30.1.13

ताकि सुरक्षित रहे आधी आबादी

पहले ही स्पष्ट कर दूँ कि यह लेख पूर्णतया व्यक्तिगत अनुभवों और लेखक की सीमित बौद्धिक क्षमताओं के आधार पर ही लिखा गया है। जीवन में संस्कार, संस्कृति, शिक्षा, सामाजिकता आदि के अंश समुचित रूप से विद्यमान रहते हैं अतः विचार प्रक्रिया में उनका उपस्थित रहना स्वाभाविक है। विचार पद्धतियों के मत भिन्न हो सकते हैं, एक छोर पर बैठे व्यक्ति को दूसरा छोर स्पष्ट न दिखता हो, पर बिना दोनों छोरों को समाहित किये कोई संगठित सूत्र निकलना कठिन होता है। दूसरे तथ्यों और सत्यों की उपस्थिति हीन सिद्ध कर देना भले ही बौद्धिक धरातल पर विजय ले आये पर वह विजय समाज की विजय नहीं हो सकती। जीवन एकान्त या घर्षण में नहीं जिया जा सकता है, एक राह निकलनी ही होती है, सबके चलने के लिये। एकरंगी आदर्श की तुलना में बहुरंगी यथार्थ ही सबको भाता है, वही समाज की भी राह होती है।

एक प्रकृति, मैं भी हिस्सा हूँ
बहुत दिनों से इस विषय पर लिखना चाह रहा था, पर पिछले माह हुये घटनाक्रम और सामाजिक परिवेश में मचे हाहाकार ने इस विषय पर चिन्तन के सारे कपाट बन्द कर दिये। लगा कहीं कुछ भी ऐसा लिख दिया जो परोक्ष रूप से भी हाहाकार के स्वर में नहीं हुआ तो हमारी मानसिकता को दोषी मान उसे भी कटघरे में खड़ा कर दिया जायेगा। एक पक्षीय संवेदनशीलता को दूसरी ओर से संवेदनहीनता घोषित कर दिया जायेगा। वादी, विवादी, संवादी, न जाने कितने स्वर उठ खड़े होंगे। भिन्न वादों के बादल धीरे धीरे छट रहे हैं, विवादों के स्वर मंद पड़ रहे हैं, संभवतः यही समय है कि विगत विचारों को संघनित कर एक सार्थक संवाद किया जाये, उन समस्याओं पर जो हमें व्यथित किये हैं, उस मूलभूत माध्यम से जो हम सबको छूकर निकलता है।

पुरुषों के प्रति अपराध और महिलाओं द्वारा महिलाओं के प्रति किये अपराध विषयक्षेत्र से बाहर रखे गये हैं। यह लेख मात्र पुरुषों के द्वारा महिलाओं के प्रति बढ़ते अपराधों पर ही केन्द्रित है और उसी में ही सीमित रहेगा। यद्यपि तीनों प्रकार के अपराध समाज में विद्यमान है और एक दूसरे से प्रभावित भी, पर पुरुषों के द्वारा महिलाओं के प्रति किये गये अपराध कहीं अधिक मात्रा में हैं और कहीं अधिक संवेदनहीन हैं। यदि मात्र उनके कारणों की विवेचना व निदान कर लिया जाये तो शेष दो स्वयं ही सध जायेंगे।

समाज परिवारों से बनता है, परिवार संबंधों से बनते हैं, संबंध व्यक्तियों के बीच पल्लवित होते हैं। यदि समाज के किसी विकार का विश्लेषण करना हो तो चिन्तनपथ संबंधों से होकर जायेगा। मेरी वर्तमान स्थिति में वह प्रमुखतः ४ संबंधों से होकर निकलता है, माँ, बहन, पत्नी और बेटी। कई लोगों के लिये यह चारों संबंध भले ही उपस्थित न हों, पर हमारा अस्तित्व माँ के संबंध और उपकार का ही प्रतिफल है। यह एक विमा तो बनी ही रहेगी, जन्म हुआ है तो संबंध भी बना है। प्रस्तुत लेख में मेरा आग्रह और विचारदिशा बस यही दिखाने की रहेगी कि यदि इन चार संबंधों की संवेदनशीलता को जिया जाये और उसे सदा याद रखा जाये तो उपस्थित समस्या का सहज निदान ढूढ़ा जा सकता है।

माँ की महानता को उजागर करता हुआ पूरा का पूरा साहित्य है, पूरा का पूरा भावनात्मक पक्ष है। जीवन देने से लेकर लालन पालन तक माँ के ममत्व का कोई मोल नहीं, बस उसे एक पक्षीय अहैतुक कृपा ही मानी जायेगी। ममत्व बड़ा ही प्राकृतिक है, हर जीव में विद्यमान है, सब जानते हैं कि किस तरह अपनी संतानों की रक्षा करनी है। यदि किसी भी वस्तु के प्रति कृतज्ञता प्रथम वरीयता में खड़ी है तो वह है माँ की ममता। ऐसा नहीं है कि एक पुत्र इस तथ्य को नहीं जानता है, कोई भी औसत बुद्धि वाले के लिये यह निष्कर्ष निकालना कठिन नहीं है और पुत्र की मौलिक विचारप्रवाहों में इसका महत्व रहता भी है। तब कुछ लोगों में महिलाओं के प्रति आदर क्षीण कैसे होता है, यहाँ तक कि कैसे अपनी ही वृद्ध माताओं को उनके पुत्र ध्यान नहीं देते। उत्तर संभवतः उनके परिवार में ही छिपा रहता है। बच्चे अपने माँ और पिता के संबंधों को ही देख कर सीखते हैं, उन्हें ही अपना आदर्श मानते हैं। उनका आपसी व्यवहार पुत्र के लिये बहुत महत्वपूर्ण होता है।

अब जिन परिवारों में पत्नी को प्यार व सम्मान नहीं मिलेगा, वहाँ के बच्चे क्या देखेंगे और क्या सीखेंगे? जीवन की प्रथम शिक्षा ही यदि महिलाओं के प्रति अनादर की हुयी तो कहाँ तक माँ का किया उपकार बच्चों के मस्तिष्क में सर्वोपरि बना रहेगा। उसे भी लगने लगेगा कि ममता आदि सब भावनात्मक विषय हैं पर पारिवारिक परिस्थितियों में महिलाओं की यही स्थिति है, यही सम्मान है। माता पिता के बीच सामञ्जस्य के आभाव में दो तरह की मानसिकता ही विकसित होती है, या तो पुत्र पिता की तरह रुक्ष व असंवेदनशील हो जाता है या माँ के प्रति अपने उपकार से बद्ध अतिसंवेदनशील हो जाता है, भावुक हो जाता है। दोनों ही परिस्थितियाँ संतुलित विकास में अवरोध हैं। महिलाओं के प्रति हमारे व्यवहार के प्रथम बीज हमारे माता पिता ने ही बोये होते हैं। यदि किसी व्यक्ति ने महिला के प्रति कोई अपराध किया है तो प्रथम प्रश्न माता पिता पर उठना चाहिये, संभावना बहुत है कि उत्तर वहीं मिल जायेगा।

महिलायें आधी आबादी हैं, यदि उनके साथ निभा कर जीना नहीं आ पाया तो हम अर्धजगत से विलग ही अनुभव पा पायेंगे, अर्धशिक्षित ही रह जायेंगे। अनुभव की दूसरी शिक्षा बहन के माध्यम से आती है। हर घर में बहन होनी आवश्यक है, यदि घर में बहन नहीं होगी तो ममता के द्वारा प्राप्त महिलाओं के प्रति संवेदनशीलता भी घुल जाने का भय है तब। एक निकट संबंधी के परिवार को जानता हूँ, सारे पुत्र ही हैं, उनके घर का वातावरण काटने को दौड़ता है, किस समय वहाँ क्या बोल दिया जायेगा, पता नहीं चलता है। ऐसा नहीं है कि सारे परिवार ऐसे ही होते हैं पर बहन का घर में होना पुत्र को महिलाओं के प्रति और संवेदनशील बनाता है। मैं बुंदेलखण्ड से आता हूँ और वहाँ की एक मान्यता मुझे सदा आशा की किरण दिखाती है। वहाँ माँ की कोख तब तक शुद्ध नहीं मानी जाती जब तक वह किसी बिटिया को जन्म न दे दे। संभवतः मेरे घर में भी तीसरी सन्तान के रूप में मेरी छोटी बहन को आना इसी मान्यता की पुकार रही होगी। अत्यधिक पुत्रमोह और पुत्रियों को गर्भ में ही समाप्त कर देने की प्रथा न जाने कहाँ जन्मी, न जाने क्यों जन्मी, कहना कठिन है। पर वही प्रारम्भिक अपराध है, महिलाओं को प्रति और उनका बहनों के रूप में परिवार में न आना एक और कारण है, भाईयों के अन्दर वह संवेदनशीलता न उत्पन्न होने का, जो पुत्रों को संतुलित रूप से विकसित करने के लिये आवश्यक है।

