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बुधवार, 5 दिसंबर 2012

इंतज़ार

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अभी तुम्हारी छोटी छोटी आँखें
मुझे नहीं पहचानेंगी

अभी तुम्हारे छोटे छोटे होंठ
मुझे नहीं पुकारेंगे

अभी तुम्हारे छोटे छोटे कान
मेरी आवाज़ को अनसुना कर देंगे

अभी तुम्हारी छोटी छोटी उंगलियाँ
मेरी शर्ट को नहीं खींचेंगी

अभी तुम्हारे छोटे छोटे पैर
मेरे साथ नहीं चलेंगे

पर मुझे पता है
एक दिन आएगा, जब ये सब होगा
और तब तक
मेरी छोटी दोस्त
मैं इंतज़ार करूंगा!

शुक्रवार, 24 फ़रवरी 2012

हंसिया चाँद

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(पूनम का चाँद तो सब को लुभाता है, लेकिन चाँद हर दिन तो एक जैसा नहीं रहता. ये कविता उस चाँद के नाम जो अमावस के बाद निकलता है, और उतना खूबसूरत हो न हो, होता तो हमारा इकलौता चाँद ही है ना!)

आज रात है
हंसिया चाँद,
इतराता शर्माता
रंग-रसिया चाँद.

बिछी बिसात पे
प्यादे जैसा चाँद,
एक कमज़ोर
इरादे जैसा चाँद.

मुरझाई छुई-मुई
की डाली चाँद,
गुनगुनी चाय की
प्याली चाँद.
  
सच कहो तो ये है
बस नाम का चाँद,
पर जो भी है,
यही है हर रहीम और
हर राम का चाँद।।

(हंसिया = sickle)

  

शुक्रवार, 17 फ़रवरी 2012

दोस्त

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कुछ भूल गए,
कुछ याद रहे.
कुछ बिछड़ गए,
कुछ साथ रहे.

कुछ सुने हुए से 
किस्सों से,
कुछ बुने हुए से
हिस्सों से.

कुछ गैरों के,
कुछ अपनों के.
कुछ सच्चे और
कुछ सपनों से.

कुछ फिर मिलने
के वादे थे
'टच' में रहने के 
इरादे थे.

फोन में नंबर
अभी भी हैं,
बर्थडे रिमाइंडर
अभी भी हैं.

पर एक अनदेखा
सा दुश्मन है
शायद वो मेरा
अंतर्मन है.

बढ़ता हूँ,
रुक जाता हूँ.
सच कहूं तो,
अहम् के आगे
झुक जाता हूँ.

शायद इसीलिए..
कुछ भूल गए,
कुछ याद रहे.
कुछ बिछड़ गए,
कुछ साथ रहे.  

बुधवार, 21 सितंबर 2011

अथ श्री NEW महा भारत कथा

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'माधव', 'केशव', 'वासुदेव' वगैरह के बाद जब अर्जुन ने 'यादव कुल गौरव' कह कर संबोधित किया तो कृष्ण झल्ला गए. "यार ये बाकी सब ठीक है पर 'यादव कुल गौरव' सुन के ऐसा लगता है जैसे यू.पी. का कोई समाजवादी  सभासद अखिलेश यादव को मस्का लगा रहा है."

अर्जुन का लटका मुंह और भी लटक गया. वैसे भी जबसे तीरंदाजी असोसिएशन का चुनाव हारे थे, अर्जुन को कोई पूछने वाला भी नहीं था. कृष्ण ने पहले भी समझाया था कि खेल असोसिएशन में तो किसी नेता की सिफारिश से भी काम नहीं चलने वाला, क्योंकि खुद सारे नेता इन खेल संस्थाओं के मुखिया हैं.

वैसे कृष्ण पर भी काफी प्रेशर था. मथुरा में जन्माष्टमी के लाइव कवरेज के लिए कई देशी विदेशी चैनल लाइन में थे लेकिन मुख्या प्रबंधक महोदय के भाई के साले के चचेरे भाई के चैनल को ही टेलीकास्ट राइट्स मिलेंगे ऐसी बात मीडिया में लीक हो गयी थी. अब अगर ये राइट्स पिछले बार से भी कम दामों पर गए तो वैष्णो देवी और तिरुपति बालाजी तो देवताओं के अनुअल गेट-टुगेदर में कृष्ण की इज्ज़त का चीरहरण कर देंगे!

