कल्पना का घोड़ा,हिमालय की ऊंचाई और बिम्ब अधिकार आयोग

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कवि और लेखक अपनी बात कहने के लिये उपमा/रूपक का सहारा लेते हैं। फ़ूल सा चेहरा, झील सी आंखे, हिमालय सी ऊंचाई, सागर सी गहराई, मक्खन सा मुलायम, चाकू सा तेज, कल्पना का घोड़ा।

इस तरह से बात समझने में आसानी होती है। पढ़ा/सुना/देखा/सोचा और बात समझ में आ गयी। जिस चीज को किसी ने देखा हो उस सरीखा किसी दूसरे को बताया जाये तो दूसरे के बारे में खट से एक अंदाज हो जाता है।

लेकिन बिम्ब/उपमाओं की भी उमर होती है। समय के साथ वे उपमायें बेमानी सी हो जाती हैं लेकिन रूढ़ हो जाने के चलते चालू रहती हैं। प्रयोग करते रहते हैं लोग! उपमायें कोई ’प्रयोग किया फ़ेंक दिया’ जैसी खपतिया सामान तो होती नहीं। पीढियों तक चलती हैं। लेकिन इसई के चलते लफ़ड़ा भी होता है अक्सर।

अब जैसे देखिये जैसे कल्पना के घोड़े पर सवार होने की बात है। यह उपमा जब प्रयोग में आना शुरु हुई होगी तब घोड़ा ही सबसे तेज सवारी होता होगा। कल्पना को तेज भगाना है सो घोड़े पर बैठा दिया। भागती चली गयी किड़बिड़-किड़बिड़। जिन लोगों ने इसका प्रयोग शुरु किया होगा वे पुरुषवादी मानसिकता के भी बताये जा सकते हैं। क्योंकि घोड़े पर बैठने का काम ज्यादातर पुरुषों ने किया। महिलायें तो डोली/पालकी पर ही चलती रहीं। तो जहां कल्पनाओं की बात चली। पुरुषों की कल्पनायें भागती चली गयी घोड़े पर और स्त्रियों की कल्पनायें धीरे-धीरे पिछलग्गू बनी चलती रहीं। पिछड़ गयीं। क्या यह भी एक कारण है महिलाओं के पीछे रह जाने का?

कल्पना के लिये घोड़े की सवारी करते हुये दिखाना ऐसा ही है जैसा बाढ़ में राहत सामग्री बंटना। कागज पर सब बंट गयी लेकिन पहुंची कहीं नहीं।

अब कोई कह सकता है कि कल्पना तो अंतत: स्त्रीलिंग शब्द है। चाहे पुरुष की हो या स्त्री की। घुड़सवारी तो कल्पना ही करेगी। लेकिन यह भी सोचा जाये कि जो स्त्री पात्र कभी खुद घोड़े पर नहीं बैठी वह अपनी कल्पना को कैसे बैठा देगी। बैठायेगी भी तो बहुत दूर तक भेजने में सकुचाइयेगी। इत्ती दूर तक ही भेजेगी ताकि अंधेरा होने के पहले कल्पना वापस घर लौट आये। या फ़िर किसी पुरुष कल्पना के साथ सवार होकर उसके साथ जायेगी।

बहरहाल छोड़िये औरत/मर्द की बात। अब आप यह सोचिये कि आजकल तेज सवारी कार के जमाने में कल्पना को घोड़े पर सवार बताना क्या सही है। सड़कों से घोड़े गायब हैं, गांवों से अस्तबल गायब हैं, सेनाओं में घोड़े केवल परेड के लिये बचे। ले-देकर घोड़े सिनेमा में बचे हैं जहां हीरो या विलेन को किसी घोड़े पर दांव लगाते दिखाना होता है बस्स। ऐसे में कल्पना के लिये घोड़े की सवारी करते हुये दिखाना ऐसा ही है जैसा बाढ़ में राहत सामग्री बंटना। कागज पर सब बंट गयी लेकिन पहुंची कहीं नहीं।

अब कल्पना के घोड़े की जगह कल्पना की साइकिल,मोटर साइकिल, कार, मर्सिडीज ,आल्टो प्रयोग होना चाहिये। सामूहिक कल्पनाओं के लिये मेट्रो कल्पना, राजधानी कल्पना, शताब्दी कल्पनायें प्रयोग की जा सकती हैं।

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कभी-कभी लोग बड़ी अटपटी उपमायें प्रयोग करते हैं। ऐसा लगता है कि कवि/लेखक लोग हमेशा क्रांति के मूड में रहते हैं। जो चीज दिखी सामने उसे हथियार में बदल लिया। जो बिम्ब दिखा उसे जोत दिया अपनी रचना सवारी में। चल बेटा पाठक के पास। पाठक अपना दिल खोले इंतजार कर रहा है। पलक पांवड़े बिछाये हुये।

बिम्ब/ उपमानों का भी कोई बिम्ब-उपमान अधिकार होना चाहिये। जिस किसी बिम्ब को उसकी गरिमा के अनुरूप न लगाया जाये वो भाग के चला जाये बिम्ब अधिकार आयोग में और ठोंक से मानहानि का दावा।

आये दिन इस तरह के अन्याय/अत्याचार होते रहते हैं बिम्बों/उपमानों के साथ। किसी को कहीं फ़िट कर दिया कोई कहीं। बिम्ब/ उपमानों का भी कोई बिम्ब-उपमान अधिकार होना चाहिये। जिस किसी बिम्ब को उसकी गरिमा के अनुरूप न लगाया जाये वो भाग के चला जाये बिम्ब अधिकार आयोग में और ठोंक से मानहानि का दावा। ऊंचाई का बिम्ब ऊंचाई के लिये, नीचाई का नीचाई के लिये। महानता का बिम्ब महान लोगों के साथ लगेगा, कम महान लोगों का कम महान लोगों के साथ। सीनियर बिम्ब सीनियर पात्र के लिये जूनियर बिम्ब नये,ताजे, फ़ड़कते पात्र के लिये। किसी भी बिम्ब के साथ दुभांती हुई तो वह बिना फ़ीस के अदालत में मुकदमा ठोंक सकता है। उसका केस कोई सरकारी वकील बिम्ब लड़ेगा जिसको साहित्य की भी जानकारी होगी।

बहुतायत में प्रयोग किये जाने वाले बिम्ब बिम्ब आयोग अधिकार में अर्जी लगा सकते हैं कि साहब देखिये काम तो हमसे हचक के लिया जाता है लेकिन मजूरी वही जो सबको मिलती है। फ़िंच जाते हैं प्रयोग होते-होते लेकिन उसके हिसाब से भुगतान नहीं होता। कम उमर वाले नये बिम्ब को खतरे वाली जगहों में भेजने की मनाही हो सकती है। स्त्री बिम्बों की सुरक्षा के लिये विशेष उपाय किये जायें। उनके भी आरक्षण की बात चल सकती है ताकि उसे भी लटकाया जा सके।

अगर ऐसा हुआ तो बड़े मजेदार किस्से आयेंगे सामने। अब देखिये एक नामचीन च लोकप्रिय गीतकार ने शहीद की शान में कवितापेश की है।

शहीद की शान में कवितायें लिखना एक उज्ज्वल परम्परा शहीदों पर कविता लिखना हमेशा सुरक्षित रहता है। कोई कुछ बोल नहीं सकता सिवाय सर झुकाकर आंखे नम कर लेने के। कवि को भी कविता में शहीद अलाउंस मिल जाता है। उसके काव्यदोष को अनदेखा कर दिया जाता है। पोयटिक जस्टिस का भी विशेषाधिकार तो हमेशा ही रहता है कवि के साथ।

हां तो बात शहीद पर लिखी गयी कविता की हो रही थी। तो कवि ने लिखा है और फ़िर सुर में गाया भी है- है नमन उनको कि, जिनके सामने बौना हिमालय अब बताइये इसका मतलब क्या समझा जाये। हिमालय को बौना बना दिया शहीद के सम्मान में।

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हिमालय को हम दिनकरजी की कविताओं से जानते आये हैं।
मेरे नगपति! मेरे विशाल!
साकार, दिव्य, गौरव विराट
पौरूष के पुन्जीभूत ज्वाल!
मेरी जननी के हिम-किरीट!
मेरे भारत के दिव्य भाल!
मेरे नगपति! मेरे विशाल!

