Wednesday, December 14, 2016
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जब चंद्रशेखर आजाद और भगत सिंह ताजमहल देखने गये

chandershekhar azad with bhagat singh
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chandershekharazad with bhagat singh at tajmahal

आजाद हैं हम और आजाद ही रहेंगे

एक दिन क्रांतिकारी दल के सेनापति चन्द्रशेखर आजाद, जो उन दिनों हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (एच.एस.आर.ए.) के प्रमुख थे, अपने साथियों श्री राजगुरु, श्री सुखदेव, श्री भगत सिंह, श्री भगवानदास माहौर, श्री विजय कुमार सिन्हा के साथ आगरा की “हींग मंडी” के एक मकान में बैठे थे। यह मकान आठ रुपए मासिक किराये पर लिया गया था। उसी दिन ये लोग आगरा का ताजमहल भी रात को देख आये थे। ताजमहल देखने के बाद राजगुरु, जिन्हें कविता करना आता ही नहीं था, एकाएक कहने लगे, मैंने भी अभी ताजमहल पर एक कविता लिखी है, सुनो-

“रौजे को देखकर, मेरे इश्क ने बलवा किया, बलवा किया….”

वे अभी यह शुरू ही कर पाये थे कि भगत सिंह ने उन्हें बीच में टोकते हुए कहा,

“अच्छा, अच्छा- सुन लिया, अब बंद भी करो अपना यह बलवा…।”

भला राजगुरु जैसा क्रांतिकारी उस घोर ब्रिटिश दासता के जमाने में “बलवा” अर्थात् विप्लव (क्रांति) की बात कैसे भूल सकता था। आखिर अंग्रेजों के विरुद्ध आजीवन क्रांति के लिए ही तो उसने पढ़ाई-लिखाई और घर-परिवार का त्याग किया था। एक बार अर्थाभाववश पूरे 3 दिन तक सभी लोग केवल चाय में ही गुजारा करते रहे। ऐसा कठिन था उनका क्रांतिकारी जीवन। साथी भगवान दास को भी एक दिन इसी तरह कविता सुनाने का चाव हुआ, तो वे भी साथियों के बीच अपनी रची यह तुकबंदी गुनगुनाने लगे-

“हृदय लगी, प्रेम की बात ही निराली,

मन्मथ-शर हो…”

इतना सुनना था कि चन्द्रशेखर आजाद भगवान दास पर बिफर पड़े। अपनी नाराजगी जताते हुए कहने लगे-

“अरे क्या जब देखो तब प्रेम-फ्रेम गाते रहते हो! खुद अपना मन खराब करते हो और दूसरों का भी। कहां मिलेगा इस जिन्दगी में प्रेम-फ्रेम का मौका? कल कहीं किसी सड़क के किनारे पुलिस की गोली खाकर लुढ़कते नजर आओगे।”

डाट सुनते ही भगवानदास माहौर चुप्पी लगा गये। कुछ प्रतिक्रिया नहीं व्यक्त की। यही भगवान दास थे झांसी के छात्र, जिन्हें “हरीशंकर” छद्म नाम से अपने झांसी-प्रवास के दौरान वहां के दो अन्य छात्रों सदाशिवराव मलकापुरकर और विश्वनाथ वैंशपायन अपने साथ भगाकर ग्वालियर ले गये थे। और फिर आजाद के ही नेतृत्व में ये छात्र क्रांतिकारी गतिविधियों में सक्रिय रहते गिरफ्तार होकर कारावास भी झेलते रहे। भगवानदास माहौर को भी एक आरोप में गिरफ्तार किया गया था।

इन तीनों छात्रों के क्रांतिकारी जीवन के प्रेरक आजाद ही थे।

आजाद कहते थे गाना ही है तो “बम फिटकर, पिस्तौल झटककर” ऐसा कुछ गाया कर। वे अपने रुक्ष- कठोर स्वर में गुनगुनाते थे

दुश्मन की गोलियों का हम सामना करेंगे।

आजाद हैं हम और आजाद ही रहेंगे।।

चन्द्रशेखर आजाद कभी-कभी लोकभाषा में ही ये पंक्तियां गुनगुनाया करते थे-

जेहि दिन हुइहै सुरजवा,

तब हम अरहर के दलिया,

और जड़हन के भतुआ,

खूब कचरि के खइबे हो रामा,

जेहि दिन होइहै सुरजवा…।

अर्थात् जिस दिन भारत देश, अपनी यह जन्मदायिनी मातृभूमि ब्रिटिश पराधीनता-पाश से मुक्त होगी, भारत स्वतंत्र होगा, तब उन दिनों हम सब भारतवासी बड़े आनन्द से पेट भरकर, खूब मजे से अरहर की दाल और भात निÏश्चत होकर खाया करेंगे, हां भाइयो! जिस दिन देश स्वराज्य प्राप्त कर लेगा।

-वचनेश त्रिपाठी “साहित्येन्दु’

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