26.2.14

जल और आयुर्वेद

जल और भोजन, दो ऐसे तत्व हैं, जो हम ग्रहण करते हैं और इनको आयुर्वेद के सैद्धान्तिक परिप्रेक्ष्य में समझना आवश्यक है। बहुधा जल पीने में हम प्यास को ही प्रेरक मानते हैं, जब प्यास लगी, पानी पी लिया। कब पीना, कितना पीना, कैसे पीना, इस पर कई प्रचलित मान्यतायें हैं जिन्हें सार्वभौमिक मान लिया जाता है, पर गुण और प्रकृति के अनुसार जल के प्रभाव का सम्यक ज्ञान लाभकारी है।

जलं जीवनम्
जल सभी रसों का उत्पादक है, पाचन प्रक्रिया में भोजन से जो पोषक तत्व सोखे जाते हैं, उन्हें रस कहते हैं, रसों से ही रक्त आदि का निर्माण होता है। जल वैसे तो जिसमें मिलाकर पिया जाता है, उसी के गुण ले लेता है, पर इसके अपने ६ गुण भी हैं, शीत, शुचि, शिव, मृष्ट, विमल, लघु। धरती पर आया जल वर्षा का ही होता है, समुद्र से वाष्पित जल अन्य जल स्रोतों से वाष्पित जल की तुलना में अधिक क्षारीय होता है। वर्षाकाल का प्रथम जल और अन्य ऋतु में बरसा जल नहीं पीना चाहिये। बहता जल पीने योग्य होता है, पहाड़ों और पत्थरों से गिरने से जल की अशुद्धियाँ बहुत कम हो जाती हैं। स्थिर जल के स्रोतों में वही जल श्रेष्ठ होता है जिसे सूर्य का प्रकाश और पवन का स्पर्श मिलता रहे। यदि जल मधुर है तो त्रिदोषशामक, लघु और पथ्य होता है। क्षारीय है तो कफवात शामक, पर पित्त को बढ़ाता है। कषाय हो तो कफपित्त शामक, पर वात को बढ़ाता है।

हर स्थान से निकलने वाली नदियों के जल में कोई न कोई स्थानीय दोष होता है, उसका भी वर्णन वागभट्ट ने ५वें अध्याय में किया है। गौड़, मालवा और कोंकण क्षेत्र से निकलने वाली नदियों में अर्शरोग(बवासीर), महेन्द्र पर्वत ले निकलने वाली नदियों में उदररोग व श्लीपदरोग(हाथीपाँव), सह्याद्रि और विन्ध्य से निकलने वाली नदियों में पाण्डुरोग(एनीमिया) और शिरोरोग, पारियात्र(हिन्दुकुश) पर्वत से निकलने वाला जल त्रिदोष शामक, बल, पौरुष, शक्ति को उत्पन्न करने वाला होता है। इन स्थानों पर रहने वालों लोगों में इस जल से सात्म्य हो जाता है, पर बाहर से आये लोगों में रोग होने की संभावना बनी रहती है।

मन्दाग्नि, गुल्म, पाण्डु, उदररोग, अतिसार, अर्श और ग्रहणी रोग के लोगों को जल कम पीना चाहिये। स्वस्थ मनुष्य को भी अधिक जल नहीं पीना चाहिये, किन्तु ग्रीष्म और शरद में अधिक जल पिया जा सकता है। सामान्यतः शीतल जल का निषेध है, पर मदात्यय(मदिरा से होने वाले विकार), शरीर की ग्लानि, मूर्छा, वमन, परिश्रमजन्य थकावट, भ्रम, प्यास की वृद्धि, शरीर की ऊष्णता, आहार विहार जन्य दाह, रक्तपित्त और विषभक्षण जन्य विकार, इन सबके लिये शीतल जल पीना चाहिये। उष्ण जल,  अग्निदीपक, पाचक, कण्ठशोधक, पचने में लघु, उष्ण, वस्ति का शोधक होता है। दक्षिण भारत के कई स्थानों पर भोजन के साथ गुनगुना पानी देते हैं, संभवतः उनकी परम्पराओं में यही गुण और सूत्र रहे होंगे। शीतल जल ६ घंटे में, गर्म कर ठंडा किया ३ घंटे में और गुनगुना जल १ घंटे में पच जाता है। गर्म कर ठंडे किय जल कफकारक नहीं होता है।

९० प्रतिशत रोगों का कारण हमारा पेट है। पेट में भोजन और जल ही जाते हैं। कितना भोजन किया, यह उतना महत्वपूर्ण नहीं है, जितना कि कितने प्रतिशत भोजन पचा। समुचित पाचन ही स्वास्थ्य का साधन है। कोई भी अन्न पहले सूर्य के प्रकाश में पकता है, उसके बाद रसोई में अग्नि की आँच में पकता है और अन्त में आमाशय में भी जठराग्नि में पचता है। पेट में भोजन जाते ही जठराग्नि प्रदीप्त हो जाती है और तब तक रहती है, जब तक भोजन पच नहीं जाता है। श्रमशील व्यक्ति में एक घंटा, सामान्य व्यक्ति में डेढ़ घंटा और ठंडे स्थानों में रहने वालों के पेट में दो घंटे तक यह जठराग्नि प्रदीप्त रहती है। इस समय यदि पेट में जल गया तो वह जठराग्नि को मन्द या ठण्डा कर देगा और भोजन अपच रह जायेगा। यही अपचा भोजन सारे रोगों की जड़ है, डकार से लेकर, एसिडिटी, मोटापा, रक्त अम्लता, जोड़ों का दर्द, हृदयाघात और कैंसर जैसे भीषण रोग इसके कारण होते हैं। यदि भोजन ठीक से पच गया तो कभी कोई रोग हो ही नहीं सकते हैं। भोजन के बाद वात बढ़ना संकेत है, उसे उपेक्षित न करें, वात सूक्ष्म होती है और हर अंग प्रभावित करने में सक्षम भी।

