Sunday, April 24, 2011

खंडित विश्वास -सतीश सक्सेना

अटूट रिश्ता  है, चोटों से ,  जख्मों को , सहलाना क्या   ?
गहरे घाव,ह्रदय में लेकर,खिलखिल कर हंसपाना क्या  ?

सारा जीवन, जिया दर्द में ,
पीड़ा नहीं , भुला पाऊंगा  !
मुझे प्यार की नहीं जरूरत  
कैसे खुशियाँ, सह पाऊँगा  !

ऐसा लगता, इसे सहारा देने को ही , जन्म लिया था !
अब न इसे  ठुकरा पाऊंगा , बिना वेदना जीना क्या  ?

अगर न होता जन्म हमारा  ,
चोट तुम्हारी,  सहने को !
कौन निभाता जीवन भर
वेदना भटकती आश्रय को !
मैं क्या जानू ?  ज़ख़्मी होकर, घाव कभी भर  पाते हैं  ?
छेड़छाड़,मीठी झिड़की,आलिंगन का सुख होता क्या ? 

कैसे झेलूँ प्यार तुम्हारा
टूटा मन , शीशे जैसा  !
हर मीठी नज़रों के पीछे
चाहत है,शंकित मन है ! 

लगता मेरा बिखरा मन अब कभी नहीं जुड़ पायेगा
कैसे समझाऊँ मैं तुमको, पीड़ा का सुख होता क्या !

बहुत मनाऊँ अपने मन को
पर विश्वास कहाँ से लाऊं !
तेरी बाँहों का सम्मोहन ,
क्यों  ? बेमानी ,लगता है   !

खंड - खंड विश्वास हुआ है, मोहपाश मैं बंधना क्या !
मेरे एकाकी जीवन को , मधुर हास , से  लेना क्या  !

77 comments:

  1. gazab...geet me jawaab nahi aapka....ham to aapke purane mureed hain.....wah...

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  2. कवि का दर्द आसानी से महसूस किया जा सकता है।

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  3. stish bhaia ab to khavt bdlnaa pdhegi log khte hain puraane chaanval or puraani shraab bhtrin hoti hai lekin hm khaavt bdl kar khte hain ke bhai stish ji ki puraani rachnaayen bhtrin or anmol hoti hain .... akhtar khan akela kota rajsthan

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  4. अटूट रिश्ता है चोटों से ,
    जख्मों को सहलाना क्या
    गहरे घाव ह्रदय में लेकर ,
    खिल खिल कर हँस पाना क्या
    मैं क्या जानू जख्मीं होकर, घाव भरे भी जाते हैं !
    छेड़ छाड़ मीठी झिड़की , आलिंगन का सुख होता क्या !
    भावनाओं कि सुंदर अभिव्यक्ति इस कविता के माध्यम से. पुराने खजाने से मोती धुंद कर निकाला है आपने. बहुत सुंदर.

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  5. कैसे झेलूँ प्यार तुम्हारा
    टूटा मन शीशे जैसा !
    हर मीठी नज़रों के पीछे
    प्यार छिपा ! शंकित मन है !
    खंड-खंड विश्वास हुआ है,मोहपाश मैं बंधना क्या!
    मेरे एकाकी जीवन को,मधुर हास से लेना क्या !


    प्रत्येक पंक्ति में अत्यंत सुंदर भाव....
    संवेदनाओं से भरा बहुत सुन्दर गीत...
    ऐसे गीत कभी पुराने नहीं होते...

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  6. आप अपनी कविताओं में पुनर्स्पन्दित होते लग रहे हैं और पाठकों के जख्मों को कुरेद रहे हैं :)
    बढियां कविता !

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  7. लगता मेरा बिखरा मन अब कभी नहीं जुड़ पायेगा
    कैसे समझाऊँ मैं तुमको, पीड़ा का सुख होता क्या !"

    मन की पीड़ा को इतने साल पहले व्यक्त कि थी --जख्म आज भी हरा है --सतीश जी !बेहद संवेदन शील रचना .. मन के गहरे भावो को दर्शाती हुई ...

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  8. लगता मेरा बिखरा मन अब कभी नहीं जुड़ पायेगा
    कैसे समझाऊँ मैं तुमको, पीड़ा का सुख होता क्या !
    itna dard kahe seene main daba ke rakha hai.....

    jai baba banaras.......

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  9. दुक बांटने से दुख दूर होता है॥

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  10. मधुर भावनाओं की सुमधुर नित्य बनाता हूँ हाला,
    भरता हूँ इस मधु से अपने अंतर का प्यासा प्याला,
    उठा कल्पना के हाथों से स्वयं उसे पी जाता हूँ,
    अपने ही में हूँ मैं साकी, पीनेवाला, मधुशाला।।५।

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  11. कैसे समझाऊँ मैं तुमको, पीड़ा का सुख होता क्या !
    badi hi visham sthiti hai...ishka jab k taraf ho to saza deta hai..aur jab dono tarf ho to maza deta hai...wah-wah... sher ke liye nahin aapki rachna ke liye...