ये लोग यही सब माथा पच्ची कर रहे थे कि भीम भी आ गए. चुनाव का सीज़न नहीं था सो उनके अखाड़े के पहलवानों की कोई डिमांड नहीं थी पर खिलाने पिलाने का खर्च तो था ही. कृष्ण ने उनको अर्जुन के दुःख के बारे में बताया तो भीम उल्टा अर्जुन पर ही बरस पड़े "अरे कृष्ण, मैंने भी तो इसको समझाया था. कुश्ती महासंघ और वेट लिफ्टिंग फेडरेशन के चुनावों में मेरे साथ क्या हुआ था, ये देख कर भी इसको अकल नहीं आयी तो कोई क्या करे. अरे ये सब छोड़ो मेरी सुनो. ये आजकल सारी दुनिया को जो अन्ना हजारे का गांधीगिरी का रोग लगा है ना, हम जैसों के पेट पे तो लात पड़ गयी. ना कोई लोन रिकवरी के लिए पहलवान ले रहा है ना घर खाली कराने के लिए. ये मुश्टंडे तो मेरे गले पड़ गए हैं."

तभी 'दुर्योधन भैया अमर रहें' और 'दुर्योधन तुम संघर्ष करो, हम तुम्हारे साथ हैं' के नारे लगाती ६-८ जीप और २०-२५ मोटर साइकिलों का एक काफिला धूल उड़ाता हुआ निकल गया. अर्जुन बोले 'साला काहे का संघर्ष. दलबदलू की औलाद. पहले मुलायम के आगे पीछे घूमता था, अब मायावती के पीछे.' भीम ने कहा, "यार समझ नहीं आया मायावती ने इसको ले कैसे लिया". कृष्ण बोले "अरे सीधा फंडा है भाई. इसके और इसके भाइयों के परिवार के इतने वोट हैं, इसकी सीट तो पक्की है ही."

इतना कहते हुए वो उठ खड़े हुए और बोले 'अच्छा मैं ज़रा निकलता हूँ. इंडिया टीवी में उनकी वो एलियन और गाय वाली स्टोरी थी ना, उस न्यूज़ पर पैनल डिस्कशन में जाना है." और उन्होंने अपनी स्प्लेंडर स्टार्ट की और निकल गए. 

अर्जुन और भीम दुर्योधन के काफिले की उड़ती हुई धूल देखते रह गए. 


शुक्रवार, 24 जून 2011

मेरी शादी का पहला साल!

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हमें एक हुए ,
एक साल हो गया।
अरे पता ही नहीं चला,
ये तो कमाल हो गया।

अभी कल ही तो
मैं पहली बार तुमसे मिलने आया था,
तुम कुछ शरमाई हुई सी थी और
शायद मैं भी कुछ घबराया था.

कल ही तो हमने अपने घर के लिए
कितने सारे सपने सजाये थे।
और जब बारिश का पानी खिड़की से अन्दर आ गया
तब भीगे हुए गद्दे उठाये थे!

कल ही तो हमारे
रूठने मनाने की शुरुआत हुई थी।
और जब मैंने डांटा तो तुम्हारे
आंसुओं की बरसात हुई थी!

कल ही तो हम
तेज़ बारिश में भीगते हुए घर आये थे,
धूप नहीं निकली थी अगले हफ्ते
और कमरे में पंखे के नीचे कपड़े सुखाये थे।

कल ही तो हमने
अपने सपनों को कुछ नाम दिए थे,
कल ही तो हमने एक-दूसरे को
अपने सुबह और शाम दिए थे।

कल ही तो ज़िन्दगी ने
कंधे पर हौले से छू के मुझसे कहा
तुम अकेले थे ना
इसलिए एक साथी दे दिया।

कल ही कल में वो
सारे पल ना जाने कैसे बीते।
अब सोचता हूँ तो याद आते हैं वो सारे पल,
मुस्कुराते, गुनगुनाते, हँसते और जीते!

अभी तो एक लम्बा सफ़र है,
पर ख़ुशी तो होती है ना जब अच्छी शुरुआत हो।
आगे बहुत मुश्किलें आएंगी ज़रूर,
पर चिंता नहीं मुझे जब तुम साथ हो।

शनिवार, 9 अप्रैल 2011

पर भ्रष्ट है कौन?

