29.5.13

मानसिक विलास

एक मित्र महोदय से कहा कि इस नगर में कोई ऐसा स्थान बतायें जहाँ चार पाँच घंटे शान्तिपूर्वक मिल सकें, पूर्ण निश्चिन्तता में। मित्र महोदय संशय से देखने लगते हैं, आँखों में एक विनोदपूर्ण मुस्कान छा जाती है उनके। इस नगर में एकान्त की खोज के अर्थ बहुत अच्छे नहीं माने जाते हैं, कई युगल बाग़ों, बगीचों, मॉलों और त्यक्त राहों में एकान्त की खोज करने में प्रयत्नशील दिख जाते हैं। भविष्य के रोमांचित और प्रेमपूर्ण स्वप्नों का सृजन भीड़भाड़ वाले स्थानों पर हो भी नहीं सकता है, उसके लिये एक दूसरे पर एकांगी ध्यान देना होता है, हावों भावों को पढ़ना पड़ता है, कुछ न कुछ बनाते हुये बताना पड़ता है।

उनका अर्थ समझ कर कुछ बता पाता, उसके पहले उन्होंने मेरे बारे में पूरी फ़िल्म तैयार कर डाली। जैसा हमारी फ़िल्मों में होता है कि सोच कर कुछ और जाओ, निकलता कुछ और है, वही उनके साथ भी हुआ। हमने कहा कि यह समय लिखने के लिये चाहिये, एक सप्ताह में चार पाँच घंटे ऐसे मिल जायें तो न केवल साहित्यिक प्रतिबद्धताएँ पूरी होती रहेंगी वरन भविष्य के मार्ग भी दिखने लगेंगे। एकान्त में चिन्तनशीलता गहरे निष्कर्ष लेकर आती है, विषय स्पष्ट हो जाते हैं। व्यवधान से न केवल समय का आभाव हो जाता है वरन लेखन का तारतम्य भी टूट जाता है।

अब मित्र महोदय के मुख पर चिन्ता की रेखायें थीं, उन्हें लगा कि क्या घर में लेखन को लेकर कोई विरोध है, लेखन में वांछित सहयोग मिल पा रहा है या नहीं? बताया कि लिखने से श्रीमतीजी कभी नहीं रोकती हैं, न कभी कोई कटाक्ष भी करती हैं, प्रार्थना करने से चाय आदि बना कर मेज़ पर ही दे जाती हैं। बच्चे भी लेखन निमग्न पिता को छोटी छोटी बात के लिये नहीं टोकते हैं, समस्या गम्भीर होने तक की प्रतीक्षा कर लेते हैं। पड़ोसी भी अच्छे हैं, कभी ऊँचे स्वर में संगीत आदि नहीं बजाते हैं। हाँ, घर से थोड़ी दूर पर एक व्यस्त नगरमार्ग अवश्य है, जिसमें वाहनों के चलने की ध्वनियाँ घर में घुस आती हैं, पर वे ध्वनियाँ भी पंखे आदि उपकरणों के पार्श्व में छिप जाती हैं।

तब क्या समस्या है श्रीमानजी, आप तो बड़े सौभाग्यशाली हैं। इतिहास साक्षी है कि लेखकों ने सारे विरोधों के होते हुये भी इतना उत्कृष्ट लेखन किया है, पारिवारिक और सामाजिक अपेक्षाएँ को निभाते हुये भी रत्न प्रस्तुत किये हैं। क्या कारण है कि आप लेखन को लेकर इतने सुविधाभोगी हुये जा रहे हैं? कल कहेंगे कि एकान्त भी आपकी लेखकीय क्षमता नहीं उभार पा रहा है, आपको पहाड़ चाहिये, नदी चाहिये, सागर चाहिये। बंगलोर में झील और बाग़ तो मिल जायेंगे, पहाड़, नदी, सागर आदि कहाँ से लायेंगे? लेखकीय एकान्त में कल्पनालोक की बातें तो बतिया लेंगे, पर जीवन के सच अपना आधार खोने लगेंगे वहाँ। व्यस्त समाज में रह कर स्वस्थ लेखन कीजिये। क्या साहित्यिक रोगी की तरह एकान्त में स्वास्थ्य लाभ करने जाना चाहते हैं?

कितने निर्मल भावों से एकान्त की अभिलाषा जतलाई थी, अपने लेखकीय उद्यम के लिये, पर न जाने हमारे ऊपर कितनी विकृतियों का दोषारोपण कर दिया गया। कहीं कोई ऐसी अनूठी बात तो हमने की नहीं, सारे गम्भीर लेखक विषय पर स्वयं को केन्द्रित करने में एकान्त का सहारा लेते हैं, प्रकृति के विस्तारित सौन्दर्य का सहारा लेते हैं। एक बड़े लेखक के बारे में कहीं पढ़ रहा था कि उनके सुबह के तीन चार घंटे विशुद्ध चिन्तन और लेखन में बीतते हैं, मन का ध्यान और घनीभूत हो, इसलिये वे तीरंदाज़ी का भी अभ्यास करते हैं। हमने भी अपने खेल सचिव को तीरंदाज़ी की किट लेने के लिये कहा है, आशा है उससे लेखकीय उद्यम तनिक और गुणवत्ता भरा हो जायेगा।

उत्तम विचार बड़ा मानमनौव्वल करवाते हैं, उन्हें एकांगी ध्यान देकर मनाना पड़ता है, भीड़ भाड़ देखकर तो वे आते ही नहीं हैं। उन्हें अवतरित होने के लिये उपयुक्त वातावरण चाहिये। यद्यपि स्रोत ज्ञात नहीं होता है विचारों का, पर यह अनुभव अवश्य है कि जब मन की स्थिति अच्छी होती है तो भावों को शब्द मिलने लगते हैं। प्राचीन काल में ऋषि मुनि भी प्रणायाम और ध्यान से सशक्त हुये मन में विचारों को आमन्त्रित करते थे और सूक्तों की रचना करते थे। उनके विचारों की उत्कृष्टता भले ही न हमें लब्ध हो पर एकान्त में बैठ कर विचारों के आवागमन को समझने का प्रयास तो कर ही सकते हैं।

सूत्रबीज कई स्थान से प्राप्त हो जाते हैं, सर्वाधिक उपयुक्त स्थान चर्चायें हैं, सुधीजनों के संग। बात कोई स्वरूप लिये प्रारम्भ नहीं होती है, किसी छोटी से बात से गहरे विचारों में उतर जाती है। उनमें से कुछ बीज सूत्र बन चिन्तन में बस जाते हैं और एकान्त पा धीरे से निकलते हैं, विस्तारित होते हैं, कई शाखायें, कई संबंध, कई निष्कर्ष और कई उद्घाटन, न जाने किन किन रूपों में वे सूत्रबीज बिखर जाते हैं। सूत्रबीज फिर भी नष्ट नहीं होते हैं, भविष्य के लिये सुरक्षित हो जाते हैं, आगामी सूत्रबीजों के साथ इन्द्रधनुष सा फैल जाते हैं, विचारों के विस्तृत वितानों में।