अब बताइये कभी का साकार,दिव्य,गौरव विराट बौना होकर कैसा लगेगा? कवि हिमालय को बौना बनाये बिना भी शहीद को महान बता सकता था। हिमालय से अनुरोध करता तो वह शहीद के सम्मान में अपना माथा झुका देता। उससे कहते तो वह शहीद की याद में नदियों के रूप में बह जाता। लेकिन शायद कवि मजबूर है। उसका काम हिमालय को बौना बिना चल नहीं पायेगा।

एक सैनिक के मुंह से ही कभी हमें सुनवाया गया था-
कट गये सर हमारे तो कुछ गम नहीं
सर हिमालय का हमने न झुकने दिया।

शहीद की शान में कवितायें लिखना एक उज्ज्वल परम्परा शहीदों पर कविता लिखना हमेशा सुरक्षित रहता है। कोई कुछ बोल नहीं सकता सिवाय सर झुकाकर आंखे नम कर लेने के। कवि को भी कविता में शहीद अलाउंस मिल जाता है।

अपनी जान देकर भी जिस हिमालय के सर को झुकने से बचा पाने का संतोष सैनिक के मन रहा होगा उसी हिमालय को सैनिक के सम्मान में बौना बना दिया। सैनिक की आत्मा कलपती होगी। जिसकी रक्षा के लिये वह शहीद हो गया वही उसके चलते बौना हो गया। बेटे की शहादत पर बाप का सीना चौड़ा होता है, सर फ़ख्र से ऊंचा होता है। किसी बेटे की शहादत के बारे में लिखते हुये कोई कवि लिखे बेटे के शहीद होने से बाप बौना हो गया-इसी तरह की बात लगती है हिमालय को बौना बताना।

धर्मपाल अवस्थीजी ने कारगिल के शहीदों की याद करते हुये कविता में पाकिस्तानी सैनिकों का जिक्र करते हुये लिखा है- अउना, बउना सब पउना सब। ( वे सब भगोड़े तुम्हारे सामने (शहीदों के सामने) औने,बौने, पौने हैं)। लेकिन यहां कवि जी ने हिमालय का हिसाब कर दिया। देश का गौरव सैनिक की शहादत से बौना हो गया। बलिहारी है कवी जी की।

कोई आशु कवि इस तरह की उपमायें लिखे तो बात समझ में आती हैं लेकिन हमारे समय के लोकप्रिय गीतकार इस तरह की वीरतायें दिखायें हैं तो उनको कौन रोकेगा? कौन टोकेगा? खासकर तब जब वे इस बात को अपना कविता पाठ शुरू करने से पहले बताते हैं अंग्रेजी में- Its better to be a good poet than a bad engineer. जब अच्छे कवि के ये हाल हैं तो खराब कविगणों के क्या हवाल होंगे। उनके प्रशंसक जो उनको अनुकरण करके लिखने-पढ़ने का अभ्यास करते हैं वे भी इसी महान परम्परा को आगे बढ़ायेंगे। अटपटे,चौंकाने वाले बिम्ब इस्तेमाल करेंगे, बेमेल उपमायें देंगे और कविता- कल्याण करेंगे।

वैसे कवि की अपनी स्वतंत्र सत्ता होती है। वह अपने मन, मूड, मौका, मर्जी के अनुसार अपने बिंब तय करता है। कभी-कभी तो चाहकर भी अटपटा बिम्ब बदल नहीं पाता। किसी-किसी कविता में तो बिम्ब का अटपटापन ही उसकी खूबसूरती बन जाता है। बिम्ब से अटपटापन हटा दो कविता की खूबसूरती का फ़ेयरवेल हो जाता है।

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रचनाओं के साथ नये-नये प्रयोग करने की चाह के चलते भी चौंकाने वाले बिम्ब प्रयोग में लाये जाते हैं। अक्सर इस तरह के प्रयोग देखते रहने के चलते अब तो इस तरह के प्रयोगों में चौंकाने की क्षमता भी खोते जा रहे हैं।

निदा फ़ाजली जी की बहुत प्रसिद्ध गजल है जिसमें उन्होंने मां के बारे में लिखते हुये लिखा था- बेसन की सोंधी रोटी पर ,खट्टी चटनी जैसी मां। बहुत प्यारी सी बलि-बलि जाऊं टाइप उपमा है मां की। न जाने कितने लोगों ने इस जमीन पर गजलें लिखीं होंगी। लेकिन इसको अलग नजरिये से देखा जाये तो लगता है कि संबंधो की वस्तुओं में बदलने की कवायद की शुरुआत है। मां का दर्जा दुनिया के हर साहित्य में ऊंचा ,सबसे ऊंचा माना गया है। मां के उदात्त गुणों की बात की जाती है। मां की ममता , प्रेम, क्षमा, त्याग के न जाने कितनी-कितनी तरह उपमायें प्रयोग की गयीं होंगी। लेकिन इसमें मां की याद को खट्टी चटनी,चौका-बासन,चिमटा, फुकनी जैसी बताकर शायर ने मां को सामान में बदल दिया। बहुत प्यारा बिम्ब है लेकिन मां को सामान में बदलने के बाद।

रचनाओं के साथ नये-नये प्रयोग करने की चाह के चलते भी चौंकाने वाले बिम्ब प्रयोग में लाये जाते हैं। अक्सर इस तरह के प्रयोग देखते रहने के चलते अब तो इस तरह के प्रयोगों में चौंकाने की क्षमता भी खोते जा रहे हैं।

अरे लेकिन हम भी यह सब क्यों लिख रहे हैं। हम कोई कवि या आलोचक तो हैं नहीं। मात्र पाठक और श्रोता हैं। एक श्रोता और पाठक को यह अधिकार थोड़ी होता है कि वह कवि और शायर के काम में दखल दे। है कि नहीं!

मेरी पसंद

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गीत !
हम गाते नहीं
तो कौन गाता?

ये पटरियां
ये धुआँ
उस पर अंधरे रास्ते
तुम चले आओ यहाँ
हम हैं तुम्हारे वास्ते।

गीत !
हम आते नहीं तो
कौन आता?

छीनकर सब ले चले
हमको
हमारे शहर से
पर कहाँ सम्भव
कि बह ले
नीर
बचकर लहर से।

गीत!
हम लाते नहीं
तो कौन लाता?

प्यार ही छूटा नहीं
घर-बार भी
त्यौहार भी
और शायद छूट जाये
प्राण का आधार भी

गीत!
हम पाते नहीं
तो कौन पाता?

-विनोद श्रीवास्तव,कानपुर

87 responses to “कल्पना का घोड़ा,हिमालय की ऊंचाई और बिम्ब अधिकार आयोग”

  1. dr.anurag

    वैसे तो इ स्वामी ने एक टिपण्णी में मेरे मन की बात सबसे पहले कह दी थी ….कविता के बारे में मेरी एक सीमित समझ है …खालिस पाठक सी .मेरा मानना है ..के कवि अपने समय का चौकीदार होता है……अपने समय का साक्षी भी ….अनदेखे ओर देखे अनुभवों को इस तरह शब्दों का लिबास पहनाना के पढने वाले को चेरा जाना पहचाना लगे ..कभी कभी अपना….. ओर यहाँ चलती किसी बहस में भाग लेने की मेरी कतई इच्छा नहीं है …निदा फाजली साहब ओर गुलज़ार का किसी ने नाम लिया तो दुःख हुआ …पर हैरानी नहीं हुई..अक्सर मैंने देखा है ….हिंदी के बड़े ज्ञाता .ज्ञानी लोग …वे भी जिनकी कई किताबे छप चुकी है …जो कवितायों के विशेषग माने जाते है .गुलज़ार की त्रिवेनियो पर शेर कहकर तारीफ़ कर देते है ….ओर आज़ाद नज्मो को कविता कह कर….मैंने हिंदी के बड़े -बड़े खम्बो की बोझिल उबाऊ ओर लम्बी लम्बी कविताएं पढ़ी है ….दुर्भाग्य से एक सच ये भी है के हिंदी के कई लोग उर्दू की गजलो ओर नज्मो को थोडा हलके में लेते है …बिना पढ़े ओर समझे वे अपने पूर्वाग्रहों मेंग्रसित वे निष्कर्ष निकाल लेते है …ओर उसी को अंतिम सत्य….
    निदा साहब का एक शेर है …..
    “दो ओर दो का जोड़ हमेशा चार कहाँ होता है
    सोच समझ वालो को थोड़ी नादानी दे मौला ”