यही कारण है कि भोजन के तुरन्त बाद पिये जल को विष माना गया है। भोजन के एक घंटे पहले और डेढ़ घंटे बाद तक जल नहीं पीना चाहिये। भोजन के पहले पिया जल शरीर को कृशकाय बनाता है और बाद में पिया जल शरीर में स्थूलता लाता है। भोजन करते समय, भोजन अटकने पर एक दो घूँट जल लिया जा सकता है। दो अन्नों के सन्धिस्थान(रोटी और चावल के बीच में) पर भी एक दो घूँट जल लाभदायक होता है क्योंकि दोनों अन्नों के लिये भिन्न एन्जाइमों का स्राव होता है। यदि भोजन के साथ कुछ तरल लेना हो तो सुबह फलों का रस, दोपहर में छाछ और रात में दूध लिया जा सकता है। यद्यपि इनमें भी पर्याप्त जल होता है पर जल जिसमें मिलता है, उसके गुण ले लेता है।

पानी कैसे पियें? पानी को घूँट भर भर कर पानी पियें, जैसे गरम दूध पीते हैं। मुँह में क्षार बनता है, लगभग एक लाख ग्रन्थियाँ हैं और एक दिन में कई लीटर तक लार बनती है। पेट में अम्ल बनता है, जो पाचन में ही सहायक होता है। कहते हैं कि यदि पेट सामान्य रहे तो १०० वर्ष तक निरोग जिया जा सकता है। घूँट घूँट पिये पानी से अधिक लार अन्दर जायेगी जो पेट की अम्लता को शमित करेगी। तेज गति से पीने से भी अम्लता कम होगी पर उतनी मात्रा में नहीं। पशुओं को देखें कि वे भी ऐसे ही पीते हैं, चिड़िया बूँद बूँद पीती है, कुत्ता चाट चाट कर पीता है। लार विश्व की सबसे अच्छी औषधि है, इसको अन्दर जाते रहना आवश्यक है। पशुओं को देखिये, वे तो चाट कर अपने घाव तक ठीक लेते हैं। त्वचा के कई रोगों के लिये सुबह की लार अमृतसम है। जो लोग पान मसाला, गुटका, तम्बाकू आदि खाकर थूकते रहते हैं, उनसे बढ़ा अभागा कोई नहीं। एक ही स्थिति में थूक सकते हैं, जब कफ अधिक बढ़ा हो। तो पान खाने वाले क्या करें? पान बिना कत्था और सुपारी के साथ खायें और अन्दर ले लें। पान पित्त और कफ का नाशक है, चूना वात नाशक है, तो यह संयोग तीनों दोषों का निवारण करता है, पर पान देशी हो, तनिक कसैले स्वाद वाला।

पानी कैसा पियें? शीतल जल तो कभी न पियें, सामान्य तापमान का ही पियें, गुनगुना पानी पियें। पेट में ठंडा पानी जाने से शरीर का तापमान कम होता है और पेट में ऊष्मा पहुँचाने के लिये सारा रक्त पेट की ओर बहता है तो शरीर अपनी पूरी क्षमता से कार्य नहीं करता है। अधिक ठंडा पीने वालों को कब्ज की भी समस्या रहती है, क्योंकि ठंडे पानी का पृष्ठतनाव(सर्फेस टेंशन) अधिक रहता है, उससे आँतें संकुचित हो जाती है और मल का प्रवाह रोकती है।

सुबह उठते ही पानी पियें, बिना कुल्ला किये हुये, इसे ऊषापान कहते हैं। यदि ताँबे के बर्तन में रात भर का रखा जल हो तो अच्छा, नहीं तो जल गुनगुना कर लें। मात्रा लगभग एक लीटर, घँूट घूँट कर और धीरे धीरे। रात भर सोते समय सारी क्रियायें शिथिल हो जाती हैं, पर लार बनने की प्रक्रिया चलती रहती है, ब्रह्ममुहूर्त में बनी लार सर्वोत्तम होती है। इस लार का उपयोग चिकित्सा के लिये भी होता है। डायबिटीज के रोगियों के घाव ठीक करने में यह लार बड़ी उपयोगी होती है। चश्मे उतारने के लिये सुबह की लार आँखों में लगाने से अद्भुत लाभ हैं। लार में वह सब कुछ है जो माटी में है, जो शरीर में है, यही कारण है कि त्वचा में लगे दाग आदि भी इस लार से चले जाते हैं।

पानी खड़े होकर कभी न पियें, सदा ही बैठकर पियें, कहते हैं कि खड़े होकर जल पीने से गठिया आदि रोग हो जाते हैं। भार के अनुसार पानी पीना चाहिये। अपने वजन को दस से भाग देकर उसमें दो घटा दें, उतना लीटर पानी एक दिन में पिये, ७० किलो के व्यक्ति के लिये ५ लीटर। प्यास एक वेग भी है, कभी न रोकें, शरीर में जल की कमी होते ही वह रक्त से वह कमी पूरी करने लगता है।

जल जीवन है और जीवन का यह रूप जानना आवश्यक है। अगली पोस्ट में भोजन और आयुर्वेद।

चित्र साभार - www.h2o2.com

22.2.14

कफ, वात, पित्त

कफ, वात और पित्त, ये तीन तत्व हैं जो शरीर में होते है और कार्यरत रहते हैं। कहने को तो इनको और भी विभाजित किया जा सकता था, पर ये तत्व भौतिक दृष्टि से दिखते भी हैं और गुण की दृष्टि से परिभाषित भी किये जा सकते हैं। शरीर की क्रियाशीलता में हम इनका अनुभव कर सकते हैं। कफ का अनुभव हमें अधिक ठंड में होता है। पित्त नित ही हमारे पाचन में सहयोग करता है। वात हमारे वेगों और तन्त्रिका संकेतों को संचालित करता है। यही कारण रहा होगा कि शरीर को विश्लेषित करने के लिये इनको आयुर्वेद में आधार माना गया है।

