जी के जीवनकाल में उन का एकल अधिकार उसी तरह है जैसे वह उन की स्वअर्जित भूमि हो जिसे वे विक्रय, दान आदि के माध्यम से हस्तांतरित कर सकते हैं या वसीयत कर सकते हैं।

दि आप के पिता उक्त भूमि की वसीयत नहीं करते हैं तो उक्त भूमि आपके पिता जी के जीवनकाल के उपरान्त उन के प्रथम श्रेणी के जीवित उत्तराधिकारियों को प्राप्त होगी। जिस में आप की दादी, आप की माताजी और आप की बहनों और भाइयों का समान अधिकार होगा। इस तरह आप की दोनों विवाहित बहनें भी आप के पिता जी की उत्तराधिकारी हैं और उन्हें भी उक्त भूमि में हिस्सा प्राप्त करने का अधिकार आप के समान ही होगा। यदि आप के पिता जी की कृषि भूमि उत्तर प्रदेश या उत्तराखंड में स्थित है तो आप उस के उत्तराधिकार के बारे में इस साइट पर अन्यत्र खोज कर जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।

ससुरालियों द्वारा विधवा की संपत्ति हड़पना और खुर्द-बुर्द करना ग़बन का संगीन अपराध है।

समस्या-

बड़नगर, उज्जैन से राधा ने पूछा है-

मेरी शादी 31 मई 2010 को राजेश से हुई थी, मेरे पति को पाएल्स हो गया था।  देवास ट्रीटमेंट करने गये।  डॉक्टर ने नींद का इंजेक्शन लगाया और वो इंजेक्शन रिएक्शन कर गया, पति की हालत ज़्यादा बिगड़ गयी तो इंदौर रेफर किया, पर फिर भी उन्हें नहीं बचा पाए, मैं उस समय मायके में थी।  3 दिन पहले ही मुझे मेरे पति छोड़ कर गये थे, मुझे ऑपरेशन के बारे में किसी ने नहीं बताया। पति सुबह 11 बजे से तो रात 10:30 मिनट तक ज़िंदगी और मौत से लड़ते रहे, पर मुझे किसी ने खबर नहीं की, उनका पोस्ट मार्टम  भी नहीं कराया गया, रात 12:50 मिनट पर मुझे मेरे बड़े ससुर जी ने कॉल किया और कहा की राजेश की तबीयत खराब हो गयी है।  उसको अचानक ही चक्कर आए और दर्द हुआ तो हम अपोलो (इंदौर) ले आए हैं ओर आईसयू में भरती किया है, बस इतना कहा।  हम रात को जैसे तैसे गाड़ी कर के गये।  रात 4 बजे हम पहुँचे, ससुराल वालों में से कोई बात करने ही नहीं आया, दूसरे रिश्तेदार थे।  मैंने पति को एक बार देखने को कहा तो टालते गये, मुझे मेरे पति से नहीं मिलाया गया।  सुबह 8 बजे मुझे घर चलने को कहा। मैं ने इनकार किया कि मैं मेरे पति को देखे बिना नही जाऊंगी, तो कहा कि वो घर ही आ रहा है। जब घर पर उनको मेरे सामने लिटाया गया तो मेरे तो होश ही उड़ गये।  कुछ पूछने पर सब मुझे गपलते रहे।  मौत का कारण और समय आखरी समय तक नहीं बताया था उन लोगो ने।  बस टालते रहे। कुछ समझ में ही नहीं आ रहा था।  मेरे साथ मेरे ससुराल वालों ने धोखा किया है।  8 जून 2012 को उनका देहांत हो गया।  उनके जाने के बाद मुझे ससुराल वालों ने घर से निकाल दिया।  मुझे मेरा समान, गहने और ज़रूरी दस्तावेज़ (मेरे) भी नहीं दिए जा रहे है।  घर के बड़ों ने मिल बैठ कर बात करनी चाही।  पर वो लोग घर आ के हम से बदसलूकी से पेश आए।  मुझे और मेरे परिवार वालों को गंदा गंदा बोला गया, मुझे जान से मारने की धमकी भी दी।  पहले तो मुझे मेरा सामान, मेरी चीज़ें नही दी और मेरे साथ मार पीट भी की है।  मुझे शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना दी गयी है।  मेरे पति का इधर उधर का पैसा सब खुद के पास जमा कर लिया है।  उनके अकाउंट भी बंद करा दिए हैं।  मुझे मेरा हक़ नहीं देते।  मै पिछले साल सितंबर से बीमार हूँ।  मुझे वीनस साइनस  थ्रॉम्बोसिस है। इस बीमारी के साथ और भी बीमारियों से ग्रस्त हूँ। मुझे दिमाग पर जोर डालने और तनाव से दूर रहने के लिए डॉक्टर ने कहा है। फिर भी ये लोग मुझे परेशान करते हैं जिससे मेरी बीमारी ठीक होने के बजाय बढ़ती जा रही है।  