भोपाल कब आयेगा

आजकल टेलीविजन पर अक्सर एक विज्ञापन आता है।

इसमें एक बुजुर्गवार ट्रेन पर चढ़्ते हैं। उनको भोपाल उतरना है। वे लोगों से पूछते रहते हैं कि भोपाल कब आयेगा। लोग उनको बताते नहीं। शायद उनकी बात नहीं समझ पाते। भाषा का चक्कर। रेल चलती रहती है। उनका सवाल अनुत्तरित रहता है। अंतत: वे निद्रावस्था को प्राप्त होते हैं। शायद आखिरी स्टेशन पर जब वे जगते हैं तो वे डिब्बे में अकेले यात्री बचे होते हैं। बाहर निकलकर प्लेटफ़ार्म पर आते हैं तो अपने को किसी दक्षिण भारतीय स्टेशन पर पाते हैं। स्टेशन का नाम दक्षिण भारतीय भाषा में लिखा होता है जिसे वे पढ़ नहीं पाते। लेकिन उनके पास एक चूंकि टाटा डुकोमा का मोबाइल है इसलिये चिंता की बात नहीं। मोबाइल से संपर्क सूत्र बना हुआ है।

पता नहीं रेलवे के लोगों ने यह विज्ञापन देखा कि नहीं। मेरे ख्याल से तो रेलवे को इसके खिलाफ़ आपत्ति जतानी चाहिये। रेलवे की आपत्ति की बात तो बाद में पहले आम जनता के हिसाब से मामला देखा जाये।

अपने यहां रेलवे में घुलने-मिलने का काम सबसे तेज होता है। ट्रेन के स्पीड पकड़ने तक जान-पहचान का सिलसिला शुरु हो जाता है। भाषा, क्षेत्र आदि इसमें कभी प्रभावी बाधा नहीं बन पाते। एक से पूछो दस बतायेंगे वाला मामला रहता है। ऐसे में मोबाइल कम्पनी कैसे यह कल्पना करती है कि रेल में कोई पूछेगा और उसको पता नहीं चलेगा कि भोपाल कब आयेगा। रेलवे में यात्री को बैठा के एकदम कल्पना के घोड़े दौडा दिये विज्ञापन की थीम बनाने वाले ने।

अपने समाज का भी यह अतिशयोक्ति पूर्ण नकारात्मक चित्रण है। एक बुजुर्ग पूछ रहा है भोपाल कब आयेगा और उसको कोई बता के नहीं दे रहा है कि कब आयेगा भोपाल। सिर्फ़ इसलिये कि उसको बताना है कि उसके डुकोमा का मोबाइल है इसलिये उसकी समस्या का हल उसको किसी दक्षिण भारतीय स्टेशन में उतार के थमा दिया जायेगा।

हम लोग आज से अपनी साइकिल यात्रा के दौरान जिन आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक गये थे। हम तेलगू, तमिल, मलयालम या कन्नड़ का ककहरा तक नहीं जानते थे। लेकिन हमको किसी भी जगह परेशानी का ’प’ तक नहीं मिला। यहां कैसे एक बुजुर्ग को विज्ञापन में पूछते-पूछते सुला दिया जाता है कि भोपाल कब आयेगा!

यह विज्ञापन पूरे देश के ताने-बाने की नकारात्मक और काल्पनिक छवि पेश करता है। इत्ता भी भाषा का लफ़ड़ा नहीं है अपने इधर। आप एक भोपाल पूछो रेल में तो लोग दस भोपाल के किस्से सुना देंगे। अपन के तो एक दोस्त का नाम ही भोपाल सिंह है। कोई उनसे पूछता तो खड़े हो जाते सामने – देखो खुद आ गया भोपाल आपके पास। :)