सूत्रबीज अनुभव से मिलते हैं, बच्चों के निर्मल व्यवहार से मिलते हैं, प्रकृति के विस्तार से मिलते हैं, और भी न जाने कितने स्रोत हैं उनके। उस समय हम बस ग्रहण करते हैं, कुछ भी अभिव्यक्त नहीं कर पाते हैं। उन सबको समाहित करने और संश्लेषित कर व्यक्त करने के लिये एकान्त चाहिये। विचारों को मथना पड़ता है, संभावनायें पाने तक थकना पड़ता है।

थोड़ी और बात करने पर मित्र महोदय ने बताया कि उनका पर्याप्त लेखन एक होटल की खुली छत पर हुआ है। सायं समय मिलने पर वहाँ चले जाते थे, अधिक लोग वहाँ नहीं आते थे, आसपास गमले में लगे पेड़ पौधे, शीतल मंद पवन, वाहनों का स्वर ६ तल नीचे छूटता हुआ और ऊपर खुला विस्तृत आकाश। एक पूरा वातावरण मिलता था वहाँ, एकान्त और प्रवाह प्रधान। एक चाय, वेटर भी आपको समय और स्वतन्त्रता देते हुये, तब दो घंटे के बाद सृजित साहित्य के सहस्र शब्द। मुझे कल्पना भर कर लेने से ही एक प्रतियोगितात्मक ईर्ष्या हो आयी, काश मुझे भी कोई ऐसा स्थान मिल गया होता। एक दो बार कॉफ़ी डे में ध्यानस्थ होने का निष्फल प्रयास कर चुका हूँ, युगलों की व्यस्तताओं और व्यग्रताओं ने हर बार ध्यान भंग कर दिया।

आप अपने मानसिक विलास के लिये कौन सा स्थान ढूंढ़ते हैं, अपने घर में क्या उतना फैल कर लेखन कर पाते हैं? यदि हाँ, तो ज्ञान की कुछ फुहारें हम पर भी बरसा दीजिये।

25.5.13

अच्छा लगता है, जब बच्चे सिखाते हैं

बच्चे, पता ही नहीं चलता है, कब बड़े हो जाते हैं? कल तक लगता था कि इन्हें अभी कितना कुछ सीखना है, साथ ही साथ हम यही सोच कर दुबले हुये जा रहे थे कि कैसे ये इतना ज्ञान समझ पायेंगे? अभी तक उनकी गतिविधियों को उत्सुकता में डूबा हुआ स्वस्थ मनोरंजन समझते रहे, सोचते रहे कि गंभीरता आने में समय लगेगा।

बच्चों की शिक्षा में हम सहयोगी होते हैं, बहुधा प्रश्न हमसे ही पूछे जाते हैं। उत्सुकता एक वाहक रहती है, हम सहायक बने रहते हैं उसे जीवन्त रखने में। जैसा हमने चीज़ों को समझा, वैसा हम समझाते भी जाते हैं। बस यही लगता है कि बच्चे आगे आगे बढ़ रहे हैं और हम उनकी सहायता कर रहे हैं।

यहाँ तक तो सब सहमत होंगे, सब यही करते भी होंगे। जो सीखा है, उसे अपने बच्चों को सिखा जाना, सबके लिये आवश्यक भी है और आनन्दमयी भी। यहाँ तक तो ठीक भी है, पर यदि आपको लगता है कि आप उनकी उत्सुकता के घेरे में नहीं हैं, तो पुनर्विचार कर लीजिये। यदि आपको लगता उनकी उत्सुकता आपको नहीं भेदती है तो आप पुनर्चिन्तन कर लीजिये।

प्रश्न करना तो ठीक है, पर आपके बच्चे आपके व्यवहार पर सार्थक टिप्पणी करने लगें तो समझ लीजिये कि घर का वातावरण अपने संक्रमण काल में पहुँच गया है। टिप्पणी का अधिकार बड़ों को ही रहता है, अनुभव से भी और आयु से भी। श्रीमतीजी की टिप्पणियों में एक व्यंग रहता है और एक आग्रह भी। बच्चों की टिप्पणी यदि आपको प्राप्त होने लगे तो समझ लीजिये कि वे समझदार भी हो गये और आप पर अधिकार भी समझने लगे। उनकी टिप्पणी में क्या रहता है, उदाहरण आप स्वयं देख लीजिये।

बिटिया कहती हैं कि आप पृथु भैया को को ठीक से डाँटते नहीं हैं। जब समझाना होता है, तब कुछ नहीं बोलते हो। जब डाँटना होता है, तब समझाने लगते हो। जब ढंग से डाँटना होता है, तब हल्के से डाँटते हो और जब पिटाई करनी होती है तो डाँटते हो। ऐसे करते रहेंगे तो वह और बिगड़ जायेगा। हे भगवान, दस साल की बिटिया और दादी अम्मा सा अवलोकन। क्या करें, कुछ नहीं बोल पाये, सोचने लगे कि सच ही तो बोल रही है बिटिया। अब उसे कैसे बतायें कि हम ऐसा क्यों करते हैं? अभी तो प्रश्न पर ही अचम्भित हैं, थोड़ी और बड़ी होगी तो समझाया जायेगा, विस्तार से। उसके अवलोकन और सलाह को सर हिला कर स्वीकार कर लेते हैं।

पृथु कहते हैं कि आप इतना लिखते क्यों हो, इतना समय ब्लॉगिंग में क्यों देते हो? आपको लगता नहीं कि आप समय व्यर्थ कर रहे हो, इससे आपको क्या मिलता है? थोड़ा और खेला कीजिये, नहीं तो बैठे बैठे मोटे हो जायेंगे। चेहरे पर मुस्कान भी आती है और मन में अभिमान भी। मुस्कान इसलिये कि इतना सपाट प्रश्न तो मैं स्वयं से भी कभी नहीं पूछ पाया और अभिमान इसलिये कि अधिकारपूर्ण अभिव्यक्ति का लक्ष्य आपका स्वास्थ्य ही है और वह आपका पुत्र बोल रहा है।

ऐसा कदापि नहीं है कि यह एक अवलोकन मात्र है। यदि उन्हे मेरी ब्लॉगिंग के ऊपर दस मिनट बोलने को कहा जाये तो वह उतने समय में सारे भेद खोल देंगे। पोस्ट छपने के एक दिन पहले तक यदि पोस्ट नहीं लिख पाया हूँ तो वह उन्हें पता चल जाता है। यदि अधिक व्यग्रता और व्यस्तता दिखती है तो कोई पुरानी कविता पोस्ट कर देने की सलाह भी दे देते हैं, पृथुजी। लगता है कि कहीं भविष्य में मेरे लेखन की विवेचना और समीक्षा न करने लगें श्रीमानजी।

