खुशदीप सहगल
बंदा 1994 से कलम-कंप्यूटर तोड़ रहा है

पुरुषों की ज़िप पर ताला? Zip Lock...(खुशबतिया 12-04-14)

  • Saturday, April 12, 2014
  • by
  • Khushdeep Sehgal



  • हर पुरुष की ज़िप पर ताला लगा दिया जाए और चाभी घर पर छोड़ दी जाए, बस यही आदेश देना बाकी रह गया है...दिल्ली हाईकोर्ट ने शुक्रवार को ये बेशक लाइटर टोन में कहा, लेकिन उसका आशय यही था कि पुरुषों की सार्वजनिक जगहों पर पेशाब करने की बुरी आदत को लेकर वो भी ज़्यादा कुछ नही कर सकता...दिल्ली हाईकोर्ट से एक याचिका में प्रशासनिक अधिकारियों को ये सुनिश्चित करने का निर्देश देने की मांग की गई थी कि दीवारों को लोग गंदा ना करें...जस्टिस प्रदीप नद्राजोग और जस्टिस दीपा मेहता की बेंच ने याचिका को खारिज़ करते हुए कहा कि अदालत इस तरह के निर्देश नहीं दे सकती...सार्वजनिक स्थलों पर पेशाब करने की समस्या को कही ओर सुलझाया जाना चाहिए...अदालत ऐसा आदमी नहीं बना सकती जो घर से बाहर निकले और अपनी ज़िप पर ताला लगाए रखे... अदालत ने कहा कि कुछ घरों के बाहर की दीवारों पर देवी-देवताओं की मूर्तियां लगा दी जाती हैं, लेकिन फिर भी लोग दीवारों को गंदा करने से बाज़ नहीं आते...अदालत ने कहा कि वो उम्मीद करते हैं कि पुरुष जो अनंत कलाकार की महानतम रचना है, वो अपने स्वामी (रचनाकार) के आगे अपनी गुप्तता (प्राइवीज़) को बेनक़ाब नहीं करेंगे और सड़कों पर पेशाब नहीं करेंगे...याचिकाकर्ता मनोज शर्मा ने याचिका में मांग की थी कि एक आवासीय परिसर के बाहर की दीवार से देवी-देवताओं की तस्वीरें हटाने का आदेश दिया जाए...ये तस्वीरें सिर्फ इसी उद्देश्य से लगाई गईं कि लोग दीवारों को गंदा ना करें...अदालत ने कहा कि वो ग्रुप हाउसिंग सोसायटी के सदस्यों को ये तस्वीरें हटाने का निर्देश नहीं दे सकती...अदालत ने ये भी कहा कि पुरुष तब भी ऐसी हरकत करना नहीं छोड़ते जब दीवार पर लिखा होता है- देखो गधा (या कुत्ता) पेशाब कर रहा है”…



    ख़बर आपने पढ़ ली...परेशानी सच में कितनी मुश्किल है...अदालत भी कुछ कर पाने में खुद को असहाय पा रही है...दिल्ली हाईकोर्ट ने बेशक लाइटर टोन में ज़िप पर ताले की बात कही...लेकिन मैं सोच रहा हूं कि अगर सच में ही ऐसा होने की नौबत कभी आई तो क्या-क्या बदल जाएगा...लेकिन उद्देश्य तभी पूरा होगा जब ज़िप के साथ पैंट की बेल्ट पर भी लॉक लगा कर उसकी चाभी भी घर में ही रखी जाए...

    फायदे-
        1. शहर भर की दीवारें, सड़कें और गलियां गंदी होने से बच जाएंगी...
        2.  बेल्ट और जिप लॉक का नया धंधा फलेगा-फूलेगा यानि नया रोज़गार सृजन होगा...
        3. पुरुषों को लघु-शंका के लिए कई बार घर की दौड़ लगानी होगी, इससे वो फिट रहेंगे...
        4. घर ज़्यादा दूर है तो ऑटो-टैक्सी वालों का भला होगा...बस या मेट्रो से घर गए तो सरकार का राजस्व बढ़ेगा...
        
      और सबसे अहम- 
      5.बेवफ़ाई की भी कोई संभावना ही नहीं रहेगी...

    नुकसान-
    नुकसान तो मुझे एक ही दिखता है, पुरुषों को कई बार काम छोड़कर घर जाना पड़ सकता है...यानि सीधे-सीधे Work-Hours का नुकसान...








    Keywords:Urination, Defacation, Zip lock
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    Youth will govern 2019 Election...खुशदीप

  • Wednesday, April 9, 2014
  • by
  • Khushdeep Sehgal
  • राजनीति को नई दिशा-परिभाषा देता युवा...

    मूलतः प्रकाशित- नई दुनिया-जागरण आई नेक्स्ट, 9 अप्रैल 2014



    यंगिस्तान जाग चुका है। अब उसे सिर्फ भविष्य का भारतकह कर ही टरकाया नहीं जा सकता। देश का युवा वर्ग आज के भारत को बदलने के लिए भी अधिक से अधिक भूमिका चाहता है। युवाओं के महत्व को अब देश के राजनीतिक दल भी अच्छी तरह समझ रहे हैं। शायद यही वजह है कि 2014 लोकसभा चुनाव में युवा मतदाताओं को लुभाने के लिए सभी सियासी पार्टियां एड़ी-चोटी का ज़ोर लगाए हुए हैं। इस लोकसभा चुनाव में कुल 81 करोड़ 45 लाख मतदाता हैं। इन मतदाताओं में से 23 करोड़ दस लाख ऐसे युवा हैं जो पहली बार अपने मताधिकार का इस्तेमाल करेंगे।  

    2011 की जनगणना के मुताबिक देश के 55 करोड़ लोग 35 साल या उससे नीचे की उम्र के हैं। इनमें 15 से 35 साल के बीच की आयु के युवाओं की हिस्सेदारी 42 करोड़ 20 लाख है। ये देश की कुल आबादी का 34.8 फीसदी है। संयुक्त राष्ट्र की एक ताजा रिपोर्ट के अनुसार 2020 तक भारत के लोगों की आयु का मध्यमान सिर्फ 29 साल होगा। यानि भारत पूरी दुनिया में सबसे ज़्यादा युवा लोगों का देश होगा। यहां कुल आबादी के 64 फीसदी लोग काम करने लायक आयु वर्ग के होंगे।

     भारत की तेज़ी से बढ़ती आबादी लंबे समय से बहस का विषय रही है। पिछली सदी के नौवें दशक तक बड़ी आबादी को देश के लिए बोझ माना जाता रहा। सिकुड़ते संसाधन, कुपोषण, बदहाल शिक्षा जैसी चुनौतियां का सामना करने में सरकारी तंत्र के हमेशा पसीने छूटते रहे। लेकिन पिछली सदी के अंतिम दशक में उदारीकरण का दौर शुरू होने के बाद देश की आबादी को लेकर दृष्टिकोण बदलने लगा। सेवा क्षेत्र के तेज़ी से बढ़ने की वजह से देश की बड़ी आबादी को कमजोरी की जगह खूबी माना जाने लगा। देश की आबादी में बड़ा हिस्सा युवा होने का ही कमाल है कि 2004 में प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) जो सिर्फ 687 डॉलर था वो 2013 मे बढ़कर 1107 डॉलर हो गया।

    अमेरिका, चीन और जापान विकास की दृष्टि से दुनिया में आज अग्रणी माने जाते हैं। लेकिन तीनों ही देशों की आबादी तेज़ी से बुढ़ाती जा रही है। ऐसे में युवाशक्ति के बूते भारत को आज सबसे ज़्यादा संभावनाओं वाला देश माना जा रहा है। देश में अर्थव्यवस्था के खुलने का ही नतीजा है कि देश के युवा वर्ग के सपनों को पंख लग गए है। आज के युवा के मिजाज को समझने के लिए उसकी तीन आकांक्षाओं को समझना ज़रूरी है। 1- युवा अपने लिए अच्छी शिक्षा और अच्छे रोज़गार के ज़रिए खुशहाल जिंदगी सुनिश्चित करना चाहता है। 2- युवा वर्ग खुद को किसी भी बंदिश में नहीं बंधते नहीं देखना चाहता। उसको धर्म की दुहाई या जात-पात के पचड़ो से भरमाया नहीं जा सकता। 3- युवा पीढ़ी के लिए भ्रष्टाचार का मतलब ये नहीं है कि किसी कर्मचारी को कुछ रुपये रिश्वत में देने पड़ते हैं। युवाओं के लिए भ्रष्टाचार ये है कि उन्हें किसी काम के लिए लाइन में लगकर अपना कीमती वक्त बर्बाद करना पड़ता है। युवा वर्ग सरकारी दफ्तरों में सिंगल विंडो से त्वरित ढंग से अपना काम होता देखना चाहता है।