तीसरा और महत्वपूर्ण पड़ाव पत्नी के रूप में आता है। इस पड़ाव में ही पुरुष की समझ और संवेदनशीलता विकसित और परिपक्व होती है, उसे साथ में मिलकर कार्य करने वाला साथी मिलता है। अब तक वह परिवार का अंग रहता था, पत्नी के आने के बाद उस पर परिवार चलाने का उत्तरदायित्व भी आ जाता है। जब मिलकर किसी एक ध्येय के लिये दो लोग कार्य करते हैं, एक दूसरे को समझने के लिये उससे अच्छा माध्यम नहीं हो सकता है। परिवार के माध्यम से समाज से जुड़ना, दूसरे पक्ष के संबंधियों से जुड़ना, समाज को और अधिक समझ पाना, ये सब उस प्रक्रिया का अंग है जो हमें समाज के रूप में रहना सिखाती है। बच्चों को एक प्रभावी नागरिक के रूप में विकसित करना और उन्हें समाज और विशेषकर महिलाओं के प्रति संवेदनशील बनाना, परिवार का ही कार्य है। एक प्रसन्न परिवार संवेदनाओं का केन्द्र होता है, यही वह केन्द्र है जिसका सुचारु और अधिकारपूर्ण संचालन महिलाओं के प्रति अपराधों पर सशक्त नियन्त्रण रख सकता है।

चौथा और सर्वाधिक मधुर संबंध बिटिया का होता है। प्रथम तीन संबंधों में तो पुरुष ने केवल कुछ ग्रहण ही किया होता है, यह वह समय होता है जब कुछ देने की स्थिति में होते हैं हम। किसी बिटिया को पालना और बड़े होते देखना ही महिलाओं की संवेदना समुचित समझने का माध्यम है। व्यक्तिगत अनुभव से ही कह सकता हूँ कि पुरुष के दायित्वबोध का निष्पादन बिटिया के लालन पालन में ही उभर कर आता है, पुरुष के रुक्ष भाव उसी समय अपनी गाँठ खोल देते हैं, पितृत्व के निर्वाह में ही पूर्णता पाता है पुरुष का अस्तित्व। जब आप एक के प्रति लालन पालन का भाव लेकर जी रहे होते हैं तो किसी अन्य के प्रति अपराध का भाव भी कैसे ला सकते हैं।

जो इन चारों संबंधों को पर्याप्त मान देता है, वह सहायक होता है सुख में, समृद्धि में, वह सहायक होता है सभ्यता को उत्कृष्ट स्थान पर पहुँचाने के लिये, वह सहायक होता है ऐसी मानसिकता फैलाने में जहाँ सबका समुचित सम्मान हो, सबका समुचित आदर हो। फिर भी ऐसे तत्व बने रहेंगे जो सधा सधाया संतुलन बिगाड़ने का प्रयत्न करेंगे। कानून व्यवस्था ऐसे ही अपवादों से निपटने के लिये बनी है, सामाजिक व्यवस्था को यथा रूप चलने देने के लिये। वृहद बदलाव पर अन्दर से आता है, भव्यता का प्रकटीकरण पहले हृदय के अन्दर होता है तब कहीं वह वास्तविकता में ढलता है। जो चार संबंध हमें सर्वाधिक प्रिय हैं, उन्हीं में हमारी सामाजिक स्थिरता व संतुलन के बीज छिपे हैं। उन्हीं को साधने से सब सध जायेगा, शेष साधने के लिये तन्त्र उपस्थित हैं।

मुझे बड़ा ही आश्चर्य लगा कि अब तक मचे हाहाकार में कठिनतम दण्ड की बात तो सबने की, जो निसंदेह आवश्यक भी है, पर संबंधों के जिन सशक्त तन्तुओं से एक सार्वजनिक चेतना का विकास संभव था, उस पर सब मौन रहे। अधिकारों की लड़ाई खिंचती है, तनाव लाती है। संबंधों की उपासना जोड़ती है, आनन्द लाती है। हमारे सामूहिक कलंक के मुक्ति का मार्ग संभवतः यही है कि हम सब अपने इन चार संबंधों को प्रगाढ़ करें, और संवेदनशील करें।

(यह लेख राजस्थान पत्रिका के २६ जनवरी विशेषांक में भी छपा है, बंगलोर संस्करण में)

26.1.13

ठंड में स्नान

शरीर से उठती भाप, श्रद्धा का सिन्धु
कुम्भ में कई श्रद्धालुओं को स्नान करते हुये देख रहा हूँ, शरीर से भाप का उठना स्पष्ट देखा जा रहा है। उधर ज्ञानदत्तजी के फेसबुक पर कोहरे और ठंड की व्यापक आख्या भी प्रस्तुत है। परिचितों और संबंधियों से फोन पर बात करते समय स्वर में ठंड के कंपन गूँज रहे हैं, शरीर पर कपड़ों की कई परतें चढ़ी हुयी हैं, उत्तर भारत का सारा कपड़ा अल्मारियों और दुकानों से बाहर आ कँपकपाते शरीरों को आश्वासन दे रहा है। सूर्य के अतिरिक्त जो वस्तु जैसे भी ऊष्मा दे सकती है, अपने कार्य में लगी हुयी है। ऐसे में टीवी पर कुम्भ स्नान के चित्र देखने से श्रद्धालुओं की श्रद्धा की जीवटता का अनुमान लगाने में किसी को भी सन्देह नहीं हो सकता है। एक दो नहीं, करोड़ों शरीर प्रचण्ड ठंड में अपनी शरीर की ऊष्मा आहुति स्वरुप गंगा मैया को चढ़ा रहे हैं, ठंड में भला इससे अधिक क्या आहुति हो सकती है। अब ईश्वर को विवश होकर ही सही, प्रसन्न तो होना ही पड़ेगा।

हम चाह कर भी अपने शरीर की ऊष्मा तज ईश्वर को प्रसन्न नहीं कर पा रहे हैं। क्या करें, यहाँ पर ठंड पड़ती ही नहीं है, ठंड तो क्या यहाँ पर गर्मी भी नहीं पड़ती। ईश्ववर को प्रसन्न करने के दोनों ही मार्ग बन्द हैं। यहाँ बंगलोर में ठंड के नाम पर पूरी बाँह की शर्ट ही पर्याप्त होती है, ठंड का आनन्द चाह कर भी नहीं मिल पाता है। वैसे तो सादे पानी से ही नहा लेते हैं पर कभी कभी विलासिता सूझती है तो गीज़र के गुनगुने पानी से नहा कर थकान दूर कर लेते हैं।

देखा जाये तो स्नान का पवित्रता से नाता है और पवित्रता का ईश्वर से, यही कारण है कि जब भी हम पूजा करने बैठते हैं तो नहा धोकर बैठते हैं। कलियुग में पापों की कमी नहीं रहेगी, चाहेंगे, न चाहेंगे, पाप हो ही जायेगा। प्रत्यक्ष से न होगा तो विचारों से ही हो जायेगा। पाप धुलने का कोई उपाय नहीं, जो हो गया सब खाते में लिख गया। बस पूजा और प्रार्थना ही उपाय बचता है लिखे हुये को धोने का। एक दिन में ही इतने पाप हो जाते हैं कि नियमित पूजा करना आवश्यक है। कभी आप सोच भी लें कि दो दिन में एक बार ही पूजा कर के काम चला लिया जाये तो आपको पिछले दिन के पाप याद ही नहीं आयेंगे, कलियुग में स्मरण शक्ति भी कम कर रखी है ईश्वर ने। ले देकर आप पाप करने को बाध्य हैं, पाप धोने के लिये नित पूजा करने को बाध्य हैं, पूजा करने के लिये नित स्नान करने को बाध्य हैं। ऐसा लगता है कि सारा कालचक्र हमें नित नहाने के लिये ही रचा गया है।

अब आपको लग सकता है कि यदि किसी तरह से पाप करने से बच जायें तो नित नहाने की बाध्यता भी समाप्त हो जायेगी। न पाप करेंगे, न पूजा करनी पड़ेगी और न ही स्नान करना पड़ेगा। विचार सशक्त है, पर ईश्वर ने उसका भी तोड़ निकाल रखा है। आप पाप नहीं करेंगे तो अति सज्जन हो जायेंगे, अति सज्जन होने के कारण आपकी अपने आस पास के लोंगों से पटेगी नहीं। आपके साथ कार्य करने वाले आपको अपने मार्ग का काँटा समझेंगे, आपके पड़ोसी आप पर हँसेंगे। साथी आप पर कुटिल चालों से आघात करेंगे, आपको झूठा ही फँसा देंगे। पड़ोसी आप पर व्यंग बाण छोड़ेंगे। जब आहत और बिंधे हुये घर आयेंगे तो घरवालों से भी पर्याप्त झिड़की खायेंगे। इतना सब होने के बाद आपका तन मन अशान्त हो जायेगा, आप वाह्य विश्व का मैल उतार फेंकना चाहेंगे। मानसिक अशान्ति के लिये पुनः पूजा और पूजा के लिये पुनः स्नान। कुछ भी कर लीजिये स्नान तो ईश्वर आपसे नित करवा के ही रहेंगे। गर्मी हो तो आनन्द से कीजिये, ठंड हो तो कष्ट में कीजिये, बरसात में तो वह स्वयं स्नान की व्यवस्था सम्हाले रहते हैं।