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  12. गहरा दर्द,गहरी संवेदना को दर्शाती आपकी अनुपम कृति के लिए आभार.

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  13. पुराना हो कर भी बेहद शानदार लाजवाब गीत....

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  14. सतीश जी हलकी फुलकी कवितायेँ ही समझ आती हैं. भारी भरकम और रोने धोने वाली कविताओं के लिए अपनी समझदानी बहुत छोटी है अतः इन पर टिपण्णी करना मेरे बस का रोग नहीं.मुझे तो हमेशा ही आपका फोटू खिचवाने का अंदाज बहुत पसंद आता है .

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  15. संवेदनाओं से भरा बहुत सुन्दर गीत

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  16. सारा जीवन जिया दर्द में
    पीड़ा बैठ गई तनमन में !
    जितना प्यार दे रहीं मुझको
    कैसे खुशियाँ सह पाऊँगा !
    अब तो जैसे वर्षों से ना , युग युग से नाता पीड़ा का !
    गहरा रिश्ता है अब दुःख से, इसके बिन अब जीना क्या

    बहुत ख़ूबसूरत गीत !
    प्रत्येक पंक्ति स्वयं के अस्तित्व को साकार कर रही है !
    वाह !

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  17. • इस ऊबड़-खाबड़ गद्य कविता समय में आपने अपनी भाषा का माधुर्य और गीतात्मकता को बचाए रखा है।

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  18. मन के भावों की सुंदर अभिव्यक्ति अंदर तक पैठ गई।

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  19. विरह, वाइन और वियेना का डेडली कोम्बिनेशन प्रस्तुत किया गुरुदेव.. अब जाकर "मेरे गीत" बना है आपका ब्लॉग!!

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  20. आपके गीत तो अब सीधा दिल के द्वार पर दस्तक देने लगे हैं..

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  21. बहुत सुन्दर गीत

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  22. "Teri baahon kaa sammohan kyon be -maani lgtaa hai "-
    peeda me aannad jise ho aaye meri madhushaalaa -Bachchanji ne aise hi to nahin khaa thaa -
    veerubhai

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  23. लगता मेरा बिखरा मन अब कभी नहीं जुड़ पायेगा
    कैसे समझाऊँ मैं तुमको, पीड़ा का सुख होता क्या !
    बेहद सुंदर गीत की रचना की है। इतने टाइम तक छुपा कर रखा था आपने गीत।

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  24. बहुत मनाऊँ अपने मन को
    पर विश्वास कहाँ से लाऊं !
    तेरी बाँहों का सम्मोहन
    क्यों बेमानी लगता है !

    सतीश भाई गजब का गीत है, आपके गीतों का तो मैं कायल हूँ।

    हाँ फ़ोटो बढिया है।:)

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  25. बहुत संवेदनशील भाव हैं ......बेहतरीन रचना

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  26. एक और गीत...शुक्रिया...

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  27. भावपूर्ण एवं सुन्दर गीत...१८ साल पूर्व भी उम्दा रचते थे आप...

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  28. ishwar naa kare aise dard se kisee ka sakshatkar ho .
    shubhkamnae .

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  29. गहरी संवेदना
    बहुत ख़ूबसूरत गीत !

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  30. वाह!गीत तो है ही दिलकश, फोटू भी लाज़वाब है।

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  31. पीड़ा का सुख...क्या बात है, बहुत सुन्दर ।

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  32. खंड - खंड विश्वास हुआ है, मोहपाश मैं बंधना क्या !मेरे एकाकी जीवन को , मधुर हास से लेना क्या !
    mann ki is sthiti ko jodna aasaan nahi hota, bahut achhi rachna

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  33. दर्द और पीडा के सागर में आपके गोते गहरे से और गहरे होते जा रहे हैं ।

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  34. पीड़ा का सुख, बहुत अनुभव किया है तभी कह सकता हूँ कि आसान नहीं है यह लिखना।

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  35. पुरानी रचना पर इतनी टिप्‍पणियां
    जरूर बहुतों को पीड़ा दे रही होंगी।

    हमें चाहत नहीं है टिप्‍पणियों की
    हमारे यहां तो स्‍वयं हाजिर हों।


    मन का आमंत्रण मन को है, मन से मिलिएगा जरूर

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  36. कवि और पीड़ा का साथ अनादिकाल से चला आ रहा है, पीड़ा के दर्पण में जो सत्य को देखना सीख जाये वास्तव में वही जीवन को कुछ हद तक जान सकता है

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  37. पुराने चावलों की बात ही कुछ और होती है।