    युवाओं की बढ़ती उम्मीदों की वजह से राजनीतिक दलों को भी इस लोकसभा चुनाव में अपनी रणनीतियों को बदलने के लिए विवश होना पड़ा है। देश में, खास तौर पर ग्रामीण क्षेत्रों में, अब तक चुनाव की जो धुरी धर्म और जात-पात पर टिकी होती थी, वो अब बदल कर विकास पर केंद्रित हो गई है। ये युवावर्ग की आकांक्षाओं के दबाव की वजह से ही हुआ है।

    देश के युवा और नए मतदाता का ज़ोर आज समावेशी राजनीतिक संवाद पर है। राजनेताओं तक अपनी बात पहुंचाने के लिए युवा मतदाता के पास आज सोशल मीडिया जैसा मज़बूत साधन मौजूद है। अभिव्यक्ति के इस माध्यम के सशक्त होने की वजह से राजनीतिक दलों के हर कृत्य पर आज देशवासियों की पैनी नज़र है। आज़ादी के बाद ये सुखद बदलाव है कि आम आदमी को केंद्र में रखकर अब शासन की नीतियां बनाई जाने लगी हैं। सभी राजनीतिक दल शासन को अधिक से अधिक पारदर्शी बनाने की बात करने लगे हैं।

    बीते तीन साल में देश में कई मौकों पर देखा गया कि जनाक्रोश को युवावर्ग ने धार दी। भ्रष्टाचार के ख़िलाफ अन्ना हज़ारे की अगुवाई में आंदोलन हो या दिल्ली में निर्भया के साथ हुई बर्बरता पर रोष जताने के लिए सड़क पर उमड़ा जनसैलाब, हर जगह युवा सबसे आगे दिखे। यहां तक कि दिल्ली विधानसभा चुनाव में अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी को मिली कामयाबी में भी युवा मतदाताओं का खासा हाथ रहा।

    देश की युवा पीढ़ी को अब समस्याओं के समाधान के लिए वर्षों तक इंतज़ार नहीं कराया जा सकता। उसे तुरंत नतीजा चाहिए। शायद यही वजह है कि दिल्ली में आम आदमी पार्टी के 49 दिन के राज के बाद ही उसकी लोकप्रियता का ग्राफ़ नीचे आ गया। ज्यादा साल नहीं हुए, नब्बे के दशक तक युवा वर्ग को चुनाव की दृष्टि से अप्रासंगिक माना जाता था। लेकिन अब स्थिति बदल चुकी है। अब वो लोकतांत्रिक प्रकिया में अपनी ज़्यादा से ज़्यादा भागीदारी के लिए आगे आ रहा है। लोकतंत्र का ये समावेशी रूप आश्वस्त करता है कि भारतीय राजनीति आज नहीं तो कल वंशवाद और वीआईपी वर्चस्व की बेड़ियों से मुक्त होगी।
    - खुशदीप सहगल






    Keywords:Youth,Election, Politics
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    Election : Food of Leaders...खुशदीप

  • Monday, April 7, 2014
  • by
  • Khushdeep Sehgal
  • नमो खिचड़ी, रागा चॉकलेट, केजरी चना...



    अरे ओ सांभा, ये रामगढ़ वाले कौन सी चक्की का आटा खाते हैं रे...लेकिन आज सवाल ये है कि हमारे देश की पॉलिटिकल पार्टियों के नेता कौन सी चक्की का आटा खा रहे हैं...दिन भर देश में जगह जगह जाकर पूरी ताकत से शब्दों के बाण चलाते हैं...अगले दिन फिर तरोताजा होकर वही काम...क्या है इनकी इस ऊर्जा का राज़? कैसा है इनका खानपान? कैसे रखते हैं ये खुद को फिट? 

    वेबदुनिया पर इसी विषय पर है आज मेरा लेख।

    अगर आप अपनी पार्टी के शीर्ष नेता हैं तो चुनाव प्रचार के लिए देश के कोने-कोने की खाक छाननी ही पड़ती है लेकिन इतनी ऊर्जा आख़िर कहां से आती है। ये नेता इतने टाइट शैड्यूल में खाते क्या हैं। हर नेता का खान-पान का अपना अंदाज़ है। बीजेपी के ‘पीएम उम्मीदवार’ नरेंद्र मोदी खिचड़ी के मुरीद हैं तो कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी के लिए चॉकलेट पहली पसंद है। आम आदमी पार्टी के मुखिया अरविंद केजरीवाल को डॉयबिटीज़ है, इसलिए वो डाइजेस्टिव बिस्किट और भुने चनों से भूख मिटाते हैं।

    मोदी इन दिनों नवरात्र के नौ दिन के उपवास पर हैं। इसलिए नींबू और गर्म पानी का सेवन कर रहे हैं। मोदी वैसे भी अल्पाहारी हैं। नई जगहों पर वो खाने से बचते हैं। उनका खाना बनाने के लिए रसोइया उनके साथ रहता है। आम दिनों में वो गुजराती खाना, खास तौर पर शाम को खिचड़ी खाना ही पसंद करते हैं।

    दूसरी ओर, राहुल गांधी अक्सर अपना नाश्ता नहीं लेते। उन्हें व्यस्त कार्यक्रम के दौरान ‘रेडी टू ईट’ नूडल्स खाते देखा जा सकता है। ‘मिंट’ में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार राहुल अधिक यात्रा वाले दिनों में डाइट कोला और लेमन जूस के सिप लेते रहते हैं। ये उन्हें डिहाइड्रेशन से बचाता है, लेकिन राहुल को चॉकलेट बहुत पसंद हैं। उनके मुताबिक चॉकलेट एनर्जी-लेवल बनाए रखने में मदद करती है। इसके अलावा राहुल सी-फूड भी पसंद करते हैं।

    अरविंद केजरीवाल मिर्च-मसाले वाले खाने से पूरी तरह परहेज़ करते हैं। जब वो दिल्ली में होते हैं तो उनकी पत्नी लंच-बॉक्स तैयार कर उन्हें देती हैं। व्यस्त दिनचर्या के दौरान केजरीवाल के सहयोगी ध्यान रखते हैं कि वो वक्त-वक्त पर फल या जूस लेते रहें। अक्सर उन्हें पार्टी के कार्यकर्ताओं के घरों पर भोजन के लिए रुकना पड़ता है। लेकिन साधारण खाना बनाने की पहले से ही हिदायत रहती है।

    46 साल के केजरीवाल शुगर-लेवल कंट्रोल में रखने के लिए डाइजेस्टिव बिस्किट और भुने चनों से भूख मिटाते हैं। भोजन में मूंग की दाल उन्हें पसंद है। कोल्ड ड्रिंक्स से केजरीवाल बचते हैं। लेकिन कभी ठंडा पीना भी हो तो डाइट-कोला ही लेते हैं।

    खुद को फिट रखने के लिए क्या करते हैं ये नेता... 

    मोदी, राहुल और केजरीवाल तीनों के अपनी काया के अनुसार स्वास्थ्य मानदंड अलग-अलग हैं। 63 साल के मोदी वजन के हिसाब से ओवरवेट (90 किलोग्राम) हैं। लेकिन वो अपनी फिटनेस को लेकर बहुत सजग हैं। उनके दिन की शुरुआत सुबह 5 बजे प्राणायम, योग और अपने गांधीनगर के आवास के बगीचे में टहलने से होती है। सुबह साढ़े सात बजे तक वो घर से निकलने के लिए तैयार हो जाते हैं। आजकल दिन में चार-चार रैलियों को संबोधित करने की वजह से मोदी ज़रूरी फाइल्स यात्रा के दौरान ही देखते हैं। दौरे पर वो कहीं भी जाएं लेकिन रात को वो घर आना ही पसंद करते हैं। उनका दिन अममून रात को डेढ़ बजे तक ख़त्म होता है।

    केजरीवाल खाली वक्त मिलने पर योग और विपासना करते हैं। प्रचार के वक्त उनका दिन सुबह 6 बजे शुरू होता है। आधी रात तक उनकी व्यस्तता बरकरार रहती है। 44 साल के राहुल गांधी कितने भी व्यस्त हों, शाम को दौड़ के लिए ज़रूर वक्त निकालते हैं। कहीं चुनावी दौरे पर भी हो तो उनके लिए दौड़ने का मार्ग पहले से ही निर्धारित रहता है। दिल्ली में राहुल साइकिलिंग और स्विमिंग से भी खुद को फिट रखते हैं। इसके अलावा उन्हें बैडमिंटन और आइकिडो (जापानी मार्शल आर्ट की एक किस्म) का भी शौक है।