जीवन जीना प्रकृति चक्र का अंग होना है। प्रकृति के पाँच तत्वों से मिल कर ही बने हैं, कफ, पित्त और वात। कफ में धरती और जल है, पित्त में अग्नि और जल है, वात में वायु है, इन तत्वों की अनुपस्थिति आकाश है। प्रकृति में जिस प्रकार ये संतुलन में रहते हैं, हमारे शरीर में भी इन्हें संतुलन प्रिय है। जिस अनुपात में यह संतुलन शरीर में रहता है, वह हमारे शरीर की प्रकृति है। कुछ में कफ, कुछ में पित्त, कुछ में वायु या कुछ में इनके भिन्न अनुपात प्रबल होते हैं। यह संतुलित स्थिति हमारा शारीरिक ढाँचा, मानसिक स्थिरता और बौद्धिक व्यवहार निर्धारित करती है। यही संतुलन स्वास्थ्य परिभाषित करता है। प्रकृति से हमारे सतत पारस्परिक संबंधों में ये तीन तत्व घटते बढ़ते रहते हैं। किसी भी एक तत्व का शरीर में अधिक होना ही प्रकृति से हमारे घर्षण का कारण है। यही घर्षण रोग का कारण है। जब तक जीवनशैली या औषधियों से संतुलन की स्थिति में वापस पहुँचकर घर्षण कम किया जा सकता है, रोग साध्य रहता है। जब यह असंतुलन असाध्य हो जाता है, शरीर प्रकृति चक्र से बाहर आ जाता है, प्राण शरीर त्याग देते हैं।

वाग्भट्ट कृत अष्टांगहृदयं के प्रथम अध्याय में ही इन तीन तत्वों के गुण परिभाषित हैं। कौन सा या कौन से तत्व प्रभावी है, यह शरीर की बनावट, मानसिक स्थिति और बौद्धिकता से स्पष्ट हो जाता है। जहाँ वात के प्रभाव वाला मन से सतत चंचल होगा, वहीं कफ के प्रभाव वाला सौम्य और स्थिर होगा। इनके गुणों को समझ लेने से किस वस्तु, मौसम, क्रिया और भाव का शरीर पर क्या प्रभाव पड़ता है, उसके सैद्धान्तिक आधार स्पष्ट हो जाते हैं।

कफ के गुण हैं, स्निग्ध(चिकना), शीत, गुरु(भारी), मन्द, श्लक्ष्ण(खारापन के साथ चिकना), मृत्स्न(मिट्टी की तरह गन्ध वाला), स्थिर। ये गुण धरती और जल के सम्मिलित गुण हैं। जहाँ पर भी इनमें से एक या अधिक गुण कारण या प्रभाव में दिखेंगे, उसमें कफ की उपस्थिति मानी जायेगी। शीत है तो वह कफ बढ़ायेगा। यदि कफ अधिक है तो वह भारीपन या मन्द स्वाभाव लायेगा।

पित्त के गुण हैं, सस्नेह(तैलीय), तीक्ष्ण, ऊष्ण, लघु, विस्त्र(मृत शरीर की गन्ध सा), सर(बहने वाला), द्रव। ये गुण अग्नि और जल को परिभाषित करते हैं, कारण से भी या प्रभाव से भी। जिसे पसीना अधिक आता हो, उसमें ऊष्ण गुण है, वह पित्त के प्रभाव में है। ऐसे ही तीक्ष्ण गन्ध वाले पदार्थ पित्त बढ़ाते हैं।

वात के गुण हैं, रुक्ष, लघु, शीत, खर, सूक्ष्म, गतिमयता। ये सारे गुण वायु में भी पाये जाते हैं। यदि वात अधिक होगा त्वचा रुक्ष होगी। यदि मानसिक तनाव अधिक होगा तो विचारों की गतिमयता के कारण वात बढ़ेगा।

यही नहीं, दिन में, ऋतु में, क्रिया में, शरीर में इन तीनों तत्वों की प्रधानता बदलती रहती है। दिन के प्रारम्भ में कफ, मध्य में पित्त और अन्त में वात प्रधान हो जाता है। बचपन में कफ, युवावस्था में पित्त और वृद्धावस्था में वात प्रधान हो जाता है। पाचन के प्रारम्भ में कफ, मध्य में पित्त और अन्त में वात प्रधान हो जाता है। शरीर के ऊपरी भाग में कफ, मध्य में पित्त और नीचे में वात प्रधान हो जाता है। इसी प्रकार ग्रीष्म के चार माह पित्तप्रधान, वर्षा के चार माह कफ प्रधान और शीत के चार माह वातप्रधान होते हैं।

क्रियाओं को देखें तो उनमें भी यही गुण स्पष्ट दिखते है। सोने में इन्द्रियाँ स्थिर होती हैं तो कफ बढ़ता है। व्यायाम से शरीर संकुचित होता है तो लघु गुण के कारण वात और पित्त बढ़ता है। अधिक चिन्तित रहने से वात बढ़ता है। धूप में निकलने से ऊष्णता के कारण पित्त बढ़ता है। भावों में भी इन गुणों के मूल छिपे हैं। स्पर्श, रूप, रस, रंग, गंध में भी इन तीन गुणों के वर्धन या शमन के गुण छिपे हैं। रॉक संगीत या शास्त्रीय संगीत सुनने में ये तत्व भिन्न रूप से प्रभावित होते हैं।

जहाँ कफ संतुलन लाता है, कल्पनाशीलता लाता है, सृजन लाता है, वहीं इसकी अधिकता क्रोध और आक्रामकता लाती है। जहाँ पित्त शरीर का ताप नियन्त्रण करता है, ऊर्जा देता है, वहीं इसकी अधिकता ज्वर लाती है। जहाँ वात शरीर को गतिमय बनाता है, वेगों और तंत्रिकातन्त्र के संवेगों को संचालित करता है, वहीं दूसरी ओर इसकी अधिकता मानसिक असंतुलन का कारण बनती है।

हर प्रकार के खाद्य को आयुर्वेद में इसी आधार पर विश्लेषित किया गया है। क्या लेने से कौन सा तत्व शरीर में बढ़ता है और कौन सा तत्व शमित होता है, इसका विस्तृत वर्णन किया गया है। भोजन के माध्यम से ही किस तरह से बदलाव लाकर हम अपने मौलिक संतुलन की स्थिति में वापस जा सकते हैं। इसी सिद्धान्त को आगे बढ़ाते हुये, उन्हीं के आधार पर रोगों की चिकित्सा भी की जाती है। औषधियों में वह तीव्रता रहती है कि किसी तत्व की कमी या अधिकता को शीघ्रता से दूर किया जा सके।