आजकल हम पर ध्यान थोड़ा कम है, माताजी और पिताजी घर आये हैं, दोनों की उत्सुकता के घेरे में इस समय दादा दादी हैं। न केवल उनसे उनके बारे में जाना जा रहा है, वरन हमारे बचपन के भी कच्चे चिट्ठे उगलवाये जा रहे हैं। कौन अधिक खेलता था, कौन अधिक पढ़ता था, कौन किससे लड़ता था, आदि आदि। मुझे ज्ञात है कि इन दो पीढ़ियों का बतियाना किसी दिन मुझे भारी पड़ने वाला है। माताजी और पिताजी भले ही बचपन में मुझे डाँटने आदि से बचते रहे, पर मेरे व्यवहार रहस्य बच्चों को बता कर कुछ न कुछ भविष्य के लिये अवश्य ही छोड़े जा रहे हैं।

कई बच्चे अपने माता पिता को अपना आदर्श मानते हैं, उनकी तरह बनना चाहते हैं। पर जब उनके अन्दर यह भाव आ जाये कि उन्हे थोड़ा और सुधारा जा सकता है, थोड़ा और सिखाया जा सकता है तो वे अपने आदर्शों को परिवर्धित करने की स्थिति में पहुँच गये हैं। उनके अन्दर वह क्षमता व बोध आ गया है जो वातावरण को अपने अनुसार ढालने में सक्षम है। समय आ गया है कि उन्होंने अपनी राहों की प्रारम्भिक रूपरेखा रचने का कार्य भलीभाँति समझ लिया है।

पता नहीं कि हम कितना और सुधरेंगे या सँवरेंगे, पर जब बच्चे सिखाते हैं तब बहुत अच्छा लगता है।

22.5.13

स्वयं से भागते, हम लोग

कभी सोचा है कि व्यक्ति को सबसे अधिक भड़भड़ाहट कब होती है, सर्वाधिक मन कब ऊबता है, कौन सा समय वह शीघ्रातिशीघ्र बिता देना चाहता है? उत्तर अधिक कठिन नहीं होगा, यदि जीवन के भारी कष्टों को सूची से हटा दिया जाये तो सबसे अधिक कष्ट में व्यक्ति तब होता है जब वह एकान्त में होता है, शारीरिक रूप से, मानसिक रूप से।

कभी सोचा है कि व्यक्ति स्वयं से इतना क्यों भागता है? एकान्त काटने को दौड़ता है। कुछ तो कारण होगा कि हम स्वयं को ही नहीं झेल पाते हैं।

कहीं पढ़ भी रहा था कि जेल में यदि किसी व्यक्ति को कठिनतम दण्ड दिया जाता है तो उसे एकान्त में रख देते हैं, तनहाई कही जाती है वह। वह एकान्त ऐसा होता है जहाँ बन्दी का मानसिक संतुलन तक बिगड़ जाता है। क्या एकान्त में रहना हमारी प्रकृति के विरुद्ध है? व्यक्ति को स्वयं से भय क्यों?

ये सारे प्रश्न ऐसे हैं जो उठते तो हर एक के मन में हैं, पर उनका उत्तर पाना उतना ही कष्टकर होता है जितना एकान्त में समय बिताना। कोई इसे मन का खेल मानता है, कोई सामाजिकता को दोष देता है, कोई इस पर कुछ कहना ही नहीं चाहता है। एकान्त सदा ही दोषपूर्ण माना जाता है, जो लोग किसी और से घुलते मिलते नहीं, उन्हें संशय और विस्मय की दृष्टि से देखा जाता है, विचित्र प्राणी की तरह।

माना कि एकान्त भयावह है, माना कि एकान्त असामाजिक है, पर अपने से पूर्णतया विमुख हो जाता कहाँ से आ गया हमारे अन्दर? अपने से भागने का गुण कहाँ से आ गया हमारे अन्दर? आश्रयों के हटते ही भरभरा कर ढहने लगता है हमारा जीवन। माना कि सहजीवन ही हमारी राह है, पर स्वयं को समझने और समझाने से क्यों विमुख हो जाते हैं हम? एकान्त को भयानक मानने वाली यह मानसिकता इतने गहरे धँसी है हम सबके अन्दर कि हम स्वयं से ही भागने लगे हैं।

यही प्रश्न संस्कृतियों के बीच की दीवार भी है, यही प्रश्न संस्कृतियों के बीच की सुलझन का प्रारम्भ भी है। पूर्व की संस्कृति में यह प्रश्न सदा से ही पूछा जाता रहा है, पश्चिम में यह प्रश्न सदा ही प्यासा रहा है। हमारा जीवनक्रम स्वयं को समझने से प्रारम्भ होता है और सहजीवन तक जाता है, पाश्चात्य सहजीवन को प्रमुखता से रख इस प्रश्न पर ठंडी राख उड़ेल देता है। जीवन दोनों संस्कृतियों में पल रहे हैं, एक पद्धति में अन्त तक स्पष्ट दिशा दिखती है, दूसरी पद्धति पगडंडियों के समाप्त होते ही भ्रमित हो जाती है। मैं जितना एकान्त में डूबता हूँ, उतना ही प्राच्य हो जाता हूँ, जितना सबके संग जीने लगता हूँ उतना ही पाश्चात्य का रंग धारण कर लेता हूँ। मैं बहुधा मुहाने पर खड़ा रहता हूँ, इस प्रश्न के कुछ इस पार, इस प्रश्न से कुछ उस पार।

स्वयं को जानना है तो स्वयं से जूझना भी पड़ेगा। कोई इसे भले ही अध्यात्म मान कर बुढ़ापे के लिये छोड़ दे, पर यह प्रश्न मुँह बाये एक न एक दिन खड़ा अवश्य हो जायेगा। कह देने भर से कि इन सबके बिना भी काम चल जायेगा, ये प्रश्न टलने वाले नहीं, उत्तर तो पाना ही पड़ेगा।

एक दूसरे को देखकर तो सब ही जीवन पार कर लेते हैं, पर क्या दूसरे का जीवन ही हमारा भी मानक हो जाये? क्या वे पद्धतियाँ जो किसी एक के लिये सुन्दर ढंग से चलती हैं, क्या दूसरे के ऊपर भी उतना ही प्रभावी हो सकती हैं? ऐसा नहीं है कि सारे लोग भेड़चाल में ही चलते हैं, कुछ अपनी राह स्थापित करते हैं, अपने मानक स्वयं स्थापित करते हैं। भौतिक सफलतायें अपना स्थान बनाती हैं, विकास होता रहता है, पर स्वयं को समझने का प्रश्न कार्य और उद्देश्यों की भीड़ में खोया ही सा रहता है।

अपने हृदय पर हाथ रखिये और पूछिये कि स्वयं से पहली बार वार्तालाप कब किया था, तब पता चलेगा कि तीन या चार दशक तो इस प्रश्न को पहली बार आने में ही निकल जाते हैं। जब तक प्रश्नोत्तरी तनिक रोचक होती है, आधा जीवन बीता हुआ सा लगता है। लगता है कि हम सदा ही स्वयं से भागते रहे, स्वयं का सामना करने से कतराते रहे।