मेरे पास पैसे भी नहीं हैं जिससे मैं अपनी जाँच करा सकूँ और इलाज करा सकूँ।  12वीं फेल हूँ, आमदनी का कोई रास्ता नहीं है।  मे कहीं नौकरी भी नहीं करती हूँ।  जैसे तैसे मेरे पिताजी मुझे जीवन बसर करने मे मददत कर रहे हैं।  पिताजी की आर्थिक स्थिति भी ठीक नहीं है फिर भी मुझे थोड़ी बहुत मदद करते हैं।  शादी के बाद 4 महीने मैं ससुराल में रही।  फिर मेरे पति मुझे महाराष्ट्र ले जाए साथ रहने के लिए।  उन की नौकरी थी वहाँ पर।  मेर पति ने ईपीएफ और जीपीएफ जैसी चीज़ों में उनकी माताजी को नॉमिनी बनाया था।  मेरी शादी के ढ़ाई साल पहले।  वो नॉमिनी का नाम बदल नहीं पाए। (मेरी बीमारी के चलते और भी कुछ परेशानियों के चलते) और वो इस दुनिया से चले गये।  अब कंपनी से पैसा मिलेगा उस पर क्या मेरा अधिकार नहीं बनता? उन के ईपीएफ और जीपीएफ पर मेरे क्या अधिकार है? उन की एलआईसी भी थी शादी के पहले से ली हुई।  जो कि अभी तक चल रही थी।  उसकी जानकारी मुझ से छुपाई जा रही है मुझे पॉलिसी नंबर नहीं बताए जा रहे हैं। कहते हैं पॉलिसी तो थी ही नहीं।  मेरे पास प्रूफ है, पर पॉलिसी नंबर नहीं है। मैं उसकी जानकारी कैसे कर सकती हूँ? मे पॉलिसी ऑफिस जा चुकी हूँ, मैनेजर ने मदद करने से इनकार कर दिया।  बिना पॉलिसी नंबर के हम आपकी कोई मदद नहीं कर सकते। क्या मेरे पति के जाने के बाद पॉलिसी पर मेरा हक़ बनता है?  अगर है तो मैं कैसे इसे हासिल कर सकती हूँ? हम ने हमारे घर में बहुत सा सामान बसाया था।  महाराष्ट्र में पर पति के जाने के बाद ससुर जी वहाँ गये और सारा सामान ले आए। उस में कुछ तो बेचने की बात कर रहे थे और  मुझे देने से मना कर दिया। क्या मुझे मेरे घर का समान और बिका हुआ सामान मिल सकता है?  क्यों कि ससुरजी ने मुझसे बिना पूछे मेरा सामान बेचा हे।  मुझे मेरा सामान, मेरे कागज़ात, मेरे गहने, सभी बिना टूट फूट के बिना कटे फटे मुझे मिल सकें।  उस के लिए भी कोई क़ानून है?  ससुरजी ने मुझे घर में रखने से ही मना कर दिया और  हिस्सा माँगा तो भी मना कर दिया।  वो कहते हैं कि ये जायदाद मैं ने बसाई है, मैं इसका कुछ भी कर सकता हूँ।  चाहूँ तो दान में दे दूँ।  इसलिए मैं मेरे बेटे को जायदाद से बेदखल करता हूँ।  क्या वे मेरे पति के शांत होने के बाद वो मेरे पति को जायदाद से अलग करने को अभी नवम् में बोलते हैं जब कि मेरे पति जून में ही शांत हो गये हैं।  इसका मतलब कि उनका बेटा गया तो उन की ज़िम्मेदारी ख़त्म।  वो मुझे उन के घर में हिस्सा नहीं देना चाहते और जायदाद में भी हिस्सा नहीं देना चाहते।  उन की इकलौती विधवा बहू होने के नाते भी मेरा हक़ नहीं बनता क्या? इसमे मेरे क्या क्या हक़ हैं?  वे मुझे गालियाँ देते हैं मेरे बारे में ग़लत ग़लत बातें फैला रहे हैं।  पूरे समाज में और गाँव में।  जिस से मुझे बदनामी का सामना करना पड़ रहा है।  इसलिए क्या मैं मानहानि का दावा कर सकती हूँ? क्या इस पर भी कोई क़ानून है?  मेरे ससुराल वाले बड़े लोग है, हम को बहुत परेशान करते हैं।  मुझे आगे पढ़ाई करनी है, मेरा इलाज कराना है,  मुझे अपना भारण पोषण करना है।  पर पैसे के बिना कैसे हो? मुझे शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना दी गयी है। मुझे मेरे अधिकार के बारे मे बताइये।  मेरी उमर छोटी है।  इसलिए मुझे क़ानून की कोई जानकारी नहीं है।  कृपा कर के मेरी परेशानी का निवारण करें।