इस आधार पर शरीर, काल, भाव और अन्य द्रव्यों की प्रकृति का वर्गीकरण एक वैज्ञानिक आधार है और वाग्भट्ट द्वारा कई दशकों की प्रायोगिक प्रक्रियाओं के बाद सिद्ध और लिपिबद्ध किया गया है। वाग्भट्ट ने ७००० श्लोकों में इसकी न केवल विस्तृत व्याख्या की है वरन औषधियों को बनाने की विधियों को वर्णित भी किया है। यही कारण है कि वाग्भट्ट की कृति के ऊपर १० से भी अधिक टीकायें लिखी जा चुकी और आयुर्वेद के आचार्यों में उसमें लिखे एक एक सूत्र के लिये निर्विवादित सम्मान है। ऐसी अद्भुत कृति को आंशिक रूप से भी पढ़ सकना मेरे मन में भारतीय मनीषियों और आयुर्वेद के लिये अभूतपूर्व कृतज्ञता का भाव संचारित करता है।

अब मुझे समझ में आ रहा है कि देशी विधियों के प्रभाव के पीछे आयुर्वेद सम्मत वाग्भट्ट के सूत्रों का सशक्त वैज्ञानिक आधार है। हमारे पूर्वज जो नियम परम्परा से निभाते आ रहे हैं, उसके पीछे आयुर्वेद का व्यापक प्रसार है। कालान्तर में पराधीनता के पाशों में हमें नियम तो याद रहे पर उनका वैज्ञानिक आधार लुप्त हो गया। आवश्यकता है उसे पूर्णविश्वास से अपनाने की।

आगे की कड़ियों में इसको विस्तारित करते व्यावहारिक उपाय।

19.2.14

संतुलन, गति, क्रम

आयुर्वेद समझने के पहले शरीर को समझना आवश्यक है। शरीर कोई विशेष और एकात्म में जीता हुआ तन्त्र नहीं है वरन प्रकृति का ही एक अंग है। प्रकृति के संग जीने में शरीर की सार्थकता है, प्रकृति विरुद्ध जीने में शरीर को बड़ा कष्ट हो जाता है। या तो प्रकृति मुक्त हो जायें जो कि बहुत कठिन और साधना का कार्य है, या प्रकृतिलय हो जायें और प्रकृति के संग शरीर को चलाना सीख लें। प्रकृतिलय होने के दो लाभ हैं, एक तो शरीर रोगमुक्त रहेगा और अनावश्यक घर्षण न होने से पूरी जीवन ऊर्जा प्राप्त होती रहेगी। 

आप चाहें न चाहें, शरीर प्रकृति के अनुसार स्वयं को ढालना चाहता है और निरन्तर उस दिशा में प्रयास करता भी रहता है। समस्या तब आने लगती है, जब हम जीवन में कृत्रिमता ले आते हैं, परिस्थितियों को अपने नियन्त्रण में मानकर जीने लगते हैं। प्रकृति एक बिन्दु तक तो कृत्रिमता सहती है, उसके बाद विकार रूप में असहनीय घर्षण व्यक्त कर देती है, वही रोग बन जाता है। हमारे लिये तब यह नितान्त आवश्यक हो जाता है कि हम प्रकृति के मूलभूत सिद्धान्तों को समझें और वही सिद्धान्त अपने शरीर के साथ भी अपनायें। आप उसे प्रकृतिलयता कह सकते हैं, प्रकृति का अनुशासन कह सकते हैं, आप उसे आयुर्वेद का आवश्यक अंग भी कह सकते हैं।

तीन सिद्धान्त हैं, संतुलन का सिद्धान्त, गति का सिद्धान्त और क्रम का सिद्धान्त। दर्शन की दृष्टि से ये तीनों सिद्धान्त उतने ही सिद्ध हैं जितने भौतिक दृष्टि से।

प्रकृति अपने संतुलन के लिये विख्यात है। तन्त्र जितना बड़ा होता जाता है, अपने अस्तित्व के लिये संतुलन पर निर्भर होता जाता है। संतुलन का प्रमाण प्रकृति में स्थित चक्रीयता से मिल जाता है। ऋतुयें विधिवत आती हैं, ग्रहों के बीच की दूरियाँ सधी हैं, दिन के बात रात की निश्चितता रहती है, एक मध्य स्थिति है जिसके इधर उधर प्रकृति जाती तो है, पर लौट कर अपनी संतुलित स्थिति में लौट आती है। धारण करने वाले सारे अवयव संतुलन के प्रतिमान होते हैं। बुद्ध का मध्यमार्ग विचारों और व्यवहारों के अभूतपूर्व संतुलन का दर्शन है। बुज़ुर्गों का संतुलित व्यवहार परिवारों को साधता है। संतुलन का दर्शन व्यापक है, यह प्रकृति का सिद्धान्त है और शरीर पर भी विधिवत लागू होता है।

यदि संतुलन की दृष्टि से एक पंक्ति में आयुर्वेदीय स्वास्थ्य की परिभाषा देनी हो, तो कफ, पित्त और वायु का संतुलन में रहना स्वास्थ्य है, उनका असंतुलित होना रोग का प्रारम्भ है। किसी भी रोग के लक्षण उठाकर देख लीजिये, कोई न कोई एक तत्व बढ़ जाता है। वह किस कारण बढ़ा, वह रोग का कारण है और वह किस तरह वापस अपनी संतुलित अवस्था में वापस आता है, यह रोग का निदान है। रोग संतुलन से कितना दूर निकल गया है, यह रोग की तीव्रता बताता है और तदानुसार उतनी पीड़ा भी देता है। आप किस स्थान पर रह रहे हैं, उसके अनुसार हर शरीर का अपना नैसर्गिक संतुलन होता है। हर ऋतु, दिन का समय, जीवन का समय, हर क्रिया और हर खाद्य का अपना अलग गुण होता है, जो इस संतुलन को प्रभावित करता रहता है। स्वस्थ रहने का सीधा से सिद्धान्त है, यथासंभव व यथाशीघ्र आप उस संतुलन को वापस ले आयें। यदि यह सिद्धान्त आपको समझ आ गया, तो पहले आप बीमार ही नहीं पड़ेंगे, और यदि दुर्भाग्य से बीमार पड़ भी गये तो शीघ्र ठीक हो जायेंगे।