सर्वाधिक पुण्य कमाना हो तो ठंड में ठंडे पानी से ही स्नान करना चाहिये। जानकार कहते हैं कि चाहे आप ठंडे पानी से स्नान करें या गर्म पानी से कष्ट उतना ही होता है और आनन्द भी उतना ही आता है। गर्म पानी से स्नान करने में स्नान करते समय आनन्द आता है पर स्नान के बाद ऐसी कँपकपी छूटती है कि आप कई घंटों तक संयत नहीं हो पाते हैं। वहीं दूसरी ओर यदि आप ठंडे पानी से स्नान करें तो पहले दस सेकेण्ड का ही कष्ट रहता है। पहले दस सेकेण्ड के पश्चात शरीर इतनी ऊष्मा उत्सर्जित करता रहता है कि दिन भर ठण्ड नहीं लगती है। भयंकर से भयंकर ठंड हो, ठंडे पानी में किया स्नान अन्ततः हानि नहीं पहुँचाता है। प्रशिक्षण के समय उदयपुर में और जनवरी के माह में पूरे ३१ दिन तक ठंडे पानी में सुबह सुबह स्नान करने के अनुभव के आधार पर आपको बता रहा हूँ कि ऐसा करने से दिन भर चेतना अपने उत्कर्ष पर रहती है।

वैसे भी गर्म पानी से नहाना आपके लिये पूर्ण आध्यात्मिक शुद्धि लेकर नहीं आयेगा, तब आपको पूजा अधिक करनी पड़ेगी। पानी गर्म करने के लिये या तो आप कहीं से लकड़ी काटेंगे, गैस जलायेंगे या बिजली का प्रयोग करेंगे। इन तीनों ही दशाओं में आप प्रकृति को क्षति पहुँचा रहे हैं। यमराज के यहाँ खुले नये कार्यालय में आपको कार्बन डेबिट मिल जायेगा और आपके पापों पर सरचार्ज भी जुड़ जायेगा। कितना पाप और जुड़ेगा कुछ नहीं कह सकते। जिन्हें रिलायन्स के टेलीफ़ोन बिल चुकाने का अनुभव है, वे ही बता सकते हैं कि दिन भर के पापों से भी अधिक सरचार्ज लग सकता है, स्नान के बाद की गयी पूजा से भी अधिक का। अत श्रेयस्कर है कि स्नान न करें, पूजा न करें पर गर्म पानी से नहाने की सोचे भी नहीं। ईश्वर के नियम ठंड में ठंडे पानी से नहाने की ओर इंगित करते हैं, उनका उल्लंघन निश्चय ही प्रकृतिविरुद्ध है।

स्नान का आनन्द मुक्तमुखी
जब ईश्वर के नियम आपसे जबरिया स्नान करवाने के लिये बने हों तो क्यों न स्नान में आनन्द उठाया जाये। बचपन का सारा समय स्नान में आनन्द उठाने की स्मृतियों से भरा हुआ है। गर्मियों में नदी नहाने में घंटों निकल जाते थे, जितनी देर पानी के अन्दर रहे उतनी देर सूरज के क्रोध को ठेंगा दिखाते रहे, प्रकृति के एक अंग से दूसरे का सामना। गर्मियों में नहाना कष्ट नहीं है, न नहाना कष्ट है, फिर भी नहाने का आनन्द तो उठाना ही होता है। ठंड का स्नान भी बहुधा छत पर होता था, धूप में, कड़वे तेल से मालिश करने के बाद, गिन चुन कर उतना ही जितना शरीर भिगो कर धोने और सुखाने के लिये पर्याप्त हो। ठंड में स्नान करने के लिये मन बनाने, सामग्री एकत्र करने, पहला पानी का डब्बा उड़ेलने में ही घंटों समय लग जाता है, पहला डब्बा डालते ही शेष के सारे कार्य यन्त्रवत कुछ मिनटों में ही सम्पन्न हो जाते हैं। आप अब पूछ सकते हैं कि इसमें आनन्द कहाँ? असली आनन्द तब आता है जब दूसरे को ठंड में स्नान करते हुये देखते हैं और अपनी बारी की प्रतीक्षा कर रहे होते हैं।

ट्यूबवेल और पूल का सम्मिलित आनन्द
छात्रावास में भी स्नान करना अनिवार्य था, न नहाने वालों को विशेष संबोधनों से धोया जाता था। सुबह के समय ट्यूबवेल की धार बहती थी और हम बच्चे एक एक करके दस सेकेण्डों के लिये उस धार के नीचे खड़े हो जाते थे। धार से ही जितना मैल कट जाये उतना ही अच्छा, शेष हाथ से ही रगड़ कर साफ कर लेते थे। कुछ साहसी बच्चे ही साबुन लगा कर पुनः ट्यूबवेल के नीचे जाने की प्रतीक्षा का कष्ट उठा पाते थे। ट्यूबवेल का पानी तनिक गर्म होता है और उतना कष्टकारी नहीं लगता है स्नान। हाँ, स्नानागार से वापस कमरे तक जाने में लगभग ५० मी की दूरी तय करनी होती थी, किस गति से हम अपने कमरे पहुँच जाते थे पता ही नहीं चलता था। यदि वहीं दूरी १०० मी की कर दी जाती तो हमारे छात्रावास के कई कीर्तिमान हो जाते १०० मी फर्राटा दौड़ में।

भारतीय बच्चों को नित नहाने के लिये प्रेरित करने में हमारी माताओं का विशेष योगदान है। यदि मातायें खाना न देने की चेतावनी न दें तो संभव है बहुत से शीतभीरु बालक दो माह स्नान ही न करें। क्या करें, जाड़े में भूख भी तगड़ी लगती है, एक दो दिन उपवास में निकालना कठिन हो जाता है, अब ले देकर नहाना ही पड़ेगा। लीजिये, श्रीमतीजी भी पुकार रही हैं कि आप नहा लीजिये तो नाश्ता लगाया जाये। उठते हैं, नहा ही लेते हैं, कुंभ में इतने लोगों को नहाते देख कर अपनी ठंड तुच्छ ही लग रही है।

हर हर गंगे, सयत्न संचित शारीरिक ऊष्मा का तुच्छ भोग स्वीकार करो, माँ।

चित्र साभार - www.hsj.org, www.health.wikinut.com, http://rural-india-pictures.blogspot.in

23.1.13

बख्शा तो हमने खुद को भी नहीं है

एक साथी अधिकारी के कार्यालय में बैठे थे, किसी समन्वय के विषय पर बात चल रही थी। एक कर्मचारी आता है, एक बड़ी ग़लती के संदर्भ में, आरोप तय हो चुके थे, दण्ड के बारे में बख्श देने की बात कर रहा था। बातों से लग रहा था कि ग़लती हुयी नहीं है वरन की गयी थी और वह भी अक्षम्य थी। अधिकारी अपनी न्यायप्रियता के लिये जाने जाते थे, अच्छे कर्मचारियों के चहेते और ठीक से कार्य न करने वालों के लिये भयकारक। उनका उत्तर सुनकर मैं दंग रह गया। उन्होने कहा कि कैसे बख्श दें, बख्शा तो हमने खुद को भी नहीं है।

बात सच थी, मैं उन्हें जितना जानता था, स्वानुशासन में कसे किसी भी और व्यक्ति से अधिक अनुशासित, किसी भी समय हो, कैसी भी परिस्थिति हो, कार्य के प्रति और अनुशासन के प्रति कठोर। जो स्वयं के लिये कठिन मापदण्ड निश्चित करता है वही दूसरे के प्रति कठोरता भी दिखा सकता है। अनौपचारिक रूप से पूछने पर बताया कि यदि कर्मचारी का व्यवहार उनके प्रति व्यक्तिगत रूप से अप्रिय होता तो उसे क्षमा करने में उन्हें एक पल भी न लगता। आरोप ऐसा था जो रेलवे के प्रति अप्रिय था, उस दशा में क्षमा कर देना उनके अधिकार क्षेत्र के बाहर था। व्यक्तिगत जीवन में अत्यन्त सहनशील और अनुशासित व्यक्ति का प्रशासनिक रूप में इतना कठोर व्यवहार देख मन सोचने को विवश हो गया।

क्षमा शोभती मानुषः
दण्ड के बारे में इतिहासों में न जाने कितने उदाहरण बिखरे पड़े हैं। दो छोर हैं, कम आरोप के लिये अधिक दण्ड और अधिक दण्ड को भी क्षमा कर देने का उदारहृदय। इन दोनों छोरों के बीच में सब प्रशासक अपने आप को पाते हैं। प्रशासनिक मानक सदा ही ज्ञात रहे हैं, किस आरोप के लिये कितना दण्ड हो यह बहुत कुछ नियत है, दण्ड कितने प्रकार के हों यह भी नियत है। मानवीय हस्तक्षेप दो ही रूप में आता है। पहला आरोपों को किस परिप्रेक्ष्य में लिया जाये, गलती अनजाने में हुयी या जानबूझ कर की गयी। दूसरा यह कि यदि उसका दण्ड कम रखा जाये तो भविष्य में पुनरावृत्ति की क्या संभावनायें हैं? इस क्षमा के लिये क्या वह कृतज्ञ रहेगा और भविष्य में अधिक मन लगा कर कार्य करेगा?