    दो पंक्तियों में कितना बड़ा सार है …..गर समझने वाला चाहे तो…..बिना विम्बो के कविता क्या आप गध भी नहीं रच सकते …….
    आपने सोंधी रोटी का जिक्र किया है …शायद मजाक में किया है…लेकिन सच तो ये है के ये कितनी मांये इसे पढ़ सुनकर बस आँख भरकर अपने काम में लग जाती है .ये वो मांये है जिन्हें साहित्यक समझ नहीं है …..जिन्होंने कोई कविता नहीं पढ़ी….जिन्हें उर्दू के कई लफ्जों के मायने नहीं आते …..
    मसलन.देखिये ….
    बान की खुर्री खाट के ऊपर हर आहट पर कान धरे
    आधी सोयी आधी जागी थकी दोपहरी जैसी मां
    अजीब बात है ……आगे वे लिखते है
    “बाँट के अपना चेहरा ,माथा आँखे जाने kahan गयी
    फटे पुराने इक एलबाम में चंचल लड़की जैसी मां ”
    मेडिकल कॉलेज में बीटल्स ओर एल्विस सुनने वाले मेरे अंग्रेजीदां दोस्त ठहर गये थे इसे सुनकर ……….क्या इतने मुश्किल विम्ब है………
    दरअसल ये दिल से निकले विम्ब है …..
    अब गुलज़ार पे आते है .उन्हें समझने के लिए एक खास समझ की जरुरत है …..मसलन
    एक बेचारी नज़्म के पीछे /सैंकड़ो रोजमर्रा के मसले /तेज नेजे उठा के भागते है /मुन्तशिर ज़ेहन के बियाबान में /
    दस्तानो की बीबा शहजादी /लीरा लीरा सा पैरहन पहने /हांफती कांपती बदहवास बेचारी /मुझसे आकर पनाह मांगती है /एक बेचारी नज़्म की इस्मत
    सैंकड़ो रोजगार के मसले……..

    कितना आसान है न ये सब कहना…….अगर वाकई इतना आसान है .तो देखिये गुलज़ार यहाँ किस तरह कहते है

    एक सनसेट है, पके फल की तरह
    पिलपिला रिसता, रसीला सूरज
    चुसकियाँ लेता हूँ हर शाम लबों पे रखकर
    तुबके गिरते हैं मेरे कपड़ों पे आ कर उसके

    एक इमली के घने पेड़ के नीचे
    स्कूल से भागा हुआ बोर-सा बच्चा
    जिस को टीचर नहीं अच्छे लगते
    इक गिलहरी को पकड़ के
    अपनी तस्वीरें किताबों की दिखा कर खुश है

    मेरे कैन्वस ही के ऊपर से गुज़रती है सड़क इक
    एक पहिया भी नज़र आता है टाँगे का मुझे
    कटकटाता हुआ एक सिरा चाबुक का
    घोड़े की नालों से उड़ती हुई चिनगारियों से
    सादा कैन्वस पे कई नुक्ते बिखरते हैं धुएँ के।

    कोढ़ की मारी हुई बुढ़िया है इक गिरजे के बाहर
    भीख का प्याला सजाए हुए, गल्ले की तरह,
    माँगती रहती है ख़ैरात ‘खुदा नाम’ पे सब से।
    जब दुआ होती है गिरजे में तो बाहर आकर
    बैठ जाता है खुदा गल्ले पे, ये कहते हुए
    आज कल मंदा है, इस नाम की बिक्री कम है।

    ‘क़ादियाँ’ कस्बे की पत्थर से बनी गलियों में
    दुल्हनें ‘अलते’ लगे पाँव से जब
    काले पत्थर पे क़दम रखती हुई चलती हैं
    हर क़दम आग के गुल बूटे से बन जाते हैं!
    देर तक चौखटों पे बैठे, कुँवारे लड़के
    सेंकते रहते हैं आँखों के पपोटे उनसे।

    नीम का पेड़ है इक-
    नीम के नीचे कुआँ है।
    डोल टकराता हुआ उठता है जब गहरे कुएँ से
    तो बुजुर्गों की तरह गहरा कुआँ बोलता है
    ऊँ छपक छपक अनलहक़
    ऊँ छपक छपक अनलहक।

    गोया हमें क्या मतलब किसी कविता की परिभाषा से ….उसके क्षेत्रफल से …. उसकी लम्बाई ओर गहराई से …बौधिक कुशलातायो का पैमाना मापती कविताओं से ….नियम ओर अनुशासन में बंधी कविताओं से……. ..हमें तो निरा पाठक रहने दीजिये …..
    dr.anurag की हालिया प्रविष्टी..सुन जिंदगी!! किसी-किसी रोज तेरी बहुत तलब लगती है

  2. ज़मालो का मुँहबोला भाई--कमाल !

    डॉ अनुराग ने अब तो सब स्पष्ट कर ही दिया.. पईसा वसूल टिप्पणी !
    प्रतीकों उपमानों और बिम्बों के बिना रचित-पठित साहित्य अधूरा स्वरालाप ही होगा ।
    मैंनें अपना स्टैन्ड बदल दिया है.. .. ?
    ना जी ना… मुझे तो ज़मालो का मुँहबोला भाई टिपियाने को पठाता रहा । कारण ?
    काहे कि मौज़ लिये केर साट्टीफ़िकेट हमहूँ धरे हन ।
    सिर फूटे की नौबत पर वोहिका बाद में देखाइत.. हन्डेड पारशेन्ट पारफ़ेक्ट डिस्केमर डिस्क्लेमर जउन होत हुये…

    हालाँकि टिप्पणियों की उड़ान को कनॉडा की ओर डाइवर्ट करने की चेष्टा इन-प्रॉक्सी की गयी थी, फिर भी ……
    ऎसे मुद्दों पर चिट्ठाकार को बीच बीच में क्या अपनी उपस्थिति दर्ज़ नहीं कराते रहना चाहिये था ?
    और… और, मेरा चरित्र-परिवर्तन हो गया !!

  3. ज़मालो का भाई कमाल

    डॉ अनुराग ने अब तो सब स्पष्ट कर ही दिया.. पईसा वसूल टिप्पणी !
    प्रतीकों उपमानों और बिम्बों के बिना रचित-पठित साहित्य अधूरा स्वरालाप ही होगा ।
    मैंनें अपना स्टैन्ड बदल दिया है.. .. ?
    ना जी ना… मुझे तो ज़मालो का मुँहबोला भाई टिपियाने को पठाता रहा । कारण ?
    काहे कि मौज़ लिये केर साट्टीफ़िकेट हमहूँ धरे हन ।
    सिर फूटे की नौबत पर वोहिका बाद में देखाइत.. हन्डेड पारशेन्ट पारफ़ेक्ट डिस्केमर डिस्क्लेमर जउन होत हुये…

    हालाँकि एक बीच में एक बार टिप्पणियों की उड़ान को कनॉडा की ओर मोड़ने की चेष्टा इन-प्रॉक्सी की गयी थी,
    पर क्या ऎसे मुद्दों पर चिट्ठाकार को बीच बीच में अपनी उपस्थिति दर्ज़ नहीं कराते रहना चाहिये ?
    और.. और यह देख निट्ठल्ले का चरित्र परिवर्तन हो गया !!

  4. अनूप भार्गव

    अब जब कि इस विषय पर गर्मा गरम बहस शान्त सी हो गई है , कुछ भोले से सवाल पूछना चाहूँगा कुमार विश्वास जी या उन के प्रशंसकों से :
    १. जब विश्वास जी इतनी अच्छी कविता लिखते हैं तो उन्हें श्रोताओं से हर पंक्ति पर तालियों की भीख क्यों मांगनी पड़ती है ?
    २. वह ५ मिनट की कविता को ५० मिनट के चुटकुलों के साथ क्यों सुनाते हैं । चुटकुले सुनने के लिये तो और भी स्थानों पर जाया जा सकता है ।
    ३. श्रोताओं को कविता के करीब लाने की बजाय क्या वह उन्हें कविता से दूर नहीं ले जा रहे ?

    वैसे मुझे उन की यह कविता न तो बहुत ही पसन्द आई और ना ही इतनी बुरी भी लगी ।

  5. बवाल

    छायावाद के विषय में अज्ञानता आजकल हर जगह परिलक्षित हो रही है। कारण दिल के साथ-साथ दिमाग के इस्तेमाल की जगह लोग सिर्फ़ और सिर्फ़ दिमाग का अतिशय इस्तेमाल करने लगे हैं या कहिए कि फ़ैशन चला बैठे हैं। कविता में हिमालय का बौनापन कवि की अक्खड़ता दर्शा तो ज़रूर रहा है मगर यह उनकी उम्र की वजह से भी है। सभी तो दुष्यंत कुमार जैसा मर्म कमसिनी में नहीं पा सकते ना। खै़र वो प्रस्तुतिकरण उम्दा कर रहे फ़्यूज़न के अंदाज़ में, किंतु यदि बिंबों में बौद्धिक स्पंदन आ जाए तो फिर कहना ही क्या। अनूपजी हमें नहीं लगता के आपके इस सुन्दर विष्लेषण की प्रतिक्रिया में टिप्पणियों के आलिंद को कोपलताओं से सजाया जाए। हाँ जी, यह बात तो फिर भी कहेंगे कि माँ के लिए उपमा ’खट्टी’ की जगह ’मीठी’ चटनी की दी जाती तो ……………………………………………. खै़र जाने दीजिए। हा हा। बहुत आनंद आया।
    बवाल की हालिया प्रविष्टी..जाने क्या वो लिख चलेबवाल

  6. Uchit Awasthi

    एक आखिरी बात अनूप जी से …लोकप्रियता इसे कहतें हैं की ज़रा उल्लेख भर आने से आप की पोस्ट को डॉ कुमार के नाम ने ही इतना पोपुलर कर दिया है .अभी तक इतनी अधिक टिप्पिनी शायद ही आई हों. जय हो. इस की भी रेखा होती होगी हाथ में .इस बार डॉ कुमार विश्वास का हाथ देखना पड़ेगा.

