Friday, December 27, 2013

कोई सागर दिल को बहलाता नही

१६ दिसंबर,२०१२ की उजली दोपहर। सुबह सुबह दीदी को फोन किया पता चला कि खाँसी आ रही है बहुत ज्यादा। रात भर आती रही। मनोज नॉर्मल फिज़ीशियन की क्लीनिक पर ले कर गया। दीदी के घर धूप नही आती थी। मैने फोन कर के कहा मेरे घर आ जाओ यहाँ धूप में लेटना थोड़ी देर को। वो पहले ही कहाँ मना करती थी, अब तो और नही। मुझे बड़ा कब माना उन्होने ? बच्चा ही समझती थी। समझती थी कि कुछ भी बर्दाश्त करने की क्षमता नही मुझमें। ना डाँट। ना सच। मुझसे छोटे छोटे लोगो से कह गई कि अब जीवन की आस नही। लेकिन मुझसे तो कभी नही कहा़। मेरी उम्मीद में हमेशा सिर हिलाती रही। मुझे निराश नही होने देना चाहती थी वो कभी भी शायद।

बाहर की धूप में दरी बिछा कर मोटा बिछौना डाल दिया धूप में। अदरक़ वाली चाय जब आई तो बोली "तुम्ही तो मना करती हो कि अब दूध वाली चाय ना पिया करो।" मैने हूक़ संभालते हुए कहा। अब कुछ नही मना करते हैं। तुम्हारा जो मन हो वो खाओ।
"नही रहने दो" उन्होने धीमे से कहा।

मैं काढ़ा बनवा लाई।
फिर जबर्दस्ती खुश दिखने की चाहत में चहक चहक कर बताने लगी, "ये देखो दीदी, ये ना प्यूटीनिया है, ये डॉग फ्लॉवर। ये गुलाब देखो कितना सुंदर खिला है। देख रही हो सारी बगिया हरी हो गई है। अब ऐसे ही तुम भी धीरे धीरे हरी हो जाओगी।"
वो ऐसे मुस्कुराई जैसे किसी बच्चे की नादानी पर मुस्कुराया जाया जाता है " मौसमी फूलों पर मेरी जिंदगी डिसाइड कर रही हो ? मौसम बदलेगा और ये सब मुरझा जायेंगे।"
मुझे अपनी बेवक़ूफी पर वाक़ई अजीब खीझ हुई।

मैने फिर बात बदल दी। "जानती हो दीदी, जैसे ही तुम ठीक होगी ना, तुम कार चलाना सीख लेना। और तुम्हारी हेयर स्टाइल एकदम चेंज। लेगिंग और कुर्ती के साथ एकदम नया अवतार होगा तुम्हारा। और हम दोनो बहने मिल कर खूब काम करेंगे। सोशल वर्क। ये सामने झोपड़ी के बच्चों को पढ़ाया जायेगा और...."
वो बीच में बात काट कर बोली वो "कौन सा गाना है.....कोई सागर दिल को बहलाता नही...अब ये सब बातें अच्छी नही लगतीं।"
मैं अपनी सारी मुर्खताओं के साथ चुप हो गई।
मन ही मन गुनती रही गीत के शब्द, सारे अंतरे। हर शब्द, हर स्टैंजा फिट था उन पर।

मुझसे छुप के, बच्चों से छुप के किसी दिन अकेले में कहती तो होगी ही

मैं कोई पत्थर नही इंसान हूँ,
कैसे कह दूँ ग़म से घबराता नही।

दर्द को हद से आगे तक बर्दाश्त करने के बाद भी एक के बाद दूसरे अंग का साथ छूटता पा कर किसी न किसी दिन तो मन कह उठता होगा

जिंदगी के आईने को तोड़ दो,
इसमें अब कुछ भी नज़र आता नही

और अब कहीं दूर या कहीं हमारे ही इर्द गिर्द, हमें अपने से अलग होने के बावज़ूद हँसता, घूमता देख कभी मन में आ ही जाता होगा ना

कल तो सब थे कारवाँ के साथ साथ,
आज कोई राह दिखलाता नही।

मेरी बहादुर बहन ! मुझे माफ कर दो, तुम मुझे जितना बहादुर बनाना चाहती थी, मै उतनी बहादुर नही बन सकी।

Thursday, October 3, 2013

विविध भारती ! बचपन के दोस्त को जन्मदिन मुबारक़

यूनुस जी की फेसबुक पोस्ट पर पढ़ा आज विविध भारती का जन्म दिन है। 

जब से होश सभाला, माँ को जाना, बाबूजी को जाना, घर को जाना, तब से जाना विविध भारती को। घर में एक बड़ा सा रेडियो आ चुका था। सुना बड़े भईया को दहेज के साथ मिला था। वो सुबह भाभी के साथ किचेन में पाया जाता। दोपहर में बाउंड्री में। रात में पिता जी के साथ होता था़ समाचार बाँचता हुआ।

मेरी सुबह ढेर सारा दर्द देने वाली एक्सरसाइज़ से होती। नाश्ता करते समय सुनाई देता "मैं अपने खून से आसमाँ को रंग दूँगा, क्रांति लिख दूँगा। क्राऽऽऽतिऽऽऽ" ये सबसे पुरानी याद है विविध भारती की। 

माँ स्कूल जाने को तैयार हो रही होतीं, बाबूजी और दो भईया लोग आफिस, रसोई से आँगन तक दो भाभियाँ और दीदियाँ चहल कदमी कर रही होतीं। नाश्ता बनाती, टिफिन पैक करती। माँ का सामान जगह पर रखती, बाबूजी का पीढ़ा रखती। और पीछे से जाने कौन सुन रहा होता। संगीत सरिता, भूले बिसरे गीत, चित्रलोक। 

स्कूल देर से जाना हुआ। चौथी कक्षा से। अब जब व्यक्तित्व निर्माण में अंजाने ही कोई आपका रोलमॉडल बन जाता है, तब मेरे रोलमॉडल का सबसे प्रिय साथ था, विविध भारती। 

अब उसका क़फस छोटा हो गया था। छोटे भईया ने अप्रेंटिस से बचा कर मेरी रोलमॉडल, को वो रेडियो ला कर दिया था।