अब बात रेलवे की। रेलवे सभी स्टशनों में त्रिभाषा फ़ार्मूला इस्तेमाल करता है। जिन प्रदेशों की भाषा हिंदी है वहां स्टेशन के नाम हिंदी ,अंग्रेजी और अगर और उस प्रदेश की कोई राजभाषा होती है तो उस भाषा में भी में स्टेशन का नाम लिखा होता है। जहां भाषा हिंदी के अलावा कोई और भाषा है वहां उस स्थानीय प्रदेश की भाषा के साथ हिंदी और अंग्रेजी में स्टेशन का नाम लिखा होता है। यह अनिवार्यत: पालन करने वाला नियम है। जैसे कि ऊपर देखिये वाराणसी स्टेशन का नाम हिंदी अंग्रेजी और उर्दू में लिखा है। उर्दू उत्तर प्रदेश की द्वितीय राजभाषा है। (फोटो जाट देवता के ब्लॉग से)। इसी तरह बगल की फोटो देखिये चेन्नई बीच स्टेशन का नाम तमिल, हिंदी और अंग्रेजी में लिखा है।

ऐसा कैसे हुआ कि मोबाइल के प्रचारक को दक्षिण भारत में एक स्टेशन मिला जहां स्टेशन का नाम सिर्फ़ दक्षिण भारतीय भाषा में लिखा हुआ है।

हो सकता है कि किसी स्टेशन पर अपवाद स्वरूप नाम हिंदी/अंग्रेजी में लिखने से रह गया हो। लेकिन यह नियम का अपवाद है। अपवाद को विज्ञापित करना कहां की समझ है जी!

स्टेशन के प्लेटफ़ार्म पर पत्ते इस तरह बिखरे दिखाये गयें कि अगर किसी सही में वह कोई स्टेशन है तो उसका स्टेशन मास्टर निलंबित हो जाये।

प्लेटफ़ार्म पर गंदगी वाली बात पर दक्षिण भारत वाले भी खुन्नस खा जायेंगे। उनका एतराज हो सकता है कि साउथ इंडिया का प्लेटफ़ार्म कैसे इत्ता गंदा दिखा दिया- कोई उत्तर भारत समझ रखा है क्या?

वैसे तो विज्ञापन वाले कुछ भी दिखा देते हैं। एवरेस्ट पर पेट्रोल पम्प। जहां कुछ नहीं है वहां पर मोबाइल और भी न जाने क्या-क्या। लेकिन टाटा डुकोमा का यह विज्ञापन किसी भी नजरिये से भारतीय समाज पर फ़िट नहीं बैठता। एक बेचारे बुजुर्ग को गलत बहाने से रात भर टहलाया और सुबह एक अनजान जगह पर उतार दिया। भारतीय समाज के वर्मान ताने-बाने के लिहाज से इस विज्ञापन का संदेश एकदम गल्त है!

बताओ भला एक बुजुर्ग सबसे पूछता फ़िर रहा है और कोई उसे बताने वाला नहीं है – भोपाल कब आयेगा।

ऐसा माफ़िक विज्ञापन की दुनिया में ही हो सकता है।

लेकिन ऐसा विज्ञापन कोई बनाता है तो उसको सेंसर बोर्ड कैसे पास कर देता है? रेलवे इस पर कोई एतराज क्यों नहीं करता।

आपका क्या कहना है इस पर?

कही ऐसा तो नहीं कि अपन ही गलत समझे विज्ञापन को! और सही में ऐसा होता हो कि एक बुजुर्ग पूछता रहे सारी रात और उसे बताने वाला कोई न मिले कि भोपाल कब आयेगा।

लेकिन मुझे फ़िर लगता है कि ऐसा होता नहीं है। विज्ञापन वाले की सोच अललटप्पू टाइप है। कोई और अच्छा उपाय सोचना चाहिये मोबाइल बेचने का।

बुजुर्गवार तो खैर उतर गये। अपने ठिकाने भी पहुंच गये होंगे मोबाइल के सहारे। इन विज्ञापन कम्पनियों का भोपाल कब आयेगा? :)

33 responses to “भोपाल कब आयेगा”

  1. भारतीय नागरिक

    अरे साहब, भोपाल आता भी कहां है? वह तो अपनी ही जगह स्थित है. आते – जाते तो लोग हैं? वैसे विज्ञापनों के बारे में क्या कहना, जहां दाढ़ी बनाने के विज्ञापन में सुन्दर सी महिला दिखाई जाये, वहां तो ऊपरवाला भी कुछ नहीं कर सकता.
    भारतीय नागरिक की हालिया प्रविष्टी..नदियों में विसर्जित प्रदूषण .