समाधान-

प की विस्तृत कहानी पढ़ी। यह भारतीय महिलाओं की सामान्य कहानी है। बहू घर में लायी जाती है पति और उस के परिवार की सेवा करने के लिए। जब पति का देहान्त हो गया हो और उस की विधवा पत्नी बीमार हो, सेवा करने लायक नहीं हो तो आम तौर पर ससुराल वालों का व्यवहार ऐसा ही हो जाता है। वे उस के पति की संपत्ति पर कब्जा कर लेते हैं और बहू को  निकाल फेंकते हैं उस के पिता-भाइयों की जिम्मेदारी पर। जिस देश में काम करने लायक सधवा बहू को दहेज लाने को बाध्य किया जाता हो, न लाने पर जला दिया जाता हो, उस देश में ऐसा व्यवहार आश्चर्य पैदा नहीं करता। लेकिन ऐसा नहीं है कि सारा समाज ऐसा ही है। अच्छे लोग भी हैं। कानून बहू के साथ है लेकिन उस का उपयोग करना बहू नहीं जानती। उसे कानून की जानकारी भी नहीं है।

ही स्थिति आप के साथ है।  लेकिन आप के साथ एक अच्छी बात है कि आप जीवन जीना चाहती हैं। अपनी बीमारी से मुक्त होना चाहती हैं। आगे पढ़ाई कर के अपने पैरों पर खड़ी होना चाहती हैं। अपने अधिकारों को हासिल करना चाहती हैं। जब आप में इतनी हिम्मत है तो आप को समाज में आप का साथ देने वाले भी मिलेंगे जो आप को अपने अधिकार दिलाने में मदद भी करेंगे। लेकिन आप को फर्जी मदद करने वालों से भी सावधान रहना होगा। आप के प्रति फैलाई जा रहे बुरे प्रचार का भी मुकाबला करना होगा। आप दृढ़ता से खड़ी रहेंगी तो अपना जीवन जीत सकती हैं।