स्कूल जा रही होती, तो चट पट तैयार कर रहे हाथों, चाय के साथ रोटी दे रहे चिमटे और बस्ते में टिफिन रख रहे हाथों के पीछे भूले बिसरे गीत बज रहा होता। स्कूल से लौट कर आती, तो मेरी रोल मॉडल गुसलखाने मे अपने उसी साथी को ताखे पर रख कपड़े धुल रही होती। उसका साथी उसे मनचाहे गीत सुना रहा होता।

घेर में सबसे पीछे था गुसलखाना ‌और गेट पर डाकिया मनी आर्डर, रजिस्ट्री, लेकर भड़भड़ भड़भड़ करता रहा जाता। मन चाहे गीत के आगे वो आवाज़ कहाँ सुनाई देती। कभी कभी कोई मेहमान भी....!! अम्मा स्कूळ से लौट कर आतीं, जान पातीं कि आज फिर फलाँ आदमी वापस हो गया गेट से और आग बबूला हो जातीं। शरमायी दीदी, सहमी दीदी। अम्मा का नाश्ता तैयार करने में जुटी होती।

शाम को मेरा होमवर्क और उनके साथी का जयमाला। 

रात में उनका सहलाती, एड़ी दबाती हुई मेरे स्कूल की कथा गाथाएं और उनके साथी का छायागीत। सुबह से काम में लगी वो जाने कब सो गयी होती। मैं गुस्सा हो कर बगल में लेट जाती और रात बिरात आँखें खुलने पर सुनाई देता कि वो साथी भी बोल बोल कर हार चुका और अब घर्रर्रर्र की आवाज़ आ रहौ होती शायद वो खर्राटें लेता था। मैं कुहनी मार कर बताती। तो पहिये सी स्विच से उसे शांत किया जाता। कभी कभी तो सोने में हाथ लगता और वो बिस्तर के नीचे। दो खानों मे बँटा हुआ....! डर के संभाला जाता। झट से बजा कर देखा जाता, वो भी एक बेशरम, बज पड़ता और मेरी रोलमॉडल के चेहरे पर हँसी....!!

मेरी टीन एज आई और दीदी विदा हो गयीं। उनके रिश्ते, नाते, चिट्ठियों वाली पोटली, ज्वेलरी बॉक्स, लंबे लंबे सूट, डायरी सब मेरी अनकही विरासत में आ गये। उनका साथी भी, अब वो मेरे साथ होता गुसलखाने में कपड़े धोते समय।

ऊबती दोपहरों में मनचाहे गीत सुनाता। दीदी ने एक रूलदार कॉपी में १० १५ गाने लिखे होंगे। मैने चार डायरियाँ भरी थीं। विविध भारती से सुने गानो से। बुझी बत्ती में कान के पास चलता छायागीत। तब दिमाग का मेमोरी कार्ड भरा नही था। अँधेरे में सुनायी देता वो मनपसंद गीत, हर अंतरे के साथ दिमाग में फीड हो जाता। सुबह समय मिलते ही डायरी में दर्ज़ और फ्री पीरियड में सहेलियों के साथ गुनगुनाहट।

एम०ए० कंप्लीट हुआ और मेरे पैर का आपरेशन हुआ। कॉर्बन रिंग्स पड़ी थीं। दर्द से रिश्ता पुराना था। लेकिन उतना दर्द कभी नही झेला था। मैने लिखा

"छत की ईँटे कम पड़ती हैं, रातें लंबी होती हैं, सोने वालों तुम क्या जानो, ये बातें क्या होती हैं।"

रात भर दर्द, नींद का नाम नही। उस कमरे प्लास्टर नही हुआ था। यहाँ से वहाँ, तक की ईँटे गिन जाती थी और फिर से शूरू करती थी।  

दीदी की एक सहेली ढेर सारी किताबें दे जातीं और भइया ले आये थे नया रेडियो। ढेर सारे बैंड वाला। क़फस और अधिक कॉपैक्ट था इस बार। और जाने कितने बैंड थे उसमें।  

मैं, दर्द, दवा, छत की ईँटे, नयी दोस्त किताबें और पुराना साथी विविध भारती।

वहाँ से निकली तो कंपटीशन की तैयारी में जुट गई। ढेर ढेर किताबे और उनके बीच विविध भारती़। पढ़ते पढ़ते थक जाती, तो उस साथी की सुन लेती और फिर से रिचार्ज हो कर लग जाती अपने लक्ष्य की ओर। 

इस बीच लड्डूलाल जी से इश्क़ भी हो चुका था। लड्डूलाल जी तीसरा इश्क़ थे। उनसे पहले गोपालदास नीरज और अटल जी के आशिक हो चुके थे हम। लड्डूलाल जी से आवाज़ का रिश्ता था। अपने खयालों मे किसी ट्रेन में बैठी मैं (जबकि तब तक भूल भी चुकी थी कि ट्रेन कैसी होती है, सफर ही कितना करना होता था और जो करना होता वो बस से करती, क्योंकि ट्रेन के प्लेटफॉर्म में लिये सुविधाजनक नही थे।) सामने की सिट पर बैठे लड्डूलाल जी। वो कुछ बोलते और मैं पहचान जाती। मुग्ध सी पूछती "आप लड्डूलाल जी हैं।"

वो मुस्कुरा कर अपनी दिल ले लेने वाली आवाज़ में कहते "आपको कैसे पता।"

और मैं निहाल सी कहती "आपकी आवाज़ कोई भूल सकता है क्या ?"

खैर लड्डूलाल जी तो ना मिले आज तक। यूनुस जी मिल गये इसी ब्लॉगिंग के गलियारे में। 

वो भी दिन आया, जब कंपटीशन की किताबों ने हमें हमारी मंजिल तक पहुँचा दिया। लेकिन मंजिल बड़ी दूर थी। घर से २००० किमी दूर। द्क्षिण भारत का एक क्षेत्र। कभी सोचा भी नही था। सोचा क्या जाना ही नही था कि इसी देश के किसी भूभाग में भौगोलिक, सांस्कृतिक भिन्नता ऐसी होगी कि हमें लगेगा कि हम विदेश आ गये।

 हमारे जाने की तैयारी में जो माँ ने दिया उससे इतर मेरी एक ही माँग थी। एक टू इन वन। जिसमें विविध भारती सुना जा सके।

