मौसम को बूझो मूर्खाधिराज!

चिठेरा-चिठेरी संवाद

चिठेरा: हेलो चिठेरी, हाऊ डु यू डू।
चिठेरी:उड़ी बाबा , तू त अंग्रेज हो गवा! तबियत तो ठीक है न!

चिठेरा: तबियत तो ठीक है। अपन सुनावो कैसी है। मिजाज कैसा है।
चिठेरी: मिजाज दुरुस्त है। लेकिन ये मौसम बहुत छेड़खानी करता है। सीटी बजाता है।

चिठेरा: अरे हमारे रहते तुमको कोई और छेड़े ! ई तो हम न होने देंगे। मार जूतन कपाल बजा देंगे।
चिठेरी: कपाल बजाओगे? मौसम का? बहुत बहादुर हो?

चिठेरा:क कौनो शक है? कौनो ‘सटिकफ़िकेट’ चहिये बहादुरी का? बोलो, बोलो! चुप काहे हो?
चिठेरी:’सटिकफ़िकेट’ नहीं बौड़म ’सर्टिफ़िकेट’ कहा जाता है। कुछ सो सीख लो अंग्रेजी।

चिठेरा: एक बार फिर से कहो न! अच्छा लगता है।
चिठेरी: कित्ती बार कहा अंग्रेजी सुधारने को। हिंदी की तरह ही चौपट है तुम्हारी अंग्रेजी। दोनो पर समान अधिकार।

चिठेरा: ई वाली बात नहीं। ऊ वाली बात कहो एक बार और!
चिठेरी:कौन वाली? बोलो न! शर्माओ नही।

चिठेरा:एक बार फिर से बौड़म कहो न!
चिठेरी:अरे, बेवकूफ़। सच बार-बार दोहराने से झूठ लगने लगता है। तुम अपना बहादुरी की कहानी सुना रहे थे। कैसे अपने बहादुर समझने का भ्रम पाते हो?

चिठेरा: अरे हम पैदाइसी बहादुर हैं। जिसे कहो उसे गरिया सकते हैं। खुले आम नंग-नाच कर सकते हैं। नंगा होना बहुत बहादुरी का काम है आजकल!
चिठेरी: तेरी मति मारी गयी रे! किसी मनोचिकित्सक को दिखा।

चिठेरा: मनोचिकित्सक बहुत पैसा लेता है। कोई सस्ता इलाज बताओ न!
चिठेरी: भैयाजी को बुलवाते हैं! वे पाद-प्रहार करेंगे तो शायद अकल ठिकाने लग जाये।

चिठेरा:वे कैसे आयेंगे। वे तो खुदै पटकनी खाये पड़े हैं। मुम्बई में। लेकिन ये बताओ क्या ‘पाद-प्रहार ‘से अकल ठीक हो जाती है?
चिठेरी:जिनके होती है उनकी ठीक हो जाती है। जिनकी नहीं होती उनका दूसरा इलाज किया जाता है?

चिठेरा:सो क्या?
चिठेरी: उनको पटक के धराशायी किया जाता है। इसके बाद उनके गुदगुदी की जाती है। पटकनी का दर्द और गुदगुदी की स्मित के संयोग के दुर्लभ क्षणों का दर्शन लाभ लेने के लिये अकल खिंची चली है। उसी ‘तमाशबीन अकल’ को कब्जिया के दिमाग में भर दिया जाता है। भुस के ऊपर। ‘अकल कोटिंग’ से दिमाग की बैटरी चलने लगती है। टिक-टिक!टिक-टिक!टिक-टिक!

चिठेरा: ये तुम कैसी गहन-गम्भीर बातें कर रही हो? ऐसी गम्भीरता तो समाज सुधारक, क्रांतिकारियों और भ्रांतिजीवियों में भी नहीं पायी जाती। मुझे तो डर लग रहा है।
चिठेरी:तुम क्यों डरते हो? हम हैं न! हम तुम्हारा साथ देंगे। बुद्धिजीवियों की तरह दगा न देंगे।

चिठेरा:सच!
चिठेरी:मुच!

चिठेरा: अच्छा और सुनाओ! मौसम की क्या कह रही थी।
चिठेरी: ये मौसम को बूझो मुर्खाधिराज! कुछ बेवकूफ़ी की बातें करों।

चिठेरा:बेवकूफ़ी की बात करें? मतलब नार्मल हो जायें।
चिठेरी: एक्जैक्टली!

चिटेरा:सोचता हूं काश मैं बूढ़ा होता तो फ़ागुन में तेरा देवर बन जाता।
चिठेरी:अरे तू तो सच में ‘गत-बुद्धि’ बन गया! ‘हत-बुद्धि’ हो गयी मैं तो!

चिटेरा:तो क्या करूं! समझ में आता नहीं! भांगड़ा करूं!
चिठेरी:कर। धरती हिला के रख दे। गाना भी गायेगा क्या?