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  38. कैसे झेलूँ प्यार तुम्हारा
    टुटा मन शीशे जैसा !
    हर मीठी नजरोंके पीछे
    प्यार छिपा ! शंकित मन है !
    खंड-खंड विश्वाश हुआ है , मोहपाश में बंधना क्या !
    मेरे एकाकी जीवन को, मधुर हास से लेना क्या !
    बहुत मार्मिक पंक्तियाँ है ! जब एक बार मन टूट जाता है, स्वाभाविक है उसका शंकित होना !
    अंतिम पंक्ति मुझे बहुत पसंद आई है !
    कैसे समझाउं मै तुमको, पीड़ा का सुख होता क्या !
    सही है पीड़ा का सुख तो शायद शमा पर मर् मिटने वाले परवाने से अधिक कौन
    जानता होगा भला ?
    आप के गीत हमेशा कुछ जादा लिखने को मुझे मजबूर करते है !

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  39. राजेश उत्साही जी का कमेंट ही मेरा कमेंट माना जाए...

    जय हिंद...

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  40. बेहद संवेदनशील रचना।

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  41. ऐसा सचमुच होता है जब वेदना झेलते झेलते प्राणी यह भरोसा ही नहीं कर पाता कि उसके साथ कुछ प्यार या विश्वास जैसी चीज़ें भी जुड़ सकती हैं...अच्छी रचना..

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  42. खुशदीप सहगल said...

    राजेश उत्साही जी का कमेंट ही मेरा कमेंट माना जाए...

    जय हिंद...




    और खुशदीप भाई का कमेंट मेरा कमेंट माना जाए! :-)


    परन्तु एक बात ज़रूर कहना चाहूँगा... बात वैसे कुछ ख़ास नहीं है... ख़ास तो आपकी यह कविता है...

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  43. मन की गहरी पीड़ा को दर्शाती भावपूर्ण मर्मस्पर्शी रचना....

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  44. लगता मेरा बिखरा मन अब कभी नहीं जुड़ पायेगा
    कैसे समझाऊँ मैं तुमको, पीड़ा का सुख होता क्या !
    wah.isse zyada kuch kah nahin paa rahi hoon.

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  45. आपको गद्य और गीत दोनों ही में महारत हासिल है :]

    मैं क्या जानू जख्मीं होकर, घाव भरे भी जाते हैं !
    छेड़ छाड़ मीठी झिड़की , आलिंगन का सुख होता क्या !
    भाव पूर्ण प्रस्तुति, हरेक पंक्ति में जीवन की पीड़ा, प्रेम, शंका और आशा के भाव हैं...

    आभार सुन्दर रचना के लिए!

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  46. अनुपम गीत लिखते हैं आप.

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  47. आदरणीय सतीशजी ,पीड़ा का शब्द-चित्र बनना आज देख पायीं हूं .....सादर!

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  48. दर्द से साक्षात्कार कराता कवि

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  49. दुख से रिश्ता हो गया है इसके बिना नहीं रह पाउंगा और खुशियां भी नहीं सह पाउंगा । जख्मों और चोटों से अटूट रिश्ता हो गया है मन शीशे जैसा टूट चुका है इसलिये अब हर नजर हर प्यार के पीछे एक आशंका नजर आती है मन आशंकित होता है कि कही यह पहले की तरह तो नहीं । और इस आशंकाग्रस्त मन के कारण तन और मन दौनो ने एकान्त का चयन कर लिया है हास विलास से मन उचट गया है । तुमको कैसे समझाउ

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  50. १८ साल पहले इतनी पीड़ा का अहसास !
    अब लिखेंगे तो और भी ग़ज़ब ढाएँगे ।

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  51. अटूट रिश्ता है चोटों से ,
    जख्मों को सहलाना क्या
    गहरे घाव ह्रदय में लेकर ,
    खिल खिल कर हँस पाना क्या
    मैं क्या जानू जख्मीं होकर, घाव भरे भी जाते हैं !
    छेड़ छाड़ मीठी झिड़की , आलिंगन का सुख होता क्या !

    निसंदेह एक उम्दा रचना।

    .

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  52. बहुत सुन्दर गीत है ... सुन्दर शब्द चयन से कवि के एहसास प्रस्फुटित हो उठे हैं ...

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  53. बहुत सुन्दर कविता लिखी आपने ..फोटो भी बढ़िया.....बधाई.
    ________________________
    'पाखी की दुनिया' में 'पाखी बनी क्लास-मानीटर' !!

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  54. खंड - खंड विश्वास हुआ है, मोहपाश मैं बंधना क्या !
    मेरे एकाकी जीवन को , मधुर हास से लेना क्या !

    बहुत ही संवेदनशील रचना...

    ReplyDelete
  55. satish ji

    aaj aapki kavita padhkar man kahi ruk sa gaya hai ... prem me itna dard kyo hota hai , main samajh nahi paaya...


    badhayi .