आफिस में दिन भर एकड़ा, वेकड़ा सुन कर थके कान २४ घंटे में तीन बार ही सही लेकिन अपनी भाषा सुन पाते थे तो विविध भारती से। चित्रलोक उतना मोहक नही था। कुछ ही गाने रिपीट हो कर सुनायी देते। लंच में चावल चढ़ा कर विविध भारती आन। शुक्र है तब हिंदी गाने सुनायी देते और फिर एक बार रात को सोते समय। जब मन माँ, भईया, भाभी सहेलियों के साथ अपने घर में होता तो कानों मे मिठास घोल रहा होता विविध भारती।

२००३ जनवरी में जब मैं वापस उत्तर प्रदेश लौटी, घर तो नही, घर के पास, लखनऊ में। तब विपुल के पास जो रेडियो था, उसमें विविध भारती नही था। एफएम....! मेरा रेडियो छूट गया। अब सुनने का कोई चाव नही था। लोगो के पास रिक्शे में, कार में, मोबाइल में हर जगह एफ०एम० था। बस विविध भारती नही था। मुझे अब कोई चार्म नही था रेडियो का। मोबाइल पे गाने सुने गये। रेडियो नही।

अभी सिर्फ २ महीने पहले अचानक फिर मिल गया सर्च करते हुए विविध भारती। मेरे ही मोबाइल पर। अब फिर से लंच मनचाहे गीत के साथ होता है। हाँ मगर शिकायत है उससे, वैसे ही जैसे हर बिछड़े साथी से बहुत दिन बाद मिलने पर होती है। वक्त ने उसका भोलापन छीन लिया....!!

जन्मदिन मुबारक़ दोस्त.....!!

Sunday, September 22, 2013

लंचबॉक्स, विवाह संस्था और जाने क्या क्या

 
यूँ कहने को तो हर आदमी अकेला ही है। किसी से भी पूछ लीजिये वो भरे पूरे परिवार और समाज के साथ भी खुद को अकेला ही बता देगा। हर कोई खुद को उस शेर से जुड़ा हुआ पाता है कि
 
हर तरफ, हर जगह बेशुमार आदमी
फिर भी तनहाइयों का शिकार आदमी।
 
और उस शेर से भी कि
 
सबके दिल में रहता हूँ पर दिल का दामन खाली है,
खुशियाँ बाँट रहा हूँ मै और अपना ही दिल खाली है।
 
मगर सच तो ये है कि हमारे आपके इर्द गिर्द बेशुमार आदमी हैं, बहुतों के दिल में हम रह भी रहे हैं किसी ना किसी तरह।
 
पर सोचिये ज़रा उस औरत के बारे में जो सुबह से शाम तक एक घर के कुछ कमरों और कुछ दरवाजों के बीच है। दुनियाँ की नज़र में बिलकुल अकेली नही। खुश रहने को क्या नही है उसके पास। एक खाता, कमाता, स्मार्ट पति एक नन्ही मुन्नी, प्यारी सी बच्ची और क्या चाहिये खुश रहने को भला और अगर इस पर भी उसे कुछ चाहिये तो फिर उसकी डिमांड ग़लत है। उसे नही पता कि जिंदगी में बस उन्ही चीजों में खुशी ढूँढ़ लेनी चाहिये, जो हमें मिली हैं।
 
इला, हर दूसरे घर में पायी जाने वाली एक सामान्य महिला है। कहने को सुंदर। फिट। हनीमून पर पहनी गई ड्रेस आज भी थोड़ी ढीली ही है। फिगर, जैसे का तैसा। सुबह पति को भेजने के बाद शाम को पति के इंतज़ार तक़ काम ये कि कि पति को खुश कैसे किया जा सकता है। इसलिये क्योंकि खुद इला के खुश रहने की चाभी उस पति के ही पास है। सुबह से शाम तक की गई इन कोशिशों में नाक़ामयाब इला ना ही पाति को खुश कर पाती है और ना ही खुद की खुशी पाती है।
 
देखती हूँ, तो अपने इर्द गिर्द जाने कितनी इला दिखाई देती हैं। सुबह पाँच, साढ़े पाँच बजे उठ कर पति और बच्चों के लिये लंच बनाना, उनके सामान सही जगह पर रख कर उनके तैयार होने तक उनकी असिस्टेंट बनी रहना। उन्हे प्यार से विदा करना और उनका मशीन की तरह विदा ले लेना। उसके बाद शाम पाँच बजे तक जिंदगी में कोई गतिविधि नही। साहेब आफिस में है और उन्हे सबसे ज्यादा डिस्टर्ब पत्नी का फोन करता है। पत्नी जानती है ये ग़लत बात है। वो डिस्टर्ब करती भी नही। उसकी आगे की गतिविधि बस ये है कि वो घड़ी की सुई देखती रहे बस और इंतज़ार करे छः बजने का। छः बजने के कुछ देर पहले वो खुद को सही कर लेती है (वैसे अधिकांश पत्नियाँ ये भी नही करतीं, क्योंकि उन्हे पता होता है कि शादी के २ साल होते होते पति की रुचि उसकी खूबसूरती में रह ही नही गयी) दरवाज़ा खोलने के बाद उसे पता है कि अभी उसे कुछ नही बोलना है, क्योंकि साहेब पूरे दिन जिस तरह थक कर आये हैं, उसके बाद उन्हे ना ही कुछ बोलने का मन है ना ही सुनने का। चाय,नाश्ता, टी०वी के बीच घड़ी साढ़े नौ बजा देती है और डिनर का टाइम हो जाता है। साहेब का मूड थोड़ा हलका हो चुका होता है। लेकिन इतना भी नही कि वो पत्नी की समस्याए सुनें। उन्हे खुश रखने की मुहिम में लगी बीवी़ चुन चुन कर इर्द गिर्द की वो खबरे लाती है, जो सुखद हों। साहेब उखड़े उखड़े रिएक्शन के साथ सुनते हैं और सोने चल देते हैं। सुबह फिर वही दिनचर्या।
 
इस पर अगर इला जैसी महिला हो, जिसका शहर  मुंबई है, तो अकेलेपन में कुछ अधिक ही वृद्धि होना स्वाभाविक हैं।
 