    Keywords:Election,Food,Fitness
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    The myth of muslim vote bank...खुशदीप

  • Saturday, April 5, 2014
  • by
  • Khushdeep Sehgal
  • मुस्लिम वोट बैंक क्या हक़ीक़त है या सिर्फ़ एक भ्रम, इस मुद्दे पर आज मेरा एक लेख अमर उजाला कॉम्पैक्ट में छपा है।

    इस लेख को इस लिंक पर जाकर पढ़ा जा सकता है-

    मुस्लिम वोट बैंक का मिथक

    लेख की मूल प्रति ये है-

    16वीं लोकसभा के चुनाव में मुसलमान वोट किस पार्टी के खाते में जाएंगे?क्या मुस्लिम वोट बैंक राष्ट्रीय स्तर पर एक वास्तविकता है या सिर्फ मिथक? क्या मुस्लिमों को अन्य धर्मों के मुकाबले किसी पार्टी विशेष के पक्ष में एकमुश्त वोट करने के लिए आसानी से तैयार किया जा सकता है? मुस्लिम वोटों की इस पहेली को साधने की कोशिश करने में कोई भी सियासी दल पीछे नहीं है। यहां तक कि भारतीय जनता पार्टी भी मुस्लिमों का सच्चा हितैषी होने का दावा कर रही है। नरेंद्र मोदी एक बुकलेट के माध्यम से दावे कर रहे हैं कि किस तरह गुजरात में मुस्लिमों की आर्थिक-सामाजिक स्थिति दूसरे राज्यों की तुलना में बेहतर है।
    मुस्लिम वोट बैंक के पीछे थ्योरी दी जाती है कि मुसलमान अपने बड़े धार्मिक संस्थानों या धार्मिक गुरुओं की अपील के हिसाब से वोट करते हैं। जिस पार्टी या प्रत्याशी के पक्ष में ये अपील जारी हो जाती है, उसे मुस्लिम थोक के भाव से मतदान करते हैं। शायद यही वजह है कि कांग्रेस हो या समाजवादी पार्टी, बीजपी से छिटका जेडीयू  हो या राष्ट्रीय जनता दल या फिर बामुश्किल डेढ़ साल पुरानी आम आदमी पार्टी, सभी मुस्लिम धार्मिक नेताओं का समर्थन हासिल करने के लिए एड़ी-चोटी का ज़ोर लगाए रखते हैं। ये भी एक हक़ीक़त है कि मुसलमानों के कुछ कथित रहनुमा भी निजी फायदे के लिए इस भ्रम को टूटने नहीं देना चाहते कि मुस्लिम समुदाय को किसी दिशा में भी एकतरफा मोड़ा जा सकता है।
    दरअसल, देश के सब मुसलमानों की सोच को एक तराजू में रखकर तौलना एक भ्रांति के सिवा और कुछ नहीं है। भारत में मुसलमानों की आबादी 13 फीसदी, यानि 16 करोड़ है। भारत भौगोलिक रूप से जितना विशाल है सांस्कृतिक स्तर पर उतना विविध भी। देश के अलग-अलग इलाकों में रहने वाले मुसलमानों का रहन-सहन भी उसी इलाके की ज़रूरतों के हिसाब से प्रभावित होता है। स्थानीय मुददे मुसलमानों को भी उतना ही उद्वेलित करते हैं जितना कि अन्य समुदायों को। ऐसे में मुसलमान भी क्षेत्र के हिसाब से पार्टी और उम्मीदवार को चुनते हैं तो आश्चर्य कैसा? मुस्लिम वोटर तात्कालिक परिस्थिति के अनुसार लोकसभा चुनाव और विधानसभा चुनाव का फर्क भी अच्छी तरह समझता है। 2009 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में मुस्लिम मतदाताओं ने कांग्रेस पर भरपूर भरोसा जताया। वही राज्य में 2012 में विधानसभा चुनाव के दौरान मुस्लिमों ने कांग्रेस को पूरी तरह नकार मुलायम सिंह यादव की झोली वोटों से भर दी।

    मुस्लिम वोट बैंक का तर्क देने वालों के लिए मुस्लिम समाज को अटूट इकाई के तौर पर देखना भी गलतफहमी है। ये समाज सदियों पहले से ही शिया और सुन्नी, दो वर्गों में बंटा हुआ है। इसके अलावा हिदू समाज जैसे ही ऊंच-नीच का भेदभाव मुस्लिम समाज में भी पाया जाता है। मध्ययुगीन भारतीय समाज में इस्लाम को एक धार्मिक समुदाय के नही बल्कि जाति समुदाय के रूप में स्वीकार किया गया था। मुगल, पठान, तुर्क, शेख और सैयद को मूल उप-जातियों के तौर पर लिया गया। इन सभी ने खुद को हमेशा अगड़े वर्ग में माना। इनके अलावा भारत में जो भी दूसरे लोग धर्म परिवर्तन के बाद मुसलमान बने, उनसे बराबरी का बर्ताव न करते हुए पिछड़े दर्जे में ही रखा गया।
    आज़ादी के बाद चुनावी राजनीति ने मुस्लिम समाज में जातिगत बंटवारे को और तेज़ किया। सियासत के मंडलीकरण के बाद तो कहीं-कहीं ये टकराव इतना तीक्ष्ण है कि कुरैशी अगर एक पार्टी को वोट करते हैं तो अंसारी दूसरी प्रतिद्वन्द्वी पार्टी के प्रत्याशी को वोट देते हैं। यहां ये मायने नहीं रखता कि प्रत्याशी मुस्लिम है या किसी और धर्म का।

    आखिर देश के मुसलमान किस पैट्रन से वोट करते हैं? इसके लिए पिछले तीन लोकसभा चुनाव नतीजों के आधार पर एक हालिया अध्ययन में दिलचस्प नतीजे सामने आए। इनसे साफ़ हुआ है कि 1999, 2004 और 2009 के लोकसभा चुनावों में हिंदुओं ने जिस आधार पर अपना वोट दिया, कमोवेश वैसा ही आधार मुसलमानों ने भी चुना। 1999 में पार्टी को मुख्य आधार मान कर वोट करने वाले हिंदू मतदाता 55.50% तो मुसलमान 52.70% थे। 2004 में पार्टी के आधार पर वोट करने वालों हिंदुओं का प्रतिशत गिर कर 45.70 पर आया तो मुस्लिमों में भी ये 43.50% ही रह गया। 2009 में पार्टी के आधार पर हिंदू मतदाताओं की वोटिंग का प्रतिशत 61.80 तक चढ़ा तो मुसलमानों में भी 59.10% तक पहुंच गया।

    जहां तक उम्मीदवार को मुख्य आधार मान कर वोटिंग का सवाल है तो हिंदू मतदाताओं में 1999 मे 26.30%, 2004 में 31.50% और 2009 में 24.30% ने इसे और सभी कारणों पर तरजीह दी। उम्मीदवार को मुख्य आधार मान कर वोट करने वाले मुस्लिम मतदाताओं का भी समान पैट्रन दिखा। 1999 में 25.00%, 2004 में 32.10 और 2009 में 24% मुस्लिम मतदाताओं ने पसंद के उम्मीदवार के आधार पर वोट दिया।


    मुस्लिम समुदाय भी विकास, शिक्षा, रोज़गार, स्वास्थ्य आदि बुनियादी मुद्दों पर वैसे ही सोच रखता है जैसे कि देश के बाक़ी नागरिक। लेकिन इसके साथ ही मुस्लिमों के लिए एक और बड़ा सवाल है- सुरक्षा की गारंटी। जो भी राजनीतिक दल इस मामले में उसे ईमानदारी से काम करता दिखता है, मुस्लिम समुदाय उसके पीछे एकजुट होने में देर नहीं लगाता। गुजरात में 2002 की हिंसा हो या हाल में उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में दंगा, मुस्लिम मतदातों के लिए सुरक्षा भी चुनाव के वक्त अहम मुद्दा होता है। 






    Keywords:Muslim Vote Bank, Secularism
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    Slogans, Patel Rap, Crackers...खुशबतिया (04.04.14)

  • Thursday, April 3, 2014
  • by
  • Khushdeep Sehgal

  • (खुशबतिया की तीसरी कड़ी आपके लिए हाज़िर है, मेरे इस प्रयास पर अपनी राय ज़रूर दीजिएगा)


    मजबूरी का नाम...