ति के मरने के उपरान्त संतान न होने पर उस की समस्त संपत्ति की स्वामिनी पत्नी और मृतक की माती ही हैं।  इस तरह आप अपने पति की सम्पत्ति की स्वामिनी हैं। आप चाहें तो समस्त संपत्ति हासिल कर सकती हैं। आप के पति का जो भी रुपया उस की नौकरी से, ईपीएफ, जीपीएफ, बीमा पालिसी आदि से मिलना है वह सब आप का है। यदि नॉमिनी कोई और भी है और उसे वह धनराशि मिल भी जाती है तो ऐसा धन प्राप्त करने वाला नॉमिनी केवल एक ट्रस्टी मात्र है। ट्रस्टी का कर्तव्य है कि वह मृतक के उत्तराधिकारियों को उन की धन संपत्ति सौंप दे। यदि ट्रस्टी ऐसा नहीं करता है और उस धन संपत्ति को अपने पास रख लेता है तो यह सीधे सीधे भारतीय दंड संहिता की धारा 406 के अंतर्गत न्यास भंग का अपराध है, ग़बन है। आप को चाहिए कि आप अपने पति की संपत्ति आप के ससुराल वालों द्वारा ऱख लिए जाने तथा नौकरी से, ईपीएफ, जीपीएफ, बीमा पालिसी आदि से मिलने वाले धन के लिए पुलिस में रिपोर्ट कराएँ। यदि थाना रिपोर्ट न लिखे, पुलिस अधीक्षक को शिकायत करें और फिर भी काम न चले तो न्यायालय में परिवाद प्रस्तुत करें। आप की प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज हो जाने पर पुलिस का कर्तव्य है कि वह आप की संपत्ति को रखने वालों को गिरफ्तार कर उस संपत्ति को बरामद करे। इस के बाद आप न्यायालय से उस संपत्ति को अपनी सुपूर्दगी में ले सकती हैं।  जो संपत्ति न मिले और जो खराब मिले उस की प्राप्ति और नुकसान के लिए आप दीवानी वाद न्यायालय में संस्थित कर सकती हैं।

प के ससुर जी का यह कहना सही है कि जो संपत्ति उन्हों ने अर्जित की है उस पर उन का अधिकार है वे इसे कुछ भी कर सकते हैं। लेकिन जो संपत्ति आप के पति ने अर्जित की है उस पर उन का कोई अधिकार नहीं है। आप के ससुर जी का यह कहने का कि वे अपने पुत्र को अपनी जायदाद से बेदखल करते हैं कोई अर्थ नहीं है।  यदि किसी जायदाद में आप के पति का अधिकार है तो उसे समाप्त नहीं किया जा सकता क्यों कि वह तो आप के पति के देहान्त के साथ ही आप का हो चुका है। यदि आप के ससुराल में कोई सहदायिकी पुश्तैनी जायदाद हो तो उस में भी आप के पति का अधिकार था। वह अधिकार अब आप के पति की मृत्यु के उपरान्त आप का है आप उस के लिए भी विभाजन का दीवानी वाद प्रस्तुत कर सकती हैं। इस के लिए आप को स्थानीय वकील से सलाह करनी चाहिए और सहायता प्राप्त करनी चाहिए। आप के पास यदि मुकदमे लड़ने के लिए धन नहीं है तो आप जिला मुख्यालय पर जिला जज के कार्यालय में स्थापित विधिक सेवा प्राधिकरण में सहायता के लिए आवेदन प्रस्तुत करना चाहिए। यह प्राधिकरण आप को निशुल्क वकील की मदद प्रदान कर सकता है तथा अन्य सहायता भी प्रदान कर सकता है।

