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CBSE से अलग दिल्ली बोर्ड बनाने पर छिड़ी बहस, जानिए बच्चों के भविष्य पर क्‍या होगा असर
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CBSE से अलग दिल्ली बोर्ड बनाने पर छिड़ी बहस, जानिए बच्चों के भविष्य पर क्‍या होगा असर
दिल्लीन सरकार ने अपना नया शिक्षा बोर्ड लाने का फैसला किया है.

विशेषज्ञों का कहना है कि अगर संविधान के हिसाब से देखें तो शिक्षा समवर्ती सूची का हिस्‍सा है. केंद्र और राज्‍य दोनों साथ-साथ चलेंगे. ऐसे में राज्‍यों को पूरा हक है कि वे अपने यहां शिक्षा को लेकर फैसला ले सकते हैं.

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  • Last Updated: August 14, 2020, 2:13 PM IST
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नई दिल्‍ली. दिल्‍ली सरकार ने अपना नया शिक्षा बोर्ड लाने का फैसला किया है. हाल ही में दिल्‍ली शिक्षा मंत्री मनीष सिसोदिया ने दिल्‍ली शिक्षा बोर्ड को लेकर कमेटी गठन करने की जानकारी दी थी. दिल्‍ली सरकार के इस फैसले पर बहस छिड़ गई है. अभिभावक और विशेषज्ञ इस फैसले पर सवाल उठा रहे हैं कि क्‍या अभी तक दिल्‍ली के सरकारी स्‍कूलों में चल रहे सीबीएसई बोर्ड को हटा दिया जाएगा? क्‍या दिल्‍ली बोर्ड सीबीएसई बोर्ड से बेहतर होगा या शिक्षा के स्‍तर को और खराब कर देगा? हालांकि कुछ विशेषज्ञ दिल्‍ली सरकार के इस फैसले को सही और अन्‍य राज्‍यों की तरह ही शिक्षा के क्षेत्र में उठाया गया कदम बता रहे हैं.

दिल्‍ली सरकार के नया बोर्ड लाने की सिफारिशों का विरोध कर रहे ऑल इंडिया पेरेंट्स एसोसिएशन के अध्‍यक्ष और एजुकेशन एक्टिविस्‍ट एडवोकेट अशोक अग्रवाल कहते हैं किे सीबीएसई बोर्ड से एफिलिएटेड दिल्‍ली के सरकारी स्‍कूलों के लिए अलग से बोर्ड बनाना सही फैसला नहीं है. सीबीएसई न सिर्फ केंद्रीय बोर्ड है और इससे मान्‍यता प्राप्‍त स्‍कूल पूरे देश में हैं बल्कि 21 अन्‍य देशों में भी सीबीएसई बोर्ड से पढ़ाई कराई जा रही है. ऐसे में इंटरनेशनल बोर्ड से हटाकर स्‍कूलों को राज्‍य बोर्ड में डालना बच्‍चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ है.

अग्रवाल कहते हैं कि दिल्‍ली सरकार में शिक्षा मंत्री मनीष सिसोदिया का कहना है कि सबसे पहले 40 स्‍कूलों को ही इस बोर्ड से मान्‍यता दी जाएगी. इसमें भी कुछ सरकारी और कुछ प्राइवेट स्‍कूल होंगे. इसके बाद दिल्‍ली बोर्ड की मान्‍यता लेना स्‍कूलों की इच्‍छा पर निर्भर होगा. यह बात भी समझ से परे है. क्‍योंकि अगर दिल्‍ली सरकार कोई बोर्ड बनाएगी तो दिल्‍ली के सभी सरकारी स्‍कूल अपने आप ही उस बोर्ड के अंतर्गत आ जाएंगे. ऐसे में कोई भी प्राइवेट स्‍कूल सीबीएसई बोर्ड को छोड़कर दिल्‍ली बोर्ड के पास आना चाहेगा तो यह कहना मुश्किल है.