    मेरी नयी कविता " परायो के घर " पर आप का स्वागत है .
    http://poemsofvijay.blogspot.com/2011/04/blog-post_24.html

    ReplyDelete
  56. बहुत मनाऊँ अपने मन को
    पर विश्वास कहाँ से लाऊं !
    तेरी बाँहों का सम्मोहन
    क्यों बेमानी लगता है !
    लगता मेरा बिखरा मन अब कभी नहीं जुड़ पायेगा
    कैसे समझाऊँ मैं तुमको, पीड़ा का सुख होता क्या !
    ..
    आदरणीय सतीश जी ...आप सच में गीतों की गंगा हैं...बहुत...सुन्दर भाई जी . संकोच सा होता है आपके लिखे पर टिप्पड़ी करने में ! छोटा मुंह बड़ी बात ना हो जाये कहीं....

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  57. अटूट रिश्ता है चोटों से
    ज़ख्मों को सहलाना क्या
    गहरे घाव ह्रदय में लेकर
    खिल खिल कर हँस पाना क्या
    -----------------------------
    संवेदना को स्वर देता ...सुन्दर गीत

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  58. प्रेम प्यार पीड़ा का नाम.. पीड़ा सुख बन जाती जब...गीत जन्मते ऐसे तब..पीले पन्नों की पुरानी रचना कहाँ भूली जा सकती है..
    'फलाफल' का स्वाद तो सच में भूलना मुश्किल है...

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  59. आपके अंतर्मन में उठती संवेदनशील भाव-तरंगे मन को झकझोर गयी। सुंदर रचना।धन्यवाद।

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  60. भाई जी, चुराने लायक चीज है। आपने कापीराईट जैसा कुछ लगाया नहीं है अपने ब्लॉग पर, दोष मत दीजियेगा।

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  61. आदरणीय सतीश सक्सेना जी

    अच्छा गीत है …

    35-37 के थे आप जब यह गीत लिखा,
    भाभीजी के लिए लिखा या …
    ?!


    शुभकामनाओं सहित
    - राजेन्द्र स्वर्णकार

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  62. इतनी पीडा ! इतना दर्द ! सतीश जी माना कि जिंदगी बडे घाव देती है पर मरहम भी तो लगाती है । बहुत ही दर्द भरी कविता, दिल को छू गई ।

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  63. सतीश जी मुझे तो पन्ने कहीं पीले नज़र नहीं आ रहे ......

    :))

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  64. मैं क्या जानू जख्मीं होकर, घाव भरे भी जाते हैं !
    ..bahut sunder

    ReplyDelete
  65. कैसे झेलूँ प्यार तुम्हारा
    टूटा मन शीशे जैसा !
    हर मीठी नज़रों के पीछे
    प्यार छिपा ! शंकित मन है !
    खंड-खंड विश्वास हुआ है,मोहपाश मैं बंधना क्या!
    मेरे एकाकी जीवन को,मधुर हास से लेना क्या !

    वाह!
    विवेक जैन vivj2000.blogspot.com

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  66. sateesh bhai ji
    aap mere blog par aaye aur mere housla e ko badhaya iske liye aapko bahut bahut dhanyvaad
    v hardik naman
    poonam

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  67. बहुत सुन्दर गीत..बेहद संवेदनशील ...

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  68. सतीश जी

    यह संवेदनशील रचना कैसे छूट गयी पढने से ..पता नहीं ..आज आंच पर देखा तो यहाँ पढने आई ...बहुत भावुक करने वाला गीत ...

    ३० को आपसे मुलाक़ात नहीं हुई ..अफ़सोस रहेगा ...

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  69. har ek pankti apni chaap chorti hui prateet hoti hai.khoobsurat prastuti.

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  70. भाई साहिब आपकी नै रचना का इंतज़ार है .

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  71. पिछले दिनों में काफी नायाब चीजें छूटी हैं, लगता है.. आनंद आ रहा है...

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एक निवेदन !
आपके दिए गए कमेंट्स बेहद महत्वपूर्ण हो सकते हैं, कई बार पोस्ट से बेहतर जागरूक पाठकों के कमेंट्स लगते हैं,प्रतिक्रिया देते समय कृपया ध्यान रखें कि जो आप लिख रहे हैं, उसमें बेहद शक्ति होती है,लोग अपनी अपनी श्रद्धा अनुसार पढेंगे, और तदनुसार आचरण भी कर सकते हैं , अतः आवश्यकता है कि आप नाज़ुक विषयों पर, प्रतिक्रिया देते समय, लेखन को पढ़ अवश्य लें और आपकी प्रतिक्रिया समाज व देश के लिए ईमानदार हो, यही आशा है !


- सतीश सक्सेना

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