जिज्ञासु यायावर

फ़ुरसतिया के यात्रा संस्मरण

कोणार्क- जहां पत्थरों की भाषा मनुष्य की भाषा से श्रेष्ठतर है

कोणार्क जहां पत्थरों की भाषा मनुष्य की भाषा से श्रेष्ठतर है।- रवीन्द्रनाथ टैगोर पुरी कथा कहने के बाद हमें अगली पोस्ट में कोणार्क वर्णन करना था। छह माह से भी ज्यादा हो गये वह अगली पोस्ट न लिखी जा सकी। यह होता है यारों का वायदा निभाने का फ़ुरसतिया अंदाज! शाम को हम पुरी की […]

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