२४ घंटे के इस अबोलेपन की कल्पना करना ही तक़लीफदेह है। उसमें कहीं से भी अगर कोई ऐसा मिल जाता है़ जिसके साथ थोड़ा भी कुछ बाँटा जा सकता है, तो वो जीवन का सबसे बड़ा सुख होता ही होगा। कैसा अजीब सा दुःख होता है जब हम नायक से सुनते है कि "कोई बात सुनने वाला नही होता, तो हम बहुत कुछ भूल जाते हैं।"
इर्द गिर्द कितने ही रिश्ते जो मैसेज के अपडेट्स पर टिके हुए हैं, मुझे याद आ जाते हैं। मुझे याद आता है कि वे भी बहुत दूर हैं एक दूसरे से। मगर हर थोड़ी देर की अपडेटेशन उन्हे सुख देती है, इस बात का कि कोई है जो उनके पल पल की खबर रखना चाहता है।
 
और देखिये ना कि वो जिससे हम अपने अकेलेपन को भरने की माँग कर रहे हैं, वो जो हमारा सो कॉल्ड पार्टनर है, अकेला वो भी है। कहीं दूसरी जगह की मैसेज अपडेट उसके भी खालीपन को भर रही है। अजीब बात है ना ये।
समझ ही नही पाती कि क्यों है ऐसा। विवाह जैसी संस्था में ऐसा क्या होना चाहिये कि ये अपने आदर्श रूप में स्थापित हो ? क्या ये संस्था बेकार हो गई है या फिर कुछ सुधार की माँग है इसमें ? पति या पत्नी संतुष्ट क्यों नही ? ये मनचाहा बंधन, अनचाहा कैसे हो गया है ?
 
या फिर इंसानी फितरत ही है भागते रहने की ? ढूँढ़ते रहने की ? वो जो सहज उपलब्ध है, उससे संतुष्ट ना होना ये स्वभाव है क्या उसका ? ऐसा तो नही कि उपलब्धता चीजों का मूल्य घटा देती है। वो प्रेमिका जिसके कितने कितने चक्कर काट कर, कितनी कितनी मनौनी, चिरौरी कर के अपना बनाने को राजी किया गया था। पत्नी बनते ही उसके बाद किसी और की दरकार क्यों हो जाती है ? वो पति जो लोगों के लिये प्राप्य है वो खुद को संतुष्ट क्यो नही कर पाता ?
 
क्या कहा ? ये सब बातें लंच बॉक्स से संबंधित तो नही। अरे नहीं, नही सब बाते कहाँ है लंचबॉक्स से संबंधित। ये तो वो बातें है, जो मेरे मन में आईं लंचबॉक्स देखने के बाद।
 
खैर प्रश्न तो और भी आये ये भी कि ये असहज से रिश्ते कितने दिन तक सुकून दे पायेंगे। ये रिश्ते जिनकी नींव कुछ मैसेज होते हैं, उन पर खड़ी दीवारों की उम्र क्या होती होगी ? और फिर क्या ये भी एक जगह जा कर उसी एकरसता का शिकार नही हो जाते होंगे ? ना होते तो वक्त की माँग पर यही रिश्ते लीगल हो जाते।
 
कुछ लोंगों को फिल्म के अंत को ले कर शिकायते हैं। असल में लोग प्ले और मूवी में अलग अलग उम्मीदों के साथ जाते हैं। यहाँ कुछ प्ले जैसा माहौल था। सबका अपना अपना नज़रिया, मगर मुझे लगा कि इन असहज रिश्तों का सहज अंत संभव भी नही था।
 
मूवी और भी कई जगह संवेदनाओं को हिलाती है। वो आंटी, जो मूवी में सिर्फ अपनी आवाज़ के साथ है, वो माँ जो कितने दिनो से पड़े पिता की एक ही तरह से सेवा कर रही है। इस महीने का इंतजाम कर के अगला महीना भगवान भरोसे छोड़। ये सारे लोग भले ही अलग से लगते हों, लेकिन हैं हमारे आपके बीच।
 
आंटी का ओरिएंट पंखा जमाने से नही बंद हुआ। वो चलते पंखे की सफाई कर देती हैं, क्योंकि अगर वो पंखा बंद हुआ तो कोमा में पड़े अंकल की साँसे बंद हो जायेंगी। सोचिये, किसी को बिस्तर पर ही सही, देखते रहने के लिये हम क्या क्या जतन करते हैं। ये हम मनुष्यों का कितना अजीब स्वभाव है।
 
लंग कैंसर से जूझ रहे पति की सेवा करती एक और औरत उसकी मृत्यु के बाद कितने सहज अंदाज में कहती है "बहुत भूख लगी है, मन हो रहा है कि पराँठे खाऊँ।" दिल दहल जाता है, उस औरत के वक्तव्य पर। वो बिलख कर रोती तो उतनी संवेदनाएं ना उपजतीं, जितनी उसके ऐसा कहने पर उपजती है।
 

शेख का कहना " हाँ सर अनाथ तो हैं हम। लेकिन मेरी माँ ऐसा कहती थी के साथ बातें कहना बात का वज़्न बढ़ाता है।" बड़ी सीधी सच्ची सी बातें। बिना किसी लाग लपेट। दिमाग को बहुत सारे विचार दे गई ये मूवी, मेरे लिये बस इसलिये भी विशेष हो जाती है, क्योंकि बहुत दिनो बाद लगातार सवा घंटे किसी चीज पर लिख पाई।

Sunday, August 5, 2012

वो चबूतरा....






  शाम का इंतज़ार करते हम और हमारा इंतज़ार करता चबूतरा। हमारी दिन भर की कारगुजारियों का कच्चा चिट्ठा वहीं तो खुलता था। खिलखिलाता, गुनगुनाता, एक दूसरे का मजाक उड़ाता, एक दूसरे के टेंशन से रात ना सोये जाने के किस्से भी सुनता।
त्यौहारों की ड्रेस, शादियों की तैयारी, मैचिंग्स की टेंशन, मेंहदी की डिज़ाइन सेलेक्ट किये जाने का साक्षी रहा है वो।

शाम बीत जाने पर, फिर शायद लाइट जाये और फिर से चहक उठे वो पत्थर इसका इंतज़ार हमें तो रहता ही था, उसे भी रहता ही होगा।



सबके चले जाने पर एक टीनएजर और एक बस टीन एज को छोड़ ,  उसी लाइन पर खड़ी दो नाहमउम्र सखियों की गुपचुप बातें सुनता वो... बरसात में कभी कभी जब बूँदे दिन भर नही टूटतीं, तो तलब ऐसा बुरा हाल करती कि भीग भीग कर बतियाया जाता। जाड़े की वो शाम, जो अब लिहाफ में भी कँपकँपाती है, उन दिनो सामने से आती खुले मैदान की सरसराती हवा में भी डरा नही पाती।