प्रकृति का दूसरा महत्वपूर्ण सिद्धान्त है गति। गति संतुलन से भिन्न पक्ष है, पर प्रकृति में जो दृष्टिगत है, उस आधार में इन दोनों में स्पष्ट भेद करना कठिन है क्योंकि दोनों सदा ही एक दूसरे से गुँथे हुये दिखते हैं। कभी कभी आप कह सकते हैं कि गति है तभी संतुलन है, कभी कह सकते हैं कि संतुलन के कारण गति स्थिर है, दोनों एक दूसरे पर निर्भर हैं, पर दोनों भिन्न भी हैं। प्रकृति की हर क्रिया में समय लगता है, यही कारण है कि गति प्रकृति का एक मूलभूत सिद्धान्त है।

एक पौधा यदि तीन माह में परिपक्वता पाता है तो वह उतना ही समय लेगा। उसे बदलने का प्रयास विकार ले आयेगा। एक शिशु गर्भ से अपने समय के पहले निकल आये तो हर दृष्टि से सुकोमल होता है। प्रकृति की चक्रीयता उसकी गति और संतुलन से उपजी है और वही उसमें व्याप्त व्यवस्था और अनुशासन का आधार है। शरीर को अपना स्वास्थ्य गति के सिद्धान्त से मिलता है। आयुर्वेद की दृष्टि से स्वास्थ्य शरीर के अन्दर होने वाली प्रक्रियाओं की नियत गति से ही अच्छा रहता है, उन्हें छेड़ने के प्रयास असंतुलन लेकर आते हैं और रोग का कारण बनते हैं। यदि भोजन पचने की एक गति है तो शरीर को उसी के अनुसार भोजन देना होता है। यदि शरीर को विश्राम के लिये एक नियत समय आवश्यक है तो उसका भी सम्मान करना पड़ेगा। अचानक से कुछ भी बदलने से गति प्रभावित होती है, जिससे शरीर प्रभावित होता है। ऐसा भी नहीं है कि जीवन में सब कुछ स्थिर ही होता है और परिवर्तित नहीं किया जा सकता, पर उस परिवर्तन की भी अपनी नियत गति होती है, और हमें उसका सम्मान करना आवश्यक है।

प्रकृति का तीसरा महत्वपूर्ण सिद्धान्त क्रम का है। प्रकृति में विकास का हर पक्ष क्रमिक है। कारण और प्रभाव की एक क्रमिक व्यवस्था प्रकृति में व्यापकता से देखी जा सकती है। बीज से सीधे फल नहीं आते हैं, एक क्रम का पालन करते हैं पौधे। सागर से उड़ी वाष्प सीधे ही वर्षा बन नहीं बरस जाती है, पूरी क्रमिक प्रक्रिया का पालन करता है जल। जहाँ गति है, वहाँ क्रम होगा ही।

प्रकृति की तरह ही  आयुर्वेद शरीर में होने वाले परिवर्तनों में क्रम को बहुत महत्व देता है। किस वस्तु को किस रूप में लेना है, किस रूप में परिवर्तित करने के पश्चात लेना है, किसके बाद क्या लेना निषेध है, इन सबको गहनता से आयुर्वेद समझता और समझाता है। दाल को बनाने में प्रकृति ने जितना समय लगाया है, उसके पकने और पचने में भी उतना समय लेती है प्रकृति। जिस क्रम में तत्वों का संचयन हुआ है, उसी क्रम में उनका विघटन भी होता है। क्रम का यह सिद्धान्त बड़ी सूक्ष्मता से आयुर्वेद में पिरोया गया है और जैसे जैसे हम गहरे उतरते हैं, क्रम का सिद्धान्त स्पष्ट होता जाता है।

यदि इन तीन सिद्धान्तों को एक शब्द से परिभाषित किया जाये तो उसे अनुशासन कहा जा सकता है। बहुधा लोग एक अनुशासित जीवन जीने लगते हैं, उसमें प्रकृति के तीनों तत्व संतुष्ट बने रहते हैं, शरीर स्वस्थ बना रहता है। कहें तो प्रकृति के अनुशासन में रमे लोग प्रकृतिलय हो जाते हैं। हम अनुशासन के नियन्त्रण में यदि नहीं भी बंधें रहना चाहें तो भी इन तीन सिद्धान्तों को अलग अलग स्तर पर सम्मान अवश्य करते रहें। हम इन सिद्धान्तों का जितना सम्मान करेंगे, स्वयं को प्रकृति को उतने ही निकट पायेंगे, प्रकृति से शरीर का उतना ही कम घर्षण होगा, हम उतने ही स्वस्थ और ऊर्जान्वित रहेंगे।

विषय को समझने के पहले उसकी सैद्धान्तिक स्थापना आवश्यक होती है, ऐसा करने से समझ सरल और सहज हो जाती है। आयुर्वेद बड़ा ही सरल और व्यावहारिक है। जिन्होंने आयुर्वेद के ऊपर जटिलता का आवरण चढ़ा रखा है, उनसे निपटने में ये सिद्धान्त जानने बहुत आवश्यक हैं। आप अपना ८५ प्रतिशत स्वास्थ्य स्वयं ही साध सकते हैं और वह भी साधारण खानपान की वस्तुओं से। बस यह याद रहे कि जो खा रहे हैं और जब खा रहे हैं, उससे शरीर की संतुलन, गति और क्रम के सिद्धान्त कैसे प्रभावित हो रहे हैं।

अगली पोस्टों में आयुर्वेद के व्यावहारिक और आर्थिक पक्षों पर भी चर्चा की जायेगी।

15.2.14

प्रकृति चक्र

आयुर्वेद का परिचय लोग वैकल्पिक चिकित्सा पद्धति के रूप में कराते हैं। पर जितना मैं समझ सका हूँ, आयुर्वेद एक पूर्णकालिक जीवनशैली है जो भारतीय सांस्कृतिक व स्वास्थ्य परंपराओं में रची बसी है। आयुर्वेद से संबंधित केवल दो तथ्य समझ लिये जायें तो हम स्वयं ही ८५ प्रतिशत रोगों से अपने आप को दूर रख सकते हैं, शेष १५ प्रतिशत के लिये विशेषज्ञ का परामर्श लिया जा सकता है। समझने योग्य ये दो तथ्य हैं, अपने शरीर की प्रकृति और नियमित लिये जाने वाला भोजन। कहने का आशय है कि शरीर की प्रकृति के अनुसार समुचित भोजन बस करते रहने से रोग पास नहीं आ सकते हैं। असमय, अभोज्य और अव्यवस्थित ढंग से किये भोजन के कारण ही ८५ प्रतिशत तक रोग होते हैं।