  2. Dr. Kavita Vachaknavee

    मेरा अपना अनुभव यह है कि मैं ऐसी स्थितियों में भारत में लोकेशन की जानकारी मोबाईल द्वारा देखती हूँ। स्टेशन आने से पूर्व ही मोबाईल पर उस स्थान का नाम आने लगता है जो निकटतम होता है ( सिग्नल आदि के हिसाब से )। उन्हें अक्ल होती तो वे यह करते कि बुजुर्गवार को थोड़ी बाद सूझा और उन्होने किसी से पूछने की बजाय लोकेशन फ़ाइंडर द्वारा भोपाल आने से पूर्व ही मोबाईल पर पढ़कर जान लिया कि आने वाला है। रही त्रिभाषा नियम की जानकारी तो विज्ञापन बनने वालों की इतनी अक्ल कहाँ कि वे स्टेशनों के नाम तीन भाषाओं में देखने के बाद भी इस के पीछे के नियम अथवा नीति के बारे में अनुमान लगा पाते। गंदगी वाले मामले में तो उत्तर या पूर्व में बैठा व्यक्ति अनुमान भी नहीं लगा सकता कि दक्षिण में स्टेशन एकदम समतल। साफ व सूखे होते हैं। दिल्ली जैसे राजधानी के स्टेशन तक से हजार गुना साफ सुथरे। कभी रेलवे से यात्रा नहीं की होगी बंदे ने।

    आपकी फेसबुक प्रोफाईल पर मुझे टिप्पणियाँ नहीं दीख रहीं, केवल नोटिफिकेशन से पता चला कि आपने टिप्पणी के उत्तर में कुछ लिखा है। पर क्या लिखा है, यह नहीं दीख रहा।
    Dr. Kavita Vachaknavee की हालिया प्रविष्टी..छत पर आग उगाने वाले दीवारों के सन्नाटों में क्या घटता है

  3. देवांशु निगम

    बंगलौर में एक रेलवे स्टेशन है के आर पुरम , तीन साल तक रोज रस्ते में पड़ता था और घर से ऑफिस के पूरे रस्ते बस वाही एक चीज़ हिंदी में दिखती थी |

    हमारे यहाँ तो ट्रेन में बोल दो की फलां स्टेशन उतरना है तो बोलेंगे भैया सो जाओ, जब स्टेशन आने वाला होगा तो जगा देंगे, हम दो स्टेशन आगे जा रहे हैं |

    और मान लो की वो न जाते हुए वहां तक तो कह देंगे, भैया जब हम उतरेंगे तो जगा देंगे उसके आगे देख लेना |

    ट्रेन तो हमारे देश में एकता का प्रतीक हैं, जब इतिहास पढ़ रहे थे तो ये भी पढ़ा था कि ये भी एक वजह थी क्रांति के फ़ैलने की|

    आज भी ट्रेन में राजनीति से लेकर खेल , कला से लेकर विज्ञान सारी चर्चाएँ हो जाती हैं | वित्त मंत्री को अर्थशास्त्र और विदेश मंत्री को विदेश नीति सिखा दे हमारे यहाँ के ट्रेन यात्री |

