धूप अलसाई सी लेटी है

सुबह दरवाजा खोलते ही धूप दिखी। एकदम दरवज्जे तक आकर ठहरी हुयी सी। जैसे सूदूर से कोई फ़रियादी किसी हाकिम के यहां पहुंच जाये। लेकिन उसके दरवज्जे में घुसने की हिम्मत न होने पर वहीं ठिठका खड़ा रहे कि अब क्या करूं! :)

ठिठकी धूप देखकर अपनी तुकबंदी/कविता याद आती है:

जाड़े में धूप
आहिस्ते से आती है,
धीमें-धीमे सहमती हुई सी।

जैसे कोई अकेली स्त्री
सावधान होकर निकलती है
अनजान आदमियों के बीच से।

धूप सहमते हुये
गुजरती है चुपचाप
कोहरे, अंधेरे और जाड़े के बीच से।

धूप सड़क , मैदान, छत, बरामदे में अलसाई सी लेटी है। उसको आज न दफ़्तर जाना है, न कचहरी न इस्कूल। ऊपर सूरज जी गर्म से हो रहे हैं। लगता है धूप को डांट रहे हैं – उसके आलस के लिये। शायद कह रहे हों -उठ जा बिटिया ब्रश करके नास्ता कर ले उसके बाद थोड़ा पढ़ ले। एक्जाम आने वाले हैं।

धूप लाड़ली अपने पापा के गले में बांहे डालकर फ़िर कुनमुनाती हुई सो जाती है। सूरज उसको प्यार से निहारते हुये अपनी ड्यूटी बजाने निकल पड़ते हैं। :)

एक आटो सड़क पर पसरी धूप को बेरहमी से कुचलता निकलता है। ऊपर से इसे देखकर सूरज का खून खौल जाता है। उनके शरीर का तापमान हजार डिग्री बढ़ जाता है। सूरज की गर्मी देख आटो वाले के पसीने आ जाते हैं। वह अपना स्वेटर उतारकर बगल में धर लेता है। भागता चला जाता है ! सरपट ! दूर ,बहुत दूर । डरते हुये – सड़क पर पसरी सूरज की बच्चियों को रौंदते हुये सलमान खान की तरह।

धूप , पेड़ – पौधों की पत्तियों पर पहुंची। सब सहेलियां आपस में चिपटकर चमकने , बिहंसने, बतियाने लगीं। धूप ने अपने सूरज से धरती तक अपने सफ़र की कहानी सुनाई। यह भी कि कैसे वह रास्ते में, पृथ्वी की परिक्रमा के बहाने मंडराते, तमाम आवारा आकाश पिंडो को गच्चा देते हुये आयी है।

एक सहेली ने कहा कि वे तुम उनको छोड़कर यहां चली आयी वे बेचारे अंधेरे में भटकते, तेरी याद में चक्कर काट रहे होंगे। बड़ी निष्टुर है तू यार धूप! इस पर सब खिलाखिलाकर हंस दीं। पत्तियां तो अब तक हंसते हुये थरथरा रही हैं।

गेंदे का फ़ूल धूप और पत्तियों को हंसते-खिलखिलाते देख अपना सर मटकाते हुये मुस्कराने लगा है। थोड़ा मोटा सा होने के चलते किसी सेठ का पेटू बेटा सा लगता है गेंदे का फ़ूल! उसको सिर मटकाते-मुस्कराते देख एक गुलाब की कली ने अपनी सहेली के कान में फ़ुसफ़ुसाते हुये कहा- बौढ़म कहीं का, बेवड़ा, बावला। ज्यादा नजदीकी के चक्कर में उसका कांटा सहेली-कली के चुभ गया। वह, उई मां! कहते हुये झल्लाते हुये तेजी से फ़ुसफ़ुसाई – गेंदे की आशिकिन अपना ये कांटा संभाल। हमारी नयी पत्ती में छेद कर दिया। ये तो रफ़ू भी नहीं होती कहीं :)

धूप,पत्तियों, फ़ूल, कलियों को चहकते-महकते देख पूरी कायनात मुस्कराने लगी।

मेरी पसंद

तुम्हारी याद
गुनगुनी धूप सी पसरी है
मेरे चारो तरफ़।

कोहरा तुम्हारी अनुपस्थिति की तरह
उदासी सा फ़ैला है।

धीरे-धीरे
धूप फ़ैलती जा रही है
कोहरा छंटता जा रहा है।

7 responses to “धूप अलसाई सी लेटी है”

  1. समीर लाल

    धीरे-धीरे
    धूप फ़ैलती जा रही है
    कोहरा छंटता जा रहा है।

    -शुभ संकेत हैं..शुभकामनाएँ.
    समीर लाल की हालिया प्रविष्टी..आहिस्ता आहिस्ता!!

  2. indian citizen

    अच्छा बिम्ब है. धूप, कुहरे और सूरज का.
    indian citizen की हालिया प्रविष्टी..सरोकार की पत्रकारिता और वेब-साइट पर तस्वीरें

  3. प्रवीण पाण्डेय

    धूप बस यही कहती है, मैं आ गयी हूँ.. आप भी आ जाओ।
    प्रवीण पाण्डेय की हालिया प्रविष्टी..बस, बीस मिनट

  4. sanjay jha

    जैसे कोई अकेली स्त्री
    सावधान होकर निकलती है
    अनजान आदमियों के बीच से।…….

    ……………………..
    ……………………..

    प्रणाम.

  5. mahendra gupta

    कोहरा तुम्हारी अनुपस्थिति की तरह
    उदासी सा फ़ैला है।

    भाव पूर्ण अभिवयक्ति

  6. सतीश सक्सेना

    आपने अपना फोटू बड़ा गज़ब खिचवाया है …
    सतीश सक्सेना की हालिया प्रविष्टी..भाषा इन गूंगो की -सतीश सक्सेना

  7. : फ़ुरसतिया-पुराने लेख

    [...] धूप अलसाई सी लेटी है [...]

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