    भारत की राजनीति नारा-प्रधान है। सियासी दल हों या इनके शीर्ष नेता सभी को हमेशा रामबाण नारों की तलाश रहती है। ऐसे नारे जो तत्काल लोगों की ज़ुबान पर चढ़ जाएं और चुनावी नैया पार लगा दें। नेता जी की नज़रों में आने के लिए उनके लगुए-भगुए भी नारों को गढ़ने में अपनी पूरी रचनात्मक उढ़ेल देते हैं। चंडीगढ़ में 29 मार्च को नरेंद्र मोदी की रैली के दौरान बीजेपी की शहर प्रभारी आरती मेहरा को ऐसी ही एक कोशिश भारी पड़ी। आरती मेहरा ने जोश में नारा लगाया था...मजबूरी का नाम महात्मा गांधी और मज़बूती का नाम नरेंद्र मोदी। चंडीगढ़ क्षेत्र कांग्रेस कमेटी (सीटीसीसी) को ये नारा नागवार गुज़रा। सीसीटीसी के उपाध्यक्ष डी डी जिंदल ने इसे राष्ट्रपिता का अपमान मानते हुए चंडीगढ़ के सेक्टर 34 पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज़ करा दी। आरती मेहरा के साथ बीजेपी के पोस्टरबॉय नरेंद्र मोदी के ख़िलाफ़ भी शिकायत दर्ज़ कराई गई है। लेकिन यहां आधार दूसरा बताया गया। मोदी के ख़िलाफ़ शिकायत में कहा गया कि उन्होंने चंडीगढ़ लोकसभा सीट से कांग्रेस प्रत्याशी पवन कुमार बंसल को लेकर झूठी, अपमानजनक और अवांछित भाषा का प्रयोग किया। शिकायत के मुताबिक मोदी ने रेलगेटका उल्लेख किया, जिसका पवन कुमार बंसल से कोई लेनादेना नहीं है। मोदी के बयान को आचार-संहिता का उल्लंघन बताते हुए शिकायत में कहा गया है कि इस मामले में बंसल को पहले ही क्लीन-चिट मिल चुकी है। सीबीआई की एक अदालत एक एनजीओ की उस याचिका को भी ठुकरा चुकी है जिसमें बंसल के ख़िलाफ़ दोबारा जांच करने की मांग की गई थी। शिकायत के अनुसार मोदी ने 29 मार्च को रैली में कहा था- भ्रष्टाचार के पवन को यहीं गाढ़ दो, उसे जाने मत दो, यहीं पर रोक दो

    पटेल रैप...

    आप मॉडर्न संगीत के शौकीन है तो आपने गुजरात के दिबांग पटेल का 'पटेल रैप' सुना होगा। लेकिन यहां मैं गुजरात के एक और पटेल का ज़िक्र कर रहा हूं। ये पटेल साहब है गुजरात के ऊर्जा और पेट्रोकैमिकल्स मंत्री सौरभ पटेल। मोदी के ख़ासम-म-ख़ास माने जाते हैं। यहां तक कि अगर मोदी के प्रधानमंत्री बनने की स्थिति आती है तो सौरभ पटेल का नाम गुजरात के मुख्यमंत्री पद के प्रमुख दावेदारों में शुमार होता है। लेकिन सौरभ पटेल को चुनाव आयोग से आम आदमी पार्टी के मुखिया अरविंद केजरीवाल के ख़िलाफ़ शिकायत करना उलटा पड़ गया। सौरभ पटेल रिलायंस इंडस्ट्री लिमिटेड के सीनियर डायरेक्टर रमणीक लाल अंबानी के दामाद हैं। रमणीक लाल रिलायंस इंडस्ट्री के संस्थापक धीरूभाई अंबानी के बड़े भाई है। केजरीवाल मार्च में गुजरात के तीन दिन के दौरे पर आए थे तो उन्होंने आरोप लगाया था कि सौरभ पटेल का कुछ चुनींदा उद्योगपतियों से घनिष्ठ नाता है। केजरीवाल का ये भी आरोप था कि सौरभ पटेल को ऊर्जा और पेट्रोकैमिकल्स मंत्रालय का दिया जाना और रिलायंस पेट्रोकैमिकल्स का यहां फलना-फूलना मात्र संयोग नहीं कहा जा सकता। सौरभ पटेल की पहचान सभी विवादित मुद्दों पर चुप्पी बरतने की रही है। लेकिन इस बार केजरीवाल के आरोप के बाद वो तमतमा गए। उन्होंने सीधे चुनाव आयोग में केजरीवाल के ख़िलाफ़ गैर जिम्मेदार और अपमानजनक बयानके लिए कार्रवाई के लिए शिकायत कर दी। चुनाव आयोग ने केजरीवाल से तो कोई स्पष्टीकरण नहीं मांगा लेकिन गुजरात के मुख्य चुनाव अधिकारी से सौरभ पटेल का लेखा-जोखा ज़रूर मंगा लिया है। इसमें पटेल के विभाग और उनके अंबानी परिवार से रिश्ते के बारे जानकारी मांगी गई है। सौरभ पटेल का कहना है कि उनका अंबानी परिवार से रिश्ता 25 साल पुराना है। पटेल के मुताबिक वो जल्दी ही चुनाव आयोग को अपना जवाब भेज देंगे।

    पटाख़ा पॉलिटिक्स...

    चुनावी रैलियों के दौरान पटाखे ना फोड़े जाएं तो क्या मज़ा? ना तो अपनी पार्टी के दिग्गज़ नेताओं को कुछ पता चलेगा और ना ही विरोधी दलों के कानों तक धमक पहुंचाई जा सकेगी। लेकिन अब पार्टी के टॉप नेताओं की रैलियों के दौरान ऐसा करना संभव नहीं होगा। दरअसल, इंटेलीजेंस ब्यूरो ने सभी राज्यों के डायरेक्टर जनरल पुलिस को एक एडवायज़री भेजी है। इस एडवायज़री के मुताबिक डायरेक्टर जनरल स्तर के अधिकारियों को ये सुनिश्चित करने के लिए कहा गया है कि पार्टी के दिग्गज नेताओं के आसपास कहीं पटाख़े ना बजने दिए जाए। आईबी ने ये कदम अमृतसर में बीजेपी उम्मीदवार अरुण जेटली के एक रोड-शो के दौरान हुए हादसे के बाद उठाया है। 18 मार्च को इस रोड शो के लिए बीजेपी समर्थकों ने हीलियम के गुब्बारों और पटाखों का इंतज़ाम कर रखा था। जेटली जब जीप पर चढ़े हुए थे तो एक पटाखे से गुब्बारा फट गया। ज़ोरदार धमाके के साथ गैस का रिसाव हुआ। इस हादसे में जेटली और कुछ पुलिसवालों को मामूली चोटें आईं। आईबी ने राज्यों के डायरेक्टर जनरल पुलिस को भेजी एडवायज़री में पिछले साल आंध्र प्रदेश के पश्चिम गोदावरी ज़िले में हुए एक हादसे का भी उल्लेख किया। इस हादसे में पटाखों से ही एक वाहन में आग़ लग गई थी। आईबी ने ऐसी ही एडवायज़री वीवीआईपी की सुरक्षा व्यवस्था देखने वाले स्पेशल प्रोटेक्शन ग्रुप (एसपीजी) और नेशनल सिक्योरिटी गार्ड्स (एनएसजी) को भी भेजी है।

    स्लॉग ओवर

    सूबेदार लहना सिंह और सूबेदार इमामदीन ब्रिटिश इंडियन आर्मी की एक ही रेजीमेंट में तैनात थे। दोनों जिगरी यार थे और रोज शाम को साथ जाम टकराया करते थे। देश के बंटवारे ने दोनों को अलग कर दिया। सूबेदार इमामदीन को पाकिस्तानी सेना में जाना पड़ा। अपने यार की याद को हमेशा ज़िंदा रखने के लिए सूबेदार लहना सिंह रोज़ शाम रम के दो गिलास तैयार करता। फिर एक-एक बार दोनों से सिप करता। कोई पूछता तो कहता कि- एक मेरा है और एक सूबेदार इमामदीन का। कई साल बीतने के बाद लहना सिंह सिर्फ एक गिलास से रम सिप करता दिखा। रोज़ सूबेदार लहना सिंह को देखने वाले एक शख्स ने पूछा- क्यों भाई आज दूसरा गिलास कहां है?” इस पर सूबेदार लहना सिंह का जवाब था- आज से मैंने पीना छोड़ दिया है, लेकिन मेरे यार ने नहीं।
    (Contributed by Dr Dhanul Haq Haqqi, Karachi)








    Keywords:Slogans, Patel rap, Crackers
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    Husband, Wife and ? ...खुशदीप

  • Wednesday, April 2, 2014
  • by
  • Khushdeep Sehgal



  • पति, पत्नी और 'वो'...