बीमा पालिसी के नंबर के बिना उसे तलाश करना अत्यन्त दुष्कर काम है।  लेकिन फिर भी यदि आप को अपने पति की सही जन्मतिथि जो कि उन के सैकण्डरी बोर्ड के प्रमाण पत्र में दर्ज हो तो आप भारतीय जीवन बीमा निगम की किसी शाखा में जा कर अपने पति के नाम, पिता के नाम, निवास स्थान और जन्मतिथि के आधार पर बीमा पालिसी का पता कर सकती हैं तथा संबंधित शाखा और मंडल कार्यालय को लिख कर दे सकती हैं कि बीमा पालिसी की राशि का भुगतान आप के सिवा किसी अन्य को न किया जाए। आप को नौकरी से, ईपीएफ, जीपीएफ, बीमा पालिसी आदि से मिलने वाली धनराशि को आप के अलावा किसी भी अन्य व्यक्ति को भुगतान करने पर रोक लगाने के लिए आप के सास-ससुर को पक्षकार बनाते हुए अपने पति की उत्तराधिकारी होने के आधार पर तुरंत एक दीवानी वाद कर देना चाहिए जिस में आप को अस्थाई निषेधाज्ञा का यह आवेदन करते हुए अस्थाई निषेधाज्ञा प्राप्त करना चाहिए कि जब तक वाद का निपटार न हो जाए उक्त राशियों का भुगतान किसी को न किया जाए। उक्त सभी राशियों के लिए आप के नाम नॉमिनेशन न होने के कारण आप को जिला न्यायाधीश के न्यायालय से उत्तराधिकार प्रमाण पत्र हासिल करना होगा।

उत्तराधिकार में प्राप्त किसी भी संपत्ति पर केवल प्राप्तकर्ता का ही अधिकार होगा, उस के पुत्र पुत्रियों का नहीं।

समस्या-

झाँसी, उत्तर प्रदेश से नीरज अग्रवाल पूछते हैं –

क्या माता से उत्तराधिकार में प्राप्त संपत्ति में बेटी का अधिकार होता है?

समाधान-

हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम दिनांक 17 जून 1956 से प्रभावी हुआ है। इस अधिनियम के प्रभावी होने के उपरान्त इस अधिनियम के अंतर्गत उत्तराधिकार में प्राप्त किसी भी संपत्ति पर केवल उत्तराधिकार में प्राप्त करने वाले व्यक्ति का ही अधिकार होता है अन्य किसी का नहीं।

स अधिनियम की धारा 14 के अनुसार किसी भी स्त्री की संपत्ति उस की व्यक्तिगत संपत्ति होती है। इस कारण उस से उत्तराधिकार में प्राप्त संपत्ति भी संपत्ति को प्राप्त करने वाले की व्यक्तिगत संपत्ति होगी। धारा-15 की उपधारा (क) के अंतर्गत ही किसी को मातृपक्ष की संपत्ति प्राप्त हो सकती है। इस उपधारा में कहा गया है कि किसी स्त्री की मृत्यु के उपरान्त उस की संपत्ति उस के पुत्र-पुत्रियों (और पूर्व मृत पुत्र पुत्रियों की संतानों) को प्राप्त होगी। इस में कहीं भी यह उल्लेख नहीं है कि जीवित पुत्र पुत्रियों के पुत्र पुत्रियों को भी संपत्ति प्राप्त होगी।  इस कारण से माता या मातृ पक्ष से प्राप्त संपत्ति पर केवल संपत्ति प्राप्त करने वाले का ही अधिकार होगा। यह उस की स्वयं की संपत्ति होगी। उस में संपत्ति प्राप्त करने वाले व्यक्ति के जीवित रहते उस के पुत्र पुत्रियों का कोई अधिकार नहीं होगा।

वसीयत से संपत्ति जीवनकाल के बाद ही हस्तांतरित होगी तथा वसीयतकर्ता अपने जीवन काल में वसीयत बदल सकता है