हर प्रशासक के लिये मानवीय हस्तक्षेप का अर्थ भिन्न होता है। यह दो कारकों पर निर्भर करता है। पहला कि प्रशासक के अन्दर अपने कर्मचारियों को लेकर कितनी आशावादिता शेष है, आशावादी प्रशासक सदा ही एक और अवसर देने को प्राथमिकता देते हैं। दूसरा कि प्रशासक अपने जीवन में स्वयं ही कितने अनुशासित हैं, अधिक अनुशासित उसी तरह का प्रशासन चाहते हैं जो उन्होंने स्वयं पर लागू कर रखा होता है। आशावादिता और अनुशासनप्रियता दोनों ही अलग विमायें हैं, एक प्रमुखतः सामाजिक है, दूसरी प्रमुखतः व्यक्तिगत, पर मानवीय हस्तक्षेप पर इनका प्रभाव मिलाजुला होता है।

अब मित्र अधिकारी का कठोर निर्णय उनकी क्षीण आशावादिता से अधिक प्रभावित था या अनुशासनप्रियता से, यह स्पष्ट कहना कठिन है। अधिक पूछने का अर्थ उनके अर्धन्यायिक अधिकारक्षेत्र में दखल देने जैसा था, पर इस विषय ने स्वयं के बारे में सोचने को प्रेरित अवश्य किया। मेरे कर्मचारी बहुधा जो पीठ पीछे चर्चा करते रहते हैं. वह परोक्ष रूप से देर सबेर पता ही चल जाती है। उनकी राय में मेरा चित्रण कार्य करवाने में कठोर पर कार्य के समय की गयी गलतियाँ क्षमा कर देने में सहदृय प्रशासक के रूप में किया जाता है। सुनकर बहुत अच्छा लगता है, यदि संस्था का कार्य सिद्ध हो रहा है तो दण्ड का क्या महत्व है? सबको ही कम दण्ड दिया है ऐसा भी नहीं है, कई कठोर उदाहरण भी हैं, पर मुख्यतः निर्णयप्रक्रिया में आशावादिता सर चढ़ बोली है।

मुझे ज्ञात है कि दण्ड के विषय में सहृदय हो जाना लगभग १५ प्रतिशत घटनाओं में उल्टा बैठा है या कहें कि क्षमा किये लोगों पर कोई सुधार नहीं हुया और उन्होंने गलतियाँ पुनः की। लगभग ५० प्रतिशत लोगों पर कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ा, पर वे नकारात्मकता की ओर भी उद्धत नहीं हुये। पर जिन ३५ प्रतिशत लोगों ने क्षमा का महत्व समझा और अधिक श्रम कर अपनी पुरानी गलतियों को भर दिया, वे मेरे लिये दण्ड प्रक्रिया का आनन्द रहे हैं, दण्ड न देने से ही सुधरने वाले। अनुशासन के मार्ग पर मध्यम और आशावादिता के मार्ग पर उच्च विश्वास सदा ही मेरी निर्णय प्रक्रिया को प्रभावित करते रहे हैं।

आशावादिता के निष्कर्ष कई लोगों के लिये १५ प्रतिशत घटनाओं से कहीं अधिक नकारात्मक रहे होंगे। इस प्रतिशत का अधिक होने का अर्थ है, धीरे धीरे आशावादिता से विश्वास उठ जाना। यही सामाजिक और पारिवारिक क्षेत्र में भी लागू होता है, नकारात्मकता की एक घटना किन स्थानों पर किस रूप में सामने खड़ी हो जायेगी, कहना कठिन होता है। किसी घटना को लेकर समाज के स्वर इन्हीें विमाओं के सतरंगे स्वरूप होते हैं, संदर्भों के परिप्रेक्ष्य में सभी अपने अपने स्थान पर सच भी होते हैं। किसी अपराध के लिये कोई मृत्युदण्ड माँगता है, कोई उन्हें सुधरने देना चाहता है, बिना यह जाने कि उन दोनों का का अर्थ है अपराधी के लिये। अपराधी के लिये इन सब माँगों में सब अपने मन को व्यक्त करते हैं, कि यदि अपराध उनने किया होता तो क्या दण्ड मिलना चाहिये?

बड़े महान होते हैं वे जो स्वयं के लिये तो बड़े कठिन मापदण्ड बनाते हैं पर अन्य को क्षमा करने में बड़े उदार हो जाते हैं, ऐसे लोग उदाहरण प्रस्तुत करते हैं उनके लिये जिन्हें उन्होने क्षमा किया है। वहीं दूसरी ओर बड़े ही धूर्त होते हैं वे लोग जो स्वयं के लिये तो रीढ़विहीन मापदण्ड बनाते हैं पर दूसरों को कठिनतम दण्ड देने के लिये सदा उद्धत रहते हैं। दूसरी प्रकार के लोग दण्डप्रक्रिया में नकारात्मकता भरने का कार्य बड़ी शीघ्रता से कर डालते हैं, भययुक्त वातावरण बनने में देर नहीं होती तब।

मैं उत्कट आशावादी हूँ
पता नहीं मैं ठीक करता या नहीं, पर संभवतः उस दिन कर्मचारी को क्षमा कर के एक और अवसर देता, कुछ अच्छा करने के लिये, जिससे उसका ग्लानिभाव कम हो जाये। आरोप व दण्ड का भारीपन जीवन में नकारात्मकता न ले आये, उसमें तनिक सहायक बनने का कार्य करता। उस कर्मचारी के आरोप के आधार पर संभावना अवश्य थी कि भविष्य में मेरा निर्णय सही नहीं ठहराया जाता, फिर भी उत्कट आशावादिता से बच पाना कठिन है मेरे लिये भी।


चित्र साभार - http://www.shutterstock.com, http://www.acceler8or.com

19.1.13

समाचार संश्लेषण

शीर्षक पढ़कर थोड़ा सा अटपटा अवश्य लगा होगा। स्वाभाविक ही है क्योंकि समाचार के साथ संश्लेषण शब्द प्रयुक्त ही नहीं होता है। संश्लेषण का अर्थ है, भिन्न से प्रतीत होने वाले कई विचारों, तथ्यों या वस्तुओं को एकरूपता से प्रस्तुत करना। समाचार तो एक तथ्य है, एक तथ्य में भिन्नता कहाँ से और यदि भिन्नता नहीं तो उसका संश्लेषण कैसा? यदि समाचार के साथ कुछ किया जा सकता है तो वह है उसका विश्लेषण, समाचार विश्लेषण एक सुना हुआ शब्द भी है। समाचार को कई पहलुओं में विभक्त कर उसके कारणों और निष्कर्षों की विवेचना ही उसका विश्लेषण हुआ। विश्लेषण में मत भिन्न हो सकते हैं पर समाचार का तथ्य अभिन्न रहता है।

विकास जब अँगड़ाई लेता है तो जम्हाई के कई स्वर उसमें समाहित हो जाते हैं, जितनी बार अँगड़ाई लेता है उतने ही नये स्वर आ जाते हैं। दूसरी प्रकार से कहें तो जब कोई नया खिलौना बच्चे के हाथ लगता है तो उससे सम्बन्धित नये खेल ढूढ़ लेता है, रचना कर डालता है। जब पहली बार गेंद बनी होगी तो जमीन पर लुढ़का कर खेलने वाला कोई खेल बना होगा, कुछ बॉउलिंग जैसा। धीरे धीरे पिठ्ठू जैसे खेल की अवधारणा बनी होगी। हॉकी, फुटबाल, बॉस्केटबॉल, हैण्डबॉल, टेबलटेनिस, कंचे और न जाने क्या क्या खेल, हाँ हाँ, क्रिकेट भी, बिना उसके खेलों की परिभाषा कहाँ पूरी होगी भला? बॉल के आकार प्रकार के आधार पर खेल बने होंगे, उनके नियम बने होंगे। जब तक बॉल का स्वरूप उस प्रकार का बना रहता है, वह खेल होता रहता है, आनन्द आता रहता है।

यत मतः न भिन्नः
यही विकासक्रम समाचारों पर भी लागू होता है, पहले दूतों के माध्यम से एक आध समाचार आते थे पड़ोसी देशों के, उससे अधिक खेल और छेड़छाड़ नहीं हो पाती थी। स्थानीय समाचार शाम के जमने वाली पंचायतों या बैठकों में चर्चा में लिये जाते होंगे, पर अधिक तो वे भी नहीं होते होंगे। स्थानीय समाचारों में सम्बन्धित व्यक्ति या घटना की जानकारी पहले से ही रहती होगी अतः उसमें भी अधिक छेड़छाड़ की संभावना नहीं रहती होगी। सीमित संवादों से बढ़कर स्थिति समाचारपत्रों और चैनलों तक आ पहुँची है। देश भर के समाचार देखने के लिये पूरा देश ही बैठा है। समाचार भी वही उठाये जाने लगे हैं जो मन में तरंग संचारित कर दें। हर कोई ऐसे ही समाचारों को प्राथमिकता देने लगा, एक होड़ लगी है कि किस तरह प्रतियोगिता जीती जाये, अधिक दर्शक जुटा लेने की।

