घूसखोरों की धरपकड़ के कुछ सीन

bribeकल दिल्ली के मुख्यमंत्री जी ने घोषणा की – कोई अगर घूस मांगता है तो उससे सेटिंग करो। हमको बताओ। हम उनको जेल भेजवायेंगे।

इस घोषणा पर अमल कैसे होगा यह तो समय बतायेगा लेकिन कुछ सीन ऐसे बन सकते हैं:

सीन 1: सुबह-सुबह घूस पकड़ने वाले महकमें में फ़ोन आयेंगे-साहब हमसे घूस मांगी जा रही है। कनाट प्लेस पर मिलना तय हुआ है। आइये पकड़वाइये आकर।

जबाब दिया जायेगा- अच्छा अभी भेजते हैं। कित्ते पर बात तय हुई है?

अरे बात तो पांच सौ पर तय हुई है। हम राजी भी थे। लेकिन एक दिन के लिये बाहर चले गये। इस बीच ‘आप’ की सरकार बन गयी। आपने घोषणा भी कर दी। तो रेट डबल हो गये। हजार तो हम न दे पायेंगे। आप आइये घूस लेने वाले को पकड़वाइये। हमारा काम करवाइये।

पुलिस वाला भुनभुनाते हुये कहेगा- आप एक हजार देने को तैयार कैसे हो गये? क्या आपको पता नहीं है कि घूस लेना और देना दोनों अपराध हैं?

शिकायत कर्ता कहेगा- अरे सब पता है साबजी। लेकिन हमें क्या पता था कि आपकी सरकार बनेगी और घूस लेने वालों को पकड़वाना इत्ता आसान हो जायेगा। अब जब सरकार सुविधा दे रही है तो सोचा उसका उपयोग करने में क्या हर्जा? ट्राई कर लेते हैं।

पुलिस वाला भुनभुनाते हुये कनाट प्लेस के लिये निकलेगा। जाड़े की सुबह-सुबह थाने से एक हजार की घूस पकड़ने के लिये निकलना। नौकरी जो न कराये।

कनाट प्लेस पर ‘घूस घटना स्थल’ पर मुस्तैद होकर पुलिस वाले घूस देने का इशारा करेगा! घूस देने वाला देने की कोशिश करेगा। सरकारी आदमी उसको झिड़क देगा। ये क्या नाटक है भाई! जायज काम के बदले हमें घूस देने की कोशिश कर रहे हो? जाते हो या बुलायें पुलिस को?

लेकिन देने वाला भी देने की जिद पर अड़ा हुआ है। मजबूरन लेने वाल थाने फ़ोन करेगा- साहब ये एक आदमी हमको सुबह से घूस की पेशकश कर रहा है। सुबह पांच सौ से शुरु हुआ था अब एक हजार तक पहुंच चुका है। आप जल्दी से आइये हमको बचाइये वर्ना ये कहीं जबरदस्ती हमको घूस न दे डाले।

थाने वाले कनाट प्लेस गये सिपाहियों को फ़ोन करके जबरिया घूस देने वाले को भी पकड़ने की हिदायत दें देंगे। पुलिस वाले झल्लाकर दोनों को अन्दर कर देंगे। एक को घूस लेने के आरोप में, दूसरे को जबरिया घूस देने के आरोप में। एक ही केस में डबल उपलब्धि।

सीन 2: घूस की सूचना देने वाले ने पुलिस वालों को कनाट प्लेस बुलवाया है। पुलिस चल चुकी है। लेकिन पुलिस की गाड़ी जाम में फ़ंसी हुयी है। लाल बत्ती विहीन गाड़ी को टैफ़िक भी कोई भाव नहीं दे रहा है। ड्राइवर ट्रैफ़िक वाले को हड़काता है कि जल्दी निकालो हमें घूस देने वाले को पकड़ना है। ट्रैफ़िक वाला कहेगा अरे भाई साहब पीछे देखिये आपकी गाड़ी के पीछे मुख्यमंत्री की गाड़ी है। आपको जल्दी निकलवा कर हमें अपनी नौकरी थोड़ी गंवानी है। पुलिस वाला थाने फ़ोन करेगा – साहब जाम में फ़ंसेगा। सेटिंग का टाइम निकला जा रहा है। बताइये क्या करें? थाने वाला लोकेशन पूछकर कहेगा- अच्छा तुम कनाट प्लेस वाली घूस छोड़ दो। वो पहाड़गंज वाली टीम को सौंप देते हैं। तुम अगले चौराहे वाली घूस को कवर कर लो। बड़ी घूस है। अच्छा कवरेज मिलेगा।