  7. aradhana

    पैसा वसूल पोस्ट पर डॉ अनुराग की पैसा वसूल टिप्पणी. एक पर एक फ्री. निदा जी की उक्त रचना मुझे बहुत-बहुत अच्छी लगती है. मैं उसे कई बार पढ़ चुकी हूँ, याद फिर भी नहीं होती.
    और हाँ, एक बात और… आज से मैं अपनी कल्पनाएँ फरारी में दौड़ाऊँगी. शायद घोड़े पर दौड़ाने के कारण ही इतनी धीरे-धीरे चलती है कि कोई बिम्ब ही नहीं मिलता :-)
    aradhana की हालिया प्रविष्टी..तस्वीरें बोलती हैं शब्दों से ज्यादा

  8. अपूर्व

    आइडिया अच्छा है आपका..मुझे तो लगता है कि मानवों और पशुओं के साथ-साथ बेचारी जड़ वस्तुयों की रक्षा को भी आयोग बनाना चाहिये..प्रकृति अधिकार आयोग..जो यह देखे कि पेड़, पौधे, पहाड़ समुद्र किसी के भी अधिकारों का हनन न हो..अगर कोई हिमालय को बौना बनाने का क्लेम करता है..तो उसे प्रापर प्रासीक्यूशन के जरिये अपने दावे को सिद्ध करने की चुनौती देनी चाहिये..वो बताये कि हिमालय को प्रिसाइजली कितने मीटर और मिलीमीटर से बौना किया गया..मीजरमेंट क्या आइएसआइ स्टैंडर्ड्स पे जाचाँ गया..और लंबाई बढ़ाने के इस तरीके मे प्रतिबंधित दवाओं का सहारा तो नही लिया गया..सिद्ध न कर पाने की स्थिति मे हिमालय की मानहानि के जुर्म मे एक तगड़ा हर्जाना वसूलना चाहिये..ऐसे ही जो कवि शायर लोग बिना किसी पुख्ता सबूत के अपनी खयाली महबूबाओं की तारीफ़ करने मे चाँद तारों की बेइज्जती करते हैं..उन्हे भी कानून के दायरे मे लाना चाहिये..और पक्के प्रमाण देने वाले कवि को अपने बिंबों पर पचास साल तक पेटेंट करा कर रायल्टी खाने का अधिकार भी देना चाहिये…कविता करना आखिर सब्जी वालों का काम तो नही है..वैसे ही कल्पना को बेचारे घोड़े मे सवार कर दौड़ाने वालों को इसका जूरी के सामने लाइव डेमो दे कर प्रूव करने को कहा जाय..और न साबित कर पाने की स्थिति मे उन्हे घोड़ो के अस्तबल मे ही रहने और चने खाने की सजा देनी चाहिये..फिर उनकी कल्पना किसी मरियल टट्टू की सवारी करने की हिम्मत भी नही करेगी..
    सौ-पचास बिंब हम भी लगे हाथों पेटेंट करा लेते है..जिंदगी अच्छी मुफ़्तखोरी मे कटेगी.. :-)

  9. Mukesh Kumar Tiwari

    आदरणीय अनूप जी,

    बिम्बों के बहाने न जाने कितने प्रतिबिम्ब बनाये, लेकिन लिखनेवालों की अस्मिता इतना बचा रखा जैसे कि द्रोपदी के चीर को प्रभुजी बचाये रक्खे थे। रोचकता तो आपकी लेखनी का कमाल है, बड़ा मजा आया पढ़कर।

    हाल के दिनों में एक बहुत ही नया बिम्ब हमारे सामने आया था सोच रहा हूँ कि आप सब से बाँट लिया जाये(मौका जो है) ” प्राईसेस आर स्काई रॉकेटिंग” यह स्टील के संबंध में था। हकीकत में तो बाकी सभी दैनन्दिन जरूरतों की वस्तुयें तो घोड़े की तेजी से बढ़ी हों लेकिन स्टील तो आसमान छू रहा है} अब तो लगने लगा है कि लोहे और सोने में साम्य कैसे हो रहा है(शायद “पारस” तेजड़ियों के पास ही है जब चाहे लौहे के छुआ देते हैं जब चाहे सोने को)

    सादर,

    मुकेश कुमार तिवारी
    Mukesh Kumar Tiwari की हालिया प्रविष्टी..पतों के बीच लापता होते हुये

  10. नीरज रोहिल्ला

    अनूप भार्गव जी ने कम शब्दों में मेरे मन की बात कह दी,
    उनको केवल यूट्यूब पर ही सुना है लेकिन उनका बीच में तालियों के गडगडाहट…तालियों की फ़लाना…तालियों की ढिमका की मांग करना रचना का मजा किरकिरा कर देता है।

    कुमार विश्वास को पर्सनली एक मंझे हुये कवि से अधिक आज के युग का सफ़ल एंटरटेनर समझता हूँ।
    नीरज रोहिल्ला की हालिया प्रविष्टी..हे दईया कहाँ गये वे लोग

  11. Harshit

    अनुराग जी ने सारी बात स्पष्ट कर दी ……और अनूप जी ब्लॉग की टी.आर. पी. बटोरने का खेल जो आपने खेला वो आपको मुबारक हो ….. टिप्पणियों की संख्या एक व्यक्ति के नाम मात्र से बढ़ गई ….कभी मौका लगे तो मंच पर कुमार विश्वास का साथ पाने की चेष्टा करियेगा …. जनता अपने आप बोलेगी ….

    —-अनूप भार्गव
    अब आप कुमार विश्वास को खड़े होने, चलने, बैठने, हाथ धोने के भी तरीके सिखायेंगे क्या?
    और जन कवि को न आलोचकों की जरूरत होती है और न ही साहित्य के तकनीकी सलाहकारों की …….कविता वो होती है जो सीधे दिल पर असर करती हैं….आपको आपत्ति किस बात से हैं …..कुमार विश्वास की कविता के बिम्बों से ? उनकी लोकप्रियता से ? उनके मंचीय सञ्चालन से? या उनके जनसंपर्क के तरीके से ?

    एक उदाहरण गुलज़ार के दे दूं चलते -चलते

    ” फिर से अइयो बदरा बिदेसी,
    तेरे पंखो पे मोती जडूगी ”

    भाई हमने तो बरसात के पंख नहीं देखे …….मोती जड़ना तो दूर की बात हैं

    खैर जाने दीजिये आप नहीं समझेंगे …. इस असाधारण रूपकालंकार/ बिम्ब को

    मुझे समझ नहीं आ रहा कोई ब्लॉग लेखक को कुछ क्यों नहीं बोल रहा ……क्योंकि ये मात्र व्यंग नहीं बल्कि …..दुराशय से किया गया योजनाबद्ध तरीके से रचा गया प्रपंच है

    इन्ही शब्दों के साथ

    अलविदा

  12. Uchit Awasthi

    @अनूप भार्गव….१. [जब विश्वास जी इतनी अच्छी कविता लिखते हैं तो उन्हें श्रोताओं से हर पंक्ति पर तालियों की भीख क्यों मांगनी पड़ती है ]
    आप इसे भीख कहतें हैं हम इसे सम्प्रेषण का आग्रह समझतें हैं.और जब संप्रेषक के पास अन्य प्रस्तुतकर्ताओं की तरह संगीत या और कोई सहारा न हो.जैसे आप को अपने व्यंग्य लेख में तस्वीरें चिपकानी पड़ती हैं,क्या दर्शक चित्र से समझने वाले अबोध शिशु हैं ?नहीं बल्कि यह अपने कथ्य को ध्यान में एकाग्र करने का नुस्खा है.
    २. [वह ५ मिनट की कविता को ५० मिनट के चुटकुलों के साथ क्यों सुनाते हैं । चुटकुले सुनने के लिये तो और भी स्थानों पर जाया जा सकता है ]
    आश्चर्य है की आप इतने एकाक्षी हो चुके हैं की प्रतुत्त्पन्मति से उपजा परिहास आप को चुटकुला लगा.आज हिंदी की युवा पीढ़ी के पास एक पूरा मुहावरा कोष है डॉ कुमार के जुमलों का. आप ज़रा ढूंड कर चुटकुला दिखायें उस प्रस्तुति में …बीच में किसी के “वाह” कहने पर हुए ध्यान भंग को जो शख्स “अरे आप यहाँ हो ?मैं तो आप को आगरा में ढूंढ़ रहा था ” जैसी कुशल मेधा से वातावरण को बिखरने से बचा ले जाये,खुद में या किसी और में धुंद लें तो हमें भी बताइयेगा.
    तीसरे प्रश्न के लिए ज़रा गूगल का सर्च इंजन देखें,या डाउनलोड डेटा. 50 करोड़ से ज्यादा बार डाउनलोड होना यदि कविता से दूर कर रहा है तो आप JNU से मंगवा लीजिये कोई सच्चा कवी जो ५० को भी याद हो सके .