एक दूसरे के इमोशनल टेंशन आज बढ़ती मँहगाई के टेंशन से ज्यादा बड़े थे। बिना आगे पीछे सोचे एक दूसरे के लिये हाज़िर

भूल नही सकती जब फरवरी की ठीक दोपहर मैने श्वेता का गेट खटखटा कर कहा था "मंदिर चलोगी ?" और उसने बिना किसी प्रतिप्रश्न के कहा " चप्पल पहन लूँ।"


मेरी व्हीलचेयर को चलाती वो बिना किसी प्रश्न के मुझे मंदिर तकल ले आई। दोपहर में जब भगवान जी सोते हैं, तो सीढ़ियाँ खाली होती हैं। उन्हें उसी नींद में प्रणाम कर मैं, मंदिर की सीढ़ियों पर बैठ गई। वो बगल में बैठ गई। मैं रोती रही, रोती रही और उसने एक बार भी रोने का करण नही पूछा। जब जी भर गया तो मैने व्हीलचेयर की तरफ नज़र उठाई, बिना कहे व्हील चेयर मेरे पास ले आई वो और हम फिर से उसी चबूतरे पर। शाम की बैठक में हँसते, खिलखिलाते। बिना किसी को किसी खबर के, कि अभी एक सैलाब को बिना बाँध के बह जाने दिया गया है।

४ मई ,२००१ की एक शाम का साक्षी वो चबूतरा, जब हर शुक्रवार की तरह मंदिर से लौट कर इस चबूतरे की बैठक की तलब को कुछ उदासीनता के साथ मिटाया जा रहा था।


सब को मंजिल दूर लग रही थी। मेरा दार्शनिक स्वर  " अँधेरा बढ़ जाये, तो समझो सुबह आने वाली है।"
"और कितना अँधेरा दी ?" उस छोटी दोस्त ने चिढ़ कर कहा।
और उस सुबह के रोजगार समाचार ने हम सब को सुबह की पहली किरण दे दी। मेरा सेलेक्शन हो गया। कुछ ही दिनो में श्वेता को लखनऊ में इंजीनियरिंग कॉलेज मिल गया। पिंकी की शादी तय हो गई। हम से थोड़े छोटे पंछी भी अपने घोंसलो के लिये तिनके बटोरने निकल पड़े। सोनू होटल मैनेजमेंट में, आशीष और एकता बिज़नेस मैनेजमेंट में। अब तो सब को प्लेसमेंट भी मिल चुका है।

अगले छः महीनो में हम अपने सवेरे सँवारने निकल चुके थे।

आज जो कुछ हो रहा है, तब सब सपना लगता था। अब वो सब सपना लगता है जो तब हुआ करता था। सब के सब उन दिनो को कम से कम एक दिन तो उसी तरह जी लेना चाहते हैं। मगर......!!!


हम सब उड़ गये। हमे उड़ना सिखाने वाले बहुत खुश हुए और बहुत रोये। हम सब ने अपनी अलग अल॓ग दुनिया बना ली है। हम में से किसी को नही मालूम कि हमारा आज का सबसे अच्छा दोस्त कौन है। फेसबुक पर एकदूसरे के अपडेट्स लाइक कर के हम दोस्ती निभा ले रहे हैं।

मगर हमें उड़ने सिखाने वाले, फिर कोई दुनिया नही बसा सकते थे। वे सब बहुत अकेले हो गये। अब वो चबूतरा उनकी बातें सुनता है। हम सब की माँएं शाम होते होते वहीं इकट्ठी हो जाती हैं अब.... उसी चबूतरे पर....!!! वो सब एक दूसरे की बहुत अच्छी दोस्त हैं।


 

Friday, June 1, 2012

ना खुशी, ना ग़म....

पिछले ९ सालों में उस बाज़ार के सारे भिखारी अब शक्ल से पहचाने जाने लगे हैं।

वो बूढ़े दादा..जिनके पास गुदड़ियों का एक पूरा भंडार है। जिनकी दाढ़ी भी उलझ उलझ कर गुदड़ी ही बन गई है। वो तीखे नाक नक्श वाली उनकी गाढ़ी साँवली युवा पत्नी..जो उनके साथ कंधे से कंधा मिला कर उनके धंधे में उनका पूर्ण सहयोग देती है।

" ए बहेऽन.. तुम्हारा भईया जियेगा बहेऽन.." अनसुना कर देने पर वजन डालने को वाक्य बदलती " तुम्हारा भंडार भरा रहेगा बहेऽन।" और अगर भूल से उस उपेक्षा के बीच घर का कोई हम उम्र पुरुष वर्ग, जो अंदर किसी दुकान से कुछ लेना गया हो और बाहर आ कर मुस्कुरा कर वो सामान पसंद कराने लगे तो चट से सबसे वजनी डायलॉग " तुम्हारा जोड़ा बना रहेगा बहेऽन।"

एक दूसरे को देख कर मुस्कुरा लेने के बाद उसके अकाट्य वाक्य को काटते हुए जब आप कहते हैं " अरे जाइये दीदी ! नही देना है...! उसका जोड़ा अभी बहुत देर है बनने में और हमारा हमें बनाना नही।" ‌और गाड़ी स्टार्ट कर देते हैं, तो उस घर्रर्रर्र के बीच आप सुनते हैं उसकी स्पेशल बिलासपुरिया भाषा में बढ़ियाँ बढ़ियाँ शब्द जिससे आप इतना तो समझ ही लेते हैं कि ये कोई बहुत सुंदर सी गहन गाली है, जो आपके सम्मान में पढ़ी जा रही है।

थोड़े दिन में आप पाते हैं कि उसकी गोद का लाल आपसे " बहुत भूख लगी है" की दुहाई दे रहा है और वो तीखे नैन नक्श वाली अपने पति से तिहाई उम्र वाली नारी पूरे दिनो से है और अपने पेट की तरफ इशारा कर के आप से कहती है " ए बहेऽन... तेरा लाल जियेगा बहेऽन..दो दिन से कुछ भी नही खाया।"

आपका कसैला मुँह कहना चाहेगा, "जब खाने को नही है, तो ये रेल गाड़ी के डिब्बे..." मगर आपको याद ही हैं वो गहन शब्द.. तो आप या तो अपनी बाईक स्टार्ट कर जगह बदल देते हैं या फिर अपने देखने की दिशा....!!