एक परम स्नेही मित्र ने दर्शननिमग्न वार्तालाप के बीच एक दिन बड़े ही दुर्लभ वाक्य कहे, उनका कहना था कि जीवन में यदि किसी एक चीज को जानना आवश्यक है, तो वह स्वयं को। स्वयं को जानने के लिये मन को जानना आवश्यक है, आत्म मन से ही व्यक्त होता है।

बात सच भी है, हम सुख को ढूढ़ते रहते हैं। कहते हैं जो मन के अनुकूल है, वही सुख है। यदि हम मन को नहीं समझ पाये तब सुख को क्या समझ पायेंगे? बिना मन को जाने सुख की परिभाषायें बनाते रहते हैं, उस पर प्रयोग करते रहते हैं। मन को नयापन चाहिये तो उसे नयापन ला लाकर देते रहते हैं, पर बात तो मन के माध्यम से स्वयं को समझने की थी।

जो भी कारण हो, जो भी निदान हो, हम स्वयं से भागे लोग हैं, सदा ही बाहर अपना ठिकाना ढूढ़ते रहते हैं, व्यग्र हो। स्वयं में स्थिर होना सीख लें, तो जहाँ ठहर जायें, गाँव वहीं बन जाये हमारा, जहाँ रम जायें, वहीं राम हो जायें। यदि कहीं टिकना सीखना हो मुझे, तो स्वयं में ही, वर्तमान में ही, तात्कालिक परिवेश में ही।

18.5.13

नदी का सागर से मिलन

सागर से मिलने भागी आती नदी
पहली बार देख रहा था, एक नदी का सागर से मिलना। स्थान कारवार, नदी काली और अरब सागर। दोपहर के समय ऊपर से पड़ने वाली सूरज की किरणें पसरी नीली परत पर चाँदी की रेखा सी झिलमिला रही थीं। पीछे जंगल, बगल में रेत, हवा में एक मध्यम ठंडक और सामने दिख रहा था नदी और सागर का मिलन। मैं लगभग वहीं खड़ा था जहाँ से कभी कविवर रवीन्द्रनाथ टैगोर ने खड़े होकर सागर और नदी का मिलन देखा था। अन्तर बस इतना था कि उन्होंने काली नदी में प्रवाह के साथ कई किलोमीटर यात्रा करने के पश्चात यह दृश्य देखा था, जबकि मुझे यह दृश्य सहसा ही देखने को मिल रहा था।

काली नदी अपने उद्गम से बस १८४ किमी बाद ही समुद्र में मिल जाती है, यह संभवतः एक ही ऐसी नदी होगी जो पूरी की पूरी एक ही जिले, उत्तर कन्नड में बहती है। पश्चिमी घाट से सागर की इतनी कम दूरी ने न जाने कितने सुन्दर और ऊँचे प्रपातों को जन्म दिया है, छोटी छोटी नदियों के जाल से बुना हुआ कोकण क्षेत्र अपने आप में एक अनूठा दृश्य रचता है, पहाड़, जंगल, प्रपात, नदियाँ, सागर, सब एक दूसरे पर अधारित और आरोपित। लगभग चार लाख लोगों की जीवन रेखा यह नदी, सागर तक आते आते निश्चिन्त हो जाती है, अपना संक्षिप्त पर सम्पूर्ण कर्म करने के पश्चात।

नदी सागर में गिरती, दायीं ओर है स्तर में असमानता
आज खड़ा मैं उसी नदी का अन्तिम बिन्दु निहार रहा था। देख रहा था कि कहीं कोई भौतिक रेखा है जिसके एक ओर को समुद्र कहा जा सके और दूसरी ओर को नदी। सहसा एक सहयात्री ने इंगित किया, थोड़ी दूरी पर स्पष्ट दिख रहा था, सागर का स्तर नीचे था, उस समय भाटा था। नदी का पानी उस स्थान पर सहसा गिरता हुआ सा दिख रहा था, बहुत सुन्दर दृश्य था। नदी की दिशा में देखा, छोटी छोटी लहरें भागी चली आ रही हैं, अपने सागर से मिलने, अपना जलचक्र पूरा करने।

रात के समय चाँद पृथ्वी के निकट होता है। अब अपना आकर्षण किस तरह व्यक्त करे? पृथ्वी को अपनी ओर खींचना चाहता है, पृथ्वी ठहरी भारी, न वह हिलती है और न ही हिलते हैं उसके पहाड़। ले दे कर एक ही तरल व्यक्तित्व है सागर का, जिस पर चाँद का जोर चल पाता है, उसे ही अपनी ओर खींच लेता है चाँद, उस स्थिति को ज्वार कहते हैं। तब सागर का जल स्तर नदी से ऊपर हो जाता है। नदी ठहर सी जाती है, उसे कुछ सूझता नहीं है, उसे दिशाभ्रम हो जाता है कि जाना किधर है। आगे बढ़ते बढ़ते सहसा उसकी गति स्थिर हो जाती है, वह वापस लौटने लगती है। और जब दोपहर में चाँद पृश्वी से दूर हो जाता है, सागर पुनः नीचे चला जाता है, नदी के स्तर से कहीं नीचे, तब नदी का जल सरपट दौड़ लगाता है।

जल का यह आड़ोलन, कभी सागर से नदी की ओर तो कभी नदी से सागर की ओर, उस सीमा को कभी एक स्थान पर स्थिर ही नहीं देता, जिसे हम नदी और सागर का मिलना कहते हैं। कैसे ढूढ़ पायेंगे आप कोई एक बिन्दु, कैसे निर्धारित कर पायेगें उन दो व्यक्तित्वों की सीमायें, जिन्हें चाँद एक दूसरे में डोलने को विवश कर देता हो। चाँद मन की गति का प्रतीक माना जाता है, सागर खारा है, नदी मीठी है, यह मिलन संबंधों को इंगित करता है। यह आड़ोलन उन अठखेलियों को भी समझने में सहायक है जो संबंधों के बीच आती जाती रहती हैं। सागर स्थिर है, नदी गतिशील है, पर वे चाहकर भी अपनी प्रकृति बचाकर नहीं रख पाते। रात को चाँद निकलता है और सागर गतिशील हो जाता है अपनी सीमायें तोड़ने लगता है, नदी सहम सी जाती है, ठिठक जाती है। सागर का खारापन मीलों अन्दर चला जाता है, लगता है कि कहीं सागर स्रोत को भी न खारा कर बैठे। एक स्थान पर, जहाँ सागर की उग्रता और नदी का प्रवाह समान हो जाता है, खारापन वहीं रुक जाता है, वहीं साम्य आ जाता है।

दिन धीरे धीरे बढ़ता है, नदी उसी साम्य को खींचते खींचते वापस सागर तट तक ले आती है और साथ ही ले आती है वह खारापन जिसे रात में सागर उसे सौंप गया था। साथ में सौंप जाती है जल के उस भाव को जो रात भर ठहरा रहा, सहमा सा। यह क्रम चलता रहता है, हर दिन, हर रात। नदी सागर हो जाती है और पुनः नदी के अतिक्रमण में लग जाती है। सागर को वर्ष भर लगता है, वाष्पित होकर बरसने में, पहाड़ों के बीच अपना स्थान ढूढ़ने में, छोटी धार से हो नदी बनने में और पुनः सागर में मिल जाने में।