  13. amrendra nath tripathi

    @ …. आखिर JNU गले से नीचे क्यों नहीं उतर रहा है | JNU ने जब उन्हें बुलाया था तो वह एक कवि को नहीं , एक इंटरटेनर को बुलवाया था | यहाँ जब कुमार विश्वास आया था तो अपने साथ सफ़ेद कुर्ता-पाजामा पहने एक चाटुकार को भी लेकर आया था जो कुमार के योजनानुसार बगल की एक छत पर चढ़ के वीडियो-रिकार्डिंग करने के चक्कर में शारीरिक संतुलन खोने की वजह से गिरते-गिरते बचा था | उसे वहाँ पर कुछ लोगों ने सम्हाला | यहाँ कुमार एक ‘इंटरटेनर’ के तौर पर चुटकुलों से तालियों की भीख माँगता रहा और पाता रहा , बेशक ! फिर जैसा कि यहाँ उसके एक प्रशंसक ने एक टिप्पणी में कहा है कि माल का थैला और धमाल लेके यहाँ से दफा हो गया | इस तरह की बातों को कहना जरूरी नहीं समझता पर बार-बार JNU को सायास लाने से एक स्पष्टीकरण देना पड़ता है |

    — अनूप भार्गव जी के कहने में कोई अतिशयोक्ति नहीं है , यह उनकी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है | ‘आगरे में ढूंढना’ तो जाने कब का मुहावरा है , लोक-वाणी में बहुत समय से बोला जा रहा है | शायद कुमार जब पैदा नहीं हुआ होगा तब से | कुमार मूलतः ‘गुड पोयट’ से अलग मसखरे-बाज या चुटकुले-बाज ही है , और यह कोई खराब चीज भी नहीं है इतनी पर जब वह स्वयं को ‘गुड पोयट’ के दंभ में प्रस्तुत करता है , आलोचनापरकता वहाँ आती है | और यह किसी को बुरी नहीं लगनी चाहिए | डाउनलोड होना किसी श्रेष्ठता का सूचक नहीं , अश्लील फ़िल्में या दृश्यों के टुकड़े तो बहुत डाउनलोड होते हैं पर वे ‘श्रेष्ठ’ फिल्म या दृश्य नहीं कहे जाते | गुलशन नंदा के उपन्यास प्रेमचंद से ज्यादा बिकते हों तो इसका मतलब यह नहीं कि गुलशन नंदा प्रेमचंद से बड़े या श्रेष्ठ कथाकार भी हुए | ‘प्रसिद्धि’ और ‘श्रेष्ठता’ दो अलग अलग चीजें हैं |

    — प्रत्युत्पन्नमति वह है जो किसी भी नयी बात पर एक नए तरीके से ‘ह्यूमर’ की नवीनता के आग्रह को व्यक्त करती हुए सामने वाले को प्रभावित करे | इसमें मुख्यतया नयेपन का आग्रह है | चुटकुला जाने कितनी बार और कहाँ कहाँ बोला जाता है , इसका भी अपना महत्व है , पर यह वह नहीं है , कुमार तो एक चुटकुले को अधिकाँश परफार्मेंस में औंटटा रहता है | उसमें प्रत्युत्पन्नमति का कमाल नहीं , सस्ती चुटकुले-बाजी का धमाल है ! इसकी चुटकुले-बाजी भी अधिकांशतः निकृष्ट कोटि की है जिसपर वह भूरि-भूरि यौनिकता/अश्लीलता की छाया रखने की कोशिश करता रहता है ! द्विअर्थी संवादों की कोटि का प्रयास ही रहता है उसके यहाँ |

    — अंतिम बात कहूंगा कि व्यक्ति की सकारात्मकता और संभावनाओं में मुझे सदैव विश्वास रहा है , इसलिए इससे भी इनकार नहीं करूंगा कि भविष्य में कुमार विश्वास अच्छा नहीं लिख सकता , अगर वह अच्छा करता है तो ‘प्रसिद्धि’ और ‘श्रेष्ठता’ दोनों एक ही व्यक्ति में मिलेगी , यह भी कम खुशी की बात नहीं , पर जो सीन इस समय है उसकी कविता की , वह असंतोषजनक और आपत्तिजनक है ! लेकिन अच्छा करने के लिए उसको अपनी आलोचनाओं को सकारात्मक ढंग से लेनी चाहिए , उसे अपनी कविता के ‘कबिरा दीवाना था’ के कबीर से सीखना चाहिए कि ‘निंदक नियरे राखिये आँगन कुटी छवाय’ , पर वह तो आलोचनाओं को भी नहीं सह पा रहा है और चेलों से लठैती करा रहा है ! …. आभार !
    amrendra nath tripathi की हालिया प्रविष्टी..बजार के माहौल मा चेतना कै भरमब रमई काका कै कविता ध्वाखा

  14. Uchit Awasthi

    @अमरेन्द्र “कुंठितेश” जी. उन्हें तो पता भी नहीं होगा आप के इस अखंड विधवा विलाप का. और हाँ न हम उन के लठैत हैं और न आप की इस मनसबदारी के कोई ब्लोगर मुखिया.अक्ल का खातें हैं और पूरी दुनिया पर अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाते हैं. JNU क्या-क्या है,ये हमें न बताइये.और हम जहाँ से पढें हैं वो क्या है दुनिया जानती है. पर आप की इस प्रतिक्रिया से वो कारण पता चला जिस की वज़ह से आप स्रावित हैं.आप को तो पूरा दृश्य याद है???? जब आप की चेतना पर डॉ साहब का जनसमूह से सत्यापित बुलडोज़र चला था. अच्छा हुआ हमें सही सही कारण पता चल गया.आई ए एस की तैयारी में जितनी हिंदी पढ़ी थी उस के अनुसार जल्दी ही JNU की उसी छत से शायद नया “गोरख पाण्डेय” मिल जाये.और हाँ डॉ साहब अगली बार आगरा में किसी को ढूंढने जायेंगे तो आप ज़रूर मिलोगे.पुरुष ही थे तो तब एक बार ज़रा खड़े हो कर ये सब बोल देते उस दिन जब आप की ही चटाई पर आप का मुंडन कर गए थे वो , वहीँ कारसेवा हो जाती.आप को भी आराम रहता और हम को भी.ज़मालो कोई और भुस का बिटोरा ढूंड लेती .क्यूँ अनूप जी ?

  15. Uchit Awasthi

    और एक बात और .अनूप जी को संबोधित टीप पर भी आप का उवाच बता रहा है की पीड़ा कितनी विकट है.सामान्य शिष्टाचार का उलघंन औरों को भी आता है.इलाहाबाद इतना ज़रूर सिखाता है की ले कैसी और दे कैसी.
    सादर

  16. Uchit Awasthi

    इसे कहते हैं सभ्य और शालीन सोच …बहुत बहुत प्रणाम अनूप जी
    काश आप से कुछ लोग थोडा सा तो सीखते …..

  17. Harshit

    मै दोबारा नहीं आना चाहता था..लेकिन अमरेन्द्र भाई की टीप ने बाध्य किया…..बहुत अभद्र शब्दों का प्रयोग कर चुके आप …..ये निजी रंजिश निकालने का मंच नहीं है….कुछ दिनों पहले पवन झा जी ने इब्नबतूता के लेकर एक पोस्ट लिखी थी….बहुत सी प्रतिक्रियां आई …..कुछ पक्ष में थी और कुछ विपक्ष में ….लेकिन यहाँ तो सभी हदें तोड़ी जा रही हैं… एक दुसरे को नीचा दिखने के लिए कुतर्क दिए जा रहे हैं ……ये हो रही है साहित्य की सेवा

    अमरेन्द्र एक बात बताएँगे आप……क्या पूरे हिन्दुस्तान को कविता समझने के लिए हिंदी में उच्च डिग्रियां हासिल करनी चाहिए? एन्जीनिअर्स, मनेजर्स, डिजाइनर, पेंटर, चायवाला, कुली, एयरफोर्स ओफ़िशिअल्स और अन्य सेवाओ में संलग्न लोगो को कविता समझने, उसे अपनाने, गुनगुनाने का अधिकार नहीं है ….क्या मन के भावो को समझने के लिए भाषा विशेष की डिग्री चाहिए?