    विज्ञापन तो स्टेशन कि बात कर रहा है केवल , हमारे यहाँ वाले तो ट्रेन के चलने तक कि jankaaree दे दे, एक मर्तबा एक स्टेशन पे हमारी ट्रेन रुकी , काफी देर खड़ी रही | एक भैया कहीं से पता करके आये और बोले
    “स्टेशन मास्टर तो कहि रहे हैं पर हमका नाही लागत की क्रास हुईहै हियाँ पर”

    मैंने विज्ञापन तो देखा नहीं है, पर मसौदा आपत्तिजनक लगता है |
    देवांशु निगम की हालिया प्रविष्टी..अथ श्री “कार” माहत्म्य पार्ट-२

  4. आशीष श्रीवास्तव

    भारतीय रेल के बारे मे तो ऐसा है कि आप किसी भी डिब्बे मे किसी भी भारतीय भाषा मे पूछ ले कि भोपाल कब आयेगा, उत्तर मिलने की गारंटी है।

    टाटा डोकोमो के विज्ञापन बनाने वाले ने एसी कमरे मे बैठकर बनाया होगा और कहा होगा “व्हाट एन आइडीया सर जी !”
    आशीष श्रीवास्तव की हालिया प्रविष्टी..सरल क्वांटम भौतिकी: परमाणु को कौन बांधे रखता है?

  5. arvind mishra

    अभी तो मियाँ यह फ़िक्र कीजिये जबलपुर कब आएगा :)
    ब्लॉग -चेतावनी: आप प्रवीण पांडे जी के क्षेत्राधिकार में प्रवेश कर रहे हैं ….कैसा संयोग कि उन्होंने भी आज रेल वृत्तांत लिखा है !
    होली की सपरिवार रंगारंग शुभकामनाएं!
    arvind mishra की हालिया प्रविष्टी..हे कवयित्री!

  6. प्रवीण पाण्डेय

    बीच में हिन्दी सदा ही रहती है..हर स्टेशन पर..
    प्रवीण पाण्डेय की हालिया प्रविष्टी..अम्मा, गूगल और वेलु का पंजाबी ढाबा

  7. राहुल सिंह

    सोच में पड़ता हूं कि टीवी विज्ञापनों में क्‍या बेचने की कोशिश है और यदि समझ पा रहा हूं तो वह इस तरह क्‍यों ? का सवाल तो अक्‍सर बचा रह जाता है.
    यह विज्ञापन विवाद पैदा कर प्रचार पाने के लिए तो नहीं कि एक मामला भोपाल वाले, एक रेलवे और भी कोई भलामानस दायर कर दे ?
    राहुल सिंह की हालिया प्रविष्टी..मिक्स वेज

  8. संतोष त्रिवेदी

    मुझे लगता है कि विज्ञापन बनाने वाला रात में और एसी क्लास में हमेशा सफर करता है…..उसे कोई कुछ बताता नहीं या वह अपने कोच में अकेला होता है !
    ….होली में यह विज्ञापन भी झेल लेंगे !
    संतोष त्रिवेदी की हालिया प्रविष्टी..बुरा न मानो होरी है !

  9. चंदन कुमार मिश्र

    हम तो विज्ञापन के ही खिलाफ़ हैं भाई!
    वैसे यह विषय था छोटा, आपने खींचकर बड़ा लेख कर ही दिया!

    कुछ साल पहले एक किताब पढी थी, नाम था- भारतीय विज्ञापनों में नैतिकता…
    उसके हिसाब से तो आज का लगभग सारा विज्ञापन अनैतिक ही मालूम होता है… …
    चंदन कुमार मिश्र की हालिया प्रविष्टी..स्त्री और शब्द-2 (कविता)

  10. arvind mishra

    होश(न्गाबाद) जब जायेगा तभी तो भोपाल आएगा ! :)

  11. sanjay jha

    अललटप्पू टाइप……………….हा हा हा……

    आप की आपत्ति से हमारी सहमती है……………

    प्रणाम.