हाल ही में महाराष्‍ट्र सरकार ने कहा है कि वे राज्‍य के सभी सरकारी स्‍कूलों को सीबीएसई से अटैच करेंगे. जबकि दिल्‍ली सरकार इसका उल्‍टा ही करने जा रही है. वहीं कई राज्‍यों के ऐसे बोर्ड हैं जहां रिजल्‍ट हाई और मेनिपुलेशन के मामले सामने आए थे. अग्रवाल कहते हैं कि आज भी दिल्‍ली की सीमा से सटे राज्‍यों के बच्‍चे दिल्‍ली के स्‍कूलों में सिर्फ इसलिए पढ़ना चाहते हैं कि उन्‍हें उन राज्‍यों के बोर्ड से पढ़ने के बजाय सीबीएसई बोर्ड से पढ़ना है.
दूसरी तरफ दिल्‍ली सरकार की ये सोच है कि सरकारी स्‍कूलों में वे बच्‍चे पढ़ते हैं जो सीबीएसई बोर्ड के प्राइवेट स्‍कूलों में पढ़ने वाले बच्‍चों का मुकाबला नहीं कर सकते. जैसा कि ये 2015-16 से ही कह रहे हैं. यह सोच बहुत खतरनाक और असंवैधानिक है. बच्‍चों के हक में दूर दूर तक नहीं है. सरकारी स्‍कूलों में पढ़ने वाले आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के बच्‍चों को और कमजोर किए जाने की तैयारी है.

राज्‍य शिक्षा बोर्ड बनाने को लेकर दोबारा सोचे दिल्‍ली सरकार

सदस्‍य राष्‍ट्रीय शिक्षा नीति राम शंकर कुरील कहते हैं कि दिल्‍ली सरकार अपना शिक्षा बोर्ड बना सकती है हालांकि इसका अंतिम फैसला दिल्‍ली के उपराज्‍यपाल की अनुमति के बाद होगा. दिल्‍ली के सभी सरकारी स्‍कूलों में सीबीएसई बोर्ड से मान्‍यता मिली हुई है जो कि केंद्र का बोर्ड है. ऐसे में दिल्‍ली सरकार के अपना शिक्षा बोर्ड बनाने के पीछे एक मुख्‍य वजह यह हो सकती है कि इन्‍हें लगता होगा कि ये हमेशा ही सेंट्रल के चक्‍कर में फंसे रह जाते हैं जबकि ये अपने राज्‍य में और भी बेहतर कर सकते हैं. इनका बोर्ड और अच्‍छी परफॉर्मेंस दे सकता है. ये भी संभव है कि दिल्‍ली सरकार शिक्षा के क्षेत्र में अपनी एक अलग पहचान बनाना चाहती हो.  हालांकि सीबीएसई एक केंद्रीय बोर्ड है और बड़ा प्‍लेटफॉर्म है तो उसे छोड़कर राज्‍य के बोर्ड और छोटे प्‍लेटफॉर्म पर जाना कितना सही होगा, ये कहा नहीं जा सकता. ऐसे में दिल्‍ली सरकार को इस मामले में एक बार और सोचना चाहिए, उसके बाद ही कोई फैसला लेना चाहिए.

अगर दिल्‍ली बोर्ड को नई शिक्षा नीति के अनुसार देखें तो शिक्षा बोर्ड चाहे सीबीएसई हो या किसी भी राज्‍य का हो इससे बहुत फर्क नहीं पड़ता है लेकिन नई नीति के अनुसार इन सभी स्‍कूलों में शिक्षा, सिलेबस और परीक्षा का पैटर्न एक जैसा ही होगा. सभी बच्‍चों को एक जैसी ही शिक्षा मिलनी चाहिए.

हर राज्‍य का अपना बोर्ड है फिर दिल्‍ली सरकार बना रही है तो क्‍या परेशानी है ?