    यहाँ ब्लॉग जगत में बहुत से कवि- कवित्रियाँ मौजूद हैं….और मैंने जितना भी पढ़ा है…सभी एक दुसरे के बिम्बों की तारीफ करते नहीं थकते ….कुमार को छोडिये यदि आप सब सच में हिंदी का भला चाहते हैं तो अपनी ऊर्जा वहां लगाइए ( बात बिम्ब से शुरू हुई थी…इसलिए मैं सिर्फ वही बात करूंगा…दलदल में नहीं चाहता बातों को ले जाना ) ……एक प्रश्न और ……कहीं विरोधी लोगों की चिंता की विषय-वास्तु ये तो नहीं की कुमार कविता के माध्यम से पैसा कमा रहे हैं और दुसरे वंचित हैं ….तो किसने रोका है आपके पास श्रेष्ठ माल है …..बेचो जाकर, कीमत मिलेगी बाजार में ….अब चेतन भगत पा ही रहे हैं…. आमिर की साल में आई एक फिल्म ही बॉक्स ऑफिस में धमाल करती हैं ….सभी पूर्व रिलीज के आंकड़े तोड़ते हुए …..

    अमरेन्द्र आप और आपका संगठन कुमार विश्वास विरोधी है ये तो पूरा ब्लॉग जगत जानता है…..आप हर उस जगह पहुँच जाते हैं जहाँ कुमार की बात छिड़ी हो…..आप मत पसंद करिए, लेकिन जैसे शब्दों का आप इस्तेमाल करते हैं वो अभद्रता है, सभ्य समाज में नीची द्रष्टि से देखा जाता है……ये लोग जो ब्लॉग जगत में आज आपको उकसा कर हाँ में हाँ मिला रहे हैं…..कल डॉ. विश्वास के गले मिल मंच के बराबर बैठेंगे.

    रही बात कुमार के चेलों की तो खुद को प्रशंसक तो मानता हूँ उनका ……मेरे जैसे हजारों है उनके पास….आप भी किसी के चेले ही है ….जो आपको उकसा रहा है और खुद मुह छिपाए फिर रहा है …. इतना जरूर कहूँगा …अपनी ऊर्जा कुछ उत्पादक कार्यों में व्यय करें न कि व्यक्ति विशेष से द्वेष रखें ….आप बहुत मेधावी हैं…..शायद भविष्य में आपके रूप में कोई हिंदी का नायक ही हो…..

    उम्मीद है अब आप इस चर्चा को यहीं विराम देंगे

    शुभकामनाये

    ओह्म शांति ओह्म

  18. अनूप भार्गव

    @हर्षित जी:
    आपको आपत्ति किस बात से हैं …..कुमार विश्वास की कविता के बिम्बों से ? उनकी लोकप्रियता से ? उनके मंचीय सञ्चालन से? या उनके जनसंपर्क के तरीके से ?

    >> हर्षित जी ! मुझे इन में से किसी भी बात पर आपत्ति नहीं है । मुझे शिकायत सिर्फ़ इस बात से है कि वह कवि सम्मेलनों में भीड़ तो जुटा रहे हैं लेकिन कवि सम्मेलनों को कविता से दूर ले जा रहे हैं । यदि आप यह मानते हैं कि उन की प्रस्तुति में जो ९०% से अधिक होता है , वह कविता है तो मुझे आप से कुछ नहीं कहना है ।

    @उचित अवस्थी जी
    आप इसे भीख कहतें हैं हम इसे सम्प्रेषण का आग्रह समझतें हैं.और जब संप्रेषक के पास अन्य प्रस्तुतकर्ताओं की तरह संगीत या और कोई सहारा न हो.जैसे आप को अपने व्यंग्य लेख में तस्वीरें चिपकानी पड़ती हैं,क्या दर्शक चित्र से समझने वाले अबोध शिशु हैं ?नहीं बल्कि यह अपने कथ्य को ध्यान में एकाग्र करने का नुस्खा है.
    >> सम्प्रेषण का आग्रह एक बार समझ में आता है , दो बार समझ में आता है लेकिन जब हर पंक्ति पे किया जाने लगे तो कविता की सम्प्रेषणता पर सन्देह होने लगता है । आप ही के उदाहरण को लेते हुए “आठ पंक्तियों के लेख में अगर मुझे ८० चित्र लगाने पड़ें तो लेख शायद अपनी बात ठीक से नहीं कह रहा है और या वह शायद ’चित्र दीर्घा’ के लिये अधिक उपयुक्त है – ठीक वैसे ही जैसे ’कुमार’ जी एक Standup Comedy Club के लिये …..

    २. [वह ५ मिनट की कविता को ५० मिनट के चुटकुलों के साथ क्यों सुनाते हैं । चुटकुले सुनने के लिये तो और भी स्थानों पर जाया जा सकता है ]
    @ आश्चर्य है की आप इतने एकाक्षी हो चुके हैं की प्रतुत्त्पन्मति से उपजा परिहास आप को चुटकुला लगा.
    >> अजीब बात है कि वह ’ प्रतुत्त्पन्मति’ से उसी परिहास को हर कवि सम्मेलन में बार बार जन्म दे देते हैं । कुछ परिहास तो पहले से ही अन्य कवियों द्वारा रचे हुए होते हैं , उन्हें सिर्फ़ दोहराना होता है । कविता को तो कवि से जोड़ा जा सकता है लेकिन इन परिहासों को किस से जोड़ा जाये ? जिस नें पहले सुना दिया उसी के हो गये । नीरज जी भी ’कारवां गुज़र गया’ को बार बार सुनाते हैं लेकिन
    १) वह वह गीत उन का अपना होता है और
    २) अच्छी कविता को कई बार सुना जा सकता है , ’मैं आप को आगरा में ढूँढ रहा था’ पर बार बार हँसना मुश्किल होता है ।

    @तीसरे प्रश्न के लिए ज़रा गूगल का सर्च इंजन देखें,या डाउनलोड डेटा. 50 करोड़ से ज्यादा बार डाउनलोड होना यदि कविता से दूर कर रहा है तो आप JNU से मंगवा लीजिये कोई सच्चा कवी जो ५० को भी याद हो सके .

    >> सर्च इंजन या डाउनलोड डेटा कब से कविता के मानक और गुणवत्ता के मापदंड हो गये ? यदि आप सिर्फ़ गूगल के आंकड़ों को ले तो शीर्ष पर ऐसे शब्द/लेख मिलेंगे जिन्हें शायद आप यहां लिख भी न सकें ।
    अनूप भार्गव की हालिया प्रविष्टी..एक ख़याल

  19. amrendra nath tripathi

    @ हर्षित …
    जब ‘बात’ का जवाब आपके पास नहीं है तो आपको मेरे ही शब्दों में खोट दिख रही है | जैसे लाल चस्मा लगाए मनई को दुनिया लाल दिखती है , कुछ ऐसा ही आप लोगों के साथ भी है | बाकी पहली बार नहीं है कि आप जो मनगढ़ंत आरोप लगा रहे हैं | आप लोगों ने जो कहा वह तो है ही , एक जलनखोर महराज हमें ‘कुंठित-लुंठित’ सब बोल के गए हैं | पर हमें कोई दुःख नहीं है | ” काजर की कोठरी में कैसहूँ सयानो जाय / एक लीक काजर की लागिहैं पै लागिहैं ” ! आखिर हम कुमार विश्वास और उनके अंध-भक्त जैसे थोड़े ही हैं | आप लोग बड़े लोग हैं आलोचना भी नहीं सह पाते और हम छोटे मनई हैं आपलोगों द्वारा दी गयी गाली को भी आभूषण मान कर पहिन लेते हैं | का करें ई ससुरी इलिम बड़ी खराब चीज है जौन कहती है कि ‘जू गलत दिखे कहते रहो’ | अब इलिम भले ‘ससुरी’ है पर यहिके बिना जिन्दगी दूभर लगै लगी है ! :)

    @ उचित अवस्थी ..@.सामान्य शिष्टाचार का उलघंन औरों को भी आता है.इलाहाबाद इतना ज़रूर सिखाता है की ले कैसी और दे कैसी