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परसो उसकी शादी की पहली वर्षगाँठ है, मैं दोनो को पैसे देती हूँ, अपने पसंद का कुछ ले आने को। वो जिद करते हैं साथ चलने को। " कपड़े पसंद करने में आसानी रहेगी।"

अंदर शॉप में वो दोनो साड़ी पसंद कर रहे हैं... शीशे के पीछे से वो लोग दूर से ही दिखा रहे हैं साड़ियाँ और फोन पर सड़क से हाँ या ना बोल रही हूँ।

पसंद साड़ियाँ पैक कराने के बीच के गैप में तटस्थ अपनी कायनेटिक पर बैठे बैठे दुनिया देख रही हूँ। शनि महाराज एक लोहे के टुकड़े और 7-8 फूलों वाली माला के साथ कई लोगो का पेट पालने में सहायक बने हुए हैं।

एक बच्चा आता है। "आंटी.." कह कर हाथ फैलाता है।
मैं ना कर के मुँह घुमा लेती हूँ।

दूसरा बच्चा दिखता है। अपने अपने पतले पतले पैरों के साथ घिसटते हुए। मन में जो करुणा उपजती है, उसका नाम शायद "सम वेदना" है। हाथ पर्स की तरफ बढ़ता है और फिर रुक जाता है, कुछ सोच कर..नही ये ठीक नही, इस प्रथा को बढ़ावा देना...

वैसे उसने कुछ माँगा भी नही है। बस बाइक के अगले पहिये से सट कर बैठ गया है। थोड़ी देर में आवाज़ आती है।

 "अंटी"
"हम्म्म ?? "
" ये गाड़ी कित्ते रुपए में मिलती है ?"
" क्यों ? खरीदना है ?"
वो हाँ में सिर हिलाता है।
" तो पढ़ाई करते हो?"
वो शरमा कर ना में सिर हिला देता है।
" तब कैसे खरीदोगे ? इसे खरीदने के लिये तो बहुत सारी किताबें पढ़नी पड़ती है। देखो तुममें हममे कोई फरक थोड़े है। बस हमने पढ़ाई की तो हम अब ऐसी गाड़ी खरीद सकते हैं और तुम भी पढ़ोगे तो तुम भी खरीद लोगे..बल्कि किसी को खरीद कर भी दे सकते हो। बताओ ? करोगे पढ़ाई ? तो हम तुम्हे पढ़ा देंगे खूब ज्याद।" मैं अपने दोनो हाथ हवा में पसार देती हूँ, कायनेटिक पर बैठे बैठे ही।
उसने फिर सिर ना में हिला दिया।
 " नही.. ? क्यों ????"
"हमाअ् मन नही लगता है।"
"तब कैसे लोगे ये गाड़ी ? बिना पढ़ाई के तो नही मिल पायेगी।"
" ले लेंगे..।"
" कैसे ?"
" एक साल तक पइसा माँगेगे औ खरच नही करेंगे.. आ जईहै गाड़ी।"
मुझे हँसी आ जाती है सकारात्मक नकारात्मकता पर।
" अरे...? पइसा माँग माँग कर तुम गाड़ी खरीद लोगे ?"
"हाँअ्" वो भोले पन के साथ गर्दन टेढ़ी कर के कहता है।
" अच्छा.. ?? चलो गाड़ी खरीद भी लोगे, तो चलाओगे कैसे ? पेट्रोल का पैसा कहाँ से आयेगा ? वो भी माँग लोगे ?"
"हाँअ्" वो अपनी उसी अदा के साथ जवाब देता है।
"अरे पेट्रोल भराने को कौन देगा तुम्हें पैसा ?"
" दे देंगे..!" वो बड़े आत्मविश्वास के साथ जवाब देता है।
" कौन देगा ?? कोई नही देगा... हम तो नही देंगे।" मैने लगभग खीझते हुए जवाब दिया।
" तुम तो पहले भी कउन दे देती थी। सब तो कहिते हैं, ऊ चरपहिया स्कूटर वाली अंटी से ना माँगना कभौ देती नही हैं लेच्चर से अगल बगल वाल्यो भड़क जाउत हैं।"

मुस्कुराने के अलावा कर भी क्या कर सकती थी मैं... मगर आज १३ दिन हो गये...इस धंधे से जुड़े समाज के मनोविज्ञान को, उनकी दिनचर्या को, उनकी सुख दुःख को समझने और समझ कर उस पर कुछ लिखने के लिये अपने को बेचैन पा रही हूँ।

Monday, April 23, 2012

क्यों ना बैसाखी हवाओं पर चले आते हो तुम भी






पिछले वर्ष  लगभग इन्ही दिनों गुरू जी के ब्लॉग पर ग्रीष्म का तरही मुशायरा  हुआ था। वैशाख आया भी और जाने को भी है, तो सोचा लाइये ये मौसमी बयार यहाँ भी चले.....



दोस्त सी आवाज़ देती, गर्मियों की वो दुपहरी,
और रक़ीबों सी सताती, गर्मियों की वो दुपहरी।

ओढ़ बैजंती के पत्ते, छूने थे जिसको शिखर उस,
ज़िद से करती होड़ सी थी, गर्मियों की वो दुपहरी।

गुड़ छिपे आले में मटके में मलाई की दही है,
राज़ नानी के जताती, गर्मियों की वो दुपहरी।

धप की आवाज़ों पे चौंके कान ले कर दौड़ती फिर,
फ्रॉक में अमिया छिपाती, गर्मियों की वो दुपहरी।

शादियाँ गुड़िया की, गुट्टे और कड़क्को खेलने पर,
त्यौरियाँ माँ की चढ़ाती, गर्मियों की वो दुपहरी।

सर्दियों की रात भर माँगी थी हमने जो दुआएं,
उनको तासीरें दिलाती, गर्मियों की वो दुपहरी

आह में भी लू थी, मन में भी बवंडर धूल जैसे,
इश्क़ में दुगुनी तपी थी, गर्मियों की वो दुपहरी।