माटी से तत्व सोखता बीज
आइये, अब शरीर को तनिक दार्शनिकता से देखा जाये। शरीर माटी का बना है, यह कोई अतिश्योक्ति नहीं। जितने भी तत्व शरीर में होते हैं, वे सारे के सारे तत्व माटी में भी मिल जाते हैं। यही कारण है कि शरीर माटी से ही पोषित होता है, उसी से ही जीवन पाता है और अन्ततः मृत्यु के पश्चात माटी में ही मिल जाता है। आश्चर्य नहीं करना चाहिये कि माटी हमारे लिये कितनी महत्वपूर्ण हैं। चोला माटी के रे।

यह तो दार्शनिक पक्ष हुआ, पर इसी तथ्य में हमारे जीवन का वैज्ञानिक आधार भी छिपा हुआ है। जब माटी के तत्व ही शरीर में आने हैं तो उसका माध्यम क्या हो? क्या कभी आश्चर्य नहीं होता कि कैसे इस विश्व में इतने खाद्य पदार्थ हैं, कैसे उन्हें खाकर हम जीवित रहते हैं? मुझे तो बचपन में बड़ा आश्चर्य होता था कि कैसे मनुष्य ने जीवित रहने के लिये खाद्य पदार्थ ढूँढ़े होंगे। कैसे अन्न, शाक, फल आदि नियत किये होंगे, कैसे अखाद्य को उनसे अलग किया होगा। कैसे मनुष्य, पशु, पक्षी आदि के लिये भिन्न व्यवस्थायें रची होंगी प्रकृति ने। इस व्यवस्था को भले ही कोई आश्चर्य के किसी भी स्तर में रखे, मेरे लिये यह समझना तब और स्वाभाविक हो जाता है जब मैं अन्न, शाक, फल आदि को माटी के उन तत्वों का वाहक मानता हूँ, जो मेरे और सबके शरीर में भी हैं। माटी के विशेष तत्व अन्न के दाने में से होते हुये मेरे शरीर में पहुँचते हैं और मुझे जीवित रखते हैं, देखा जाये तो बड़ा आश्चर्य भी है और समझा जाये तो प्रकृति का एक सहज कार्य भी है।

यही कारण है कि आयुर्वेद किसी भी वनस्पति को व्यर्थ नहीं मानती है। सबके अन्दर माटी के कोई विशेष गुण समाहित हैं, पर उन्हें किस रूप में लेना है, यह एक यक्ष प्रश्न है और आयुर्वेद का रहस्य भी। हमारे अनुभव व परम्परा से प्राप्त ज्ञान के कारण हम सैकड़ों खाद्य व अखाद्य को जानते हैं, ऐसी हजारों वनस्पतियाँ भी जानते हैं, जिनमें औषधीय गुण विद्यमान हैं। आयुर्वेद ने न जाने कितनी वनस्पतियों को उनके गुण दोष के अनुसार वर्गीकृत किया है, उनके औषधीय गुणों को उजागर किया है।

यदि अन्नादि को एक माध्यम भर समझें तो भोजन पकाना और पचाना एक वृहद प्रक्रिया के सहज अंग से दिखने लगते हैं, जिसमें माटी के तत्वों को शरीर में पहुँचाना होता है। भोजन पकाने और पचाने की इस प्रक्रिया में ही स्वास्थ्य के सारे सूत्र छिपे है, सारे रहस्य छिपे हैं। यदि इसको समझ लिया गया तो आयुर्वेद के सारे भेद समझ आ जाते हैं।

माटी से तत्वों को एकत्र करने का कार्य पौधे करते हैं। इन पौधों को कम्प्यूटर की भाषा में कहा जाये तो ये एक विशेष प्रकार के सॉफ़्टवेयर हैं जो माटी से एक विशेष प्रकार का तत्व निकालते हैं। आश्चर्य की बात देखिये कि यह सॉफ़्टवेयर अपना कार्य करने के पश्चात पुनः बीज में संकुचित हो जाता है और माटी में पहुँचने पर अपना पूर्वनियत कार्य प्रारम्भ करने लगता है। इस प्रक्रिया में दो और कारकों का योगदान रहता है, सूर्य का प्रकाश और वायु के तत्व। जिन्होंने वनस्पति शास्त्र पढ़ा है, वे ये जानते हैं कि इन दोनों कारकों के बिना पौधे का विकास संभव ही नहीं है। 

पौधे के विकास में  माटी के तत्वों का क्रमिक संकलन होता है तो पचाने की प्रक्रिया में उन तत्वों का क्रमिक विघटन। पचाने के पहले अन्नादि को पकाने की प्रक्रिया उसी विघटन में सहायक है। भले ही हमें लगे कि विकास की प्रक्रिया में यह सब हमने स्वतः ही खोज लिया, पर वाग्भट्ट को ध्यान से पढ़ेंगे तो खान पान जैसी सरल सी दिखने वाली बातों में ढेरों वैज्ञानिकता छिपी हुयी है। एक पूरा का पूरा चक्र होता है जिसके माध्यम से प्रकृति हमारा पोषण करती है, एक पूरा का पूरा सिद्धान्त है जिससे हम ऊर्जा आदि पाते हैं।

जितना रहस्यमयी अन्नादि का बनना है, उतना ही रहस्यमयी शरीर के अन्दर उनका विघटन भी है। हर तरह के तत्व तोड़ने के लिये एक विशेष प्रकार का एन्जाइम निकालता है शरीर का पाचनतन्त्र। पाचन की प्रक्रिया तो लार के साथ ही प्रारम्भ हो जाती है। तत्वों का पूर्ण पाचन ही पाचनतन्त्र का कार्य है। यह कार्य बिना थके, बिना रुके शरीर करता रहता है, जीवन पर्यन्त। माँसाहारी पशुओं के लिये भी माटी के जो तत्व आवश्यक होते हैं, उन्हें अन्य पशुओं से मिल जाते हैं। उनका भी चक्र अन्ततः पौधों पर ही आधारित होता है।