अब यदि गेंद की तुलना समाचार से करें, तो गेंद के आकार प्रकार से कुछ विशेष तरह के ही खेल खेले जा सकते हैं। उदाहरण स्वरूप, बॉस्केटबॉल से आप लॉनटेनिस नहीं खेल सकते हैं। इसी प्रकार समाचार की प्रकृति के आधार पर आप उसे कुछ विशेष प्रकार से ही व्यक्त कर सकते हैं। यदि आप भिन्न प्रकार की गेंद से भिन्न खेल खेलें तो बॉल का जो हाल होता है, वही हाल चैनल समाचारों का कर रहे हैं। यही नहीं, एक समाचार को इतना अधिक दिखा डालते हैं कि यह पता ही नहीं चलता है कि उसका प्रारम्भिक या मूल स्वरूप क्या था? ठीक उसी प्रकार जैसे किसी एक बॉल को इतना पीटा जाये कि वह चीथड़े चीथड़े हो जाये।

समाचारों की तुलना गेंद से करने का उद्देश्य, किसी समाचार को नीचा दिखाना नहीं। अब कोई घटना हो गयी तो वह पिसेगी ही चैनलों की चक्की में, पिस कर क्या निकलेगी, क्या मालूम? दोष तो घटना का ही है कि वह क्यों हो गयी? मेरी समस्या उन सभी लोगों की समस्या है जिनके पास इतना समय नहीं रहता कि किसी एक समाचार को दो तीन दिनों तक देखें। यदि प्रारम्भ छूट जाता है तो वह समाचार बहुत आगे तक निकल जाता है, बीच में देखने में कुछ समझ भी नहीं आता है। यदि समझने के लिये दूसरा चैनल खोलें तो वही समाचार किसी दूसरी दिशा में भागा जाता हुआ दिखता है। तीसरे चैनल पर वही समाचार तब तक इतना धुन दिया जाता है कि उसकी विषयवस्तु को संयोजित करने में घंटों लग जाते हैं। यदि संशय दूर करने के लिये आप किसी से कुछ पूछ बैठे तो वह भी हँसने लगता है कि घंटे भर बैठने के बाद भी श्रीमानजी को समझ नहीं आ रहा है। उसे भी कहाँ फुर्सत, उसे तो उस समाचार के आगत व्याख्या भी देखनी है, कहीं ध्यान भंग हुआ तो उसे सारे सूत्र पुनः जोड़ने पड़ेंगे।

जहाँ एक समाचार का सागर व्याप्त है, उसके भिन्न स्तरों पर प्रस्तुत पक्ष उपस्थित हैं, इतना अधिक मंथन हो जाने के बाद के विष अमृत जैसे फल उपस्थित हैं, और हम हताश से कुछ न समझ पायें, यह समाचार का कम, हमारी समझ का अधिक अपमान है। यही कारण रहा होगा कि अपनी कमी छिपाने के लिये हम लोगों ने एक नयी विद्या विकसित कर ली है, समाचार संश्लेषण की। निश्चय ही पुराने जन्मों का प्रताप है कि पाँच मिनट में आठ चैनल देखते ही हमें समाचार पूरा समझ में आ जाता है। कहीं थोड़ा कम आता है, कहीं थोड़ा अधिक।

संश्लेषण अच्छा कर सकने के लिये आप को कुछ मूलभूत तथ्य जानने आवश्यक हैं। पहला तो सारे चैनलों की गति जानना आवश्यक है, उस चैनल पर एक समाचार कितना फैल चुका है, यह देखकर ही आप बता देंगे कि घटना कब हुयी थी? दूसरा, इन चैनलों की निष्ठायें समझना आवश्यक है, ऐसा करने से आप उन समाचारों को किस ओर कितना मोड़ कर स्वीकार करना है, यह पता चल जाता है। तीसरा है चैनलों की नये तथ्य खोजने और पुराने तथ्यों को खोदने की सामर्थ्य, इससे आपको विषय की गहराई विधिवत पता चल जायेगी।

इतना विशेष ज्ञान होने के बाद ही आप में वह सक्षमता विकसित हो पायेगी जिससे आप किसी समाचार का संश्लेषण कर पायेंगे। इन गुणों के अभाव में कितना ज्ञान आपके हाथ से रेत जैसा निकल जायेगा, उसका अनुमान लगाना ही कठिन है। एक समाचार पर हर चैनल का पुराना शोध उपस्थित है और नया शोध प्रतिपल उत्पन्न हो रहा है, विवेकानन्दजी की तरह पन्ने पलटकर सब समझ लेने की क्षमता विकसित करनी होगी अन्यथा समाचार के युग में असमाचारी ही रह जायेंगे।

आश्चर्य होता है कि संश्लेषण की इतनी विशिष्ट और ज्ञानपरक विधियाँ विद्यालयों में नहीं पढ़ायी जाती, नागरिकों को उनकी मेधा के अनुसार अस्तव्यस्त सीखने को विवश किया जाता है। आचार विचार से नयी पीढ़ी भले ही वंचित रह जाये, समाचार से जुड़े रहने का मानवाधिकार उससे नहीं छीना जा सकता है। आश्चर्य है, देश महाक्षति की ओर भागा जा रहा है और रास्ते में कोई मोमबत्ती भी नहीं जल रही है?

16.1.13

जाने व आने के बीच की शान्ति

रेलवे स्टेशन पर हुयी एक चित्रकला प्रदर्शनी के चित्रों को निहार रहा था, एक चित्र ने सहसा ध्यान आकर्षित कर लिया। चित्र में दो क़ुली बैठकर सुस्ता रहे हैं और शीर्षक है, द साइलेन्स बेटवीन डिपार्चर एण्ड एराइवल, जाने व आने के बीच की शान्ति। चित्रकार हैं श्री पी सम्पत कुमार।

जाने और आने के बीच की शान्ति
जब चित्र देखा तो रेलवे स्टेशन पर घटने वाली सामान्य घटना का चित्रण लगा वह, एक ट्रेन जा चुकी है, दूसरी आने वाली है, कुलियों के लिये यह विश्राम का समय है। सामान्य यात्रियों को यह दृश्य नहीं दिखते हैं, ट्रेन के आते और जाते समय कुलीगण व्यस्त ही रहते हैं। हाँ, कभी ट्रेन के समय के बहुत पहले पहुँचना हो, किसी कारणवश स्टेशन पर अधिक रुकना पड़ जाये या विश्रामालय में कभी रुके हों और भोजनोपरान्त प्लेटफ़ार्म पर टहलना हो, तभी इस तरह के दृश्य दिखते हैं। हम रेलसेवकों के लिये यह दृश्य नियमित दिनचर्या का अंग है।

हम सबके लिये यह दृश्य भले ही सामान्य हो, पर चित्र को ध्यान से देखें, चेहरे के भाव पढ़ें और शीर्षक पर विचार करें तो यह दृश्य सामान्य नहीं रह जाता है। जीवन के संदर्भों में इस चित्र का दार्शनिक पक्ष बड़ा ही सशक्त है। कुलियों के शरीर तनिक शिथिल हैं, विगत श्रम का परिणाम हो सकता है, कुछ संवाद चल रहा है, संभवतः कार्य से संबंधित वार्तालाप हो या हो सकता है घर परिवार या गाँव का विषय हो। ठेले पर बैठना, श्रम और विश्राम का साधन एक होने की ओर संकेत कर रहे हैं। चित्र मानसिक स्तर पर जो कुछ भी संप्रेषित कर सकने में सक्षम है, वह व्यक्त सा दिख रहा है। रेलवे के बारे में जितना ज्ञान मनस पटल पर होगा, उतने संबद्ध अर्थ दे जायेगा यह चित्र।

दार्शनिक स्तर पर इस चित्र का शीर्षक बहुत कुछ कह जाता है। किसी युवा के लिये सप्ताह के कार्यदिवस सप्ताहान्तों के आनन्द के बीच की शान्ति है, उसका सारा मन इसी बात के लिये लगा रहता है कि कब पुनः सप्ताहान्त आये और वह आनन्दमय हो जाये। किसी कर्मशील के लिये सप्ताहान्त एक शान्ति के रूप में आता है। किसी विरहणा के लिये प्रियतम के जाने और आने की बीच की प्रतीक्षामयी शान्ति, किसान के लिये वर्षा के जाने और आने की बीच की शान्ति, विद्यार्थी के लिये परीक्षाओं के बीच की शान्ति, श्रमिक के लिये रात का विश्राम दो संघर्षरत दिवसों के बीच की शान्ति है, अनुशासित पति के लिये पत्नी के मायके जाने और वापस आने के बीच की शान्ति, राजनेता के लिये एक समस्या के जाने और दूसरी के आने के बीच की शान्ति। हर एक के कर्मक्षेत्र में इस तरह के शान्तितत्वों की उपस्थिति रहती है, जो एक कार्य और दूसरे कार्य के बीच होती है।