नदी और सागर के रूप में प्रकृति की ये अठखेलियाँ हमें भले ही खेल सी लगती हों पर इनमें ही प्रकृति का मन्तव्य छिपा हुआ है। सागर और नदी को लगता है कि हम दोनों का संबंध नियत है, एक को जाकर दूसरे में मिल जाना है। उन्हें लगता है कि वे दो अकेले हैं जगत में। उन्हें लगता है कि उनके बीच एक साम्य है, संतुलन है, जो स्थिर है एक स्थान पर। उन्हें लगता है कि सागर और नदी का जो संबंध होना चाहिये, उसमें किसी और को क्या आपत्ति हो सकती है। नदी और सागर पर यह भूल जाते हैं कि प्रकृति कहाँ स्थितियों को स्थिर रहने देती हैं, उसने दोनों का जीवन उथल पुथलमय बनाये रखने के लिये चाँद बनाया, हर दिन उसके कारण ही ऐसा लगता है कि नदी और सागर एक दूसरे की सीमाओं का अतिक्रमण कर रहे हैं। यही नहीं, प्रकृति ने सूरज भी बनाया, केवल इसलिये कि सागर अपने मद में, खारेपन में मत्त न बना रहे, वाष्पित होकर बरसे, नदी बने।

प्रकृति के सिखाने के ढंग बड़े सरल हैं, समझना हम लोगों को ही है कि हम कितना समझ पाते हैं। प्रकृति हमें स्थिर न रहने देगी, कितना भी चाह लें हम, चाँद से संचालित मन कोई न कोई उथल पुथल मचाता ही रहेगा। यह भी सच है कि प्रकृति हमें अपनी सीमायें अतिक्रमण भी न करने देगी, कितने भी भाग्यशाली या शक्तिशाली अनुभव करें हम। आदेश कहने वाला कभी आदेश सहने की स्थिति में भी आयेगा, प्रकृति के पास पाँसा पलटने के सारे गुर हैं। सागर से धरती का मिलन होता है तो रेत के किनारे निर्मित हो जाते हैं, सारे पाथर चकनाचूर हो जाते हैं। सागर का अपनी सहधर्मी नदी से मिलन होता है तो सीमाओं का खेल चलता रहता है। सागर का आकाश से मिलन होता है तो अनन्त निर्मित हो जाता है।

प्रकृति को किसी भौतिक नियम से संचालित मानने वाले प्रकृति की विशालता को न समझ पाते हैं और न ही उसे स्वीकार कर पाते हैं। प्रकृति में सौन्दर्य है, गति है, अनुशासन है और क्रोध भी। हम तो हर रूप में जाकर हर बार खो जाते हैं। देखते देखते सागर और धरती का मिलन सागर की ओर आगे बढ़ जाता है। दोनों अपनी अठखेलियों में मगन हैं, प्रकृति भी दूर खड़ी मुस्करा रही है। हम सब यह देख कभी विस्मित होते हैं, कभी प्रसन्नचित्त। बस नदी की तरह प्रकृति में झूम जाने का मन करता है, आनन्दमय प्रकृति में।

15.5.13

दुआ सबकी मिल गयी, अच्छा हुआ

एक माह पहले जन्मदिन पर ढेरों बधाइयाँ आयी थीं, मन सुख से प्लावित हो गया था। आँखें बन्द की तो बस यही शब्द बह चले। यद्यपि फेसबुक पर इसे डाल चुका था, पर बिना ब्लॉग में स्थान पाये, बिना सुधीजनों का स्नेह पाये, रचना अपनी पूर्णता नहीं पा पाती है।

दुआ सबकी मिल गयी, अच्छा हुआ,
चिहुँकता हर बार मन, बच्चा हुआ,
कुछ सफेदी उम्र तो ले आयी है,
हाल फिर भी जो हुआ, सच्चा हुआ।

दिन वही है, बस बरसता प्यार है,
इन्द्रधनुषी सा लगे संसार है,
मूक बहता, छद्म, दुविधा से परे,
उमड़ता है, नेह का व्यापार है।

लाज आती, कोई आँखों पर धरे,
शब्द मधुरिम कर्णछिद्रों में ढरे,
कुटिल मन की गाँठ, दुखती क्षुद्रता, 
कोई तत्पर, विहँस बाँहों में भरे। 

नित्य निद्रा में अकेला, किन्तु अब,
स्वप्न में भी संग चले आयेंगे सब,
आज होगा एक जलसा देखना,
छन्द छलकें, हृदय मिल जायेंगे जब।

मैॆ रखूँगा साथ, इस विश्वास को,
प्रेमपोषित इस अनूठी प्यास को,
कल सबेरा पूर्णतः उन्नत खिले,
साध लूँगा प्रकृति की हर साँस को।


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11.5.13

ब्लॉग व्यवस्था, तृप्त अवस्था

गूगल रीडर में बढ़ते बढ़ते ब्लॉगों की संख्या ६५० के पार पहुँच गयी। तकनीक और न्यूनतम जीवन शैली विषयक लगभग ५० ब्लॉग निकाल दें, तब भी हिन्दी से जुड़े लगभग ६०० ब्लॉगों की बड़ी सूची का होना यदि कुछ इंगित करता है, तो वह अन्तर जिसे हर दिन पूरा करने के लिये कुछ न कुछ नया पढ़ते रहना आवश्यक हो जाता है। पढ़ने वाले ब्लॉगों की संख्या चाह कर भी कम नहीं कर पा रहा हूँ, यह भी इंगित करता है कि अच्छे बुरे ब्लॉगों में अन्तर की समझ भी विकसित होना शेष है, मेरे साहित्यिक पथ में। पिछले ४ वर्षों में जो भी रोचक लगता गया, सूची में स्थान पाता गया। कई और श्रेष्ठ ब्लॉगों को सूची में होना था, पर दुर्भाग्य ही कहा जायेगा मेरा कि उनसे परिचय न हो सका अब तक। संचित और अपेक्षित के बीच का अन्तर इस क्रम में तीसरा है, जो इतने ब्लॉग होने के बाद भी सूची को अपूर्ण ही रखे हुये है।