समस्या-

जिला भीलवाड़ा, राजस्थान से छीतरलाल गाडरी ने पूछा है-

मेरे काकाजी ने मुझे बचपन से गोद लिया था तथा उनके एक बेटी भी है! मैं बचपन से उनके घर पर रह रहा हूँ तथा उन की जमीन-जायदाद काम में ले रहा हूँ।  २१ साल पहले मेरे काकाजी की मृत्यु हो चुकी है।  इसके बाद मेरे बडे भाई ने धोखे से सारी जायदाद काकाजी की बेटी के नाम करवा दी तथा मुझे कुछ भी हिस्सा नहीं मिला।  मेरी बहन (काकाजी की बेटी) ऐसा नही चाहती है तथा वह सारी जायदाद मेरे नाम करवाना चाहती है इसलिए उसने सारी जायदाद मुझे दे दी।  १२ साल पहले उसने ३ बीघा ३ बिस्वा जमीन मेरे नाम करवा दी।  शेष ५ बीघा जमीन उसके नाम पर ही है।  शेष जमीन को भी वो मेरे नाम करवाना चाहती है।  मेरे पास ऐसा कोई लिखित प्रमाण नहीं है जिससे मैं बता सकूँ कि मुझे गोद लिया गया है सिवाय बहन (काकाजी की बेटी) के मौखिक कथन के।  क्या शेष जमीन की रजिस्ट्री कराने के अलावा कोई और विकल्प है जिससे बहन (काकाजी की बेटी) की मृत्यु के बाद या पहले जमीन मेरे नाम आ जावे?

समाधान-

प की समस्या का समाधान आसान है। आप अपनी बहिन से उस कृषि भूमि को अपने नाम तथा उस का जीवन काल में ही आप की मृत्यु हो जाने पर आप के उत्तराधिकारियों के नाम वसीयत करवा लें और इस वसीयत को उपपंजीयक के कार्यालय में पंजीकृत करवा लें।  इस वसीयत में यह भी लिखाएँ कि उस के पिता  जी ने आप को गोद ले लिया था लेकिन उस का कोई लिखित सबूत नहीं होने के कारण सारी सम्पत्ति उसे मिल गई थी। इस वसीयत के कारण आप की बहिन के जीवन काल में यह कृषि भूमि उसी के स्वामित्व की रहेगी।  बहिन के जीवनकाल के बाद इस कृषि भूमि का नामान्तरण अपने नाम करवा सकते हैं। यदि बहिन के जीवनकाल में ही आप का देहान्त हो जाए तो आप के उत्तराधिकारी इस वसीयत के आधार पर उन के नाम कृषि भूमि का नामान्तरण करवा सकेंगे।

स में केवल यही एक दुविधा आप को बनी रहेगी कि बहिन अपने जीवन काल में इस वसीयत को बदल न दे।  क्यों कि आप के बड़े भाई का यह उद्देश्य रहा हो सकता है कि अभी जमीन बहिन के नाम करवा दी जाए।  बाद में उस से  अपने नाम वसीयत करायी जा सकती है।  यदि बहिन वसीयत न करे तो वह जमीन आप दोनों भाइयों को आधी आधी मिल सकती है।  लेकिन आप को बहिन पर पूरा विश्वास है तो आप वसीयत से आप का यह काम हो जाएगा।   सभी बुरी संभावनाओं  से बचने के लिए आप चाहते हैं कि अभी यह कृषि भूमि आप के नाम हो जाए तो आप को अपने नाम बहिन से दान-पत्र पंजीकृत करवा कर उक्त भूमि अपने नाम हस्तांतरित करानी होगी। इस से आप तुरंत अपने नाम नामांतरण खुलवा सकते हैं। बस इस में आप को भूमि की कीमत पर स्टाम्प ड्यूटी अदा करनी होगी।