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सबसे पहले तो किसन बापट बाबूराव हजारे यानि अन्ना हजारे को कोटिशः धन्यवाद। वैसे सच तो ये है कि अन्ना को जितने भी धन्यवाद दिए जाएं वो कम हैं क्यूंकि ७२ साल के इस बूढ़े आदमी ने हमारे समाज को और हम सब को एक गहरी नींद से जगा दिया और लोगों को मजबूर कर दिया कि वो अपने एसी ऑफिस से निकल कर सड़क पर आएं, 'हम कर ही क्या सकते हैं' की हताशा को छोड़ें और सरकारों को बताएं कि चुनाव के ५ साल के बीच में भी जनता जाग सकती है।

लेकिन मैं एक बात समझना चाहता हूँ। भ्रष्टाचार है क्या? क्यूंकि इसके बारे में जितना पढ़ा, सुना, देखा है उससे तो यही लगता है कि भ्रष्टाचार का मतलब सरकारी दफ्तरों और कर्मचारियों में रिश्वतखोरी की आदत है या फिर मंत्रियों और उद्योगपतियों की मिलीभगत। भ्रष्टाचार की बात आती है तो फिर समाज और 'मिडिल क्लास' यानि मध्यम वर्ग को कैसे भूल सकते हैं।

मैं ये समझना चाहता हूँ कि समाज कौन है? या फिर अगर हम मध्यम वर्ग पर ध्यान केन्द्रित करें तो मध्यम वर्ग किन लोगों से बनता है? स्कूल के अध्यापक, डॉक्टर, वकील, सॉफ्टवेयर कर्मी, सरकारी बाबू, छोटे और मध्यम व्यापारी और ऐसे ही तमाम लोग। क्या अध्यापक कक्षा में पढ़ाने के बजाये ट्यूशन नहीं करते? क्या सॉफ्टवेयर कर्मी झूठे मेडिकल बिल नहीं बनवाते? क्या व्यापारी धांधली नहीं करते? डॉक्टर और वकील अनोखे तरीकों से अपने ग्राहकों से ज्यादा पैसे नहीं ऐंठते? कहने का तात्पर्य ये है कि समाज जिन लोगों से बनता है उन सभी लोगों के भ्रष्टाचार की वजह से समाज त्रस्त है, वजह कहीं बाहर नहीं है अन्दर ही है।

ये भी सच है कि राजनीतिज्ञों को क्लीन चिट नहीं दी जा सकती और जब तक ऊंचे पदों पर बैठे नेता और उनके करीबी भ्रष्ट अफसरों पर लगाम नहीं लगती तब तक ये उम्मीद रखना बेकार है कि छोटे कर्मचारी अपना काम ईमानदारी से करेंगे, या कहें, कर सकेंगे! लेकिन क्या ये एक जायज़ बात है कि क्यूंकि सरकार भ्रष्ट है इसलिए हम भी अपने स्तर का भ्रष्टाचार करेंगे? मुझे नहीं लगता।

हमारी आदत है हर चीज़ के लिए दूसरों पर उँगली उठाने की। भ्रष्टाचार ख़त्म करना है तो सरकार करे, न्यायपालिका करे, मीडिया करे, अन्ना हजारे करें। हम क्या करें? हमारी ज़िम्मेदारी क्या सिर्फ 'अन्ना तुम संघर्ष करो, हम तुम्हारे साथ हैं' बोल कर ख़त्म हो जाती है? ध्यान रखिये कि जनता को वही नेता मिलता है जिसके वो लायक होती है। हमारे नेता, हमारे अफसर, हमारे बाबू कहीं पाकिस्तान से आयात (इम्पोर्ट) नहीं होते, वो हमारे बीच में से आते हैं। हमारे भाई, बहन, पड़ोसी, परिचित होते हैं। भ्रष्टाचार ख़त्म करना है तो हमें सुधरना पड़ेगा। अन्यथा ना तो जन लोकपाल बिल कोई जादू की छड़ी है और ना अन्ना कोई जादूगर, जो बस पलक झपकते ही भ्रष्टाचार ख़त्म कर देंगे!

शनिवार, 1 जनवरी 2011

नवल वर्ष

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सूर्य नव,
प्रकाश नव,
आकाश नव,
अवकाश नव।

वर्ष नव,
हर्ष नव,
विश्व का प्रदर्श नव,
अब समय है
हो आदर्श नव

अन्यथा

आप आए, शुक्रिया!