लेखन, सतत, अथक
कई नवागंतुक बहुत अच्छा लिखते हैं। कई उदाहरण देखे हैं जिसमें प्रारम्भिक किरणों की झिलमिलाहट एक आशा के सूर्य का आभास देती है। उनको पढ़ना इसलिये अच्छा लगता है कि उनके लेखन की चमक में कभी अपना अँधेरा भी दिख जाता है। उनका लेखन पथ निश्चय ही हिन्दी साहित्य का राजमार्ग बनने की क्षमता रखता है और बनेगा भी, पर यदि थकान, निराशा और उपेक्षा उन्हें उनके पथ से डिगने न दे। उनके लेखन पर उत्साह के दो शब्द कहने वाला सदा कोई न कोई रहे अवश्य, विशेषकर तब, जब रात हो, एकान्त हो और विचारों का अँधेरा घुप्प हो। इसके अतिरिक्त बहुत से ऐसे लेखक और कवि हैं, जिन्हें परिचय के चौराहे मिले ही नहीं, जिन्हें कोई स्थापित ठिकाना दिखा नहीं। उन्होंने लिखा, पर समुचित मान न पाकर उनका उत्साह हिन्दी साहित्य में स्थिर न रह पाया और उन्होने अपनी ऊर्जा के लिये कोई और अभिरुचि खोज ली। अपनी आलोचनात्मक तीक्ष्णता के बाद भी हमारी उन तक न पहुँच पाने की असमर्थता एक और अन्तर प्रस्थापित कर देती है, जिसके उस पार हमारा उत्थान सुनिश्चित है।

किसी मित्र को अंग्रेजी में लिखते हुये पाता हूँ तो उन्हें हिन्दी में लिखने का आग्रह करने से नहीं चूकता हूँ। लगता है कि यही विचार, यही चिन्तनशीलता यदि हिन्दी को अपना माध्यम बना लेगी ,तो मेरे जैसे न जाने कितने हिन्दीभाषी जो अच्छे लेखन की राह तकते हैं, तृप्त हो जायेंगे। उन्हें भी लगता होगा कि हिन्दी का विस्तार क्षेत्र उतना वृहद नहीं, आर्थिक संभावनायें उतनी सुदृढ़ नहीं, जो उत्साह बनाये रखने में समर्थ हों, क्षमतायें दोहित करने में समर्थ हों। उल्टा जब मुझे वे लोग अंग्रेजी में लिखने को प्रेरित करते हैं तो बस मुस्करा कर रह जाता हूँ। दासता की खनक और ममता का आग्रह, यह अन्तर उन्हें समझा पाने में लगने वाले प्रयास को एक मुस्कराहट से ही व्यक्त कर देता हूँ।

निश्चय ही अभी जो स्थिति है उसमें जितने लोग इण्टरनेट पर पढ़ते हैं, उसमें अंग्रेजी जानने वालों की संख्या बहुत अधिक है। यही कारण हो सकता है कि अंग्रेजी में लिखना अधिक आकर्षक लगे, अधिक प्रभावित करे। जिस गति से इण्टरनेट का विस्तार हो रहा है, आने वाले दिनों में हिन्दी पाठकों की इतनी संख्या तैयार हो जायेगी कि लेखकों को पर्याप्त रूप से पढ़े जाने का बोध होने लगेगा। हर एक नये लेखक के रूप में एक नया पाठक मिल रहा है ब्लॉग जगत को, अतः नये लेखकों का स्वागत उन्मुक्त रूप से किया जाना चाहिये।

गूगल रीडर बन्द होने की सूचना के बाद से ही मन में भय बैठ गया है कि एक अच्छे मेले के आभाव में लेखकों और पाठकों का संपर्क और कम हो जायेगा। १ जुलाई के बाद क्या सारी फीड वैसे ही सुरक्षित रह पायेगी जैसी अभी तक है। कई अन्य सेवाप्रदाताओं ने यह आश्वासन तो दिया है कि सब कुछ पहले जैसा ही रहेगा, पर तकनीक से अपरिचित न जाने कितने लेखक और पाठक अपना संपर्क खो देंगे, यह भय अभी भी है। मन में विचार आया कि कम से कम उन श्रेष्ठ ब्लॉगों को चिन्हित तो कर लूँ जिन्हें नियमित पढ़ते रहना हुआ है और यदि आवश्यकता पड़ी तो उन्हें पुनः एक एक करके अपनी नयी सूची में डाल लूँगा। इस कार्य को करने में तीन चार दिन अवश्य लग गये पर उस अनुभव में जो तथ्य सामने आये, उन्होंने मुझे एक पाठक के रूप में अन्दर तक हिला कर रख दिया है।

६०० की सूची में लगभग १२५ ब्लॉग ऐसे मिले जिसमें पिछले एक वर्ष से कुछ भी नहीं लिखा गया है। उनमें लगभग २५ ऐसे थे जो नये डोमेन में चले गये और लेखन की सततता बनाये हुये हैं। १०० ब्लॉग या कहें कि लगभग २० प्रतिशत ब्लॉग ऐसे थे जो निष्क्रिय हो चले। उनमें कई नाम ऐसे थे जो यदि बने रहते तो निश्चय ही साहित्य को लाभान्वित करते। उन्होने क्यों लिखना बन्द किया, उसके क्या विस्तृत कारण थे, इसके मूल में जाना कई चर्चाओं को जन्म दे देगा, पर यह तथ्य गहरे भेदता है कि ३ वर्ष में यदि स्थापित २० प्रतिशत ब्लॉग निष्क्रिय हो जायेंगे तो इस क्षेत्र में स्थापित लेखन का क्षरण लगभग ७ प्रतिशत प्रतिवर्ष हो जायेगा। मैं उन ब्लॉगों की बात ही नहीं कर रहा हूँ जो प्रारम्भिक वर्ष में ही अस्त हो जाते हैं, उनका प्रतिशत तो कहीं अधिक होगा। संभव है कि आधे से अधिक लोग प्रथम वर्ष में ही ब्लॉग छोड़कर चल देते हों।

फिर भी पिछले दो माह में न जाने कितने ब्लॉगों को उनके तीन-चार वर्ष पूरे होने की बधाई दे चुका हूँ, वे सारे ब्लॉग के प्रकाशित स्तम्भ हैं। जो उससे भी अधिक समय से लिख रहे हैं और अब तक नीरसता और एंकातता को प्राप्त नहीं हुये हैं, उनके हाथ में ही साहित्य का भविष्य सुरक्षित है, वही लोग हैं जो ब्लॉग को साहित्य से जोड़ देंगे। तब संभवतः साहित्यकार का बनना ब्लॉग जैसे व्यापक और सूक्ष्म स्तर से भी हो सकेगा। जहाँ इतने प्रवाह किसी धारा के लिये सुरक्षित रहेंगे, वह प्रवाहमयी धार दर्शनीय होगी।

इस प्रवाहमयी तन्त्र में जो ब्लॉग अपने आप को बचाये रहना चाहते हैं, उन्हें धैर्यपूर्वक लिखते रहना पड़ेगा, पहले तीन वर्ष, फिर पाँच वर्ष, फिर न जाने कितना और। हर सप्ताह दो पोस्ट, यदि दो संभव न हो तो कम से कम एक तो निश्चय ही। तब सूची से जो १२५ ब्लॉग अपना लेखन खो चुके हैं, वैसा पुनः नहीं होगा। संभव है कि तीन वर्षों बाद जब मैं पुनः समीक्षा करने बैठूँ तो सभी अच्छे ब्लॉग नियमित मिलें।