भोजन पचने के बाद जो शेष बचता है वह पुनः प्रकृति में मिल जाता है। जब तक शरीर जीवित रहता है, प्रकृति से पोषण पाता रहता है, अन्त में शरीर माटी में मिल जाता है। यह माटी न जाने कितने शरीरों को अपने में समेटे है, न जाने कितने शरीरों को रचने की क्षमता समेटे है। प्रकृति के इस चक्र में हम एक याचक के रूप में खड़े हैं, न जाने क्या सोचकर हम स्वयं को नियन्त्रक मान बैठते हैं। प्रकृति की यह विशालता जैसे जैसे समझ आती है, तेन त्यक्तेन भुन्जीथा का भाव मन में व्याप्त होने लगता है।

दार्शनिकता तो ठीक है, पर प्रकृति का यह चक्र रोग कैसे लाता है, जानेंगे प्रकृति के एक और सिद्धान्त के साथ।

12.2.14

वाग्भट्ट

जीवन जब रजत जयन्ती पर पहुँचता है, घरवालों को पुत्र पुत्रियों के विवाह की चिन्ता सताने लगती है। उन्हे भय रहता है कि कहीं ऐसा न हो कि वह अपना जीवन साथी स्वतः ही चुन लें। उनके चुनाव में घरवालों का नियन्त्रण रहे, न रहे। इसी प्रकार किसी भी व्यक्ति के लिये जब युवावस्था अपनी रजत जयन्ती मनाने लगती है, उसे अपने स्वास्थ्य की चिन्ता सताने लगती है। लगता है कि कहीं इसके बाद स्वास्थ्य नियन्त्रण में रहे, न रहे। व्यक्ति खानपान को लेकर तनिक संयमित हो जाता है, लोगों की बतायी हुयी स्वास्थ्य संबंधी सलाहों पर अनायास ही ध्यान देने लगता है।

ऐसा ही कुछ मन में चलने लगा है। जो भी बचपन से सीखा है, जो भी चिकित्सा विज्ञान की सामर्थ्य है, वे सभी ज्ञात है, पर फिर भी मन कुछ व्यवस्थित समझने को आतुर है। एक वैज्ञानिक जीवन शैली, जिसमें स्वास्थ्य को समग्रता से देखा जाये। कोई रोग हो तो लक्षणों के आधार पर चिकित्सा की जा सकती है। किन्तु प्रयास का स्तर रोगों को न आने देने का हो, तब अध्ययन गहरे उतरता है। बुजुर्गों का स्वास्थ्य बड़ा सुदृढ़ दिखा तो उनकी बतायी बातों में स्वतः ही रुचि आने लगी। शुद्ध खानपान और अधिक प्राकृतिक जीवनशैली निश्चय ही एक स्पष्ट कारण लगता था, पर उसके पीछे कोई वैज्ञानिक सोच रही होगी, इसका भान नहीं था। बचपन में बड़े लोग सलाह देते थे कि सुबह उठकर पानी पीना चाहिये, खाने के बाद पानी नहीं पीना चाहिये, रात्रि में दही नहीं खाना चाहिये आदि आदि। उस समय तक इन सलाहें को उनके अनुभव का निष्कर्ष मान स्वीकार करते रहे। लाभ होता रहा तो उसकी वैज्ञानिकता खंगालने की आवश्यकता ही नहीं पड़ी। 

रोग संबंधी अध्ययन तो फिर भी विश्लेषण के वैज्ञानिक मार्ग से होकर आते हैं, पत्र पत्रिकाओं में निकलने वाले स्वास्थ्य संबंधी अध्ययन अब बेमानी लगते हैं, किसी कम्पनी विशेष के स्वार्थ से प्रेरित लगते हैं, किसी कारण विशेष से प्रायोजित लगते हैं। यदि ऐसा न होता तो क्यों एक ही विषय के बारे में परस्पर विरोधाभासी अध्ययन प्रकाशित होते। इन अध्ययनों की गुणवत्ता कोई सत्यापित भी नहीं करता है, किन परिस्थितियों में, किस देश के लोगों पर वह अध्ययन हुआ, इसकी वैज्ञानिकता सदैव ही संदेह के घेरे में रही है। सिद्धान्त और सार्वभौमिकता के अभाव में फुटकर में प्रकाशित अध्ययन रद्दी में फुटकर के भाव ही बिकते रहे हैं।

आयुर्वेद अब भी जीवित है, समग्र जीवनशैली
यह तो अच्छा है कि सदियों के ठहराव और उपेक्षा के बाद भी आयुर्वेद के तन्तु हमारे समाज में आज भी विद्यमान हैं। आयुर्वेद का सबसे सुखद पक्ष यह है कि इसमें स्वास्थ्य को समग्रता से देखा और समझा जाता है। दिनचर्या, ऋतुचर्या, जीवनचर्या न केवल वाह्य प्रकृति के अनुसार संचालित होती है वरन आपकी आन्तरिक प्रकृति के अनुसार और भी विशिष्ट होती जाती है। रोग आने की प्रतीक्षा किये बिना यदि स्वास्थ्य पर ध्यान देना है तो आयुर्वेद के सिद्धान्तों को समझना पड़ेगा। यदि स्वयं पर इतना विश्वास है कि रोग आने पर निपटा जा सकता है और तब तक अनियन्त्रित और अव्यस्थित जीवनशैली निभायी जा सकती है, तो वे आयुर्वेद के सिद्धान्त समझने का मानसिक श्रम त्याग सकते हैं।