लोग प्रकृति को गतिमय मानते हैं, जब गति नहीं रहती है तो उसे शान्ति समझते हैं। थोड़ा गहरे सोचा जाये तो शान्ति ही मूल है, कोई विक्षेप या हलचल उत्पन्न होती है, बढ़ती है और ढल जाती है। शरीर को ही देखें, रात भर पूरा का पूरा तन्त्र लगा रहता है, थकान स्वरूप टूटे और बिखरे तन्तुओं को जोड़ने के लिये ताकि सुबह पुनः ऊर्जस्वित हो जाये, ऊर्जा वह भी स्थिर, बहने को तैयार। एक परमाणु के अन्दर परमाणु बम की ऊर्जा विद्यमान होती है पर वह भी शान्तिप्रियता में रमा रहता है, क्रियाशीलता आने पर ही विस्फोट करता है। समाज के सारे तन्त्र देखें तो वे भी शान्ति में बने रहना चाहते हैं, बिना हिलाये हिलते ही नहीं, उपयोगी हो, अनुपयोगी हों। हमारी क्रियाशीलता प्रकृति की शान्तिप्रिय मन्थर गति से कहीं अधिक होती है, हम विश्व को गतिमय करते हैं और मूल रूप से उपस्थित शान्ति को गतिमयता से उत्पन्न अन्तराल मान लेते हैं।

कर्मशील की बढ़ती एन्ट्रॉपी
ऊष्मागतिकी (Thermodynamics) के द्वितीय नियम को देखें तो वह भी वही इंगित करती है। उथल पुथल का एक मानक होता है, एन्ट्रॉपी, किसी भी तन्त्र के अन्दर उपस्थित ऊर्जा के प्रवाह का मानक। यदि किसी भी तन्त्र को प्रकृति के भरोसे छोड़ दिया जाये, उससे छेड़ छाड़ न किया जाये तो उसकी एन्ट्रॉपी स्वतः कम होती रहती है और अपने न्यूनतम स्तर पर पहुँच जाती है। न्यूनतम स्तर की एन्ट्रॉपी शान्ति का परिचायक है, शान्ति मूल है, प्रकृति शान्तिप्रिय है, हम सृष्टि चलाने के क्रम में उसे गतिमय कर देते हैं, उसे उस स्थिति में छोड़ देने से वह स्वतः ही अपने मूलतत्व में समा जाती है।

सर्वः शान्तिः
बचपन में एक शान्तिपाठ पढ़ते थे, जिसमें प्रकृति के सब तत्वों को शान्ति की ओर जाने का उद्बोधन होता था, हर कार्य के पश्चात, हर यज्ञ के पश्चात। तब तनिक आश्चर्य होता था कि कार्य कर रहे हैं तो शान्ति की प्रार्थना क्यों, प्रकृति तत्वों से शान्ति का उद्बोधन क्यों? तब यह तथ्य समझ नहीं आता था कि प्रकृति का मूल तत्व शान्ति है, हमारा कोई भी उद्योग उसमें विध्न डाल रहा है, पर क्या करें, करना आवश्यक है। शान्तिपाठ प्रकृतिअंगों से उस मूलतत्व में पुनः बसने का आग्रह मात्र है। तो क्या हमारे पूर्वजों के उपक्रम न्यूनतम उथल पुथल पर केन्द्रित थे, यम नियम, जीवनशैली अधिक श्रमसाध्य न हो प्रकृति से ताल मिलाकर चलने वाली थी। ध्यान, समाधि, आत्मचिन्तन, शाकाहार, अपरिग्रह, सब के सब प्रकृति के नियमों से प्रेरित थे, ऊष्मागतिकी के द्वितीय नियम की दिशा में थे। प्रश्न कई हैं, दर्शन गहन है, उत्तर एक दिन में मिलने वाले नहीं, उत्तर बिना अनुभव मिलने वाले नहीं। स्थिर हो जाने की अदम्य चाह कहीं सार्वभौमिक तो नहीं, हम जीवों में।

गतिमयता को सफलता स्वीकार करने वाले, शान्ति के इस अन्तराल को अधिक महत्व नहीं देंगे, उनके मन में तो पुनः आने वाले कार्य के लिये उथल पुथल मची है, उनके लिये तो यह समय भी कार्यतुल्य है। अधिक कर जाने की चाह सफलता का मानक हो जाये तो वह सुख कहाँ से आयेगा जो कुछ न होने की शान्ति से आता है, जो मुक्तिपथ से आता है। बहुतों को लगता है कि उनका जीवन निष्प्रयोजन में ही निकला जा रहा है, उन्हें जाने और आने के बीच की शान्ति की आवश्यकता ही नहीं है। ऐसे कर्मशीलों ने जहाँ एक ओर मानवता को कई उपहार दिये हैं, वहीं दूसरी ओर उन्होने प्रतियोगिता को उन्मादित कर अन्य के लिये विश्व को एक कठिन स्थान बना दिया है। वहीं दूसरी ओर कुछ लोग प्रकृति के सहज उपासना के भ्रम में न्यूनतम से भी कम कर आलस्यविहार में बैठे रहते हैं। कर्महीन नर पावत नाहीं, पर कर्मशील भी सुख को न जान पाये, इस द्वन्द्व में विश्व सदा ही गतिमान बना रहता है।

आप इस अन्तराल को किस प्रकार लेते हैं, यह एक बड़ा प्रश्न है। यह सभ्यताओं के उत्थान और पतन का प्रश्न है, यह प्रश्न संस्कृतियों के वैशिष्ट्य का प्रश्न है, यह प्रश्न संसाधनों के संदोहन का प्रश्न है और यही तन्त्रों के सरलीकरण का प्रश्न भी है। कभी कभी कुछ न होता हुआ दिखना, बहुत कुछ हो चुके होने का प्रतीक होता है, मानवविहीन संयन्त्रों को बनाने के पीछे कितनी मेधाओं का श्रम छिपा है, यह प्रत्यक्ष से कहाँ पता चलता है? सुव्यवस्थित नगर को चलाने के उपक्रम में नेपथ्य में कितना कार्य हुआ होगा, क्या पता? कई क्षेत्रों और देशों में मची उथल पुथल, अव्यवस्था और अशांति, कर्मशीलता के मानक तो नहीं हो सकते। हमारा श्रम व्यवस्था का प्रेरक हो, व्यवस्था शान्ति लाये, यही है मेरे लिये जाने और आने के बीच की शान्ति।

चित्र साभार - http://www.zazzle.com, http://www.indif.com, श्री पी सम्पत कुमार

12.1.13

रोष-नद

हृदय भरता रोष हम किसको सुनायें,
ढूढ़ती हैं छाँह, मन की भावनायें ।।

स्वप्न भर टिकते, पुनः से उड़ चले जाते हैं सारे,
आस के बादल हृदय में, वृष्टि वाञ्छित, सुख कहाँ है ।।

लहर भीषण, विष उफनती, क्रोध में डसने किनारे,
सोचकर क्या हो गयी नत, पुनः बह आयी जलधि में ।।

क्यों नहीं मन शान्त जैसे लहर है स्थित गहन में,
क्यों नहीं मिलता हृदय को एक ऐसा ही किनारा ।।

विकलता अवरोध की बन रोष बढ़ती जा रही है,
काल का निर्णय, नदी को किस दिशा में पंथ प्रस्तुत ।।

जानता, होगा समय का चक्र भी मेरी परिधि में,
नहीं यदि, सुख की असीमित आग फिर किसने जलायी ।।

कोई तो है थपथपाता, व्यग्र हो थकते मनस को,
कोई मन में जीवनी का मार्ग बन कर प्रस्फुरित है ।।

वही बनकर छाँह मन की, रोष नद को पंथ देगा,
बिन सुने ही वेदना को पूर्णतः पहचान लेगा ।।
http://fineartamerica.com

9.1.13

दिल छीछालेदर

जब गैंग्स ऑफ वासेपुर देखी थी तो बहुत ही नये तरह के गाने सुनने मिले थे, अन्य फिल्मों से सर्वथा भिन्न। मैं कोई फिल्म समीक्षक नहीं पर तीन विशेषतायें उसके संगीत में दिखी थीं। पहला, संगीत की धुनें स्थानीय थीं। दूसरा, उसमें बोलचाल की भाषा हिन्दी अंग्रेजी की खिचड़ी के रूप में थी। तीसरा, उसका अर्थ फिल्म में व आज के समाज में व्याप्त भावों को बहुत स्पष्ट रूप से चित्रित करता हुआ था। दिल छीछालेदर उसी फिल्म का एक गाना है।