शाम को मिलने का वादा, करवटों में जोहती थी,

रात से ज्यादा सताती, गर्मियों की वो दुपहरी।

क्यों ना बैसाखी हवाओं पर चले आते हो तुम भी,
कयों ना तुमको भी सताती, गर्मियों की वो दुपहरी

शोर करती हर तरफ फिरती तुम्हारी याद जानाँ
और सन्नाटे में डूबी गर्मियों की वो दोपहरी





नोटः एक बात जो तब भी लिखी थी, पहला शेर समझने के लिये (मतले के बाद वाला)


गर्मियों को याद करो तो जो बात सबसे पहले याद आती है, वो है ४ साल की उम्र में कम से कम कपड़ो में बैजंती के पत्तों से ढके शरीर का जेठ की चटक दोपहरी में लिटा दिये जाना। उसे काटने का तरीका था, वो सपना जीना जो दीदी बताती रहतीं, बस थोड़ी देर और बस... फिर तुम भी ना माधुरी की तरह, मुन्नी की तरह दौड़ने लगोगी... जैसे बहुत सा कुछ.....मतले के बाद वाला शेर उसी पर लिखा है।


चित्रः साभार गुरू जी श्री पंकज सुबीर  

Wednesday, April 18, 2012

दिल वाले दुल्हनिया ले जाएंगे....

जिंदगी का सफर जब शुरू होता है, तब पता भी नही होता कि मंजिल तक पहुँचते पहुँचते कितने अंजान चेहरे अपने लगने लगेंगे। लगता ही नही कि सफर की शुरुआत में ये जिंदगी में थे ही नही।

ऐसा लगता है कि ये तो जमाने से हमारे साथ ही थे।

ऐसा ही एक चेहरा है मेरे लिये प्रकाश सिंह अर्श...

२८ अप्रैल, २००९ को एक पोस्ट लगाने के बाद इनबॉक्स में एक मैसेज मिलता है कि मुझे आप से कुछ चर्चा करनी है। ग़ज़ल के बारे में चर्चा और हमसे...?? हम इसी बात से खुश हो जाते हैं। हम ने खुशी खुशी उन महाशय को तुरंत अपनी जीचैट में ऐड कर लिया। चूँकि ये साहब गुरुकुल के पन्ने पर हमेशा दिखाई देते थे, तो किसी प्रकार का खतरा भी कम ही लगा। ऐड करते ही श्रीमान आनलाइन दिखे।

me: ji arsh ji dekhiye aap ne charch ki baat kahi
aur ham hazir
pro.singh@gmail.com: namskaar kanchan ji kaisi hai aap?
me: namskaar
2:36 PM mai theek hun aap kahen
pro.singh@gmail.com: main bhi thik hun aap batayen tabiyat kaisi hai aapki ab ???
me: aaram hai
pro.singh@gmail.com: aaj bahot dino baad aapki gazal padhee bahot hi achhe lagi
me: jee 2:37 PM aakhiri she'r ke kya kahane
me: thanks
pro.singh@gmail.com: bahot hi khubsurati se likhaa hai aapne
me: bahut bahut shukriya

और इसके बाद वो श्रीमान आ गये, उस बिंदु पर जिससे हम सबसे ज्यादा डरते हैं। मतलब ग़ज़ल के व्याकरण संबंधी चर्चा पर...! अब हम वैसे भी काफी दिन से ग़ज़ल कक्षा में नाम लिखाये थे। (ये अलग बात है कि जिस कक्षा में लिखाये थे, आज भी उसी कक्षा में है), तो कैसे कहते शूरू में ही कि हमको कुछ आता जाता नही है भईया। तो हमने क्या किया कि गुरू जी की इस्लाह की हुई ग़ज़ल जस की तस कॉपी पेस्ट कर दी और मन में सोचा "लो बख्शो भईया"

लेकिन जो बख्श दे वो प्रकाश सिंह अर्श कहाँ ?

किसी दूसरे दिन की चैट के अनुसार इनकी स्वीकारोक्ति

  4:30 PM me: :) achanak jaan pad gaya tha sorry boos ne bula liya tha
pro.singh@gmail.com: nahi nahi main maaf nahi karta

तो चर्चा आगे जाने की जिद पर थी।

pro.singh@gmail.com: ya hamse ke jagah pe hamsaa hoga ????
plz aap dekhe meri baaton ko anyathaa naa le aap its my reuest???????

me: are nahi bhai
  2:47 PM aap to Gurubhai ho hamare aap ki baato ka bura kya manana

  pro.singh@gmail.com: chalo isi bahaane mujhe ek bahan mil gayee guru bahan badhaayee is baat ke liye pahale to

me: aap ko bhi aur mujhe bhi
  2:51 PM aur jahan tak tumhare proffile se pata lagta hai, ki tum chhote bhi ho to finally turant se aap chhod rahi hun ( असल में बालक ने उस समय अपनी प्रोफाइल पर उम्र २० वर्ष लिख रखी थी और फोटो भी उसी हिसाब की :) I mean छोटा तो है ही, लेकिन उतना भी नही जितना मैं समझ रही थी ;) )

pro.singh@gmail.com: ha ha ha
  thik hai
bahano ke ye hak hai aapko
me: vaise bhi chhoto ko bahut der aap kah nahi paati
pro.singh@gmail.com: main to aap hi kahunga
me: aur kya tumhe to kahana h hai aap :)
pro.singh@gmail.com: jo hukam
bahan bante hi hukum chalaane lage
  jaise aagaya
2:54 PM ha ha ah a

3:00 PM me: hmm

pro.singh@gmail.com: aakhiri sher bahot hi kamaal ka hai
3:08 PM jitni taarif karun kam hai
aapse pahali baar baat ho rahi hai achha lag rahaa hai
isi bahaane mmujhe ek bahan milgayee

me: jab ki us sher ko lekar mujhe bahut doubt tha
3:09 PM pro.singh@gmail.com: nahi nahi bahot hi clear hai aur utnaa hi mukammal

me: mujhe lag raha tha, ki aadhi matra ki galati hogi
ye jab bhi tumhe tumhare shabd aata hai mai confuse ho jaati hun

pro.singh@gmail.com: tumhaare pe aapka doubt tha?
ha ha ha
nahi nahi aisi koi baat nahi hai

3:10 PM me: mai ghazal vazal likh nahi paati hun na itani mehanat kar pati hun

pro.singh@gmail.com: ha ha ha magar jab likhti hai to kamaal ka
  me: itani mathapachchi
pro.singh@gmail.com: yahi uche logon ki pahchaan hoti hai

me: ha ha
3:11 PM pro.singhgmail.com: aur kya sahi to kah rahaa hun
me: tum me bhi chhote bhi ke gun aa hi gaye turant
pro.singh@gmail.com: wo kaise?
kaisa gun ?
3:12 PM me: are yahi turant bahan ki taarefo ke pul bandhane lage
pro.singh@gmail.com: ha ha ha
bahan jee ko pata rahaa hun taaki kuchh sikh sakun
ha ha ha
  3:14 PM me: ghalat jagah bayaana liya hai
bahan khud hi abhi nausikhiya hai :)

और इस तरह सफर में जुड़ता है एक और मुसाफिर ...!