  12. ashish

    जबलपुर से कानपुर आते हुए भोपाल नहीं कभी नहीं आता . उतर लीजियेगा गोविंदनगर में .
    ashish की हालिया प्रविष्टी..वंचिता

  13. Kavita Rawat

    सब चलता रहता है ….
    बहुत बढ़िया प्रस्तुति..
    होली की शुभकामनायें!

  14. Gyandutt Pandey

    अपने चीफ पब्लिक रिलेशंस अफसर साहब को मैने कहा है कि यह मामला उनके और रेलवे बोर्ड के स्तर पर कम्पनी से उठाया जाये – इसमें टाटा डूकोमो की ऐसी तैसी करने की जरूरत है!

    आप सामाजिक रूप से जागरूक पोस्टकार बनते जा रहे हैं। यह आपकी मौज लेने की ईमेज के खिलाफ है। आप अपनी ईमेज की भी फिक्र करें! :lol:
    Gyandutt Pandey की हालिया प्रविष्टी..सब्जियां निकलने लगी हैं कछार में

    1. रवि

      मेरा भी यही मानना है. यह पोस्ट आपकी इमेज से मेल नहीं खाती. मौज लेने वाली फुरसतिया स्टाइल न छोड़ें.
      रवि की हालिया प्रविष्टी..जीवन पूरा एक वृत्त है…

  15. sonal

    kaahe holi par TATA ko hadkaa rahe hai ….
    sonal की हालिया प्रविष्टी..फागुन की बतिया

  16. दीपक बाबा

    इस विज्ञापन से हमने तो बस एक ही अर्थ निकला जिनके पास टाटा का मोबाइल होता है उनसे लोग बात करने से कतराते हैं :)

  17. rachna

    लो जी लो
    मै दक्षिण भारत का कोई रेलवे यार्ड समझ रही थी क्युकी स्टेशन तो लगा नहीं .
    वैसे
    एक बात और पूछनी थी आप को वो सज्जन बुजुर्ग क्यूँ लगे , बस इसलिये क्युकी सर पर बाल कुछ कम हैं ??
    और सबसे महत्व पूर्ण बात

    मैने ये महसूस किया हैं की ज्यादातर मोबाइल कम्पनी के कस्टमर कएर नंबर पर उसी प्रान्त की भाषा बोली जाती हैं जिस प्रान्त में उस समय नेटवर्क काम कर रहा हैं

    बी अस अन अल तक में लैंड लाइन पर अगर ” इस रूट की सभी लाइन व्यस्त हैं आता हैं ” तो उसी प्रदेश की भाषा में होगा जहां आप नंबर मिलाते हैं

    फिर टाटा डूकोमो जिस बात का प्रचार कर रहा वो कितनी सही हैं , क्या दक्षिण भारत में उनका कस्टमर कएर हिंदी में बात करेगा ???

  18. Abhishek

    हमने ये वाला विज्ञापन नहीं देखा. लेकिन ये विज्ञापन नहीं होता तो ये पोस्ट पढने को नहीं मिलती :) और इधर आपकी इमेज भी थोड़ी ढीली हुई. डोकोमो वालों की भी ऐसी-तैसी होगी अब ! बड़े काम का विज्ञापन साबित हो रहा है. :)
    Abhishek की हालिया प्रविष्टी..येनांग विकार: ! (पटना ११)

  19. shikha varshney

    ये विज्ञापन लगता है कि किसी कवि ने लिखा होगा :) उनकी कल्पना की उड़ान कौन जान पाया है :):).
    होली मुबारक ..
    shikha varshney की हालिया प्रविष्टी..जय हो….

  20. ali syed

    विज्ञापन , व्यापार की धन पैशाचिक निर्ममता का अंग हैं इन्हें उपभोक्ता के औचित्य से कोई सरोकार नहीं होता ! इनका लक्ष्य केवल एक , व्यापार के लिए ग्राहक की जेब काटो जिस तरह भी काट सको , चाहे झूठ बोलकर या कोई अतार्किक बात कह कर ! आपने इंश्योरेंश कंपनियों के विज्ञापन भी देखे होंगे जो आपको , आपकी मृत्यु का भय दिखा कर व्यवसाय करते हैं !