युवावस्था तो ऊर्जा से भरपूर होती है, शरीर में जो खाते हैं, पच जाता है, शरीर से जो चाहते हैं, निभ जाता है। युवावस्था की रजत जयन्ती आने के पहले संकेत मिलना प्रारम्भ हो जाते हैं, हम बहुधा उन्हें टाल जाते हैं। जिस तरह से भयावह रोगों ने युवावस्था में भी सेंध लगायी है, लगता है समग्र स्वास्थ्य को समझने के प्रयास हमें पर्याप्त पहले से प्रारम्भ कर देना चाहिये। संभवतः यही भाव मन में रहे होंगे जब कई बार अल्पकालिक बिगड़े स्वास्थ्य ने इस दिशा में सोचने को प्रेरित किया। विशेष बल सिद्धान्तों को समझने में दिया गया, भले ही वह धीरे धीरे समझ में आयें। निष्कर्षो से भी अधिक महत्वपूर्ण कारणों में उतरना था, एक बार कारण समझ आ जाते हैं, निष्कर्ष स्वतः सिद्ध हो जाते हैं।

एक भय और था और उसके लिये संभवतः हम लोगों की अंग्रेजी शिक्षा दोषी है। पहले लगा कि पता नहीं आयुर्वेद सामान्य भाषा में समझ आयेगा या नहीं। कहीं ऐसा तो नहीं कि अधकचरा ज्ञान पाकर, स्वयं और आयुर्वेद, दोनों से ही अविश्वास कर बैठें। अपनी संस्कृति से जुड़े विषयों को न पढ़ने वालों में दोनों तरह के लोग हैं। जिन्हें मैकालियत पर अधिक विश्वास रहा है, उनकी मानसिकता तो समझी जा सकती है, पर जो अपनी संस्कृति के सशक्त पक्षों पर आस्था रखते हैं, वे भी उसे एक बन्द धर्मग्रन्थ की तरह पूजा की अल्मारी में सजाये रहते हैं। संभवतः दूसरी श्रेणी में आने के कारण स्वयं पर आयुर्वेद न समझ पाने का भय लग रहा था। वह भय न केवल निर्मूल सिद्ध हुआ वरन स्वयं की संस्कृति से प्रगाढ़ता बढ़ा गया। संस्कृति के पक्ष इतने सरल और वैज्ञानिक हैं कि उनके पढ़ने के साथ ही उनसे संबंधित फैलायी भ्रांतियाँ अपने आकार खोने लगती हैं और लगने लगता है कि किन मूढ़ों के कहने पर इतने दिनों तक हम अपने ज्ञानकोष से छिटके छिटके फिरते रहे।

कई स्रोतों से किये ज्ञानार्जन में भले ही भिन्नता दिखती हो,  पर कालान्तर में वह ज्ञान एकल होने लगता है, वह एक रूप में पिघलने लगता है। हमारी प्रकृति ही ऐसी है कि हम एक सत्य को दो रूपों में नहीं पचा सकते, वह किसी न किसी रूप में एक हो जायेगा। जितना भी जटिल ज्ञान अर्जित किया हो, जितना भी विस्तृत अनुभव रहा हो, अन्ततः वह एक सहज रूप ले लेता है। यही सिद्धान्त स्वास्थ्य में भी लागू होता है। रोग के कारणों में उतरते ही, हम उन सिद्धान्तों को समझने लगते हैं जिनके पालन से रोग कभी विकसित ही न हो सकें। अन्ततः खानपान की प्रारम्भिक क्रिया पर ही स्वास्थ्य के आधार टिके पाये जाते हैं। प्रकृति जिन सिद्धान्तों का मान रखती है, वही सिद्धान्त हमारे स्वास्थ्य का आधार भी है। कारणों के स्रोत पर आगे बढ़ते हमें जो सूत्र मिलते हैं, वे प्रकृति की क्रियाशैली की ओर इंगित करते हैं। यदि प्रकृति के सिद्धान्त सूत्र हम जीवनशैली में अपना लें तो हम स्वास्थ्य के सुदृढ़ आधार पा सकेंगे।

प्रकृति और स्वास्थ्य के इस संबंध की गहराई और स्पष्ट तब हुयी जब आयुर्वेद के मौलिक सिद्धान्त पढ़े। चरक, सुश्रुत, निघंटु और वाग्भट्ट आयुर्वेद के चार स्तम्भ हैं। चरक के वृहद और पाण्डित्यपूर्ण कार्य को उनके शिष्य वाग्भट्ट ने प्रायोगिक आधार देकर स्थापित किया। वर्षों के अध्ययन के पश्चात जो निष्कर्ष आये, वही हमारी संस्कृति में प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से बस गये। कई पीढ़ियों को तो ज्ञात ही नहीं कि प्राचीन काल से पालन करते आ रहे कई नियमों का आधार वाग्भट्ट के सूत्र ही हैं। दिनचर्या, ऋतुचर्या, भोजनचर्या, त्रिदोष आदि के सिद्धान्त सरल नियमों के रूप में हमारे समाज में रच बस गये हैं। मैं पहले आश्चर्य करता था कि बचपन में सीखे स्वास्थ्य संबंधी सूत्र कहाँ से आये, क्या उनका कोई शास्त्रीय आधार है कि नहीं? जैसे जैसे वाग्भट्ट का कार्य पढ़ता गया, बचपन में सीखे गये सारे सूत्र एक के बाद एक दिखते गये। छोटी से छोटी सीख हो, कुछ निषेध हो, कुछ विशेष हो, सबका स्थान वाग्भट्ट के सूत्रों में मिल गया।

आयुर्वेद के बारे में जो कठिनता का आवरण चढ़ा हुआ है, वह धीरे धीरे हटता गया। आयुर्वेद का आधार स्वयं को, प्रकृति को और दोनों के परस्पर संबंधों को समझने से प्रारम्भ होता है। प्रकृति के सिद्धान्त न केवल दर्शन का विषय हैं, वरन स्वास्थ्य के प्राथमिक सूत्र भी हैं। हो भी क्यों न, शरीर भी तो प्रकृति का ही तो अंग है। भोजनचर्या, दिनचर्या और ऋतुचर्या आयुर्वेद की समग्रता और व्यापकता को स्थापित करते हैं। आप भी ध्यान दें, स्वास्थ्य संबंधी सलाहें जो हमें अपने बुज़ुर्गों से मिली है, उसका कोई न कोई संंपर्कसूत्र हमें वाग्भट्ट के कार्य में मिल जायेंगे।

आने वाली पोस्टों में आयुर्वेद के सिद्धान्तों में तनिक और गहरे उतरेंगे।

चित्र साभार - www.gayatripharma.com