    चुनावी ख़बरों की बमबारी...पतियों की मगज़मारी...पत्नियों की दुश्वारी...नेताओं की ज़ुबानी जंग ज़्यादा दिलचस्प या सास-बहू सीरियल्स का मेलोड्रामा...ऐसा ही ऑफबीट पढ़ सकते हैं आप वेबदुनिया पोर्टल के इस लिंक पर-






    Keywords:Election, Husband, Wife
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    अटल और मोदी का फ़र्क़...(खुशबतिया 29-03-14)

  • Friday, March 28, 2014
  • by
  • Khushdeep Sehgal
  • (वादे के मुताबिक खुशवंत सिंह के कॉलम की प्रेरणा से खुशबतिया का दूसरा संस्करण आपकी पेश-ए-नज़र है, अपनी राय से ज़रूर अवगत कराइएगा।)





    अटल और मोदी का फ़र्क़...



    बीजेपी की ओर से अभी तक एक ही प्रधानमंत्री देश को मिले हैं- अटल बिहारी वाजपेयी। बीजेपी की तरफ़ से ये गौरव हासिल करने वाले दूसरे शख्स नरेंद्र मोदी बन पाते हैं या नहीं, ये तो अगली 16 मई के बाद ही साफ़ होगा। हां, फिलहाल मोदी ने अपनी इस इच्छा को पूरा करने के लिए एड़ी चोटी का ज़ोर लगा रखा है। अटल बीजेपी तो क्या गठबंधन धर्म के नाते पूरे एनडीए को साथ लेकर चलने में विश्वास रखते थे। मोदी अपने कद के आगे पूरी बीजेपी को ही कुछ नहीं समझते। गुजरात दंगों के बाद मोदी को राजधर्म की नसीहत देने वाले अटल की पहचान नैसर्गिक कवि की रही है। वहीं मोदी उधार के शब्दों के साथ आज प्रचार के हर माध्यम पर दहाड़ते दिख रहे हैं- सौगन्ध मुझे इस मिट्टी की, मैं देश नहीं मिटने दूंगा, मैं देश नहीं झुकने दूंगा। प्रसून जोशी जैसे महंगे फिल्मी गीतकार ने ज़रूर इस गीत को लिखने के लिए मोटी फीस वसूली होगी। प्रसून की पहचान एडवरटाइज़िंग की दुनिया से भी जुड़ी है। प्रसून और पीयूष पांडे की टीम बीजेपी के प्रचार अभियान को देख रही है। ख़ैर जिसे बीजेपी की एंथम कह कर प्रचारित किया जा रहा है, उसमें बीजेपी का तो कोई ज़िक्र नहीं सिर्फ़ मोदी की ही हुंकार सुनाई देती है। गीत में 20 जगह मोदी ने मैं, मेरा या मुझसे का इस्तेमाल किया है। अटल राजनीति के लिए कभी कविता नहीं करते थे। मोदी सिर्फ अपने को चमकाने की राजनीति के लिए दूसरे के लिखे शब्दों को अपनी आवाज़ दे रहे हैं। शायद यही फ़र्क है अटल के अटल और मोदी के मोदी होने का...

    केजरीवाल का गेमप्लान...

    अरविंद केजरीवाल का कहना है कि वो जीतने के लिए नहीं, मोदी को हराने के लिए वाराणसी से चुनाव लड़ रहे हैं। सवाल ये उठता है कि केजरीवाल का गेमप्लान क्या हैकेजरीवाल ने जिस तरह अब मोदी के ख़िलाफ़ ताल ठोकी है ठीक वैसे ही उन्होंने पिछले साल दिल्ली विधानसभा चुनाव में शीला दीक्षित के साथ किया था। तब उन्होंने दिल्ली में 15 साल से राज कर रही शीला दीक्षित को उन्हीं के गढ़ में धूल भी चटा दी। इस बार केजरीवाल को पता है कि ना तो वाराणसी दिल्ली है और ना ही मोदी शीला दीक्षित हैं। वाराणसी में केजरीवाल भी जानते हैं कि हार निश्चित है। फिर ये जोख़िम उन्होंने क्यों मोल लिया? दिल्ली में केजरीवाल ने 49 दिन के राज के बाद अपनी सरकार की बलि चढ़ाई थी तो लोकसभा चुनाव की जंग उनके दिमाग़ में थी। ऐसे वक्त में जब उन्हें अपनी पार्टी का सबसे बड़ा चेहरा होने की वजह से प्रचार के लिए देश में जगह-जगह जाने की दरकार थी, उन्होंने खुद को वाराणसी के युद्ध में उलझा लिया। दरअसल मोदी को सीधे चुनौती देकर केजरीवाल कुछ और ही साधना चाहते हैं। केजरीवाल का मकसद कांग्रेस को हाशिए पर ले जाकर अपनी पार्टी की लकीर को उससे बड़ा करना है। केजरीवाल देश को, खास तौर पर मुसलमानों को संदेश देना चाहते हैं कि मोदी को ज़ोरदार टक्कर देने का माद्दा उन्हीं में है, कांग्रेस में नहीं। केजरीवाल की कोशिश यही है कि मोदी के सबसे बड़े विरोधी के तौर पर उन्हें देखा जाए, कांग्रेस को नहीं। केजरीवाल की ये रणनीति तो ठीक लेकिन उनकी अब तक कर्मभूमि रही दिल्ली में जो ताज़ा सियासी हवा बह रही है, वो उनकी परेशानियों का नज़ला बढ़ाने वाली है। एक न्यूज़ चैनल के सर्वेक्षण के मुताबिक दिल्ली विधानसभा चुनाव के मुकाबले कांग्रेस ने तेज़ी से अपनी खोई हुई ज़मीन को दोबारा हासिल किया है। ऐसे में केजरीवाल के लिए कहीं ये कहावत सही ना साबित हो जाए...चौबे जी छब्बे जी बनने चले थे और दूबे भी नहीं रह गए।

    बेचारी नगमा...

    बॉलीवुड, साउथ और भोजपुरी सिनेमा में खासा नाम (?) कमाने वाली अभिनेत्री नग़मा इन दिनों परेशान हैं। दस साल तक कांग्रेस के प्रचार के लिए देश भर में धूल फांकने वाली नगमा को आखिर उनकी तपस्या का इनाम मिला। नगमा को कांग्रेस ने मेरठ-हापुड़ लोकसभा सीट से अपना प्रत्याशी बनाया है। नगमा प्रचार के लिए जहां जाती है, लोगों का अच्छा खासा मज़मा जुट जाता है। नगमा का खुद का कहना है कि उन्हें नहीं पता कि उनके चारों ओर क्या हो रहा है। यानि उनके प्रचार की अभियान के लिए पार्टी का कोई बड़ा नेता उनके साथ मौजूद नहीं है। नगमा गुरुवार रात को मेरठ के जली कोठी क्षेत्र में प्रचार के लिए गई थीं। वहां उन्हें देखने वाली भीड़ ऐसी बेक़ाबू हुई कि नगमा को एक युवक को थप्पड़ भी जड़ना पड़ा। मुश्किल से सुरक्षाकर्मियों ने नगमा को भीड़ से निकाला। 22 मार्च को हापुड़ में भी नगमा को रोड-शो के दौरान अप्रिय स्थिति का सामना करना पड़ा था। हापुड़ के कांग्रेस विधायक गजराज सिंह उस वक्त नगमा के एक कान पर हाथ रखकर अपनी ओर खींचते हुए नज़र आए थे। न्यूज़ चैनल्स पर जारी तस्वीरों में नगमा गजराज सिंह का हाथ झटकते हुए साफ़ नज़र आईं। हालांकि बाद में गजराज सिंह की ओर से सफ़ाई दी गई कि नगमा उनकी बेटी के समान हैं और उनकी कोई ग़लत मंशा नहीं थी। नगमा को 2012 में उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के दौरान भी बदसलूकी का सामना करना पड़ा था। तब बिजनौर सीट से कांग्रेस प्रत्याशी रहे हुसैन अहमद अंसारी ने तो हद कर दी थी। प्रचार के लिए तब नगमा मंच पर पहुंची थीं तो कांग्रेस प्रत्याशी ने माला पहनाते हुए उनके कंधे पर हाथ रखने की कोशिश की। नगमा के हाथ झटकने पर भी आशिक मिज़ाज प्रत्याशी नहीं रुका। सारी मर्यादा ताक पर रखते हुए उसने नगमा के लिए ये तुकबंदी भी सुना डाली- कौन सा गम जो ये हाल बना रखा है, ना मेकअप है ना बालों को सजा रखा है, ख़ामोखां छेड़ती रहती हैं रुख़सारों को।" ये सुनकर नगमा ने कहा कि क्या बकवास कर रहे हो? इस पर भी कांग्रेस प्रत्याशी नहीं चेता।फिर बोला वो बकवास नहीं कर रहा। आख़िरकार नगमा गुस्से में पैर पटकते हुए मंच छोड़ कर चली गई थीं। बेचारी नगमा को विरोधियों से ज़्यादा उनकी पार्टी वालों ने ही परेशान कर रखा है।