मृत कर्मचारी की भविष्य निधि राशि में सभी उत्तराधिकारियों का हिस्सा है।

समस्या-

राजनगर, जिला अनूपपुर, मध्य प्रदेश से संतोष सिंह ने पूछा है-

मेरे पिताजी कोल इंडिया में काम करते थे, उनका देहांत हो गया है।   हम तीन भाई हैं।  मेरे बड़े भाई को पिताजी ने अपने संपत्ति से बेदखल कर के अपनी सर्विस शीट में उन का नाम कटवा दिया था।  लेकिन उनके देहांत के बाद वे माँ से उनको मिलने वाले प्रोविडेंट फंड में से हिस्सा माँग रहे हैं और नहीं देने पर मुकदमा करने की धमकी देते हैं।  जबकि उसकी उम्र 40 वर्ष है और पिछले 12 वर्ष से घर से अलग रहकर अपना काम करते हैं।  क्या कानूनी रूप से पिताजी के प्रोविडेंट फंड से अगर मां नहीं देना चाहे तो भी क्या उसका हिस्सा बनता है? इस पर वह किस तरह से क़ानूनी करवाई कर सकता है?

समाधान-

किसी भी कर्मचारी के जीवित रहने पर सेवा समाप्ति के उपरान्त प्रोविडेंट फंड (भविष्य निधि) की राशि को प्राप्त करने का अधिकार स्वयं कर्मचारी का है। इस तरह भविष्य निधि एक प्रकार से कर्मचारी की स्वअर्जित संपत्ति है।  किसी कर्मचारी का देहान्त हो जाने की स्थिति में भविष्य निधि को प्राप्त करने वाले को कर्मचारी द्वारा नामित (नोमीनेशन) करने का प्रचलन है। इस तरह किसी कर्मचारी का देहान्त हो जाने के उपरान्त भविष्य निधि योजना से भविष्य निधि की राशि का भुगतान नामिति (नॉमिनी) को कर दिया जाता है।  लेकिन इस का अर्थ यह नहीं है कि वह राशि नामिति की संपत्ति हो जाती है।  नामिति उस संपत्ति का ट्रस्टी मात्र होता है। यह उस का कर्तव्य है कि वह उस संपत्ति को मृतक के उत्तराधिकारियों में उन के अधिकार के अनुसार वितरित कर दे। आप के मामले में आप की माँ, आप और आप के भाई और यदि आप की कोई बहिन हो तो वह इस राशि में समान रूप से हिस्सेदार हैं। यदि आप तीन भाई और माँ ही है तो प्रोविडेंट फंड की राशि पर आप के भाई का एक चौथाई हिस्सा है। यदि वे उस हिस्से पर अपना अधिकार छोड़ना नहीं चाहते हैं तो आप की माता जी को उन्हें यह राशि देनी होगी।  इस संबंध में आप सर्वोच्च न्यायायलय द्वारा 20.08.2009 को शिप्रा सेन गुप्ता बनाम मृदुल सेन गुप्ता का यह प्रकरण यहाँ क्लिक कर के देख सकते हैं जिस में कहा गया है कि भविष्य निधि का नामिति केवल उस राशि का ट्रस्टी है उस राशि पर सभी उत्तराधिाकारियों का अधिकार है।

किसी को भी अपनी संपत्ति से बेदखल करने का कोई अर्थ नहीं है। हाँ, कोई भी व्यक्ति अपनी स्वअर्जित सम्पत्ति को तथा संयुक्त संपत्ति या सहदायिक संपत्ति में अपने हिस्से को वसीयत कर सकता है। यदि आप के पिता अपनी वसीयत करते और उस में यह अंकित कर देते कि उन की भविष्य निधि की राशि वे अपनी पत्नी को वसीयत करते हैं अन्य किसी भी उत्तराधिकारी का उस पर कोई अधिकार नहीं होगा तो उस राशि को अकेले आप की माता जी को प्राप्त करने का अधिकार होता। पर वसीयत न होने की दशा में उस में सभी उत्तराधिकारियों का हिस्सा है।