सभ्य समाज की दृष्टि से देखा जाये तो गैंग्स ऑफ वासेपुर अव्यवस्था और असभ्य आचरण की पराकाष्ठा था, उसमें रहने वालों के मन को टटोले तो वह जीवन के संघर्ष का अनियन्त्रित पथ। जब अव्यवस्था हो तो हर वस्तु और हर विचार के लिये संघर्ष होता है। बिना व्यवस्था विकास नहीं, बिना विकास पुनः संघर्ष, वह भी अनियन्त्रित। गैंग ऑफ वासेपुर में, हो सकता है कि घटनाओं को अतिरंजित और महिमामंडित कर के चित्रित किया गया हो, पर किसी भी स्थान के यथार्थ में स्थिति बहुत अधिक दूर नहीं होगी, कालचक्र देर सबेर वहाँ पहुँचा ही देगा।

न जाने मन के, न जाने बेमन के रंग
जो लोग यथार्थ के इस पक्ष से साक्षात्कार करने से वंचित रह गये हों, उन्हें इस फिल्म का भावार्थ बताया जा सकता है। लूट-खसोट की पर्याप्त संभावनाओं में बाहुबलियों का उदय, हत्या आदि से उत्पन्न किये भय के माध्यम से वर्चस्व की होड़, क्षेत्रों के अतिक्रमणों में संघर्ष और अन्त में सर्वनाश। ये चक्र पुनः उदय होते हैं, कभी छोटे, कभी बड़े, भिन्न भिन्न नामों से, भिन्न भिन्न रूपों से। ये छोटे छोटे उन ब्लैक होलों जैसे होते हैं जो आस पास की सभी चीजों को उदरस्थ कर जाते हैं, विकास को, शिक्षा को, नैतिकता को, संस्कृति को, सहजीवन को। यही नहीं, इनके अन्दर जाकर समय भी अपना अस्तित्व खो देता है, अंघायुग भला और क्या होता होगा, जब काल भी अंधकार में डूब जाये।

अभी कुछ दिन पहले सब टीवी में एक धारावाहिक चिड़ियाघर देख रहा था, एक वाक्य बड़ा प्रासंगिक लगा। 'जब विनाश होता है तो बहुत शोर होता है, निर्माण चुपचाप होता रहता है'। सच ही है, पेड़ एक बीज के आकार से महाकाय हो जाता है, बिना हल्ला किये, धीरे धीरे अपने अवयव धरा से और आसमान से ग्रहण करते हुये बढ़ता रहता है। पर जब वही वृक्ष गिरता है तो तुमुल नाद सुनायी पड़ता है, चारों ओर। संस्कार धीरे धीरे व्यक्तित्व बनाते हैं, कई वर्षों तक, पर जब वह चरित्र टूटता है, मन चीत्कार कर उठता है। अब शोर चाहे गैंग्स ऑफ वासेपुर की हिंसा का हो या वर्तमान की घटनाओं से उपजे जनमानस के आक्रोश का, कुछ न कुछ विनाश की ओर अग्रसर है। जो भी टूटेगा, वह कोई एक दिन में तैयार नहीं हुआ होगा, वह कई दिनों से बन रहा होगा, कई दिनों से धीरे धीरे मन में घर कर रहा होगा।

समाज की गति बहुधा दिखती नहीं है, उसकी गति का अनुमान हम लक्षणों से ही लगाते हैं। लक्षण जब घातक होते हैं, हम उपचार का सोचते हैं, हर तरह के संबद्ध और असंबद्ध कारणों पर दोष मढ़ना प्रारम्भ कर देते हैं, हल्ला मचने लगता है। अभी देखें तो हल्ला नहीं, वरन छीछालेदर मची हुयी। मनीषजी के ब्लॉग पर 'दिल छीछीलेदर' गाने को देखा तो सारा घटनाक्रम इस फिल्म से अनुनादित होता हुआ सा लगने लगा।

यह छीछालेदर कहाँ से प्रारम्भ हुयी होगी? बचपन में एक कहानी सुनी थी। एक लड़का कहीं से कुछ चोरी करके लाया, उसकी माँ ने रोका नहीं। धीरे धीरे उसकी हिम्मत और बढ़ गयी, बड़ी बड़ी चोरियाँ करने लग गया, कालान्तर में पूर्ण विकसित डकैत बन गया। पकड़ा गया, फाँसी के पहले अन्तिम इच्छा पूछी गयी तो माँ के कान में कुछ कहना चाहा। कहने के बहाने माँ का कान काट खाया, पूछने पर बताया कि यदि बचपन में माँ ने पहली चोरी पर ही रोक दिया होता तो यह स्थिति न आती। कहीं न कहीं तो आँख मूँदी गयी होंगी, कई बार जानकर भी कुछ नहीं बोला गया होगा, कई बार किसी कठिनाई में पड़ने पर बचाया भी गया होगा। नकारात्मकता एक दिन में तो विकसित नहीं होती है, कई लोगों का हाथ रहा होगा, कई घटनाओं का हाथ रहा होगा।

समाज में परिवर्तन की गति बहुत धीमी होती है, यही कारण है कि छीछालेदर दिखायी नहीं पड़ती है, वीभत्स नहीं लगती है, पर अन्दर ही अन्दर होती रहती है। विरोध तभी होता है जब असहनीय हो जाता है। यदि छोटी छोटी बातों को गम्भीरता से लिया जायेगा तभी यह सम्भव हो सकेगा कि कोई बड़ी छीछालेदर न फैले। निश्चय ही कानून व्यवस्था अपना कार्य करती है, अपवादों को चिन्हित करती है और उन्हे दण्डित करा के एक उदाहरण स्थापित करती है कि भविष्य में यह न फैले। पर अव्यवस्था का परिमाण इतना अधिक हो चुका है कि उसके लिये छीछालेदर से अधिक उपयुक्त कोई शब्द नहीं। कानून और न्याय व्यवस्था निश्चय ही इतना सब समेटने में सक्षम नहीं, उसकी भी अपनी सीमायें हैं, उसमें भी वही लोग हैं जो समाज का ही अंग हैं, उनके अन्दर भी वही गुण दोष हैं जो समाज में व्याप्त हैं, उनके अन्दर भी वही मूल्य हैं जो समाज के सम्मिलित मूल्य हैं।

छीछालेदर पर बहुत तेजी से फैलती है, संक्रमित होती है। इस अवस्था में सर्वाधिक हानि उनकी होती है जो सज्जन होते हैं, उनके अन्दर वह प्रतिरोधक क्षमता नहीं विकसित हो पाती है जिससे वे स्वयं को बचा सकें। अपवाद बनने से अच्छा है कि समाज की धार में बह चलें, एक आध दोष स्वीकार्य होने लगते हैं, एक आध दोष इंगित करने से छोड़ दिये जाते हैं, अपनत्व दोषों से अधिक महत्व पा जाता है, दोष शक्ति का पर्याय बनने लगते हैं, शक्ति दूषित होने लगती है।

संस्कृतियों पर कटाक्ष समाधान नहीं है, समाज एक प्रक्रिया से होकर निकला है, छीछालेदर एक दिन में नहीं फैली है, दशकों ने इसे सहारा दिया है। जब प्रक्रिया से दोष उपजे हैं तो प्रक्रिया से दूर भी होंगे, प्रक्रिया लम्बी होगी, प्रक्रिया पीड़ायुक्त होगी, प्रक्रिया प्रतीक्षा करवायेगी। तीस दिन में अंग्रेजी सिखाने वालों की तरह समाधान देने वालों के वक्तव्य बड़े सीमित दृष्टिकोण के दोष से ग्रसित हैं। तीस दिन सब ठीक हो जाने की आस रखने वाले अतिआशावादी हैं। दिल छीछालेदर है तो आनन्द छीछालेदरी में ही आयेगा। छीछालेदर समेटने में बहुत श्रम लगेगा, साथ ही साथ यह भी तो निश्चित करना होगा कि कोई और कहीं पर भविष्य के लिये छीछालेदर फैला तो नहीं रहा है? समाज का छीछालेदर आज से ही समेटना प्रारम्भ कर दीजिये। हो सकता है कि आज सड़क पर छीछालेदर पड़ा हो, कल हवा चलेगी तो आपके यहाँ भी उड़कर आ जायेगा यह छीछालेदर।

छोड़िये वह सब, आप गैंग्स ऑफ वासेपुर की ही छीछालेदर सुन लीजिये।
चित्र साभार - http://www.ilovephilosophy.com

5.1.13

कांजी हाउस - गाड़ियों का भी

बंगलौर में कई बार सड़क से जाते समय देखता हूँ कि एक क्रेनयुक्त वाहन खड़ा रहता है जो ठीक से पार्क न किये हुये दुपहिया वाहनों को लादता है और कहीं जाकर छोड़ आता है। संभवतः गाड़ियों का भी कोई कांजी हाउस होता होगा, जो आवारा गाड़ियों को रखने के काम आता होगा।