सीन 3: सचिवालय, ट्रांसपोर्ट आफ़िस, सेल्स टैक्स के दफ़्तर वाले अपनी बिल्डिंग के पास थाने की मांग के लिये हड़ताल करेंगे। उनकी मांग है कि घूस के पेशकश करने वाले इत्ते ज्यादा हैं कि शिकायत करने के बावजूद पुलिस तय समय पर पहुंच नहीं पाती। मजबूरन उनको काम करके देना पड़ता है। लोग जबरियन पैसे थमा देते हैं। घूस देने वालों से सुरक्षा के लिये थाना बगल में होना चाहिये ताकि पुलिस फ़ौरन आकर घूस देने वालों को पकड़ सके। जब तक थाने की व्यवस्था नहीं होगी -काम बन्द हड़ताल जारी रहेगी।

सीन 4: फ़ोन कंपनियां अपना विज्ञापन करते हुये बतायेंगी कि कैसे उनके मोबाइल से फ़ोन करने पर पुलिस वाले फ़ौरन हरकत में आते हैं। बाकी मोबाइल कम्पनियों का नेटवर्क घूस की शिकायत करने के नाम पर बिजी हो जाता है।

सीन 5: घूस लेने देने के चक्कर में घूस बिचौलियों की संख्या बढ़ जायेगी। ऐसी स्वयं सेवी संस्थायें खुल जायेंगी जो लेन -देन के काम को बिना किसी खतरे के आपके लिये अंजाम देंगी। सस्ती दरों में। उन संस्थाओं के विज्ञापन ऐसे हो सकते हैं- सेल्स टैक्स दफ़्तर से बिना घूस दिये अपना काम करवाइये, प्लॉट रजिस्ट्री के लिये संपर्क करें, कानून के अनुसार काम कराने के लिये तत्पर विश्वसनीय संस्था।

क्या पता इस धरपकड़ अभियान में बातचीत के बाद सरकार को पता चले कि तमाम निर्दोष लोग फ़ंस गये हैं। उनके मामले में निपटारे के लिये सरकार एस.एम.एस. करके जनता की राय लेगी। पूरा किस्सा ईमानदारी से बताते हुये जनता से पूछा जायेगा- बताइये इनको मार दिया जाये या छोड़ दिया जाये?

जनता की राय के हिसाब से फ़ैसला किया जायेगा। कुछ लोगों को छोड़ दिया जायेगा और कुछ के खिलाफ़ मुकदमा दर्ज होगा।

क्या पता साल भर के भीतर जन्तर-मन्तर पर एक और आंदोलन शुरु हो जाये। उसका नाम होगा — “एस.एम.एस. मुक्ति आंदोलन!”

आपका क्या कहना है इस बारे में?

3 responses to “घूसखोरों की धरपकड़ के कुछ सीन”

  1. समीर लाल "भूतपूर्व स्टार टिपिण्णीकार"

    “एस.एम.एस. मुक्ति आंदोलन!” – ये आप चला दिजिये और भीड़ लग ली तो अगले मप्र के मुख्य मंत्री आप…:)
    समीर लाल “भूतपूर्व स्टार टिपिण्णीकार” की हालिया प्रविष्टी..नारे और भाषण लिखवा लो- नारे और भाषण की दुकान

  2. देवांशु निगम

    कैसा भी मूड रहे, आपको पढ़ लो चौकस हो जाता है !!! धुआंदार और शानदार पोस्ट !!!

    घूस तो हमारे यहाँ मशीन में डाले गए तेल जैसी मान ली गयी है , डालोगे नहीं तो कुछ चलेगा नहीं | इन सबके बीच अपने केजरीवाल साहब क्या कर गुजरते हैं ये वक़्त बताएगा | बाकी शुरुआत तो बढ़िया है !!! क्या कहते हैं आप ???
    देवांशु निगम की हालिया प्रविष्टी..एक सपने का लोचा लफड़ा…

  3. सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी

    कुछ ऐसे जिद्दी टाइप मुलाजिम हैं जो घूस न पायें तो कलम ही नहीं उठा सकते। ऐसे लोग दफ़्तर जाना ही बन्द कर देंगे। गये भी तो कलम घर छोड़ आयेंगे। किसी ने कलम थमा दी तो फाइल में गलती कर देंगे। यदि गलती से सही काम कर गये तो उनकी तबियत खराब हो जाएगी। अस्पताल में भर्ती कराना पड़ेगा। सरकार को कुछ नामी विभागों के दफ़्तर के आसपास अस्पताल खुलवाना पड़ेगा जहाँ हृदयरोग व साइकियाट्री के विशेषज्ञ रखने पड़ेंगे, इमरजेन्सी वार्ड खोलना पड़ेगा। कुछ कर्मचारियों के लिए घरों में पत्नी से पिटने का खतरा बढ़ जाएगा। बच्चों का विद्रोह भी बढ़ सकता है। सबको खुश करने वाले घूस की गैरमौजूदगी से रिश्ते टूटने की घटनाएं बढ़ेंगी। कौन्सिलिंग का इन्तजाम करना पड़ेगा। इस क्षेत्र में रोजगार के नये अवसर बढ़ेंगे। यही है एक सिल्वर लाइनिंग।
    सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी की हालिया प्रविष्टी..कुछ अलग रहेगा नया साल

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