दि भविष्य-निधि की राशि आप की माता जी प्राप्त कर चुकी हैं तो आप के भाई के पास एक मात्र तरीका यही है कि वे अपना हिस्सा प्राप्त करने के लिए आप की माताजी के विरुदध दीवानी न्यायालय में वाद प्रस्तुत करें। लेकिन यदि अभी कोल इंडिया वालों ने या भविष्य निधि योजना ने इस का भुगतान आप की माता जी को नहीं किया है तो वे भविष्य निधि योजना के समक्ष आपत्ति प्रस्तुत कर सकते हैं। योजना भविष्य निधि प्राप्त करने के लिए आप की माता जी को उत्तराधिकार प्रमाण पत्र लाने को कह सकती है या नामिति होने पर उन को भुगतान भी कर सकती है।  आप के भाई न्यायालय में दावा प्रस्तुत कर के कोल इंडिया या भविष्य निधि योजना द्वारा आप की माता जी को उक्त राशि का भुगतान करने से रोकने हेतु निषेधाज्ञा प्राप्त करने का प्रयत्न कर सकते हैं।

यदि अविभाजित संपत्ति दान कर दी जाए तो माना जाएगा कि दानकर्ता ने केवल अपना हिस्सा दान किया है

समस्या -

शुकुल बाजार, सुल्तानपुर, उत्तर प्रदेश से आशुतोष तिवारी ने पूछा है –

मेरी नानी की 5 बेटियाँ है, अभी वह जीवित है!  उन्होंने अपनी सबसे छोटी बेटी को अपनी सारी संपत्ति हिबानामा (दानपत्र) करके दे दी है। नाना जी जीवित नहीँ है।  संपत्ति नानी को नाना जी से उत्तराधिकार में मिली हुई है।  बाकी 4 बेटियों ने जिन्हें नाना जी से उत्तराधिकार में कुछ नहीं मिला कोर्ट में दावा कर रखा है,  क्या ये चारों भी उस संपत्ति की हक़दार हैं?

समाधान-

प का प्रश्न बहुत स्पष्ट नहीं है। संपत्ति नाना जी की थी।  यदि नाना जी ने उक्त संपत्ति की वसीयत नानी के नाम कर दी होती तो फिर वह संपत्ति नानी की व्यक्तिगत संपत्ति होती और वे किसी को भी दानपत्र, विक्रय या अन्य किसी रीति से हस्तांतरित कर सकती थीं।   लेकिन आप के अनुसार उन्हें वह संपत्ति उत्तराधिकार में प्राप्त हुई है।  यदि नाना जी ने कोई वसीयत नहीं की थी तो उन की संपत्ति उन के सभी उत्तराधिकारियों अर्थात नानी और नाना की सभी बेटियों और बेटा है तो उस को भी समान अधिकार प्राप्त हुआ है।  यदि नानी ने नाना जी की समूची संपत्ति को अपना समझ कर हिबानामा (दानपत्र) कर दिया है तो वह गलत है।  नानी अधिक से अधिक अपने हिस्से को दान कर सकती हैं, उस से अधिक कुछ भी नहीं।   बेटियों को उक्त संपत्ति में उसी दिन अधिकार प्राप्त हो गया था जिस दिन नाना जी का देहान्त हो गया था।  यदि नाना की बेटियों ने उस संपत्ति के विभाजन और हिबानामा को निरस्त करने का वाद प्रस्तुत किया है तो वे अवश्य सफल होंगी।

स प्रकरण में  नानी ने अपने हिस्से को छोटी बेटी को दान कर दिया है। छोटी बेटी का उक्त संपत्ति में अपना स्वयं का हिस्सा भी था।  इस तरह छोटी बेटी को अपने हिस्से के साथ अपनी माँ का हिस्सा भी प्राप्त हो जाएगा।  छोटी बेटी को अन्य बहनों की अपेक्षा संपत्ति का दुगना हिस्सा प्राप्त हो सकता है।

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