    — अरे भैया कल तक तो नहीं लेकिन अब तौ हम डरे लगे हैं आपसे ! जान बख्शो महराज , अब आप जू कहेंगे हम वही कहेंगे | खुस्स्स्सस्स्स्स.! आप और कुमार की खुशी खातिर हम तो यहू कह देंगे कि कुमार विश्वास हिन्दी नहीं , भारत नहीं , विश्व नहीं , नौ ग्रह नहीं बलुक पूरे ब्रह्माण्ड के सबसे बडुवार – शालीन – भक्तवत्सल – उदार – आद आद …… कबि हैं ! इंसान की बात जाने दो तैतीस करोड़ देवता तक उनके फैन हैं ! खुस्स्स्सस्स्स्स.! मुला अब पिंड छोड़ो हमार !
    और , कल लिखे थे कि आपसे मिलके खुशी होगी , अब तो हमारी हालत खराब है , भैया , ई भारत आप और कुमार विश्वास के सौभाग्य से बहुत बड़ी आबादी का देश है , जब भारत आना तो उनके करोड़ों करोड़ों फैन्स में से किसी से भी मिल लेना , हमें बख्श देना ! आप हमारा हाथ-गोड़ तोड़ देंगे तो हम का करेंगे , काहे से कि आप धमका रहे हैं कि आप माहिर-खिलाड़ी हैं इसके कि ” ले कैसी और दे कैसी ” ! मिलने की बात ही क्या हम तो आपको कोस भर दूर देखकर ही भाग खड़े होंगे ! अब ऐसे प्रसंशक जिसके होंगे , मारे भय के उसको सब महान कवि मान लेंगे ! हमहू मान लिए प्रभू , खुस्स्सस्स्स्सस्स्स.! :)

    ***** अब आप लोगन की हमारी और से जीत , और हमारी ओर से संवाद-विराम *****
    amrendra nath tripathi की हालिया प्रविष्टी..बजार के माहौल मा चेतना कै भरमब रमई काका कै कविता ध्वाखा

  20. समीर लाल

    @ अनूप जी:

    अभी तो आप जारी हैं. जारी रहिये. कोई फरक नहीं पड़ता. लेकिन इस बीच:

    //समीरलाल ने अपनी बात बजरिये राजेश स्वार्थी कही//

    आपके तकनीकी ज्ञान की बलिहारी जाऊँ.

    इस तरह तो आप मुझ पर सीधे आरोप लगा रहे हैं. यह स्वर्था अनुचित एवं आप जैसे वरिष्ट एवं मित्र से अवांछनीय है. आप शक कर सकते हैं, आपका अधिकार क्षेत्र है. जिन प्रमाणों को लेकर आप आरोप लगा रहे हैं, उन हर बातों को गलत साबित करने की क्षमता मुझमें है किन्तु मुझे इस तरह के किन्हीं भी अनर्गल प्रलापों और आरोपों पर स्पष्टिकरण देने की आवश्यकता महसूस नहीं होती.

    उपर काफी बार पूरी टिप्पणी में आप मेरा नाम ले चुके हैं, २२/२४ बार और ले लें तो १०८ की पूरी माला फिर जायेगी. आपका शायद कुछ अभिप्राय सिद्ध हो जाये. ( वैसे मेरा नाम उतना सिद्ध भी नहीं) लेकिन अपने गुरु के लिए इतना तो कर ही सकता हूँ.

    निवेदन मात्र इतना है कि आप मुझे आरोपों और प्रत्यारोपों के अपने इस शौकिया शगल और छिछले खेल से बाहर ही रखें. आजीवन आभारी रहूँगा.

    कहीं दिल दुखा हो-जाने अनजाने में-तो हमेशा की तरह क्षमाप्रार्थी.
    समीर लाल की हालिया प्रविष्टी..कैसी हत्या – लघुत्तम कथा और कविता

  21. बवाल

    छिड़ गई रिंद में और शैख़ में तौबा-तौबा
    सामना हो गया, दीवाने का दीवाने से
    बवाल की हालिया प्रविष्टी..जाने क्या वो लिख चलेबवाल

  22. bodhisattva

    आप का कहना ठीक है, लेकिन साहित्य में थोड़ी सहूलियत दो प्रभु नहीं तो फिर सब तथ्य और विज्ञान ही रहेगा।

  23. अजित वडनेरकर

    शानदार बहस चल रही है। इत्मीनान से इसका आस्वाद लिया जाएगा।
    फुरसतिया को फुरसत से ही पढ़ना पड़ता है।
    यहां कुछ निरर्थक नहीं।

  24. बेचैन आत्मा

    आपने अपनी कल्पना के घोड़े ठीक से नहीं दौड़ाए ..नाहक कवियों पर इल्जाम धर दिया. आधुनिक संदर्भ में कवि जब कल्पना के घोड़े दौड़ाता है तो इसका मतलब कल्पना चावला के घोड़े से होता है. बिम्ब अधिकार आयोग में आपने कल्पना के ही घोड़े दौड़ाए हैं.

    अपनी जान देकर भी जिस हिमालय के सर को झुकने से बचा पाने का संतोष सैनिक के मन रहा होगा उसी हिमालय को सैनिक के सम्मान में बौना बना दिया। …यह तो बहुत नाइंसाफी है.

    बेसन की सोंधी रोटी पर ,खट्टी चटनी जैसी मां…इतने प्यारे बिंब की जो खटिया खड़ी कर दे ऐसे व्यंग्याकार से तो अच्छे-अच्छे कवि घबड़ाए..

    अंत भला तो सब भला. अंत में आपको भी एक कवि और एक गीत अच्छा लगा.

    …कवि धन्य हुआ.

    आपका पोस्ट पढ़कर मुझे कुछ-कुछ होने लगता है क्या लिखा हूँ नहीं पढुंगा. गलत हो तो बता देना माफी मांगने के लिए तत्पर हूँ. वैसे भी आजकल माफी मांगने से बड़े-बड़े पाप धुल जाते हैं..!
    बेचैन आत्मा की हालिया प्रविष्टी..आजादी के 63 साल बाद

  25. बेचैन आत्मा

    मैने जब कमेंट किया तो किसी दूसरे की टिप्पणी नहीं पढ़ी. मैं प्रायः ऐसा ही करता हूँ ताकि कमेंट में भी मौलिकता बनी रहे. अब जब औरों के कमेंट पढ़ा तो सर में खुजली हो रही है. भागता हूँ यहाँ से..
    बेचैन आत्मा की हालिया प्रविष्टी..आजादी के 63 साल बाद

  26. अपूर्व

    एक बात कहूँगा..
    कल ही आपकी पोस्ट पढ़ी और पढ़ कर कुछ उजबक सी प्रतिक्रिया दे मारी आपकी ही नकल करने की कोशिश करते हुए( ..एकलव्ययी तरीके से..तब तक कोई टिप्पणी पढ़ी नही थी..उसके बाद सारी पढ़ीं और विवाद-विषय-वस्तु से परिचित हुआ..मेरी तुच्छ प्रतिक्रिया आपकी पोस्ट पर ही थी..इस बहस मे किसी पक्ष विपक्ष पर नही!!..
    बहस के बारे मे मुझे यही लगता है कि एक अच्छे परफ़ार्मर और सामान्य कवि की सामान्य रचना को आवश्यकता से अधिक तूल दे कर अनावश्यक विवाद का विषय बनाया जा रहा है..किसी भी विवाद मे जब आरोप-प्रत्यारोप की भाषा यदि शालीनता की सीमा का अतिक्रमण करती है तब बहस अपने मूल कथ्य से भटक कर वैयक्तिक अहं का विषय बन जाती है…और फिर उस शब्दमंथन के अतिरेक से कोई सार्थक परिणाम नही वरन वैमनस्यता का हलाहल ही प्राप्र्त होता है..(हालाँकि असुर प्रवृत्ति के लिये यह अभीप्स भी होता है)..लोगों की अपनी पसंद होती है और श्रेष्ठता के अपने मानक भी…उसे दूसरों पर आरोपित करना या अतार्तिक तरीके से डिफ़ेंड करना अक्सर कोई सार्थक परिणाम नही दे पाता…. यहाँ पर ऐसे वाग्बाण किसी तार्किक परिणति पर पहुँचते नही लगते वरन पूर्वाग्रहों को पुष्ट करते ही लगते हैं..
    कोई भी कविता आनंद लेने और आत्ममंथन का आह्वान करती है..पहलवानी का नही ;-)
    ..और बहस करने लायक और भी श्रेष्ठ कविताएँ लिखी गयीं हैं..और लिखी जा रही हैं….वे भी अपनी ओर ध्यान दिये जाने की मांग करती हैं!