    स्लॉग ओवर

    मक्खन उदास बैठा था। उसके दोस्त ढक्कन ने उदास होने का कारण पूछा। 
    मक्खन ने कहा- "यार वो कल भारत-पाकिस्तान के क्रिकेट मैच में 800 रुपये का नुकसान हो गया।" 
    ढक्कन- "क्या शर्त लगाई थी?" 
    मक्खन- "हां, भारत की जीत पर मैंने 500 रुपये की शर्त लगाई थी, लेकिन भारत हार गया।" 
    ढक्कन- "फिर 800 रुपये का नुकसान कैसे हो गया?" 
    मक्खन- "यार, वो...300 रुपये हाईलाइट्स पर भी लगाए थे।" 

    (Contributed by Ainit Kachnt, Washington DC)








    Keywords:Khushwant Singh, Nagma
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    खुशवंत सिंह को समर्पित खुशबतिया...खुशदीप

  • Friday, March 21, 2014
  • by
  • Khushdeep Sehgal
  • (खुशवंत सिंह का मैं हमेशा बहुत बड़ा मुरीद रहा हूं...खुद को बड़ा सौभाग्यशाली समझता हूं कि मेरे नाम भी उनकी तरह खुश से ही शुरू होता है...उन्हें श्रद्धांजलि देने के लिए मैंने तय किया है कि अपने ब्लॉग पर हर शुक्रवार रात को खुशबतिया नाम से एक कॉलम लिखूं...प्रयास पसंद आए तो बताइएगा...आप से एक निवेदन और है कि आप इस कॉलम में शामिल करने के लिए मेरे ई-मेल sehgalkd@gmail.com पर चुटकुले या मज़ेदार बातें भेजनें का कष्ट करें...आप के नाम के साथ उन्हें प्रकाशित करने में मैं खुद को खुशकिस्मत समझूंगा...)

    अलविदा! बेबाक़ी के सरदार...
    खुशवंत सिंह सेंचुरी मारने से एक साल पहले आउट हो गए...उम्र के इस पड़ाव तक पहुंचने के बाद भी ज़िंदादिली ने उनका साथ नहीं छोड़ा...लेखन में साफ़गोई और बेबाकी...यही थी वो बात जिसके लिए उनके मुरीद उनसे मुहब्बत करते थे...शायद यही वजह है कि खुशवंत सिंह के जाने के बाद सोशल मीडिया पर उन्हें अपनी तरह से याद करने वालों का तांता लग गया...उनके लोकप्रिय स्तंभ का नाम बेशक रहा हो- ना काहू से दोस्ती, ना काहू से बैर...लेकिन खुशवंत सिंह के देहांत के बाद उनसे बैर रखने वाले सोशल मीडिया पर अपनी भड़ास निकालने से नहीं चूके...उनके पिता शोभा सिंह का नाम ले-ले कर उन्हें कोसा गया...खुशवंत सिंह को देशद्रोही का पुत्र बताते हुए यहां तक कहा गया कि उन्हें नर्क में ही जगह मिलेगी...ये सही है कि खुशवंत सिंह के पिता शोभा सिंह ने सेंट्रल असेम्बली में 8 अप्रैल 1929 को बम फेंकने के मामले में शहीद भगत सिंह और शहीद बटुकेश्वर दत्त के ख़िलाफ़ गवाही दी थी...खुशवंत सिंह ने भी इस बात को स्वीकार करने से कभी इनकार नहीं किया...लेकिन खुशवंत ये भी कहते रहे कि शोभा सिंह की इस गवाही की वजह से भगत सिंह को फांसी नहीं हुई थी...शहीद भगत सिंह, शहीद सुखदेव और शहीद राजगुरू को लाहौर षड्यंत्र केस (मुख्यत: ब्रिटिश पुलिस अधीक्षक जे पी साण्डर्स की हत्या) में संलिप्तता के चलते फांसी दी गई थी...शोभा सिंह के लिए ये तर्क भी दिया जाता है कि असेम्बली बम मामले में उन्होंने जो अपनी आंखों से देखा था, वही उन्होंने गवाही में बयां किया था...यहां एक प्रश्न उठता है कि शोभा सिंह ने ग़लत कृत्य किया भी था तो उसके लिए उनके पुत्र को भी ज़िम्मेदार मानना कौन सा इनसाफ़ है...किसी की मृत्यु के बाद भी उसे ऐसे कृत्य के लिए बुरा-भला कहना, जो उसने किया ही नहीं, ये कौन सी भारतीय संस्कृति है....
    हर हर मोदी...
    कहते है राजनीति में जिस सीढ़ी से चढ़ा जाता है, ऊपर पहुंचने के बाद सबसे पहला काम उसी सीढ़ी को लात मारने का किया जाता है...बीजेपी अब पूरी तरह मोदीत्व को प्राप्त हो गई है...ऐसे में लौहपुरुषलालकृष्ण आडवाणी की स्थिति सबसे दयनीय हो गई है...बेचारे जो इच्छा जताते है, होता ठीक उसके उलट है...मोदी इज़ बीजेपी एंड बीजेपी इज़ मोदी’…दीवार पर लिखी इस इबारत को आडवाणी जितनी जल्दी आत्मसात कर लेंगे, उतना ही उनकी बची-खुची राजनीतिक सेहत के लिए अच्छा रहेगा...वैसे भी नरेंद्र मोदी को लेकर बीजेपी इतनी आश्वस्त हो चली है कि अब उसे भगवान का भी डर नहीं रह गया है...तभी तो दिल्ली बीजेपी अध्यक्ष डॉ हर्षवर्धन ताल ठोक कर कह रहे हैं कि अब भगवान भी चाहें तो मोदी को जीतने से नहीं रोक सकते...बीजेपी की तरफ़ से नारा भी उछाला गया है...हर हर मोदी, घर घर मोदी’…कभी जय श्रीराम के उद्घोष से चुनावी सियासत के उत्कर्ष पर पहुंचने वाली बीजेपी इतनी निश्चिंत है कि उसे अब मोदी का नाम ही चुनावी वैतरणी पार करने के लिए पर्याप्त नज़र आता है...फिल्म उपकार का गाना ना जाने क्यों याद आ रहा है...'देते हैं भगवान को धोखा, इन्सां को क्या छोड़ेंगे'...
    राहुल और 'रिटायरमेंट'...
    18 मार्च को उत्तर-पूर्व में चुनावी प्रचार का आगाज़ करने के लिए राहुल गांधी अरुणाचल प्रदेश में थे...वहां हपोली में उनकी जनसभा थी...हपोली के नैसर्गिक सौंदर्य से राहुल इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने यहां तक कह दिया कि रिटायरमेंट के बाद वो यहीं बसना पसंद करेंगे...इस पर बीजेपी के समर्थकों की ओर से सोशल मीडिया पर चुटकी भी ली गई कि 16 मई को लोकसभा चुनाव की मतगणना के बाद राहुल अपनी इस इच्छा को पूरा कर सकते हैं...राहुल का फोकस लोकसभा चुनाव के साथ पार्टी का चेहरा-मोहरा बदलने पर है...युवाओं को तरज़ीह देकर राहुल की कोशिश कांग्रेस को गतिवान बनाने की है...राहुल यथास्थिति को तोड़ने की बात कर रहे हैं, लेकिन पार्टी के ओल्ड गार्ड्स को उनकी ये शैली हज़म नहीं हो पा रही है...कई दिग्गज़ नेताओं ने चुनाव से अलग रहने की ही इच्छा जताई...तो वहीं दिग्विजय सिंह और आनंद शर्मा जैसे नेता भी हैं जो स्वेच्छा से मोदी के ख़िलाफ़ काशी के चुनावी रण में उतरना चाहते हैं...सही कहा है कि जो दूरदर्शी होते हैं वो वक्त की नज़ाकत के मुताबिक अपने को ढालने में देर नहीं लगाते...
    स्लॉग ओवर...

    जब बॉबी डॉर्लिंग पैदा हुआ तो डॉक्टर घरवालों से बोला- बधाई हो, धोखा हुआ है...

    जब एकता कपूर पैदा हुई तो डॉक्टर घरवालों से बोला- बधाई हो, कौन हुआ जानने के लिए देखिए, अगला एपिसोड...

    जब प्रभू देवा पैदा हुआ तो डॉक्टर घरवालों से बोला- बधाई हो, बच्चा जब हिलना बन्द करेगा तो चेक करके बताएगें कि क्या हुआ है...