मुझे न जाने कितने अन्तर पाटने हैं, पर यदि अन्तर पाटने के पहले से दूसरा किनारा साथ छोड़कर चला जायेगा तो वह अन्तर कभी नहीं पट पायेगा, प्यास बढ़ती ही जायेगी। नये लेखक एक ओर से किनारा भरेंगे, पुराने लेखक दूसरे छोर को स्थापित रखेंगे, उसके बाद जो समतल तैयार होगा, उसमें सबके लिये स्थान होगा। मैं सारे निष्क्रिय ब्लॉगों को एक फोल्डर में एकत्र करके रख रहा हूँ, आशा है कि उसमें से कुछ दिनों के बाद नयी पोस्टें आनी प्रारम्भ हो जायेगीं। इन १२५ ब्लॉगों की कमी नये लेखक पूरी करेंगे अतः आने वाले दिनों में कई ब्लॉग संकलकों को मथ कर पढ़ने का प्रयास करूँगा।

पता नहीं यह क्रम कब तक चलेगा? ब्लॉग से मन भरने का प्रश्न ही नहीं, यह एक तृप्त व्यवस्था है, बस चलते रहें प्रवाह के साथ, जहाँ तक संभव हो सके।

8.5.13

लहरें

तकते हैं,
लहरें आती और जाती हैं।

लखते हैं,
कुछ लाती, कुछ ले जाती हैं।

छकते हैं,
इठलाती, हमें खिलाती हैं।

इनके जैसे ही सतत रहें,
हर पल उद्भव का राग यहाँ,
नत हो जाना, फिर फिर आना,
आरोहण का अनुनाद यहाँ।

हो मत्त, व्यग्र, चंचल, चपला,
दौड़ी आती विरही कल कल,
जड़ रूप मूक सागर तट पर,
आलिंगन का आग्रह निश्छल।

यह प्रेम नहीं, मद आकुल है,
जीवट मन है, कब से ठहरा,
यह विष फेनों का नर्तन भी,
आक्रोश व्यक्त होता गहरा।

एक द्वन्द्व मूर्त, स्तब्ध विश्व,
आकाश चेत, सो जाता है,
सागर धरती नित लीलामय,
इतिहास रेत हो जाता है।

इनकी गतियों सा बने रहें,
यदि शेष समय जो मिला क्षणिक,
संग जीवन हम भी बह जायें,
जब समय शेष न रहे तनिक।


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4.5.13

अनमोल जीवन

विश्व वंचित कर रहा है,
है सकल संवाद स्थिर,
दृष्टि में दिखती उपेक्षा,
भाव तम एकांत में घिर।

मान लो संकेत है यह,
कर्म एकल, श्वेत है यह,
आत्म की राहें प्रतीक्षित,
रत्नपूरित खेत है यह।

एक क्षण भी नहीं रोना,
हृदय की ऊर्जा पिरोना,
मिल गया अवसर अनूठा,
एक क्षण भी नहीं खोना।

आत्म है अनमोल जीवन,
उस विरह को खोल जीवन,
देख ले क्या क्या छिपा है,
जान ले क्या मोल जीवन।

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1.5.13

कृपया, घंटी बजायें

रविवार को जब भी कोई कार्यक्रम होता है, लगता है कोई आपकी निजता पर हस्तक्षेप कर रहा है। इंडीब्लॉगर उत्साही ब्लॉगरों की एक संस्था है जो ब्लॉगिंग को न केवल विचारों को परिष्कृत करने का साधन मानती है, वरन उसे सामाजिक कार्यों को प्रचारित प्रसारित करने का सशक्त माध्यम भी बनाना चाहती है। इसी श्रंखला में जब उनका एक निमन्त्रण आया तो मैं मना नहीं कर पाया। कार्यक्रम दोपहर में था, घर के पास था, सोचा थोड़ा टहलना भी हो जायेगा और साथ साथ ज्ञानवर्धन भी।

अपराध में व्यवधान, संभव है समाधान
यह कार्यक्रम नारी के प्रति बढ़ते अपराधों से समाज को बचाने के उपायों पर चर्चा के लिये हो रहा था। घंटी बजाने का आशय मुझे पहले स्पष्ट नहीं हो पाया था, लगा कि अलख जगाने के भावार्थ से प्रेरित होगा यह नारा। वृहद आशय निश्चय ही वही था, पर यह जिस घटना विशेष से प्रेरित था, उसमें घंटी बजाने का उपयोग सच में किया गया था। आपने एक प्रचार देखा होगा, एक परिवार से लड़ने झगड़ने की आवाजें आ रही हैं। बहुधा पड़ोसी इसे उस परिवार की व्यक्तिगत समस्या और शेष पड़ोस का मनोरंजन मानते हैं, एक चटपटी खबर जो बन जाती है यह। क्रोधपूर्ण वाकयुद्ध में बहुधा घर के रहस्य भी बाहर आ जाते हैं, एक दूसरे के ऊपर किये दोषारोपण, सुनी सुनायी बातें, और न जाने क्या क्या। बहुत कम ही देखा है कि कोई पड़ोसी जाये और उसे रोकने का प्रयास करे। ऐसे में एक युवक उठता है, उस घर के बाहर पहुँचता है, घंटी बजाता है। झगड़ा सहसा रुक जाता है, ऐसे व्यवधान प्रायः नहीं होते थे। पूछे जाने पर युवक तनिक कठोर स्वर में कहता है कि उसके घर बिजली नहीं आ रही है, वह बस यह देखने आया है कि आप के घर बिजली आ रही है या नहीं।

उपाय आपको थोड़ा विनोदपूर्ण लग सकता है, पर यह व्यवधान आवश्यक है और प्रभावी भी। झगड़े में लगे हुये युगल को तो लगता है कि सामने वाले ने उसका पूरा विश्व दूषित और कलुषित कर दिया है, अब बिना उसे निपटाये आगे बढ़ने का कोई मार्ग ही नहीं है। उन्हें उस घातक तारतम्यता से बाहर निकालने का कार्य करता है, यह घंटी बजाना। यह व्यवधान नहीं, समाधान की दिशा में सोचने के लिये प्रेरित करने का कार्य है। कई बार यह कार्य घर में बच्चे बड़े ही रोचक ढंग से करते हैं, आपके मन मुटाव को कोई महत्व न देते हुये आपसे कोई दूसरा प्रश्न पूछ बैठते हैं। आपका ध्यान बट जाता है और क्रोध का त्वरित कारण भी। पारिवारिक झगड़ों में ही नहीं वरन नारी के प्रति हो रहे किसी भी अपराध में सचेत करता हुआ संकेत ही घंटी बजाना है, हो रहे अपराध की मूढ़ता की लय तोड़ना ही घंटी बजाना है।

विषय संवेदनशील था अतः मुँह खोलने के पहले वहाँ उपस्थित समुदाय की मनःस्थिति को समझ लेना आवश्यक था। लोग बोलते रहे, चर्चा रोचक होती रही, कुछ बोलने से अधिक सुनने में रुचि बढ़ती रही। लगभग १५० ब्लॉगरों के ऊर्जावान और ज्ञानस्थ समूह की चर्चा के निष्कर्षों को समझना आवश्यक था मेरे लिये। मन में कुछ बिन्दु थे जो सोच कर गया था, कहने के लिये, पर अन्त में बिना कुछ बोले, ज्ञानमद छाके ही वापस चला आया, टहलता हुआ।