  27. Chaupatswami

    एक असफ़ल कवि और असफल गायक टाइप बंदे में मंचीय गीतकार बनने की प्रबल संभावनाएं निहित होती हैं. ’डॉ.’ कुमार विश्वास उसी अर्थ में ’संभावनाशील’ अर्धगीतकार प्रजाति के बन्दे हैं जो जीवन भर एक ही गीत लिखने के अभिशाप के साथ जन्मे हैं.

    अच्छे साहित्यिक गीतों से सर्वथा अपरिचित हिंदी-प्रदेशों की कैरियरोन्मुख काव्य-बुभुक्षित,प्रेम-बुभुक्षित,प्रेम-प्रतीक्षारत वेलेंटाइनी पीढ़ी ने उनके प्रेम-प्रयोजनीय गीतों को लपक लिया है.

    कुमार विश्वास भी अपने क्लाइंट्स की मांग को एक अच्छे व्यवसायी की तरह ताड़ गये हैं और फिर-फिर उसी उत्पाद की रिसाइकिलिंग कर आपूर्ति में संलग्न हैं.भवानी भाई ऐसों के बारे में बहुत पहले कह गये हैं : ’जी हां हुज़ूर ! मैं गीत बेचता हूं ’

    कुमार विश्वास बेचें,कमाएं,आमदनी पर जायज टैक्स भरें और प्रसन्न रहें.पर साहित्य के विशाल और उदात्त परिसर में उनकी कोई जगह न थी, न है और न होगी.
    Chaupatswami की हालिया प्रविष्टी..मैत्री पर एक टीप और विवाद जो नहीं था

  28. Harshit

    फुरसतियाँ जी वाकई काफी सोच समझ कर अपना नाम रखा है आपने ….बहुत फुरसत है आपके पास . पहले सोचा की अधीरता वश कमेन्ट कर देने की गलती की है मैंने…लेकिन फिर समीर जी को आपका जवाब देखा….बस इरादा बदल दिया…पहले खुद शिष्ट बनिए फिर शिष्टाचार का पाठ पढ़ाइए. जब मित्र कहलाने व्यक्ति के साथ आप ऐसे पेश आये है तो न जाने गैरों के साथ क्या रवैया हो आपका.

    कुमार विश्वास ने हजारों को मुग्ध किया है…मुग्ध करने का गुण भी सभी में नहीं होता ….अब देखिये न मात्र उनके नाम से ८० टिप्पणियों के ऊपर का स्कोर चल रहा है आपका…..इतना तो शायद कभी न बटोर पाते आप…आप में वो क्षमता कहाँ?

    कुमार विश्वास के बारे में डिटेल तो खूब जानते हैं आप….कोई विडियो आपकी नज़र से तो नहीं निकला आजतक ऐसा मै नहीं बकौल टिप्पणी आपने ही क़ुबूल किया है…..बड़ी शिद्दत से देखा है उनका नया विडियो इसलिए पहला कमेन्ट यू ट्यूब पर भी आपके जानिब से.

    बात बिम्ब से शुरू हुई थी तो सारा मामला कंचन जी , गौतम जी , डा.अनुराग, बेचैन आत्मा और दुसरे साथियों ने साफ़ कर दिया है…..जिसे जानते और समझते हुए भी आप अहम् वश स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं.

    @ अमरेन्द्र जवाब तो आपने नहीं दिए….और जब व्यक्तिगत आक्षेप हो तो क्या कूदना…जिस घटना के कारन आपका वाक् और ब्लॉग युद्ध चल रहा है..उचित परिचित हैं उससे….वही वजह है आपकी नाराज़गी की…बेशक इल्म तो है आपके पास….लेकिन तजुर्बा नहीं..जो होता तो लोग आपको कुमार विश्वास के खिलाफ ऐसे इस्तेमाल न कर पाते

    @चौपटस्वामी आपका नाम बहुत खूबसूरत हैं :-) बस जिंदगी में एक ब्रेक ही तो चाहिए …..अफ़सोस हिंदी के मसीहाओं को नहीं मिला….मुमकिन है आप भी उनमे से एक हो ……आपके कथनानुसार “हिंदी-प्रदेशों की कैरियरोन्मुख काव्य-बुभुक्षित,प्रेम-बुभुक्षित,प्रेम-प्रतीक्षारत वेलेंटाइनी पीढ़ी ने ने उनके प्रेम-प्रयोजनीय गीतों को लपक लिया है” …….अब क्या करें दूसरी पीढ़ी तो है भी नहीं…इसी से काम चलाना पड़ेगा …

    मेरी पीढ़ी की ख़ुशी इसमें भी है कि हमारा कवि अर्थशास्त्री भी है …..डिमांड एंड सप्लाई का फार्मूला इम्प्लीमेंट करता है…हम इसे मल्टी-टेलेंट कहते हैं …..भविष्य की चिंता आप न करें…वर्तमान ने साहित्य श्री प्रदान कर उन्हें साहित्य में स्थान दिला दिया…और भविष्य में हमारे बच्चे उन्हें पाठ्य पुस्तकों में पढेंगे. ये वादा रहा

    हर्षित

  29. K M Mishra

    इसीलिये तो कहते हैं कि जहां न पहुंचे रवि वहां पहुंचे कवि ।

    ”कल्पना के घोड़े – किड़बिड़.किड़बिड़ । फ़िंच जाते हैं प्रयोग होते.होते । स्त्री बिम्बों की सुरक्षा के लिये विशेष उपाय किये जायें।“ – जय हो अनुप दादा की ।

    और जहां न पहुंचे कवि वहां पहुंचे अनुप दादा । (दादा बंगाली वाला] बड़े भईया कानपुर वाले । अब से दादा ही कहूंगा)

    देख रहा हूं कि आपको पढ़ते पढ़ते अब आपके पाठक भी फुरसतिया हो गये हैं । कमेंट भी अब फुरसतिया टाईप आने लगे हैं । संगत का असर । मेरे ऊपर तो आलसी गिरेजेश हावी हैं ।
    K M Mishra की हालिया प्रविष्टी..क्या आप बोर हो रहे हैं

  30. विवेक सिंह

    आखिर अतिशयोक्ति अलंकार भी तो कोई चीज है !
    विवेक सिंह की हालिया प्रविष्टी..वैसे तो चलता इसके बिन

  31. एक बच्चा कम और दो पेड़ ज्यादा : चिट्ठा चर्चा

    [...] अगर आप कल्पना के घोड़े में बैठकर हिमालय की ऊँचाई नापना चाहते हैं और हिमालय की चोटी से बिम्ब के नये नये प्रयोग करना चाहते हैं तो एक नजर इधर – कल्पना का घोड़ा,हिमालय की ऊंचाई और बिम्… [...]

  32. बवाल

    गुरू जी समझ तो तब भी गये थे जब आप कहे थे………
    हाँ शुरू तब न हुए तो लीजिए अब हुए जाते हैं…….

    एक अजीबोग़रीब मंज़र कल रात देखने को मिलता है :-

    एक यूथ आईकॉन नामक व्यक्ति बड़ी तन्मयता से ओल्डों की धज्जियाँ उड़ाता जा रहा है;

    परम आदरणीय अन्ना हजारे जी को जबरन अपने झंडे तले ला रहा है;

    अपने आपको इलाहाबादी अदब की प्रचारगाह बतला रहा है और बच्चन साहब को जड़ से भुलवा रहा है;

    अपने एकदम सामने बैठे हुए स्थानीय बुज़ुर्ग नेताओं, मध्य प्रदेश के विधानसभा अध्यक्ष आदि पर तबियत से अपने हलाहली शब्दवाण चला रहा है;

    विनोबा बाबा की प्रिय संस्कारधानी के मँच पर खड़ा या कह सकते हैं सिरचढ़ा होकर, कहता जा रहा है कि मैं उपहास नहीं, परिहास करता हूँ और उपहास ही करता जा रहा है;

    जमूरों का स्व्यंभू उस्ताद बनकर अपने हर वाक्य पर ज़बरदस्ती तालियाँ पिटवा रहा है;
    (इतनी तालियाँ अपनी ही एक-दूसरी हथेलियों पर पीटने से बेहतर था कि तालियाँ पिटवाने वाले के सर पर बजा दी जातीं, जिससे उसे लगातर ये सुनाई देतीं जातीं और उसे बार आग्रह करने की ज़हमत न उठाना पड़ती, समय भी बचता और …………. ख़ैर)

    उसे जाकर कोई कह दे भाई के,
    मैं मैं मैं मैं मैं मैं मैं,
    सिर्फ़ बकरी के प्यारे बच्चे के मुँह से ही कर्णप्रिय लगती है, आदमी के (दंभी) मुँह से नहीं।

  33. फ़ुरसतिया-पुराने लेख

    [...] कल्पना का घोड़ा,हिमालय की ऊंचाई और बिम्… [...]

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