चिटेरा:न! गाना नहीं। ब्लाग लिखूंगा। ब्लागिंग के मजे ही कुछ और हैं। ब्लागिंग करूंगा!
चिठेरी: तू जा ! कर! मर! जल्दी तर! तेरा दिमाग गया है हर! हरकते ऐसी हैं जैसा कोई भरा पेट खर। तेरे साथ कैसे होगी बसर! मैं चली अपनी डगर!

( चिठेरी फ़ागुनी हवा की तरह लहराती चलती जाती है। चिठेरे के चेहरे पर किसी पिटे हुये बुद्धिजीवी की तरह हवाइयां उड़ रही हैं। चिठेरा उनको सहेज के बोतल में भरता है। उसी को पीकर वह क्रांतिकथायें लिखेगा। उड़ी हुई हवाइयां सड़ जाने पर विचार सुरा बन जाती हैं। ऐसा विजय माल्या जी का ‘बार टेन्डर’ बता रहा था ।)

12 responses to “मौसम को बूझो मूर्खाधिराज!”

  1. Shiv Kumar Mishra

    आशा है कि आप मौसम को बूझ गए होंगे और सामुदायिक ब्लॉग के अरोकार को भी….:-)

    आपका चिटठा बहुत अच्छा है. मैंने एक सामुदायिक ब्लॉग खोलने का फैसला किया है. आप भी आमंत्रित हैं उसमें लिखने के लिए. अभी हम अपने इस सामुदायिक ब्लॉग के लिए एक बृहद शब्दकोष का निर्माण कर रहे हैं. आपको उसकी कॉपी भेज दी जायेगी. अगर उस शब्दकोष के हिसाब से लिखना मंजूर है तो फिर आपका स्वागत है.

    तो फिर आईये और जनभाषा को आगे बढाईये…..:-)

  2. रवि

    ब्लाग लिखूंगा। ब्लागिंग के मजे ही कुछ और हैं। ब्लागिंग करूंगा!

    सत्य वचन महाराज चिठेरा जी… सोचता हूं मैं भी कि अब ब्लॉगिंग के अलावा कुछ नहीं करूंगा….

  3. kakesh

    ये रवि जी को क्या हुआ.कहते हैं मैं भी लड़ाई करुंगा.गाली दुंगा. ना जी ना हमको नहीं करनी ब्लॉगिंग. हम तो सामुदायिक ब्लॉगिंग करेंगे शिवकुमार जी के साथ. :-)

  4. anitakumar

    हा हा हा ! फ़ाल्गुन आयो रे साथ में सुरा भी लायो रे, लेखनी फ़िसल फ़िसल जाए और जय जय शिव जी का शब्द कोष बढ़ता चला जाए
    ये अक्ल कोटिंग कहां होती है जी , भविष्य के लिए पता नोट किए लेते हैं ,

  5. प्रमेन्‍द्र प्रताप सिंह

    बढि़यॉं लगा चिठेरा-चिठेरी संवाद,

    अबकी होली पर सामूहिक रंग खेलने की जग‍ह, सामूहिक ब्‍लागिग किया जायेगा :)

  6. ज्ञानदत्त पाण्डेय

    बहुत दिनों बाद देख रहा हूँ। पोस्ट में कोई लिंक नहीं है। समझ नहीँ आ रहा। लगता है कोई बड़ा गुल गपाड़ा हुआ है!
    बाकी, शिव कुमार सामुदायिक ब्लॉग बना रहे हैं – यह तो हमसे चर्चा तक नहीं की। अलग थलग करने का विचार है शायद! :-)

  7. संजय बेंगाणी

    होली का असर है शायद, बात कम समझ में आयी.

    यहाँ सब वाह वाह कर रहें है, सुना है किसी को बात पसन्द भी नहीं आयी, यहाँ तो समझ ही नहीं आयी.

  8. समीर लाल

    सोचता हूं काश मैं बूढ़ा होता तो फ़ागुन में तेरा देवर बन जाता।

    –क्या बात है महाराज…बहुत खूब…बाकि ते ब्लॉगिंग करिहे करी.

  9. Tarun

    Chithera, chitheri bare dino baad nazar aaye

  10. Pritam P Hans

    सो मं बु गु शु श र

    दिन कैसे बीत जाते हैं, दिल्ली में पता ही नही चलता| कब दीवाली गयी और कब वसंत पंचमी| किसी ने दिल्ली में वसंत देखा है क्या? वसंत कुञ्ज, वसंत विहार नही, पीली सरसों वाली वसंत|
    कम से कम आपका ब्लॉग पढ़ कर ये तो पता चला की होली आ रही है|

  11. अजित वडनेरकर

    बहुत दिनन बाद चिठेरा चिठेरी संवाद की मिसरी घुली है कानों में ….

  12. : फ़ुरसतिया-पुराने लेखhttp//hindini.com/fursatiya/archives/176

    [...] मौसम को बूझो मूर्खाधिराज! [...]

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