ब्लॉगर किसी विषय पर मंथन करें तो दो लाभ दिखते हैं। पहला तो विषय पर दृष्टिकोण वृहद और स्पष्ट हो जाता है। लिखने की प्रक्रिया में पढ़ने और समझने की दक्षता प्राप्त करते रहने से समस्या की परत खोलने में विशेष प्रयास नहीं करना पड़ता है। किसी भी बुद्धिजीवी के लिये चर्चा में एक आधारभूत समझ का उपस्थित होना आवश्यक है, वह हर बार शून्य से प्रारम्भ नहीं कर सकता। कई बार ऐसी समस्याओं पर जब कई दिशाओं से ऊटपटाँग वक्तव्य टपकते हैं तो लगता है कि उन मूढ़ों को मूल से प्रशिक्षित किये जाने की आवश्यकता है। ब्लॉगरों के बीच चर्चा का स्तर बना रहता है, लुढ़कता नहीं है। दूसरा लाभ यह है कि यदि ब्लॉगर किसी विषय को हृदयस्थ करेंगे तो उसे व्यक्त भी करेंगे, उस चर्चा को ब्लॉग के माध्यम से और विस्तार मिलेगा और प्रचार मिलेगा।

ब्लॉगरीय संवेदन
चर्चा में दो विचारधारायें प्रमुख थीं। पहली उन महिलाओं की, जो पारिवारिक हिंसा की या तो स्वयं भुक्तभोगी रही हैं या उन्होनें वह ध्वंस बहुत पास से देखा, या कहें कि जिन्होंने इसका तीक्ष्ण पक्ष जिया है। दूसरी विचारधारा उस समूह की थी, जो सदा ही परिवार को अधिक महत्व देता रहा क्योंकि उसकी दृष्टि में परिवार ही सहजीवन की मौलिक ईकाई है। एक समूह परिवार को बन्धन मान बैठा था, तो दूसरा उसे पोषक। एक समूह परिवार को दो व्यक्तियों के स्वातन्त्र्य का अखाड़ा मान रहा था जिसमें अधिकारों की जीत का स्वर निनाद करे, तो दूसरा परिवार को एक यज्ञक्षेत्र मान रहा था जहाँ दोनों अपने अहम स्वाहा कर फल पर स्वयं को केन्द्रित करें। दोनों ही तथ्य कह रहे थे, दोनों ही सत्य कह रहे थे।

मैं मौन सुन रहा था, समझ नहीं पा रहा था व्यक्तिगत और संस्थागत सिद्धान्तों का घर्षण। जब ऐसा ही मौन कुछ दिनों पहले स्वप्न मंजूषाजी की पोस्ट पर व्यक्त किया था तो एक झिड़की मिली थी, व्यक्त न करना कर्तव्यों से मुँह मोड़ने सा समझा गया, व्यक्त न करना बुद्धिजीविता का अपमान समझा गया। अपना द्वन्द उन्हें समझाया तो अभयदान मिल गया, सोचने का समय मिल गया और साथ ही मिला स्वयं को कहने का अवसर। चिन्तन परिवार के पक्ष में लगभग करवट ले ही चुका था कि आज की चर्चा ने पुनः सब उथल पुथल कर डाला।

विश्व को देखें तो तोड़ने वालों की संख्या बहुत अधिक रहती है, तोड़ना बहुत सरल है, जोड़ना बहुत कठिन। व्यक्ति पूरे मानव समाज को अब तक तोड़ता ही तो आ रहा है। धर्म, जाति, राष्ट्र, राज्य, भाषा, वर्ण और न जाने क्या क्या। जहाँ एक ओर तोड़कर उसका विश्लेषण उस पर नियन्त्रण सरल हो जाता, जोड़ने में न जाने कितने व्यक्तित्वों को एक सूत्र में पिरोना पड़ता है, कितनी विचारधाराओं, रुचियों और प्रवृत्तियों को एक दिशा देनी पड़ती है। सहजीवन के उपासकों को सदा ही जोड़ने की दिशा में बढ़ते पाया है, परिवार को महत्व देने वालों को सदा ही कठिन मार्ग पर चलते पाया है।

एक साम्य, दो जन्म सुवासित
क्या पारिवारिक तनाव से ग्रस्त जन संबंध तोड़ दें? उपस्थित कुछ महिलायें ही इस विचारधारा की थीं, उन्होंने निश्चय ही प्रताड़ना सही होगी। कितना दुख असहनीय है, यह परिभाषित करना होता है, उस दुख की तुलना में जो परिवार के न होने की दशा में आता है। परिवार न होने का दुख निश्चय ही अधिक है पर कुछ लोग उसे वहन कर सकते हैं, वर्तमान के नर्क से निकलने के लिये। समाज के स्वरूप के विरुद्ध कुछ सक्षम लोग तो चल सकते हैं पर वह सबके लिये उदाहरण नहीं बन सकता, सहजीवन हमारे लिये आमोद का विषय नहीं वरन आवश्यकता का आधार है। एक व्यक्ति से निर्वाह नहीं हो रहा है तो वह जीवन की राहों का अंत नहीं है, स्थितियों में सुधार के उदारमना और निष्कपट प्रयास हों, यदि फिर भी संभव न हो तो निश्चय ही दूसरा परिवार बसाया जाये, पर परिवार सदा ही प्रमुखता से रहे।

परिवार सदा ही एक आधार रहेगा, कुरीतियों से लड़ने का, समाज में संबल संचारित करने का। परिवार रहे और उसमें बेटे और बिटिया को समान प्यार और आश्रय मिले। बिटिया को आश्रय देना है तो अपराध हर हाल में रोकने पड़ेंगे। हम एक बार भुगत चुके हैं। मध्ययुगीन भारत की परिस्थितियों में नारियों ने जो सहा है, वह अवर्णनीय है। सतीप्रथा, बालविवाह, पर्दाप्रथा, बालिकावध, सब के सब सामाजिक नपुंसकता के प्रक्षेपण रहे हैं, हम अपनी बिटियों की रक्षा करने में अक्षम रहे हैं। उनको जिलाकर सम्मान देने के स्थान पर उन्हें मारकर और जल्दी ब्याहकर सम्मान बचाते आये हैं। आज भी परिस्थितियाँ उसी राह जा रही हैं, समाजिक पक्षाघात की आशंका पुनः अपने संकेत भेज रही है। सोचना होगा, क्यों कोई महिला अपनी बिटिया को इस असुरक्षित समाज में आने से मना करती है। श्वेता की यह कविता उसी वेदना के स्वर हैं, वह चीत्कार है जिसे हम सुनने से कतराते हैं।

तो उठें और हस्तक्षेप करें, हो सके तो सक्रिय, और यदि न हो सके तो कम से कम घंटी अवश्य बजा दें, अपराध में व्यवधान उत्पन्न अवश्य कर दें।