शिक्षाविद प्रो. अनिल सद्गोपाल का कहना है कि दिल्‍ली सरकार अपना बोर्ड क्‍यों नहीं बना सकती. यह संवैधानिक है. केंद्र अपनी चीजें नहीं थोप सकता. इस देश में हर राज्‍य सरकार का अपना शिक्षा बोर्ड है. दिल्‍ली कोई अलग काम तो कर नहीं रहा. देश के सभी राज्‍यों के ही बोर्ड में 95 फीसदी बच्‍चे पढ़ाई कर रहे हैं. जबकि सीबीएसई बोर्ड में पढ़ने वाले बच्‍चों का प्रतिशत महज पांच फीसदी ही है. सीबीएसई प्राइवेट स्‍कूलों का बोर्ड है. इन्‍हीं स्‍कूलों ने अभिभावकों के मन में भ्रम पैदा किया है कि सीबीएसई बोर्ड बेहतर और राज्‍यों के बोर्ड अभिभावकों को कमतर लग रहे हैं. जबकि ऐसा नहीं होना चाहिए. देशभर में 1100 केंद्रीय विद्यालय, करीब 700 नवोदय और प्राइवेट स्‍कूलों को सीबीएसई बोर्ड की मान्‍यता है. जबकि पूरी दिल्‍ली में देखें तो तीन हजार से ज्‍यादा स्‍कूल हैं जो एक बड़ी संख्‍या है और ये अभी तक सीबीएसई से जुड़े हैं. ऐसे में अगर दिल्‍ली बोर्ड बनता है तो ये स्‍कूल उसमें शामिल हो जाएंगे. इसमें परेशानी क्‍या है. जो लोग दिल्‍ली बोर्ड बनने पर सवाल उठा रहे हैं तो वे क्‍यों उठा रहे हैं. इसकी एक ही वजह नजर आती है कि नौकरियों में ये पूछा जाता है कि सीबीएसई बोर्ड से पढ़ाई की है. जबकि यह मानसिक सोच ठीक नहीं है. क्‍या सीबीएसई मानक है?

अगर आप संविधान के हिसाब से चल रहे हैं तो शिक्षा समवर्ती सूची का हिस्‍सा है. केंद्र और राज्‍य दोनों इसमें साथ-साथ चलेंगे. ऐसे में राज्‍यों को पूरा हक है कि वे अपने यहां शिक्षा को लेकर फैसला ले सकते हैं. 1974 से पहले तक शिक्षा राज्‍यों का ही मसला था. वहीं एक और खास बात है वह यह है कि हाल ही में नई आई राष्‍ट्रीय शिक्षा नीति शिक्षा को सेंट्रलाइज्‍ड करने की हिमायत करती है. जो किसी भी प्रकार से राज्‍यों, उनकी संप्रभुता और सांस्‍कृतिक शिक्षा के लिए ठीक नहीं है.

डॉ. सद्गोपाल कहते हैं कि एक बात जो दिल्‍ली के शिक्षा मंत्री मनीष सिसोदिया ने कही वह समझ के बाहर है कि दिल्‍ली बोर्ड बनने के बाद दिल्‍ली के सभी सरकारी स्‍कूल इस बोर्ड का हिस्‍सा नहीं होंगे बल्कि सिर्फ 40 निजी और सरकारी स्‍कूलों को ही सबसे पहले इस बोर्ड से जोड़ा जाएगा. बाकी स्‍कूलों की इच्‍छा पर निर्भर होगा कि वे सीबीएसई से मान्‍यता जारी रखते हैं या दिल्‍ली बोर्ड की मान्‍यता लेते हैं. जबकि अभी तक के राज्‍यों के बोर्डों को देखें तो दिल्‍ली बोर्ड बनते ही सभी सरकारी स्‍कूल उसी बोर्ड का हिस्‍सा स्‍वाभाविक रूप से बन जाएंगे. इसलिए सिसोदिया की बात को स्‍पष्‍ट करना जरूरी है.

राज्‍यों की बात है तो महाराष्‍ट्र का बोर्ड देखिए काफी बेहतर है. वहीं तमिलनाडू का बोर्ड तो इतना एडवांस है कि वहां से पढ़े हुए बच्‍चों को मेरिट के आधार पर ही सीधे मेडिकल कॉलेज या इंजीनियरिंग कॉलेजों में में दाखिला मिल जाता था. हालांकि अब नीट के कारण चीजें बदली हैं.

अभिभावकों को ये सोचना होगा कि ऐसा तो है नहीं कि सीबीएसई बोर्ड में जो बच्‍चे पढ़ते हैं वे बहुत बुद्धिमान हो गए. बाकी राज्‍य बोर्डों से पढ़ने वाले बच्‍चे बेकार हैं. इसलिए शिक्षा में राज्‍य अगर कदम बढ़ा रहा है तो केंद्र को उसे सहयोग करना चाहिए. यहां एक उदाहरण से समझना चाहिए कि नगालैंड, मेघालय, मिजोरम जैसे राज्‍यों के स्‍कूलों और वहां की जनजातियों के लिए जितनी जमीनी, सांस्‍कृतिक रूप से पुष्‍ट और बेहतर शैक्षिक व्‍यवस्‍था वहां के राज्‍य का बोर्ड कर लेगा, उतना बेहतर क्‍या सीबीएसई बोर्ड कर लेगा.
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