ऐसा मुसाफिर जो मेरा छोटा भाई बन के जुड़ा मुझसे।

इसके बाद तो मीठी मीठी बातें... पिछला रिकॉर्ड देखती हूँ तो पाती हूँ कि कभी मैं भी नाराज़ हुआ करती थी। (अब तो जमाने बीत गये.... खाली अगला ही नाराज़ होता है)

अप्रैल से शुरू हुई पहचान के बाद १६ जून को भाई साहब का पहला फोन प्राप्त हुआ। २० साल के लड़के जैसी आवाज़ तो लगी नही। आवाज़ लगी एक मैच्योर व्यक्ति की...! अच्छी या बुरी ये तो समझ नही पाई, ये समझ में आया कि मैं जिससे बात करती हूँ, उसकी आवाज़ तो नही ही है ये, तो मैने कहा कि मै अभी तुम्हारी आवाज़ और तुम्हे को-रिलेट नही कर पा रही, इसलिये फिर बात करती हूँ।

बीच में वीर जी की मुलाकात भी हुई इन साहब से, तो उन्होने बताया कि वो गीत बहुत अच्छा गाता है और इन्ही बातों में जाने कैसे हँसी हँसी में ये बात होने लगी कि इसकी तो शादी मुझे ही करानी है।

 मैं हमेशा हँस कर कहती कि तलाश रही हूँ।

मेरे जन्मदिन पर मेरी ग़ज़ल को आवाज़ दे कर चौंका दिया था इसने।

और फिर बातों बातों मे पता चला कि बहुत शौक था कि एक बहन हो दोस्त जैसी, मिली बहुत मगर निभा ना पाईं....!

अरे हम तो एक बार जुड़ गये तो फेवीक्विक की तरह चमड़ी निकल कर ही छूटते हैं और हमने पहली राखी भेजी। कहीं छूट के भाग ना जाये, इसके लिये एक नाज़ुक मगर मजबूत बंधन....!!

०४ सितंबर को रूबरू पहली मुलाकात हुई .

फिर जाने कैसे और कब सारी बातें नोंक झोंक में बदल गयीं।

पहले मुझे शिकायत थी कि यार ये बंदा कुछ ज्यादा ही मीठा बोलता है और अब .... कुछ ज्यादा ही हार्श है....!!

दुनिया भर के सामने सीधा सादा। मितभाषी....! कूल....!

जब मेरे सामने होता है, तब पता नही कितना टेढ़ा मेढ़ा...! मुझे एक शब्द ना बोलने देने वाला... गर्म मिजाज़...!

हाँ ..! एक बात खास है। पब्लिक के सामने चाहे जितना बोल लो, वो एक भी जवाब नही देता। लेकिन याद सब रखता है। जब आमने सामने आप और वो हों तब तो समझो आपकी खैर नही। नही सुननी, तो नही सुननी....!

चुप रहने के सिवाय और कोई चारा नही बचता हम जैसों के सामने।

भाई साहब को शिकायत कि मैं खुश हूँ कि तूने मुझे हाशिये पर रखा है....

और मुझे लगता है कि पूरे पन्ने पर हाशिया ही हाशिया रह गया है.....!! :) :) :)

जाने कैसे ऐसा हुआ कि मिलने के भी बहाने मिलने लगे। कभी सिद्धार्थनगर, कभी सीहोर, कभी कानपुर....!!


और फिर हम सपरिवार जुड़ गये।
माँ ... कितने प्यार से कहती है " जब भोजपुरी मे बतियाएलू, तो सचिये लागेला कि हमार आपन बेटी बिया जेसे मन के सऽब सुख दुख कहि सकेनी।"

" अ त आपन बेटी आपन ना लागी तो केकर लागी माँ।" मैं इठला के जवाब दे देती हूँ।

अधिकार पूर्वक माँ का कथन " ए कंचन ! तूही ना देखा अपने भाई के पसंद के बेटी... एतना फोटू आइल बा, एतना जने दुआर छेकले बाड़ें,बकिर तोरे भाई के कउनो बिटीये ना पसंद आवेले।"

" रऊआ चिंता काहें करतानि माँ ! हम कहतानी ना कि हम खोजि के लाएब।" मैं माँ को धीरज बँधाती।

मगर असल में खुद भी नही पता था कि ये वादा पूरा कैसे करना है।

और देखिये ना जैसे सब कुछ लिखा पढ़ा था, पहले से। शायद ये बातें हो ही रहीं थीं इसलिेये कि माध्यम कहीं न कहीं बनना था।

रंजना दीदी से बात होती है, तो बात चलती है ननद की बेटी की। सुघर है, सुशील है, पढ़ी लिखी है... अच्छा लड़का चाहिये।

"एक तो अर्श ही है दीदी।"

"डिटेल...??"

"मै भेजती हूँ।"

और बात पर बात बनती जाती है। चट मँगनी पट ब्याह जैसा कुछ....!! २२ साल में पहली बार कोई फंक्शन अटेंड किया ७ फरवरी को वर्ना इस तारीख पर उत्सव नही मनाती। वो उत्सव था , प्रकाश की सगाई का


और बस आज निकल रही हूँ, उसके साथ, उसकी दुल्हनियाँ लेने...! आप जब ये पोस्ट पढ़ें, तब शायद मैं, अपने
 भाई की शादी के गीत गा रही होऊँ....!!




तो जम के आशीष दीजिये...मन से आशीष दीजिये....!!

  कि " दूल्हा दूल्हन की जोड़ी सलामत रहे.....!!" हम तो चले .....!