    जब दया (CID) पैदा हुआ तो सारे डॉक्टरो ने भागकर हॉस्पिटल के सारे गेट बन्द कर दिए...
    जब सुरेश कलमाड़ी पैदा हुआ तो डॉक्टर घरवालों से बोला- बधाई हो, घोटाला हुआ है...जांच जारी है...
    जब दिग्विजय सिंह का जन्म हुआ तो डॉक्टर घरवालों से बोला- बधाई हो, आपके साथ मज़ाक हुआ है...

    केजरीवाल के पैदा होने से पहले डॉक्टर घरवालों से बोला- बच्चा आ नही रहा है, अन्दर धरने पर बैठा है... 
    (पागलपंती के फेसबुक वॉल से साभार)






    Keywords:Khushwant Singh, Khushbatiya
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    अनस को पढ़िए, लत ना लगे तो कहिएगा...खुशदीप

  • Saturday, March 15, 2014
  • by
  • Khushdeep Sehgal
  • लेखन की एक खास शैली है...बेबाकी से अपनी बात सच सरासर सच कहना...ठेठ और अक्खड़ स्टाइल में...ये लेखन सीधे दिल से निकला होता है, सोलह आने खरा होता है, इसलिए गहरी मार करता है...कलम की रवानगी ऐसी होती है कि बस पूछो नहीं...एक बार कोई पढ़ना शुरू करता है तो फिर आख़री फुलस्टॉप पर ही जाकर रुकता है...

    ब्लॉग जगत में ऐसा 24 कैरट लिखने वाले कई हैं...लेकिन मैं यहां दो ब्लॉगर्स का खास तौर पर नाम लेना चाहूंगा...महफूज़ अली और अनिल पुसदकर....इसी कड़ी में ताज़ा एक और नाम जुड़ा है...मोहम्मद अनस...इनके ब्लॉग का नाम है- नई डायरी...टैगलाइन है- मेरे हिस्से की दुनिया जो सबसे होकर गुज़रती है...

    मेरे लिए इस पोस्ट लिखने का मकसद ही यही है कि मोहम्मद अनस को हिंदी ब्लॉग जगत से रू-ब-रू कराना...फेसबुक पर जनाब का पहले से ही बहुत जलवा है...हाल ही में अनस ने ब्लॉगिंग में दस्तक दी है...कुल जमा अभी तक तीन पोस्ट लिखी हैं...लेकिन इन तीन पोस्ट से ही इन्होंने बता दिया है कि इनकी लेखनी क्या क़यामत ढा सकती है...

    मोहम्मद अनस


    मोहम्मद अनस पर अभी लौटता हूं, पहले जिस खास लेखन की बात कर रहा था, उसकी झलक महफूज़ अली और अनिल पुसदकर भाई की इन दो पोस्ट के ज़रिए आप तक पहुंचा देता हूं...पुरानी पोस्ट हैं- लेकिन आज भी वैसा ही मज़ा देती है जैसे कि पहली बार पढ़े जाने के वक्त दिया था...

    महफूज़ अली
    महफूज़ अली-












    अनिल पुसदकर
    अनिल पुसदकर-












    अब ये इस तरह के लेखन का कमाल ही है कि महफूज़ और अनिल भाई की हिंदी ब्लॉगिंग में हमेशा ज़बरदस्त फैन-फॉलोइंग रही है...

    अब आता हूं मोहम्मद अनस पर...मेस्मेराइज़ कर देने वाले इनके लेखन की ये बानगी देखिए...

    "जब छोटा था तो सबसे ज्यादा घबराहट जिस चीज़ से होती थी वह थी स्कूल जा कर आठ घंटे एक ही बेंच पर ,एक ही कमरे में ,एक ही ब्लैकबोर्ड को देखना . पांच साल का हो गया तो सजा धजा ,काजल पाउडर और सर में पचास ग्राम तेल चपोड़ घर में काम करने वाले दस्सू चच्चा इलाहबाद मांटेसरी स्कूल छोड़ आते ।पढ़ता कम और रोता ज्यादा था इसलिए क्लास से बाहर निकाल प्ले ग्राउंड भेज दिया जाता ।लेकिन स्कूल के टीचर जल्दी ही समझ गए की लड़का पहुंचा हुआ है ,रोज़ रोज़ का नाटक है इसका न पढ़ने का।" 

    पूरी पोस्ट इस लिक पर पढ़ी जा सकती है-


    इसके अलावा अनस ने दो और पोस्ट लिखी हैं-
    अगर आप सिर्फ़ एक बार अनस को पढ़ लेंगे तो इनके बारे में कुछ और कहने की गुंजाइश ही ख़त्म हो जाएगी...फिर मेरी तरह आपको भी इनका लिखा पढ़ने की लत लग जाएगी...

    (नोट- मोहम्मद अनस से पहले मैं मनसा वाचा कर्मणा वाले राकेश कुमार जी का हिंदी ब्लॉग जगत से परिचय कराने का ज़रिया बना था...राकेश जी भगवदगीता, उपनिषद, रामायण, भागवत आदि ग्रंथो की वैज्ञानिक आधार पर जिस तरह व्य़ाख्या करते हैं, उसने देश-विदेश में उनके असंख्य मुरीद बना दिए...अब मुझे उम्मीद ही नहीं पक्का यक़ीन है कि मोहम्मद अनस के लेखन को भी ऐसे ही हाथों-हाथ लिया जाएगा...)






    Keywords:Mohammad Anas
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    जस्सी जैसा कोई नहीं...खुशदीप

  • Wednesday, March 12, 2014
  • by
  • Khushdeep Sehgal

  • ये 11 मार्च बड़ी खास थी...इस तारीख़ की शाम समर्पित थी मेरे हीरो को...वो शख्स जिसे मैंने ज़िंदगी में कभी देखा नहीं...लेकिन उसकी शख्सीयत के बारे में मैंने जितना सुना, वो उतना ही मेरे दिल-ओ-दिमाग़ पर छाता गया...उसके बारे में मैंने जाना नहीं होता तो शायद आज मैं वो नहीं होता जो मैं हूं...उसके किस्सों को नहीं सुना होता तो आज मैं अपने पारिवारिक कारोबार को ही संभाल रहा होता...मैं जिस शख्स की बात कर रहा हूं, उसका नाम है- जसविंदर सिंह...हम सबका प्यारा जस्सी...वो जस्सी जिसे 31 दिसंबर 1993 को काल के क्रूर हाथों ने हम से छीन लिया था...महज़ 33 साल की उम्र में...

    जस्सी आज होता तो तीन दिन बाद 15 मार्च को अपना 54वां जन्मदिन मना रहा होता...बीबीसी के पूर्व संवाददाता जस्सी के बारे में ज़्यादा जानना चाहते हैं तो बीस साल पहले छपे मेरे इस लेख को पढ़ सकते हैं...

    'अन्याय को देख मर्माहत हो उठता था जस्सी'

    (परवेज़ आलम भाई के फेसबुक वॉल से जस्सी का फोटो साभार)
    बहरहाल आता हूं 11 मार्च पर...इस दिन जसविंदर सिंह मेमोरियल ट्रस्ट की ओर से भारतीय जन-संचार संस्थान (IIMC), दिल्ली में प्रथम वार्षिक व्याख्यान का आयोजन किया गया...संस्थान के मिनी ऑडिटोरियम में हुए इस कार्यक्रम में बीबीसी से जुड़े रहे और मीडिया प्रशिक्षक निकोलस न्यूजेंट  मुख्य वक्ता के तौर पर बोले...विषय था- ब्रिटेन में फोन हैकिंग के बाद न्यूज मीडिया के क्रियाकलापों की जांच के लिए गठित लेवेसन जांच आयोग की रिपोर्ट के भारतीय न्यूज मीडिया के लिए क्या मायने हैं ?

    व्याख्यान का विषय बड़ा गंभीर था...खास तौर पर भारतीय मीडिया जिस दौर से गुज़र रहा है उसे देखते हुए...मीडिया का स्वतंत्र होना भारतीय लोकतंत्र की ख़ूबसूरती है...लेकिन मीडिया बिना किसी निगरानी के निरकुंश हो जाता है तो ये लोकतंत्र के लिए किसी त्रासदी से कम भी नहीं...सरकार के हस्तक्षेप के बिना आत्म-नियमन की बात की जाती है...लेकिन मीडिया, खास तौर पर इलैक्ट्रोनिक मीडिया ने आत्म-नियमन का जो चोला पहन रखा है, क्या वो अपेक्षित परिणाम दे पा रहा है...