आवारा वाहनों को समेटती क्रेन
अब बंगलौर में इतने वाहन हैं कि घरों में उन्हें खड़े करने का स्थान ही नहीं है, हर पाँच घर में एक चौपहिया। यदि सारी गाड़ियों का क्षेत्रफल निकाला जाये और उसे सड़कों के क्षेत्रफल से घटा दिया जाये तो चलने के लिये बहुत कम स्थान ही बचेगा। प्रतिदिन 7000 वाहनों के पंजीकरण के बाद वह दिन शीघ्र ही आयेगा जब सारी सड़कों का उपयोग केवल वाहनों की पार्किंग के लिये किया जायेगा, तब किसी एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाने के लिये समय पहले से ही आवंटित कराना पड़़ेगा, लम्बी लम्बी प्रतीक्षा सूचियाँ बनेगी। अपने वाहन में एक बार यात्रा कर लेना लॉटरी लगने जैसा हुआ करेगा, मंत्रीगण संस्तुतियाँ किया करेंगे।

ऐसा नहीं है कि यहाँ पर लोगों को भान नहीं है, पर क्या करें हर किसी के पास वाहन है और हर किसी को उसको उपयोग करने का मन भी होता है, कभी दिखावे के लिये, कभी आवश्यकता के लिये। किसी भी बाज़ार जाने पर गाड़ी की पार्किंग कर पाना एक विशेष उपलब्धि होती है। बाज़ार के चहल पहल के क्षेत्र में परिचालन बाधित न हो, इसके लिये पुलिस ने उन क्षेत्रों में पार्किंग प्रतिबंधित कर रखी है। लोगों का मन फिर भी नहीं मानता है, उन्हें लगता है कि जब बड़े बड़े अपराधों में पुलिस उलझी हुयी है, अधिक गम्भीर आर्थिक संभावनाओं में पुलिस उलझी हुयी है, तो छोटा सा और कुछ समय के लिये किया गया नियम उल्लंघन भला कहाँ से पुलिस की दृष्टि में आ पायेगा?

परंपरागत कारणों से भले ही पुलिस विशिष्टजनों को छोड़ दे पर आमजनों से उसकी पैनी दृष्टि कभी नहीं हटती है। आप छोटा सा नियम उल्लंघन कर के तो देखिये, गिद्ध जितनी दूरी से देखकर कोई न कोई आपको बताने आ जायेगा कि आपने क्या अपराध किया है और किन रूपों में वह विस्फोटित होता हुआ गम्भीर अपराध बन सकता है। आप तब समर्पण के सिवाय कुछ और सोच भी नहीं सकते हैं। पुलिस जनों की सामान्य प्रवृत्तियों को छोड़ भी दिया जाये तब भी आपका बचना असंभव है। आप किसी एक सुनसान पड़े चौराहे पर समय बचाने के लिये लाल बत्ती पर निकल जाते हैं, घर में ५ मिनट पहले पहुँच कर दो तीन दिनों में इस घटना के बारे में भूल भी जाते हैं, पर सहसा आपके घर में दण्ड भरने का नोटिस आ जाता है, नियम उल्लंघन के चित्र के सहित। आपकी चतुराई धरी की धरी रह जाती है, आप आगे से ऐसा न करने का वचन कर डालते हैं, अगले अवसर तक।

कई लोग यातायात पुलिस की अन्तर्यामी दृष्टि से सुधर चुके हैं पर सबको इसका स्वाद कहाँ मिला है अभी तक। सो नियम उल्लंघन होते रहते हैं और आँखमिचौनी का खेल चलता रहता है। एक मित्र ने जब इस भेद की व्याख्या की तब कहीं जाकर सब समझ में आया। जैसे संजय की दृष्टि पाकर ही धृतराष्ट्र सब जान पाये थे, उसी प्रकार तकनीक के सहारे बंगलौर की यातायात पुलिस नगर पर अपना नियन्त्रण गाँठे हुये है। सारे नगर में सीसीटीवी कैमरे लगे हैं, लगभग हर चौराहों पर, देखने में बिजली के लैम्पों की तरह ही दिखते हैं। नियन्त्रणकक्ष में बैठे सतर्क निरीक्षक चित्र को ज़ूम करके गाड़ी का नम्बर नोट कर लेते हैं, डाटाबेस से गाड़ी से सम्बन्धित तथ्य और मालिक का पता एकत्र कर चालान बन जाता है और दोषी चालक को भेज दिया जाता है, चित्र, स्थान और समय के सहित। आप विवश और हतप्रभ हो कहीं दुबारा वह न करने का प्रण कर लेते हैं।

इस तरह जहाँ एक ओर वाहनों पर दृष्टि बनी रहती है, वहीं दूसरी ओर कार्य न करने वाले पुलिसवालों पर भी नियन्त्रण रहता है। सतर्क और पर्याप्त मात्रा में उपस्थित यातायात पुलिसबल की संख्या इसी दिव्य दृष्टि का परिणाम है।

संभवतः यही तकनीकी और प्रशासनिक कारण रहा होगा कि क्रेनयुक्त एक वाहन सदा ही आवारा वाहनों को उनके कांजीहाउस में पहुँचाने के लिये सदा कार्यरत सा दिख जाता है। ये कार्य ठेके पर दिया गया है, एक निश्चित पारिश्रमिक के अतिरिक्त एकत्र किये हुये वाहनों की संख्या पर भी कोई न कोई आर्थिक प्रलोभन रखा गया होगा। सर्वप्रथम तो अधिक धन कमा लेने की सहज प्रवृत्ति उन्हें अतिसजग और अतिउत्साही बनाये रखती है। यदि किसी स्थान पर अनाधिकृत वाहन खड़ा है और वहीं खड़ी क्रेनयुक्त अपना कार्य नहीं कर रही है तो नियन्त्रण कक्ष से क्रोध के उद्गार फूटने लगते हैं। यही नहीं, जहाँ पर क्रेनयुक्त वाहन नहीं भी है, निकटस्थ वाहन को वहाँ पहुँचने के निर्देश मिल जाते हैं। यदि इन सबसे दोषी वाहन बच भी गया तो भी लिये गये चित्र के आधार पर आपके घर में चालान पहुँचना निश्चित है।

आवारा वाहन सशंकित हैं, पता नहीं कब वे भी कांजी हाउस पहुँच जायें और उनके मालिक को छुड़ाने आना पड़े। सुविधा छूटे, समय व्यर्थ हो और धन व्यय हो, सो अलग। नागरिकों की समस्या बड़ी विचित्र हो चली है, जहाँ एक ओर नये नये वाहनों का संख्या यहाँ के यातायात और पार्किंग स्थलों का दम घोटे हुये है, वहीं दूसरी ओर यातायात पुलिस की अन्तर्यामी दृष्टि नियमों को मानने को बाध्य किये हुये है। अब या तो वाहन का उपयोग न कर बस का उपयोग करे या वाहन कहीं दूर खड़ाकर पैदल चलकर उस स्थान जाये या अपनी समस्याओं का स्थानीय निदान ढूँढ़ें।

पता नहीं किसकी गति अधिक है, साधनों की या सुविधाओं की या व्यवस्थाओं की। बंगलौर में वाहन के साधन हैं, यथानुरूप पार्किंग की सुविधा नहीं है और व्यवस्था इतनी सुदृढ़ है कि आप नियमों का उल्लंघन नहीं कर सकते हैं। वाहन आवारा घोषित हुये जा रहे हैं, कांजीहाउस भी तैयार हो रहे हैं उन आवारा वाहनों के लिये। पता नहीं किसका अपमूल्यन है, मानवीय प्रकृति का या वैश्विक प्रकृति का। कांजीहाउस, क्या सोचने को विवश नहीं करते आपको।

2.1.13

दोष नहीं दे सकता कल को

क्षुब्ध मनस का भार सहन है, दोष नहीं दे सकता कल को,
गहरे जल के तल में बैठा, देख रहा हूँ बहते जल को।

क्या आशायें, क्या इच्छायें, क्या जीवन की अभिलाषायें,
अनुचित, उचित विचार निरन्तर, रच क्यों डाली परिभाषायें,
सबने जकड़ जकड़ कर बाँधा, नहीं जिलाया व्यक्ति विकल को,
दोष नहीं दे सकता कल को।

यह सच है, जिसने जीवन को देखा, परखा, समझा है,
आहुति बनकर स्वयं जलाया, यज्ञ उद्गमित रचना है,
कैसे नहीं निर्णयों में वह लायेगा व्यक्तित्व सकल को,
दोष नहीं दे सकता कल को।

मैने जीवन की गति को अब स्थिर मन से देखा है,
महाचित्र पर खिंचती जाती, कर्मक्षेत्र की रेखा है,
ये रेखायें सतत बनातीं, योगदान फिर क्यों निष्फल हो,
दोष नहीं दे सकता कल को।

मानक है जीवन जीने के, लगी यन्त्रवत सकल व्यवस्था,
सुख, साधन की होड़ लगी है, कहाँ पता है किसे समय का,
बाँध बनाते जीवन बीता, भूल गया था लाना जल को,
दोष नहीं दे सकता कल को।

है विवेचना व्यर्थ, तर्क सब, कल की कल पर छोड़ बिसारी,
चलो सजायें वर्तमान में, एक भविष्य की सूरत न्यारी,
बीज लगाओ, सींचो बगिया, आने दो आशान्वित फल को,
दोष नहीं दे सकता कल को।
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