    वैसे सभी विज्ञापन आपके दृष्टान्त की तरह भदेस नहीं होते ! पुराने तौर तरीके से कहूँ तो ये मोहिनी मंत्र मारू तकनीक है जिससे मारे जाने वाले को पता भी नहीं चलता :)
    ali syed की हालिया प्रविष्टी..भला क्या चाहता हूं मैं ?

  21. Anonymous

    होली की बहुत बहुत बधाई आपको और आपके परिवार को ,भोपाल कब आएगा यदि सवाल न उठता तो हमें आपके अनुभव का लाभ भी न मिलता ,आनंदमयी …….

  22. jyotisingh

    होली की बहुत बहुत बधाई आपको और आपके परिवार को ,भोपाल कब आएगा यदि सवाल न उठता तो हमें आपके अनुभव का लाभ भी न मिलता ,आनंदमयी …….

  23. रहस्य क्या है..?

    कुछ भी कहा जाये ,पर वो विज्ञापन शानदार है …!!!!
    रहस्य क्या है..? की हालिया प्रविष्टी..सर्च इंजिन (Search Engine) मे चीजो को आसानी से कैसे ढूंढे

  24. Anonymous

    बिलकुल मनगढ़न्त बातें .सहयात्री एक दूसरे से इतने उदासीन न होकर परस्पर सहायता करते हैं .
    शुभ-कामनाएँ !

  25. प्रतिभा सक्सेना

    बिलकुल मन-गढन्त बातें हैं .सहयात्री एक दूसरे से उदासीन न होकर परस्पर सहायता करते हैं .
    शुभ-कामनाएँ !

  26. सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी

    मुझे इस अवधारणा से आपत्ति है कि फुरसतिया (जी) को अपनी प्रचलित छवि बनाये रखना ( इसमें बँधकर रहना) चाहिए। ऐसी पोस्टें लिखने के लिए जिस जागरूकता और सूक्ष्म दृष्टि की आवश्यकता है वह सभी लोगों में हो तो और भी अच्छा है।

    आशा है कंपनी वाले अब अपना सुधार कर लेंगे और जिस सेंसर बोर्ड ने इसे पास किया होगा उसकी ओर से फुरसतिया जी को खेदप्रकाश का संदेश भी प्राप्त होगा।
    सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी की हालिया प्रविष्टी..नन्हे हाथों का कमाल…

  27. Ashish Maharishi

    अजी साहब भोपाल तो हमारे पास नहीं आया। लेकिन हम पिछले कई बरसों से भोपाल के दिल में हैं।

  28. VIKRANT BIPUL

    यह तो बिलकुल ही नकारात्मक विज्ञापन है , ट्रेन मैं तो नहीं चाहते हुए भी कुछ सज्जन पुरुष जबरदस्ती बखान करते रहते हैं . वैसे भी अपने ही देश मैं कोई शेहेर अजनबी कैसे हो सकता है .

  29. आशीष श्रीवास्तव

    और एक बात भोपाल से दक्षिण के किसी स्टेशन में पहुचने में कम से कम ८-१० घंटे तो लगेंगे..
    उतरने वाला व्यक्ति इतनी देर थोड़ी सोता रहेगा , इटारसी ,खंडवा या नागपुर भी तो आएगा …..कहीं न कहीं तो साथ वाले उतार ही देंगे ……..

    आशीष श्रीवास्तव

  30. विरल

    तसवीरे अच्छी लगी, आलेख विषय भी.

  31. फ़ुरसतिया-पुराने लेख

    [...] भोपाल कब आयेगा [...]

  32. vijay

    मुझे लगता है आप बहुत फुर्सत में है नहीं तो भारत में और भी बहुत मुद्दे है टेंशन लेने के गरीबो के लिए व देश के उन लोगो के लिए जो बहुत दुखी है

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