    इस विषय पर मुख्य वक्ता निकोलस न्यूजेंट से पहले प्रधानमंत्री के संचार सलाहकार पंकज पचौरी ने अपनी बात रखी...पंकज पचौरी ने भारत में मीडिया को गंभीर संकट में बताया...उनके मुताबिक बिज़नेस मॉडल फेल हो रहा है...अखबारों की प्रसार संख्या में गिरावट आ रही है...मीडिया संस्थानों का मुनाफ़ा तेज़ी से घट रहा है...विज्ञापनों से होने वाली कमाई लगातार घट रही है...ऐसे में छदम रेवेन्यू सिस्टम का सहारा लिया जा रहा है...प्रिंट मीडिया में सर्कुलेशन को साबित करने वाले IRS के आंकड़ों पर उंगली उठ रही है तो इलैक्ट्रोनिक मीडिया के लिए टीआरपी की गणना करने वाले TAM सिस्टम की विश्वसनीयता भी संदेह के घेरे में है... पंकज ने एक और दिलचस्प बात बताई कि आज भी दूरदर्शन दूसरे चैनलों के मुकाबले सात गुणा ज़्यादा देखा जाता है....

    प्रधानमंत्री के संचार सलाहकार पंकज पचौरी ने बताया कि संसदीय स्थाई समिति ने लेवेसन जांच आयोग की रिपोर्ट पर भारतीय मीडिया के संदर्भ में विचार किया है...एक वर्किंग पेपर तैयार किया गया है...पेड न्यूज़ जैसे अनैतिक आचरणों के संदर्भ में मीडिया के नियमन ज़रूरत जताई जाती है...लेकिन इसके लिए कोई तैयार नहीं है...आत्म नियमन की दुहाई दी जाती है..दिल्ली हाईकोर्ट, भारतीय प्रेस परिषद और संसदीय स्थायी समिति सब कह चुके हैं कि आत्म नियमन की व्यवस्था काम नहीं कर रही है...फिर क्या रास्ता निकाला जाए...पंकज ने कहा कि वह खुद भी मीडिया पर निगरानी के लिए आत्म-नियमन के पक्ष में हैं...लेकिन इस आत्म-नियमन की जवाबदेही के लिए कोई मज़बूत सिस्टम बनना ज़रूरी है...इस संदर्भ में पंकज ने भारतीय निर्वाचन आयोग और सेबी जैसी संस्थाओं का हवाला दिया...पंकज के मुताबिक देश में नेता सबसे ज़्यादा निर्वाचन आयोग से और कारपोरेट सेबी से डरते हैं...

    पंकज पचौरी के बाद मुख्य वक्ता निकोलस न्यूजेंट ने बोलना शुरू किया...बेबाक अंदाज़ में उन्होंने पहले ही साफ़ कर दिया कि वो भारतीय प्रिंट मीडिया को तो लगातार फॉलो करते रहे हैं लेकिन इलैक्ट्रोनिक मीडिया के बारे में वो ज़्यादा अवगत नहीं है...इसलिए लेवेसन जांच आयोग की रिपोर्ट को लेकर भारतीय मीडिया के संदर्भ के मायने में ज़्यादा अधिकार से कुछ नहीं कह सकते...हां उन्होंने ये ज़रूर कहा कि प्रधानमंत्री की स्पीच को कितना स्थान देना है, ये तय करना मीडिया का काम है और ये उस पर ही छोड़ देना चाहिए...

    निकोलस न्यूजेंट ने ब्रिटेन के संदर्भ में कहा कि वहां प्रिंट मीडिया दम तोड़ने की ओर अग्रसर है...बिजनेस मॉडल को जबरदस्त खतरा है...प्रिंट मीडिया का सर्कुलेशन लगातार घटता जा रहा है...स्पेस सेलिंग के नए तरीके ढूंढे जा रहे हैं...ऐसे में गॉसिप और सनसनी के ज़रिए कारोबार करने वाली टेबलायड कल्चर हावी हो रही है...जानकारी के लिए पब्लिक सर्वेन्ट्स को रिश्वत दी जा रही है...न्यूज़ ऑफ द वर्ल्ड प्रकरण के बाद मीडिया की इन अनैतिक गतिविधियों की जांच के लिए ही लेवेसन जांच आयोग का गठन किया गया...खास तौर पर मीडिया और राजनेताओं के बीच बन गए रिश्तों पर लेवेसन जांच आयोग ने चिंता ज़ाहिर की...यानि वहां भी आत्म नियमन के लिए बनी प्रेस कम्पलेंट कमीशन कारगर नहीं रही...लेकिन सरकारी नियमन की व्यवस्था हो तो वो खुद बड़ी समस्या साबित हो सकती है...ऐसे में संवैधानिक तौर पर समर्थित आत्म-नियमन की व्यवस्था ही सबसे अच्छा विकल्प है...

    खैर ये तो सब वो बातें हैं जो व्याख्यान से संबंधित थीं...लेकिन अब फिर उस शख्स की ओर लौटता हूं जिसके नाम पर ये सारा आयोजन हो रहा था...इस कार्यक्रम के आयोजन में ज़्यादातर लोग वही शामिल थे, जिन्होंने जस्सी के साथ बीबीसी में काम किया था...उसकी ज़िंदादिली के बारे में सुनाने के लिए सबके पास इतने किस्से थे कि पूरा दिन भी सुनाते रहते तो कम रहते...
    बीबीसी की हिंदी सेवा की पूर्व प्रमुख अचला शर्मा ने शुरुआत में कार्यक्रम की रूपरेखा रखते हुए जस्सी के पसंदीदा पंजाबी कवि पाश की एक कविता का हवाला दिया...उनके भावुक शब्द ही ये गवाही देने के लिए काफ़ी थे कि जस्सी के जाने के बीस साल बाद भी उसकी ज़िंदादिली को वो कितनी शिद्दत के साथ महसूस करती है...

    कार्यक्रम के मॉडरेटर (वरिष्ठ पत्रकार-प्रशिक्षक) परवेज़ आलम ने जस्सी को फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की इस नज़्म के साथ याद किया...

    हम देखेंगे
    लाजिम है कि हम भी देखेंगे
    वो: दिन के जिसका वादा है
    जो लौह-ए-अजल में लिक्खा है
    जब जुल्म-औ-सितम सितम के कोह-ए-गरां
    रुई की तरह उड़ जाएँगे
    हम महकूमों के पाँव-तले
    जब धरती धड़ धड़ धड़केगी
    और अहल-ए-हिकम के सर ऊपर
    जब बिजली कड़ कड़ कड़केगी
    जब अर्ज़ ए-खुदा के काबे से 
    सब बुत उठवाये जायेंगे
    हम अहल-ए-सफा, मरदूद-ए-हरम
    मसनद पे बिठाए जाएंगे
    सब ताज उछाले जाएंगे
    सब तख्त गिराए जाएंगे

    जस्सी के पत्रकारिता की शुरुआत के दिनों के साथी एम के वेणु (द हिंदू के पूर्व वरिष्ठ संपादक)....या फिर बीबीसी में जस्सी की नियुक्ति के सूत्रधार सतीश जैकब या विपुल मुद्गल...सभी के पास जस्सी के बारे में सुनाने के लिए बहुत कुछ था...इस मौके पर बीबीसी से बरसों तक जुड़े रहे रामदत्त त्रिपाठी और सुधा माहेश्वरी भी मौजूद रहे...बीबीसी में पिछले सात साल से कार्यरत इकबाल अहमद की शिरकत भी खास रही...

    कार्यक्रम में सबसे महत्वपूर्ण उपस्थिति जस्सी की मां महेंद्र कौर, बहन डॉ.परमजीत कौर और बहनोई डॉ.ओंकार सिंह की रही...इस मौके पर जसविंदर सिंह मेमोरियल ट्रस्ट की तरफ से IIMC के दो छात्रों को हर साल छात्रवृत्ति देने का ऐलान किया गया...पहले साल के लिए चुनीं गईं  दो छात्राओं- सिंधुवासिनी (हिंदी पत्रकारिता) और हर्षिता (प्रसारण पत्रकारिता) को जस्सी की माताजी ने खुद अपने हाथों से आधिकारिक-पत्र देकर आशीर्वाद दिया...

    (फोटो : आनंद प्रधान सर के फेसबुक वॉल से साभार)

    इस अवसर पर बड़ी संख्या में उपस्थित IIMC के छात्रों को वक्ताओं से सवाल पूछने का भी मौका मिला...कार्यक्रम को सफल बनाने में IIMC के कुलसचिव जयदीप भटनागर और प्रोफेसर आनंद प्रधान के सहयोग को भी भुलाया नहीं जा सकता...IIMC से लौटते वक्त मैं यही सोच रहा था कि आज की शाम कितनी सार्थक रही...और रहती भी क्यों नहीं...पूरे कार्यक्रम की धुरी जस्सी जो था...जस्सी मेरा हीरो...

    Keywords:Jasvinder Memorial Trust
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